आ गया 35 रूपये का मशरुम बैग, घर में लगाएं और ताज़ा मशरूम खाएं

अब मशरूम बाजार से लेने की टेंशन खत्म । घर के किसी भी कोने में रेडी टु फ्रूट (आरटीएफ)
मशरूम बैग टांग दो और 13 से 20 दिन में ताजा मशरूम तैयार हो जाएगी । वो भी 30 से 35 रूपये में । इस बैग से तीन तुड़ाई होंगी और पौने किलो के करीब मशरूम मिलेगी । यह मशरूम बैग देखने में इतना सूंदर है की इसे आप अपने घर के ड्राइंग रूम, किचन, बालकनी में भी टांग सकते हैं ।

अर्बन एरिया में लोगों के लिए भी ये उपयोगी साबित होगा । आईसीऐआर के देश में एकमात्र डायरेक्टोरेट मशरूम रिसर्च (डीएम्आर) सोलन ने मशरूम को आम आदमी में लोकप्रिय बनाने के लिए देश में रेडी टू फ्रूट मशरूम बैग की लो कॉस्ट टेक्नोलॉजी तैयार की है । इससे लोगों को अपने घर पर ही ताज़ी मशरूम भी मिलेगी ।

रेडी टू फ्रूट बैग का वज़न करीब 2 किलोग्राम होगा । इसमें कम्पोस्ट, स्पॉन सब कुछ मिलाकर तैयार किया जाता है । इसके बाद बैग में कुछ छेद किये जाते हैं ताकि मशरूम बहार निकल सकें। इस बैग से पैदा होने वाली आयस्टर मशरूम बाजार में 80 से 100 रूपये प्रति किलोग्राम मिलती है ।

यह बाजार के मुकाबले ताज़ा होंगे और नुट्रिसियंस ज्यादा होंगे । रेडी टू फ्रूट मशरूम बैग की लो कॉस्ट टेक्नोलॉजी तैयार करने वाले डीएम्आर के वैज्ञानिक डॉ अनुपम ने बताया की मशरूम बैग में पिंक ऑयस्टर और व्हाइट ऑयस्टर मशरूम तैयार होगी । ऑयस्टर को दीगरी मशरूम भी कहते हैं । बैग में पिंक ऑयस्टर 13 दिन और व्हाइट ऑयस्टर 20 दिन में तैयार हो जाएगी। 7 से 10 दिन के अंतराल के बाद इसमें दोबारा फ्रूट ले सकते हैं ।

यह लाभकारी व्यवसाय है । इसमें लगत काम और आमदनी अधिक होगी । ऑयस्टर से सब्जी के अलावा आचार व् सूप भी तैयार किया जा सकता है । मशरूम को लोकप्रिय बनाने का काम कर रहे डीऐमआर सोलन के निर्देशकर डॉ. डीपी शर्मा ने बताया कि संसथान मशरूम को लोकप्रिय बनाने की दिशा में काम कर रहा है । इसके चलते डीएम्आर ने रेडी टू फ्रूट मशरूम बैग तैयार किया है । शीघ्र ही इसकी टेक्नोलॉजी को मशरूम ग्रोअर्स को ट्रांसफर किया जायेगा । इससे शहरी क्षेत्र के लोगों को ताज़ा मशरूम मिलेगी ।

एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले किसान अब ऐसे कर रहे है विदेशों में अनार का निर्यात

रेतीले धोरों में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले बाड़मेर के किसानों ने कम समय में ऐसा करिश्मा कर दिखाया है कि अब विदेशों तक पहचान कायम है। किसानों ने एक सपना देखा कि क्या रेतीले धोरों में भी अनार हो सकता है। बस इसी आस के साथ 2010 में बालोतरा के बूड़ीवाड़ा में अनार का पहला प्लांट लगाया था।

बस 4 साल में अनार तैयार हो गया। अनार की क्वालिटी व स्वादिष्टता के चर्चे दूर-दूर तक छा गए। इसके बाद बाद तो किसानों ने अनार की बंपर बुवाई शुरू कर दी। अब वर्तमान में 4500 हैक्टेयर में अनार की खेती हो रही है। केवल 7 साल में बाड़मेर के किसानों ने वो करिश्मा कर दिखाया, मुश्किल तो था लेकिन असंभव नहीं। अब अनार की खेती और उत्पादन में बाड़मेर प्रदेश में पहले पायदान पर है।

बाड़मेर में कम आर्द्रता के कारण अनार में बीमारियां कम फेल रही है। इसी वजह से अनार की साइज, क्वालिटी और स्वाद अनोखा है। बाड़मेर का अनार नेपाल सहित कई देशों में निर्यात हो रहा है। सिंदुरी किस्म का अनार की बंपर पैदावार हो रही है। इसी वजह से अब अनार की खेती में बाड़मेर का प्रदेश में पहला स्थान है। 4500 हैक्टेयर में अरबों रुपए के अनार की खेती हो रही है।

7 साल में किसानों ने रचा इतिहास, प्रदेश में सबसे अधिक अनार उत्पादन वाला जिला बना बाड़मेर

नेपाल भेजने के लिए अनार की पैकिंग

धोरीमन्ना के गडरा में कृषि फार्म हाउस में इन दिनों अनार की पैकिंग के लिए टेंट लगाकर श्रमिक रात-दिन जुटे हुए है। किसान बालूराम विश्नोई व सुरेश ढाका ने बताया कि यह अनार नेपाल के लिए जाएगा। पैकिंग के लिए मजदूर लगाए गए है। 2500 पौधों का साढ़े तीन हैक्टेयर में बगीचा लगाया था। अब तो हर गांव-गांव अनार की खेती होने लगी है, किसान रुचि दिखा रहे है। नेपाल के लिए निर्यात करने वाले व्यापारी ने 52 रुपए प्रति किलो के हिसाब से अनार की बोली लगाकर खरीदा है।

4500 हैक्टेयर में 135 करोड़ का अनार : बाड़मेर में अनार की 4500 हेक्टयेर में 135 करोड़ के अनार का उत्पादन हो रहा है। एक हैक्टेयर में 625 पौधे लगाए जाते है। इससे एक हैक्टेयर में 3 से 3.5 लाख का अनार उत्पादन होता है।

अनार के उत्पादन में बाड़मेर प्रदेश में पहले नंबर पर है। 2010 में बुड़ीवाड़ा में अनार का पहला प्लांट लगाया। इसके बाद अब 4500 हेक्टयेर में अनार की खेती हो रही है। सिंदुरी किस्म का अनार यहां की कम आर्द्रता के कारण प्रसिद्ध है। अनार की साइज, क्वालिटी और स्वाद भी अलग है। -पदमसिंह, सहायक कृषि अधिकारी, बाड़मेर

सिर्फ इतने रुपए खर्च करके अपनी गाड़ी में लगवाएं 35 लाख वाली गाड़ी का म्यूजिक

अच्छे म्यूजिक सिस्टम से कार का इंटीरियर लग्जरी लगने लगता है। मार्केट में भी एक से बढ़कर एक म्यूजिक सिस्टम आ रहे हैं। इनमें बड़ी टचस्क्रीन वाले इन्फोटेनमेंट सिस्टम भी शामिल हैं।

ऐसे में यदि आपकी कार में टेस्ला जैसी कार के जैसा सिस्टम लग जाए तब उसकी रौनक कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगी। इंडियन मार्केट से अब ऐसे सिस्टम भी खरीद सकते हैं। इसे मारुति आल्टो से लेकर किसी भी बड़ी कार में आसानी से फिट किया जा सकता है।

35 लाख की कार जैसा म्यूजिक सिस्टम

टेस्ला कार की प्राइस करीब 35 लाख रुपए से शुरू है। इस कार में 10 इंच या उससे भी ज्यादा बड़ी स्क्रीन वाला इन्फोटेनमेंट सिस्टम दिया होता है। इस तरह के म्यूजिक सिस्टम को ऑनलाइन 30 हजार रुपए में खरीदा जा सकता है। ये सिस्टम किसी टैबलेट की तरह होता है। यानी इसमें प्रोसेसर के साथ रैम और इंटरनल मेमोरी भी मिलती है।

ऐसे होते हैं फीचर्स

इंडियामार्ट पर क्रेटा कंपनी के ऐसे स्टीरियो सिस्टम को ऑनलाइन खरीदा जा सकता है। इसमें 10.4 इंच की बड़ी स्क्रीन दी है। इसके साथ, 2GB रैम, 32GB मेमोरी के साथ COTEX A9 क्वाड-कोर प्रोसेस दिया है। इसमें मल्टी टच स्क्रीन दी है।

जिसमें आप गाड़ी से जुड़ी कई तरह की डिटेल देख सकते हैं। ये सिस्टम ब्लूटूथ और वाई-फाई कनेक्टिविटी के साथ आता है। इसमें कॉलिंग, इन्फोटेनमेंट, इंटरनेट सर्फिंग, नेविगेशन जैसे सभी काम आसानी से होते हैं। इस सिस्टम को अमेजन से भी खरीदा जा सकता है, जहां पर EMI का ऑप्शन भी मौजूद है।

इस जुगाड़ से पशुओं को अपने आप खुरली (नांद) पर मिलता है पानी ,जाने पूरी तकनीक

सभी किसान भाईओं को पता है के किसी भी पशु को एक लीटर दूध पैदा करने के लिए कम से कम 3 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है।

ज्यादतर किसान पशुओं को 2 से 3 बार पानी पानी पिलाते है लेकिन एक बार में पशु से ज्यादा पानी नहीं पी सकता इस लिए एक दो बार ज्यादा पानी पिलाने से अच्छा है के पशु अपनी जरूरत के हिसाब से पानी पी ले । इसका सीधा संबंध आप को पता चलेगा के पशु दे दूध देने की मात्रा में काफी इज़ाफ़ा होगा ।

लेकिन अब सवाल उठता है के पशु को बार बार पानी कौन पिलायेगा । इसका उतर है पशु खुद क्यूंकि अब एक ऐसा जुगाड़ आ गया है जिस से पशु की खुरली(नांद) के पास में लगा सकते है और जिसमे हमेशा पानी रहता है ।

जब भी पानी कम हो जाए इसमें अपने आप पानी भर जाता है । इसका एक फ़ायदा यह भी है के अगर आप किसी रिश्तेदारी में भी चले जाते है वहां पर पशुओं को पानी पिलाने की चिंता नहीं रहती इनको अपने आप ही पानी मिलता रहता है ।

इस पानी वाली छोटी टंकी को स्टील से बनाया जाता है । इसमें एक नल से पानी डाला जाता है ।इसमें वही सिस्टम लगा होता है जो हमारे पानी वाले कूलर में होता है । जैसे ही पानी कम होता है ये सिस्टम नल को खोल देता है जिस से पानी अपने आप आने लगता है इस सिस्टम को कोई भी बना सकता है यह कोई ज्यादा महंगा जुगाड़ नहीं है । कोई भी किसान इसको अपने घर पर त्यार कर सकता है ।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो जरूर देखें

पेड़ों को एक से दूसरी जगह लगा इस शख्स ने खड़ा किया 2.5 करोड़ का बिजनेस

हर दिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण में हमारे अंदर अक्सर एक सवाल उठता है कि हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी के पास इस बात का जवाब है। उनका कहना है कि किसी भी अपार्टमेंट या फ्लाइओवर को बनाने के लिए पेड़ को काटने के बजाय उसे बचाया जा सकता है।

38 साल के रामचंद्र ने ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टीकल्चर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई है जो पेड़ों के ट्रांसलोकेशन यानि एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाने का काम करती है। ट्री ट्रांसलोकेशन एक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है और फिर दूसरी जगह पर उसे जैसे का तैसा लगा दिया जाता है।

पुराना है तरीका

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था रामचंद्र बताते हैं कि जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है।

इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो।

इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 5000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। हर प्रजाति के लिए उसके बचने के चांसेज बराबर नहीं होते। मुलायम लकड़ी वाले पेड़ जैसे बरगद, पीपल, गुलमोहर आदि के बचने का चांस 90 फीसदी होता है वहीं कठोर लकड़ी वाले पेड़ जैसे नीम, इमली और सागौन आदि के पेड़ों के बचने का चांस 60 से 70 फीसदी तक होता है।

कितना होती है कमाई

कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती है अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और लगाने में क्या खर्च आएगा ये पेड़ के साइज़ पर निर्भर करता है। रामचंद्र बताते हैं कि इसकी शुरुआत 6 हज़ार रुपये से होती है लेकिन हम एक पेड़ के लिए 1.5 लाख रुपये भी चार्ज करते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है। पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।2009 में शुरू हुई उनकी कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

कैसे हुई शुरुआत

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री ली है और एग्री बिजनेस में एमबीए किया है लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा। आठ साल तक एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने के बाद उससे अलग कुछ करना उन्हें समझ नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक सड़क का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसमें कई पेड़ों को काट दिया गया। यहीं से उनके मन में आया कि इन पेड़ों को कटने से बचाने का कोई तो तरीका होगा। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से इसके बारे में समझा।

गाय-भैंस को गाभिन करने का सही समय जानने के लिए इस्तेमाल करें यह यंत्र

ज्यादातर पशुपालकों को पता ही नहीं होता है कि गाय-भैंस को गाभिन कराने का सही समय क्या है, लेकिन भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने एक यंत्र क्रिस्टोस्कोप तैयार किया है, जिसके द्वारा पशुपालक आसानी ये पता लगा सकते है कि गाय-भैंस को गाभिन करने का सही समय क्या है।

“अधिकतर किसान को गाय-भैंस के गर्मी में आने के लक्षण को नहीं पहचान पाते है और गाभिन करवा देते है, लेकिन गर्भ ठहरता नहीं है, जिससे किसान को आर्थिेक नुकसान होता है। यह यंत्र गाय-भैंस के सही मदकाल की सटीक जानकारी देता है।

क्रिस्टोस्कोप बाजारों में भी उपलब्ध है। श्लेष्मा (म्यूकस) को यंत्र के ऊपरी हिस्से में डालकर स्कोप से देखने पर ही गाय या भैंस का मदकाल पता चल जाएगा।” ऐसा बताते हैं, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ हरेंद्र कुमार।

हर पशु का एक मदचक्र होता है। गाय-भैंसों में यह लगभग 21 दिन का है। मदचक्र पूरा होने पर मदकाल आता है। यह दो से तीन दिन तक चलता है। मदकाल में अलग-अलग समय पर गाय और भैंसों के शरीर में बनने वाले स्लेश्मा यानी म्यूकस से ही उनके गर्भधारण की संभावना घटती-बढ़ती है।

क्रिस्टोस्कोप में लिए श्लेष्मा के फर्न पैटर्न की मात्रा ज्यादा मिली तो कृत्रिम गर्भाधान कराने पर गर्भ टहरने की संभावना ज्यादा और फर्न पैटर्न कम होने पर संभावना कम हो जाएगी।

डॉ हरेंद्र बताते हैं, “यह हेडी टूल यंत्र है। इस यंत्र को पेटेंट कराकर निजी कंपनियों को दे दिया है। कोई भी किसान इसको खरीद सकता है। उन्हें किसी अस्पताल में जाने में जाने की जरूरत नहीं होगी। बरेली आस-पास के क्षेत्र के लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे है। उनके कृत्रिम गर्भाधान की सफलता की दर लगभग सतर फीसद तक बढ़ गई है। अभी यह औसत महज तीस फीसद तक थी।”

Image result for भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने एक यंत्र क्रिस्टोस्कोप तैयार किया है

मदकाल के गलत समय कृत्रिम गर्भाधान कराने से किसानों का पशुओं के खान-पान में धन और समय दोनों खराब होता है। सही समय पर गर्भधारण न हो पाने से दुग्ध उत्पादन भी नहीं हो पाता। दो से तीन बार मदकाल निकल जाने पर गायें या भैंस बांझ भी हो जाती है।

इस यंत्र की जानकारी के लिए आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते है:

  • भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान
  • डॉ हरेंद्र प्रसाद
  • प्रधान वैज्ञानिक
  • 09411631354

धान की फसल में बालियां बनते समय किसान को रखना चाहिए इन बातों का ध्यान

इस समय ज्यादातर क्षेत्रों में धान की फसल में बालियां आने लगी हैं, इस समय फसल में सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है। धान में बालियां आने पर खेत में पर्याप्त नमी रखनी चाहिए, लेकिन वातावरण में तापमान अधिक होने और नमी रहने से खेत में रोग व कीट भी प्रभावी हो जाते हैं। इसलिए इनके नियंत्रण के लिए लाइट ट्रैप, बर्ड पर्चर, फेरोमोन ट्रैप, ट्राइकोग्राम व रोग नियंत्रण के लिए ट्राइकोडरमा का प्रयोग करें।

धान की फसल में अगर खैरा रोग लग रहा तो रोग नियंत्रण के लिए फसल में पांच किलो जिंक सल्फेट (21 प्रतिशत) और 20 किलो यूरिया या 2.5 किलो बुझे हुए चूने को 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। तना छेदक हरा, भूरा व सफेद पीठ वाले फुदका और पत्ती लपेटक कीट के नियंत्रण के लिए कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी 18 किलो का छिड़काव करें या फिर एमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल 125 मिली 500-600 लीटर पानी में घोलकर कर छिड़काव करें।

 

फसल में दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. की 2.5 लीटर सिंचाई के पानी के साथ या फोरेट 10 जी. की 10 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी. स्थिर पानी में छिड़काव करें। जीवाणु झुलसा और जीवाणुधारी झुलसा के नियंत्रण के लिए 15 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट 90 प्रतिशत टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत को 500 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी. के साथ मिलाकर प्रति हेक्टेयर 500-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

धान की गंधीबग वयस्क लम्बा, पतले और हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है। इस कीट की पहचान कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं। इसके व्यस्क और शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं, जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और दाने खोखले रह जाते हैं।

 

यदि कीट की संख्या एक या एक से अधिक प्रति पौध दिखायी दे तो मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं। 10 प्रतिशत पत्तियां क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50 प्रतिशत घुलनशील धूल का दो ग्राम/ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग के लक्षण मुख्यता पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है। इस रोग के रोकथाम के लिए पुष्पन की अवस्था में जरुरत पड़ने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें।

रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर या बाली निकलते समय दो बार आवश्यकतानुसार कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

सोर ऊर्जा से इस किसान ने कीटों को भगाने के लिए खोजा अनोखा तरीका

पिछले कुछ सालों में कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण के लिए कई तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं। इससे न सिर्फ अनाज ज़हरीला हो जाता है बल्कि इससे ग्राउंड वॉटर टेबल भी बिगड़ रही है।

आजकल देशभर के हज़ारों किसान इस बात को समझ चुके हैं कि रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के इस्तेमाल से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है और हमारी सेहत को भी खतरा है। इसी को देखते हुए वे अब इसके लिए नए और सुरक्षित तरीके खोज रहे हैं।

केरल के पलक्कड़ ज़िले के चित्तूर ब्लॉक में इलापुल्ली गांव के एक किसान ने अपने खेत से कीटों को भगाने का एक अनोखा तरीका खोजा है। चंद्रन नाम के इस किसान ने कीटों से छुटकारा पाने के लिए एक सस्ता और इको फ्रेंडली उपाय खोजा है जो सूर्य की रोशनी से काम करता है।

केरल के एक लोकल न्यूज़ पोर्टल मातृभूमि में छपी ख़बर के मुताबिक, चंद्रन अपने 6 एकड़ के खेत में धान की खेती करते हैं। वह यहां के कृषि विभाग द्वारा बताई जाने वाली तकनीकों के साथ अक्सर नए एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं।

उन्होंने एक ऐसा सोलर लाइट ट्रैप बनाया है जो कीटों को मार देता है और किसी रासायनिक कीटनाशकी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। इस उपकरण को बनाने के लिए एक ट्राइपॉड के ऊपर एक कटोरी रखी और उसमें एक एलईडी बल्ब और सोलर पैनल लगाया गया।

इस उपकरण को चलाना बहुत ही आसान है। बल्ब से शाम को 6.30 से 9.30 बजे के बीच नीली रोशनी निकलती है जो कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है। बल्ब के ठीक नीचे एक ज़हर का ट्रैप है जो न सिर्फ इन कीटों को पकड़ लेता है बल्कि वे तुरंत मर भी जाते हैं।

ये मशीन सिर्फ उसी समय काम करती है जब कीटों का हमला खेत में सबसे ज्यादा होता है। 10 बजे के बाद ये मशीन काम नहीं करती ताकि खेत को फायदा पहुंचाने वाले कीटों को नुकसान न पहुंचे।ये मीशन सोलर एनर्जी की मदद से अपने आप काम करती है।

चंद्रन की बनाई इस मशीन से फसल की कीटों से रक्षा भी हो जाती है और वह रासायनिक कीटनाशकों से सुरक्षित भी रहती है। उनकी इस मशीन के फायदों को देखते हुए एलाप्पुल्ली के कई किसानों ने अपने खेतों में ये उपकरण लगाया है।

ये उपकरण पूरी तरह से ऑटोमैटिक है बस कटोरी में रखे पॉइज़न ट्रैप को दो दिनों में बदलने की ज़रूरत होती है। किसान एक खेत में एक से ज्यादा उपकरण लगा सकते हैं और इसकी जगह में भी बदलाव कर सकते हैं। एलाप्पुल्ली के कृषि भवन में फील्ड असिस्टेंट रजिता कहती हैं कि ये ट्रैप इको फ्रेंडली है और रासायनिक कीटनाशकों से अपनी फसल को बचाने का अच्छा उपाय भी।

अब जर्मन मशीन से खारा पानी को मीठा कर खारे पानी से होगी सिंचाई

खारेपानी के कारण फसलों का उत्पादन नहीं करने वाले किसानों के लिए ये लिए राहत की खबर है। अब जर्मन तकनीक की वाटर सॉफ्टनर मशीनों से खारे पानी को मीठा कर किसान आसानी से अब अपने खेतों में फसलों का उन्नत उत्पादन कर सकेंगे।

इसके लिए अठियासन रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर लगाए गए वाटर सॉफ्टनर मशीन का प्रयोग सफल रहा है। अब केवीके वैज्ञानिक जिलेभर के किसानों को कृषि प्रशिक्षण के दौरान खारे पानी को मीठा कर फसल उपयोग के लिए जानकारी देंगे। केवीके की ट्यूबवैल पर स्थापित इस मशीन के माध्यम से 5 से 8 हजार टीडीएस तक काम करने का दावा किया जा रहा है।

ऐसे में जिल क्षेत्रों में खारे पानी के कारण किसानों के सामने फसल सिंचाई को लेकर रही परेशानी से भी किसानों को काफी हद तक निजात मिलने की संभावना है। वैज्ञानिकों की माने तो खारे पानी में जो साल्ट बोड रहता है, जिसे ये मशीन अलग कर देती है। ऐसे में ये तकनीक किसानों के लिए खारे पानी को मीठा करने में काफी कारगर साबित हो रही है।

केवीके की ट्यूबवैल पर लगाए वाटर सॉफ्टनर संयंत्र से खारे पानी को मीठा कर पहले मूंग बीच उत्पादन, अब बगीचे और 2 हैक्टेयर में जीरे के उत्पादन में पानी काम में लिया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठी के दौरान इस तकनीक के बारे में बताएंगे।

पाइप लाइन चॉक होने देना, बालों का झड़ना, खाज-खुजली और स्कीन के रुखेपन को दूर करती है। बोरवैल का पानी इस्तेमाल करने वाले लोग भी इस मशीन का उपयोग कर सकते हैैं। डॉ.एसआर कुमावत, सहायक प्राध्यापक

जमीन की उतरी स्तर पर बनने वाली सफेद परत को कम करके, जमीन पर आनेवाली दरारों में सुधार, जमीन मुलायम होकर, उपजाऊ बनती हैं।

  •  फसल और पौधों में पत्ते जलने का प्रमाण कम होकर खेत में हरियाली बढ़ती हैं।
  • नमकीन/खारे पानी से बंद पड़ने वाले ड्रिपर्स और स्प्रिंकलर साफ होकर पहले जैसे काम करना शुरू कर देते है। केमिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कंडिशनर से निकला पानी भौतिक रचना के अनुसार हलका होने से पौधे के जड़ों को आसानी से मिलता है।

कम पानी में अधिक उत्पादन ले सकते है।, यानी पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। फसल की जड़ों पर मूली पर बना नमकीन स्तर कंडिशनर से निकले पानी में घुलकर साफ हो जाता है। मूली की कार्यक्षमता बढ़कर फसल हरीभरी रहने में मदद मिलती हैं।

  • फसल और पौधों के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथ पानी का पीएच विकसित होने के कारण फसल का उपयुक्त मूल द्रव्य मिलते है।
  • तीव्र विद्युत लहरी के कारण विषाणु का प्रमाण
  • पानी का कम होकर जैविक दृष्टि से पानी शुद्ध होता हैं।

13 अक्टूबर तक कार-बाइक में लगवा लें सिक्‍योरिटी नंबर प्‍लेट, नहीं तो होगी जेल

टू-व्हीलर या फोर व्हीलर इस्तेमाल करने वाले दिल्ली वासियों के लिए नियमों में बदलाव हुए हैं। अगर आपकी गाड़ी में हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं लगी है, तो सावधान हो जाएं और इसे जल्द से जल्द लगवा लें।

परिवहन विभाग ने इसके लिए 13 अक्टूबर की डेडलाइन तय की है। इसके बाद भी अगर गाड़ियों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं मिली तो पेनल्टी के तौर पर 500 रुपए का जुर्माना लिया जाएगा या फिर वाहन मालिक को 3 महीने की जेल भी हो सकती है।

कितनी गाड़ियों में नहीं है हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट

नई कार चलाने वालों को परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी नई कारें रेग्युलेशन लाइसेंस प्लेट्स के साथ प्री-फिटेड आती हैं। परिवहन विभाग के अधिकारी ने बताया कि विभाग के आकलन के अनुसार, लगभग 40 लाख गाड़ियां ऐसी हैं, जिन पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट नहीं हैं।

इनमें फोर व्हीलर और टू-व्हीलर, दोनों शामिल हैं। अभी इसके लिए 13 सेंटर बनाए गए हैं, जहां पर नई प्लेट लगाई जाएंगी। उन्होंने बताया कि इस बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाया जाएगा, जिसके लिए अखबारों में विज्ञापन भी दिए जाएंगे।

कितने में लगेंगी ये प्लेट्स

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, टू-व्हीलर्स के लिए इन प्लेट्स की कीमत 67 रुपए और फोर व्हीलर्स के लिए 213 रुपए पड़ेगी।

आपको क्या करना होगा

  • आरटीओ के पास 13 स्पेशल सेंटर हैं, जहां नंबर प्लेट्स को फिट कराया जा सकता है।
  • 2 अक्टूबर से पेमेंट और एप्लिकेशन के लिए ऑनलाइन लिंक लाइव हो जाएगा।
  • यूजर्स को लिंक में रजिस्ट्रेशन नंबर उपलब्ध कराना होगा और फीस देनी होगी।
  • सेंटर पर जाने और नंबर प्लेट फिट कराने के लिए निश्चित दिन और समय के लिए अपॉइन्टमेंट दिया जाएगा।

कैसी हाेती है हाई सिक्योरिटी लाइसेंस प्लेट

हाई सिक्योरिटी लाइसेंस प्लेट्स एल्युमिनियम से बनाई जाती है और इसे रिफ्लेक्टिव टेप्स से ढका जाता है। इससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है और इसमें सेल्फ डिस्ट्रक्टिव होलोग्राम्स लगाया जाता है। इसमें लेजर से व्हीकल का 10 डिजिट परमानेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर रहता है, जिससे चोरी होने का खतरा कम हो जाता है।