सितंबर में घूम लें इस खूबसूरत जगह, नहीं अगले 6 माह तक नहीं मिलेगा मौका

लद्दाख घूमने का मन है, तो देर न करें, क्योंकि अभी चूक गए, तो फिर अगले 6 महीनों तक यहां जाने का मौका खो देंगे। अगर खर्च की चिंता सता रही है, तो हम आपको को कुछ टिप्स दे रहे हैं, जिससे आप बजट को कंट्रोल में रख सकते हैं।

दरअसल लद्दाख जाने के लिए टाइमिंग के साथ ही प्लानिंग और पैकेजिंग अहम होती है। इसके लिए 10 दिनों का टूर बनाएं। इससे आप 20,000 रुपए में घूमकर वापस आय सकते हैं। लेकिन यह सफर बहुत लक्जरी नहीं होगा।

लद्दाख जाने के लिए दिल्ली से कम से कम दस दिन लग जाते हैं। यहां जाने के लिए साथ साथ में गर्म कपड़े लेकर जरुर जाएं। लद्दाख जाकर भी इन्हें खरीद सकते हैं। लेकिन इससे आपका बजट बिगड़ सकता है। वहीं साथ में खाने के लिए ड्राई फ्रूट लेकर जाएं।

कैसे जाएं-

पहला दिन (लद्दाख) –

सफर की शुरुआत के लिए दिल्ली पहला डेस्टिनेशन होना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले दिल्ली पहुंचना होगा।

दूसरा दिन (मनाली)-

दिल्ली के बाद अगला स्टॉप मनाली होगा। इसके लिए दिल्ली के ISBT कश्मीरी गेट बस स्टॉप से बस ले सकते हैं। यहां से हिमाचल रोडवेज और प्राइवेट दोनों तरह की बसें मिलती है। इस तरह 12 से 15 घंटे में मनाली पहुंच सकते हैं।  हिमाचल रोडवेज से मनाली बस स्टैंड तक का किराया 700 रुपए होगा।

तीसरा दिन (केलांग)

मनाली में रात गुजारने के बाद सुबह केलांग के लिए निकाल सकते हैं। इसके लिए आपको दोबारा न्यू मनाली बस स्टैंड जाना होगा।  बस 180 रुपए में केलांग पहुंचाएगी। केलांग पहुंचकर 500 रुपए में एक गेस्ट हाउस मिल जाएगा। यहां से लाहुल के बेहतरीन नजारों का दीदार किया जा सकता है।

चौथा दिन (लेह)-

केलांग से अगले दिन सुबह पांच बजे ही स्टेट ट्रांसपोर्ट बस से लेह के लिए निकलना बेहतर होगा। इसका टिकट 525 रुपए का होगा। इस तरह आप शाम के सात बजे तक लेह पहुंच जाएंगे। लेह बस स्टैंड से चांग्पा के लिए वेहिकल किराए पर ले, जो 350 रुपए में मिल जाएगा। चांग्पा में लद्दाखी किराए पर घर मिल जाएंगे। इसके लिए एक व्यक्ति को 500 रुपए किराया देना होगा।

पांचवा दिन (नुब्रा वैली)-

चांग्पा में रात रुकने के बाद अगली सुबह करीब आठ बजे नुब्रा वैली के लिए निकलें। इसके लिए पहले से शेयरिंग वेहिकल में सीट जरुर बुक कर लें। एक सीट के लिए 2 से ढ़ाई हजार रुपए देने होंगे। इसके अलावा इंट्री और एनवायरनमेंट फीस के लिए 100 रुपए देने होंगे। नुब्रा वेली में खारदुंग ला पास जाएं, जो कि विश्व की सबसे ऊंचाई वाली मोटरेबल रोड है। साथ ही दिश्कित गांव जाएं, जो कि एक मोनेस्ट्री गांव है। यहां एक बुद्ध का स्टैच्यू है। नुब्रा वैली घूमने के बाद रात गुजारने के लिए लेह लौट आएं।

छठा दिन (पैंगोंग झील)-

पैंगोंग झील जाने के लिए सरकारी का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए दो से ढ़ाई हजार किराया लगेगा। अगर आप यहां के लिए सुबह आठ बजे निकलेंगे, तो दोपहर एक बजे पहुंचेंगे। यहां घूमने के बाद रात लेह में ही गुजारें।

सातवां दिन (लेह)-

लेह के आसपास का एरिया कवर करने के बाद अगली सुबह लेह स्थित शांति स्तूप का प्लान बनाया जा सकता है। इसके अलावा लेह पैलेस जा सकते हैं। इसकी इंट्री के लिए 100 रुपए लगेगे।

आठवा दिन- केलांग

अगले दिन सुबह लेह से चांग्पा के लिए कैब ले सकते हैं। जो कि 350 रुपए में मिलेगी। फिर चांग्पा से केलांग के लिए बस ले,जो शाम पांच बजे पहुंचाएगी। बस का किराया 580 रुपए होगा। यहां 500 रुपए का एक रुम लेकर रात रुके।

नौवां दिन मनाली-

सुबह केलांग से मनाली के लिए बस ले, जो 180 रुपए में मिल किराया लेगी। मनाली में फ्रेश होने के बाद दिल्ली के लिए बस ले, जो 700 रुपए में दिल्ली पहुंचा देगी।

दसवां दिन (दिल्ली)

अगले दिन आप दिल्ली में होंगे, जहां से आप देश की अन्य शहरों के लिए ट्रेन ले सकते हैं।

अतिरिक्त खर्च

इस सभी खर्च में खाने का खर्च शामिल नहीं है। ऐसे में इसे अपने खर्च में जोड़कर चले। आमतौर पर एक दिन में खाने पर 500 रुपए खर्च हो जाते हैं। ऐसे में दस दिनों का अतिरिक्त खर्च 5 हजार जोड़कर चलें।

अब सरकार खरीदेगी पांच रूपये किलो गोबर, देश भर में लगेंगे गोबर से कागज़ बनाने के प्लांट

गोबर शब्द का प्रयोग अक्सर बर्बादी के लिए किया जाता है। लेकिन अब गाय के गोबर अच्छी-खासी कमाई का जरिया बनने जा रहे है। सरकार ने गोबर से कागज (paper) बनाने का सफल प्रयोग कर लिया है।

एमएसएमई मंत्रालय के तहत काम करने वाले खादी ग्रामोद्योग (केवीआईसी) की यूनिट केएनएचपीआई ने तो गाय के गोबर (cowdung) से कागज का उत्पादन भी शुरू कर दिया है।

अब देश भर में इस प्रकार के प्लांट लगाने की योजना तैयार की जा रही है। कागज बनाने के लिए गोबर के साथ कागज के चिथड़े का इस्तेमाल किया जाता है।

गोबर से वेजिटेबल डाई बनाने का भी काम

केवीआईसी के चेयरमैन वी.के. सक्सेना ने मनी भास्कर को बताया कि गोबर से कागज बनाने के साथ वेजिटेबल डाई बनाने का भी काम किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि गोबर में से कागज बनाने लायक सिर्फ 7 फीसदी मैटेरियल निकलते हैं। बाकी के 93 फीसदी का इस्तेमाल वेजिटेबल डाई बनाने में इस्तेमाल किया जाएगा। ये वेजिटेबल डाई पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। इसका निर्यात भी किया जा सकता है।

5 रुपये किलो बिकेंगे गोबर

सक्सेना ने मनी भास्कर को बताया कि यह स्कीम किसानों की आय को दोगुना करने के लिए लाई जा रही है। उन्होंने बताया कि कागज एवं विजिटेबल डाई बनाने के लिए सरकार 5 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से किसानों से गोबर खरीदेगी। एक जानवर एक दिन में 8-10 किलोग्राम गोबर करता है। ऐसे में, किसानों को अपनी मवेशियों से रोजाना कम से कम 50 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।

कहां-कहां लगेंगे प्लांट

सक्सेना ने बताया कि इस प्रकार के प्लांट देश भर में लगाने की योजना है। निजी लोगों को इस प्रकार के प्लांट लगाने के लिए सरकार की तरफ से कर्ज मुहैया कराए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि केवीआईसी ने इस टेक्नोलॉजी का सफल परीक्षण कर लिया है और केवीआईसी लोगों को टेक्नोलॉजी देने का काम करेगा। उन्होंने बताया कि केवीआईसी के जयपुर स्थित केएनएचपीआई प्लांट में अगले 15-20 दिनों में गोबर से कागज बनाने का काम आरंभ हो जाएगा।

15 लाख में लग जाएंगे ये प्लांट

गोबर से कागज बनाने वाले प्लांट लगाने में 15 लाख रुपये खर्च होंगे। एक प्लांट से एक माह में 1 लाख कागज के बैग बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा वेजिटेबल डाई अलग।

सहजन की खेती से जीवन में हरियाली, प्रतिवर्ष होती है 2 लाख की आमदन

बदलते परिवेश में परंपरागत खेती से इतर नकदी फसलों को उगाकर अच्छी आमदनी की जा सकती है। इसे साबित कर रहे हैं विघ्नेश भगत। 10 एकड़ में सहजन की हरियाली से समृद्धि की गाथा लिख रहे हैं। कई युवा किसान उनसे प्रेरित होकर इस राह पर चल पड़े हैं।

जिले में पहली बार व्यापक स्तर पर सहजन की खेती किसानों के लिए बेहतर आमदनी का जरिया बनी है। मधुबनी जिले के अंधराठाढी प्रखंड की शिवा पंचायत के घघोरिया गाव निवासी 46 वर्षीय विघ्नेश ने मंगरौनी गाव में लीज पर 10 एकड़ जमीन लेकर इसकी खेती शुरू की।

अभी फसल के रूप में सहजन के पत्ते अन्य प्रदेशों में भेज रहे हैं। उन्हें रामबालक राय, अमित कुमार और राघवेंद्र ठाकुर का सहयोग प्राप्त हो रहा है। एक एकड़ से प्रतिवर्ष दो लाख तक की आमदनी

विघ्नेश के मुताबिक औषधीय गुणों से भरपूर सहजन की एक एकड़ खेती में करीब 75 हजार लागत आती है। पांच साल तक इसके पत्ते और डंठल से प्रतिवर्ष डेढ़ से दो लाख तक आमदनी होती है। वे कहते हैं, देश के कई हिस्सों में उन्नत किस्म के सहजन की पत्ती की बढ़ती माग को देखते हुए इसकी खेती की शुरुआत की।

विघ्नेश से प्रेरणा लेकर ठाहर गाव निवासी ललित सिंह, धनछीहा गाव निवासी श्याम कुमार यादव, संजय कुमार मंडल और कौशलेंद्र कुमार साह सहित अन्य युवा किसान इसकी खेती के लिए आगे आए हैं। किसान कपिलदेव झा कहते हैं कि सहजन की खेती पर सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए,

ताकि इसके उत्पादन के प्रति किसानों का रुझान बढ़ सके। सलाद के रूप में पत्ते का प्रयोग : सहजन के पत्ते, फूल और फल सभी में काफी पोषक तत्व होते हैं। इसमें प्रोटीन, लवण, लोहा, विटामिन-बी, विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

इसके पत्ते का प्रयोग सलाद के तौर पर भी होता है। बीज से तैयार तेल खाने के साथ अन्य में उपयोगी होता है। सहजन की खेती काफी आसानी से हो जाती है। आमतौर पर सहजन सब्जी देने वाला पेड़ माना जाता रहा है।

इसके पेड़ किसानों के घर-बगीचे के अलावा सड़क किनारे देखे जा सकते हैं। इन पर वर्ष में एक से दो बार फल आते हैं। सब्जी के रूप में प्रयोग में आने वाले सहजन की माग सीजन में काफी रहती है। इसकी पत्तिया पशुओं के चारे के रूप में काफी उपयोगी मानी गई हैं। इसके सेवन से पशुओं के दूध में वृद्धि होती है।

सहायक निदेशक पौधा संरक्षण सह सहायक निदेशक उद्यान सतीशचंद्र झा कहते हैं कि वैसे तो सहजन की खेती पर सब्सिडी का कोई दिशा-निर्देश नहीं है। लेकिन, कोई किसान इसके लिए आवेदन देता है तो उसे विभाग को भेजा जाएगा। जिले में व्यापक स्तर पर उन्नत किस्म के सहजन की खेती से किसान अच्छी आमदनी कर सकते हैं।

गरीब किसानो के लिए एटीएम की तरह है बकरी पालन ,बेहद कम निवेश में ऐसे करें शुरुआत

बकरी पालन गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। बकरी को पालने के लिए अलग से किसी आश्रय स्थल की आश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें अपने घर पर ही रखते हैं। बड़े पैमाने पर यदि बकरी पालन का कार्य किया जाए, तब उसके लिए अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता पड़ती है।

यह उल्लेखनीय है कि देशी बकरियों के अलावा यदि बरबरी, जमुनापारी इत्यादि नस्ल की बकरियां होंगी तो उनके लिए दाना, भूसी, चारा की व्यवस्था करनी पड़ती है, पर वह भी सस्ते में हो जाता है। दो से पांच बकरी तक एक परिवार बिना किसी अतिरिक्त व्यवस्था के आसानी से पाल लेता है। घर की महिलाएं बकरी की देख-रेख करती हैं और खाने के बाद बचे जूठन से इनके भूसा की सानी कर दी जाती है। ऊपर से थोड़ा बेझर का दाना मिलाने से इनका खाना स्वादिष्ट हो जाता है। बकरियों के रहने के लिए साफ-सुथरी एवं सूखी जगह की आवश्यकता होती है।

एक सफल किसान की कहानी से जाने बकरी पालन का फ़ायदा

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है ।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

सुखचैन ने बतया के जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी

सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब 50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है।

एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

अब आप भी कर सकते है सोलर बिज़नेस.यह कंपनी दे रही है पार्टनर बनाने का मौका

सोलर सेक्टर में बिजनेस की संभावनाएं बढ़ रही हैं। आप भी यदि कोई नया बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं तो इन सोलर कंपनियों के साथ जुड़कर बिजनेस कर सकते हैं। कई बड़ी सोलर कंपनियां अपने बिजेनस पार्टनर की तलाश कर रही हैं।

कंपनी का अनुभव आपके काफी काम आ सकता है। कंपनियां आपको प्रोडक्ट्स की सप्लाई करती हैं। साथ ही, आपको मार्केटिंग, ब्राडिंग जैसे सपोर्ट भी कर रही हैं। आइए, जानते हैं कि कौन-कौन सी कंपनियां सोलर पार्टनर बनने का मौका दे रही हैं।

यह कंपनी दे रही है मौका

लगभग 25 साल पुरानी कंपनी वारी ने एक दशक पहले सोलर सेक्‍टर में कदम रखते हुए वारी एनर्जाइस लिमिटेड की शुरुआत की और सोलर सेक्‍टर में एक बड़ा नाम बन चुकी है। कंपनी देश भर में सोलर चैनल पार्टनर बना रही है।

वारी का पार्टनर बन कर आप सोलर मॉड्यूल, सोलर इन्‍वर्टर, सोलर वाटर पम्‍प, मॉड्यूल माउंटिंग स्‍ट्रक्‍चर, सोलर वाटर हीटर, सोलर पावर प्‍लांट ( रूफटॉप सिस्‍टम), इंटरनेट पोर्टल के अलावा हाउसहोल्‍ड सोलर प्रोडक्‍ट्स सेल कर सकते हैं। कंपनी की ओर से आपको मार्केटिंग असिस्‍टेंस भी दी जाएगी। आप प्रोडक्‍ट सेल के अलावा सर्विस भी प्रोवाइड कर सकते हैं।

मात्र 25 हजार में शुरू करें बिजनेस

एक और बड़ी कंपनी सुकैम भी चैनल पार्टनर बनने का मौका दे रही है। सुकैम का दावा है कि 25 से 40 हजार रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से आप कंपनी का चैनल पार्टनर बन सकते हैं।

सुकैम भी सोलर प्रोडक्‍ट्स बनाती है। आप भी सोलर प्रोडक्‍ट बेच कर अच्‍छा खासा बिजनेस कर सकते हैं। कंपनी की ओर से आपको बिजनेस ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही, मार्केटिंग असिस्‍टेंस भी दी जाती है।

इस कंपनी के साथ जुड़कर करें बिजनेस

साल 1979 में स्‍थापित उजास एनर्जी लिमिटेड भी सोलर चैनल पार्टनर बनने का मौका दे रही है। आप कंपनी के साथ जुड़कर अपना बिजनेस शुरू कर सकते हैं।

कंपनी का दावा है कि चैनल पार्टनर बन कर आप अच्‍छी खासी कमाई कर सकते हैं। अगर आप उजास की चैनल पार्टनरशिप लेना चाहते हैं तो यहां क्लिक कर सकते हैं। https://ujaashome.com/channel-partner/

यह कंपनी भी दे रही है मौका

सोलर मैक्‍स भी सोलर सेक्‍टर का जाना पहचाना नाम है। सोलर मैक्‍स ने भी चैनल पार्टनर बनने का ऑफर रखा है। कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर बताया है कि पार्टनर बनने के बाद कंपनी की ओर से कौन सी सर्विस आपको प्रोवाइड कराई जाएंगी। जैसे कि ट्रेनिंग, मार्केटिंग सपोर्ट, सेल सपोर्ट और टैक्निकल सपोर्ट कंपनी की ओर से दी जाएंगी।

हरियाणा की मंडी में पहुंची नई बासमती 1509 इस रेट बिकी

सरकार की ओर से अभी तक धान की सरकारी खरीद शुरू नहीं हुई है, हालांकि निसिंग जिल्हा करनाल की अनाजमंडी में बीते तीन दिनों से किसानों का बासमती किस्म का 1509 धान पहुंच रहा है। इसे व्यापारियों द्वारा तुरंत खरीदा जा रहा है। बीते कई दिनों से मंडी में किसानों का धान पहुंचना शुरू हो गया है। व्यापारियों द्वारा जिसकी खरीद शुरू होते ही मंडी में आवक बढ़ने लगी।

रविवार को मंडी में धान की आवक एक हजार क्विंटल तक पहुंच गई है। मंडी में अभी तक बासमती की 1509 किस्म का धान ही पहुंच रहा है। व्यापारियों द्वारा जिसे 22 सौ रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 24 सौ दस तक खरीद किया जा रहा है। पिछले साल यहाँ बासमती 1509 की कीमत लगभग 2700 रुपये के करीब थी वही अब किसानो को पिछले साल के मुकाबले 400 रुपए कम भाव मिल रहा है जो कंबाइन से कटाई किया गया है। इसकी तुरंत खरीद की जा रही है। हालांकि मंडी में धान का व्यापार करने वाले दलालों के पुराने धान की खरीद भी चल रही है।

मंडी में धान की कम आवक के कारण 70 फीसदी कमीशन एजेंटों की दुकानों पर अभी धान नही पहुंच पाया है, लेकिन मंडी के कमीशन एजेंटों ने दुकानों पर प्रतिदिन जाना शुरू कर दिया है। उनकी ओर से खरीद से पूर्व की तैयारियां दुरूस्त की जा रही है।

इस संबंध में मार्केट कमेटी उप चेयरमैन मुकेश गोयल ने किसानों से अपील की है कि वे अपने धान की सफाई कर व सुखाकर लाएं, ताकि उनके धान का उचित दाम मिल सकें। किसानों को मार्केट कमेटी की ओर से सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाऐगी। धान के सीजन में किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नही होने दी जाऐगी।

खेती करते वक़्त किसान को मिली 50 लाख की बेशकीमती चीज

देने वाला जब भी देता है छप्पर फाड़कर देता है। यह कहावत एक बार फिर सच साबित हुई है। किसी और की जमीन पट्टे पर लेकर अपना गुजारा कर रहे किसान को खेत से बेशकीमती चीज मिली। जैसे ही वह उसे अधिकारी के पास लेकर गया, उसे देखकर वह भी हैरान रह गए।

सरकोहा गांव के रहने वाले प्रकाश शर्मा को खेत जोतते वक्त दुर्लभ हीरा मिला था। इस 12.58 कैरेट के हीरे की कीमत 50 लाख रुपये है। उन्होंने खनीज विभाग के कार्यालय में हीरा जमा करवा दिया है। हीरे की अब नीलामी होगी और जो भी रकम इकट्ठा होगी उसका 20-25 फीसदी हिस्सा किसान को दिया जाएगा।

जिला खनन एवं हीरा अधिकारी संतोश सिंह ने कहा, ‘करीब 4 साल बाद इतना बड़ा हीरा कार्यालय में जमा करवाया गया है। इससे कर्मचारियों में भी उत्साह है। कई खदानों के बंद हो जाने के बाद हीरा उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा है। मगर इस हीरे के मिलने के बाद से उद्योग से जुड़े लोगों को नई उम्मीद मिली है।

प्रकाश सिंह को जो जिस जमीन में हीरा मिला है उसके मालिक केदारनाथ राइकवार हैं। एक अनुमान के मुताबिक मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में करीब 12 लाख कैरेट का हीरा मौजूद है। यहां बड़ी तादाद में लोग हीरा खनन के पेशे से जुड़े हैं। कई लोग पट्टे पर जमीनें लेकर यह काम कर रहे हैं।

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

डॉ. वीरेंद्र लाठर ने बताया अगर किसान चने का बीज लेना चाहते है तो M: 9915463033 सरदार जगदीप ढिल्लो, गांव फुल्लेवाला, कपूरथल्ला से खरीद सकते है

सरकारी नौकरी में नहीं लगा मन तो शुरू किया ये काम

आज के दौर में युवाओं को खेतों में काम करना अच्छा नहीं लगता और हर कोई नौकरी करना चाहता है। वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो नौकरी छोड़ खेती की ओर लौट रहे हैं या इससे जुड़ा बिजनेस शुरू कर रहे हैं।

गुजरात के जूनागढ़ के रहने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं तुलसीदास लुनागरिया जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और सिर्फ 6 साल में वो करोड़पति बन गए। इतना ही इस शख्स ने एक नहीं बल्कि चार बिजनेस की शुरुआत की। आइए जानते हैं इस शख्स ने कैसे की शुरुआत…

नौकरी छोड़कर शुरू किया बिजनेस

तुलसीदास लुनागरिया ने बातचीत में बताया कि जूनागढ़ के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर से एग्रीकल्चरल साइंस में ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने नौकरी की तैयारी की। इसके बाद उन्हें ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी, जो सरकारी नौकरी थी।

उनका कहना है कि नौकरी के दौरान उनको काम में मन नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि वो बिना महत्वाकांक्षा और चुनौती के एक रूटिव वर्क कर रहे हैं। वो खुद के एग्रीवेंचर की शुरुआत करने का सपना देखने लगे। इसलिए 4 महीने बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का बिजनेस शुरू किया।

एक-दो नहीं 4 बिजनेस किया शुरू

नौकरी छोड़ने के बाद तुलसीदास को एग्री सेंटर एंड एग्री बिजनेस स्कीम के बारे में पता चला। उन्होंने एसीएंडएबीसी के दो महीने के कोर्स में दाखिला लिया और अहमदाबाद में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ पब्लिक लीडरशिप (आईएसपीएल) से ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने मार्केटिंग, अकाउंटिंग और डीपीआर बनाना सीखा। इस दौरान उन्होंने एग्री बिजनेस से एक्सपर्ट्स से मिलने-सुनने का मौका मिला।

ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उन्होंने चार बिजनेस की शुरुआत की। कितना है कंपनियों का टर्नओवर कॉटन सीड्स ऑयल एक्सप्लोरेशन और कॉटन सीड्स केक बनाने वाली कंपनी अविरत कॉटन इंडस्ट्रीज का सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपए है। एडवेंता एक्सपोट प्राइवेट लिमिटेड वाटर सॉल्यूएबल फर्टिलाइजर, प्लांट ग्रोथ प्रोमोटर औऱ स्वाइल कंडिशनर जैसे पोटैसियम ह्यूमेट, फूलविक एसिड्स का देश भर में सप्लाई करती है। साथ ही एग्रो कमोडिटीज जैसे रॉ कॉटन बेल्स, मसाले, फल और सब्जी का एक्सपोर्ट करती है।

कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए है। इसके अलावा रेनो एग्री-जेनेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर 5 करोड़ और विमैक्स कॉर्प साइंस लिमिटेड का टर्नओवर 28 करोड़ रुपए है। चार कंपनियों का कुल टर्नओवर 95 करोड़ रुपए है। आगे भी पढ़ें

8 राज्यों में फैला है बिजनेस

तुलसीदास का कहना है कि उनका बिजनेस देश के 8 राज्यों में फैला है। यूपी, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में उनके ग्राहक हैं। विमैक्स कॉर्प साइंस एग्रोकेमिलकल्स की मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग करती है।

एग्रो केमिकल्स में इंसेक्टिसाइड्स, फंगीसाइड्स, विडीसाइड्स, प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर्स और माइक्रो नूट्रीएंट्स के साथ ऑर्गेनिक पेस्टिसाइट्स बनाती है। 120 लोगों को दे रखा है रोजगार कमाई के साथ वो लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी कंपनी में 120 कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने हरके साल एक लाख किसानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य बनाया है जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।

5 करोड़ रु है सालाना इनकम

तुलसीदास बताते हैं कि चारों बिजनेस से उनको अच्छी कमाई हो जाती है। वो करीब 5 करोड़ रुपए सालाना इनकम कर लेते हैं। प्रोडक्ट खरीदने वाले किसानों को वो खेती के बारे में ज्ञान भी देते हैं। कब उस फसल को पानी देना है, कब नूट्रीएंट्स देने हैं और पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करना है। वो कहते हैं कि उनके इस सर्विस से किसान खुश हैं।

ऐसे आप भी खुद त्यार करें कीटनाशक,दोगनी होगी पैदावार

किसान परंपरागत खेती कर मौसम की मार झेल घाटा सह रहे हैं, लेकिन जिले के कुछ किसान खेती में नए-नए प्रयोग कर अलग किस्म की खाद व कीटनाशक तैयार करने के साथ पैदावार तो बढ़ा ही रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मदद से खेती कर खूब मुनाफा भी कमा रहे हैं।

ये किसान खुद के बनाए कीटनाशक अौर खाद खेती में प्रयोग कर रहे हैं और कई प्रदेशों में इसकी सप्लाई भी कर रहे हैं। इनमें से कोई किसान बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़कर खेती कर रहा है तो कोई मजदूरी छोड़कर। यही नहीं, वे आस-पास के किसानों को उच्च तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं

पॉली हाउस या शेड नेट लगाने के लिए एक बार अधिक लागत लगती है, लेकिन बाद में किसान इससे काफी कमाई कर सकते हैं। छोटी जोत वाले किसान भी प्रशिक्षण लेकर परंपरागत खेती छोड़ आधुनिक तरीके से खेती शुरू करे तो आय काफी बढ़ सकती है।

गरीब किसान जो तकनीकी खेती में आने के लिए रुपए नहीं होने से डरते हैं, वे एमपीयूएटी या कृषि विभाग में जाकर सरकार के अनुदान के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

कोई बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ कृषि से कर रहा दोगुनी कमाई, कोई बेटे को एग्रीकल्चर में एमबीए करा तकनीकी खेती कर रहा 

3 कहानियां : जो न खुद खेती कर रहे हैं… नई तकनीक बताकर औरों को भी कर रहे प्रेरित

पिता तैयार करते हैं कीटनाशक, बेटा कृषि में एमबीए, अब करते हैं ऑनलाइन व्यापार

बुझड़ा गांव निवासी किसान वरदीचंद पटेल ने कुछ साल पहले एमपीयूएटी में प्रशिक्षण लेकर वर्मीकंपोस्ट खाद बनाना शुरू किया। खुद की खेती में प्रयोग किया व आसपास भी सप्लाई किया।

फिर एग्रीकल्चर में एमबीए बेटा भी इस व्यापार से जुड़ा और ऑनलाइन ऑर्डर लेना शुरू किया। आज एमपी, हिमाचल प्रदेश तक खाद सप्लाई करते हैं। दोनों अन्य किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। दोनों की सालभर की कमाई 12 लाख से अधिक है।

वर्मीकंपोस्ट खाद

बैंक की नौकरी छोड़ शुरू की खास मिर्च की खेती, नौकरी से दोगुनी कमाई कर रहे

फतहनगर के नारायण सिंह उर्फ राजू पहले बैंक मैनेजर थे। नौकरी के दौरान भीलवाड़ा में एक किसान का मिर्च फार्म देखा। उस किसान ने सालभर में मिर्च बेचकर 13 लाख से अधिक कमाए थे।

इसके बाद राजू ने नौकरी छोड़कर किसान से प्रशिक्षण लिया। फिर गोपालसागर में 85 हजार प्रतिवर्ष किराए पर चार बीघा जमीन ली और मिर्च की खेती शुरू की। पिछले साल डेढ़ लाख लगाकर इजराइली पैटर्न पर मलचिंग स्टाइल में मिर्च लगाई। चार माह में ही साढ़े तीन लाख कमाए।

मजदूरी छोड़ शुरू की खीरे की खेती, पहली फसल में 6-7 लाख का मुनाफा

सलूंबर जैताणा के कांतीलाल मेहता व सराड़ा चावंड के शिवराम जोशी महाराष्ट्र में मजदूरी करते थे। वहीं हाइटेक खेती का प्रशिक्षण लिया और यहां खेती में संभावनाएं तलाशी। फिर मजदूरी छोड़ वापस उदयपुर आए और पॉली हाउस में खेती करने का प्रशिक्षण लिया।

पिछले साल दोनों ने अलग-अलग अनुदान प्राप्त कर 4 हजार वर्ग मीटर का पॉली हाउस लगाया व खीरा-ककड़ी की खेती शुरू की। पहली फसल में ही कांतीलाल को 6 लाख व शिवराम को 7 लाख का मुनाफा हुआ।