दोगुनी कमाई करने के लिए ऐसे करें मिर्च की उन्नत खेती

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है।  मिर्चों में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइसिन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है।  भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है।  इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है।

मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।  बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिर्चो में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्रा पायी जाती है।  मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं।  एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है।

दोगुनी कमाई

हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें।

फैजाबाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के सब्जी वैज्ञानिक डा.एसपी सिंह के अनुसार प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 35-40 हजार रुपये आती है। इतने रकबे में करीब 60 क्विंटल तक उपज संभव है। बाजार में यह 20 रुपये प्रति किग्रा के भाव से भी बिके, तो भी किसान को करीब एक लाख 20 हजार रुपये मिलेंगे। 40 हजार की लागत निकालने के बाद भी करीब दो गुने का लाभ होगा

जलवायु

मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है।  लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।  गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।  बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है।

यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।  मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है. तेज़  मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।  फूलते समय ओस गिरना या तेज़  वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदाई होता है।  क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

क़िस्में

पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियॉ चौड़ी होती हैं।  फल 9-10 सें०मी० लम्बे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं।  इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर सूखी मिर्च के लिए होती है।

पूसा सदाबाहर : इस क़िस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सें०मी० होते हैं।  फल 6-8 सें मी. लम्बे, गुच्छों में , 6-14 फल  प्रति  गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है।  औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर , सूखी मिर्च के लिए होती है।  यह क़िस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

नर्सरी प्रबन्ध

नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए।  पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है।  नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है।  नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए ।  नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौड़ाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्ये में कठिनाई आती है।  नर्सरी की उंचाई 6 इंच या आधा फीट रखनी चाहिए।  बीज की बुआई कतारों में करें।  कतारों का फासला 5-7 सें०मी० रखा जाता है।  पौध लगभग 6 सप्ताह में तैयार हो जाती है।

मृदा एवं खेती की तैयारी

मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वेतम होती हैं। जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है।  बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।

जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है।  गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।  खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज-दर

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफ़ी होता है।

निराई-गुड़ाई

पौधों की वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है।  पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है।

सिंचाई

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।

बुआई

मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।  बडे फलों वाली क़िस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।  पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।

उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।  इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है।  यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

पौध संरक्षण

आर्द्रगलन रोग  यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है।  इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है।  इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।  इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग  इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है।  इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग  यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है।  यह रोग बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है।  शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।  एवं वृद्धि रुक जाती है।  अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।  यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है।  अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।  इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।  इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग  इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।  बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है।  तथा वृद्धि रुक जाती है।  यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।

थ्रिप्स एवं एफिड  ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है।  रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

उपज

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर होती है।

इतने रुपए गिर चुके है बासमती के भाव, किसान हुए निराश

इस बार किसानों पर हर तरफ से मार पड़ रही है। उत्पादन भी कम है और भाव भी अच्छे नहीं मिल रहे। किसानों से बात की तो कोई खुश नजर नहीं आया। धान खरीद के लिए कोई दो दिन से करनाल मंडी में है तो कोई चार दिन से। वे अच्छे भाव आने के इंतजार में डेरा डाले हुए हैं।

बासमती 1509 किस्म के साथ पहुंचे थे। किसान राजबीर ने कहा कि सीजन के शुरुआत में अच्छा रेट था, लेकिन अब स्थित खराब है। सबसे अच्छी ढेरी 2350 रुपये प्रति क्विंटल तक जा रही है। शुरआत में बासमती 1509 2600 रुपये तक बिक चूका है । ये सिर्फ हरयाणा की बात नहीं पंजाब की मंडिओं में भी भाव में गिरावट आ गई है ।

खर्च भी पूरा करना मुश्किल

काछवा गांव निवासी ईश्वर ने कहा कि वह पिछले छह दिनों से अनाज मंडी में आए हैं। धान का भाव ठीक मिल जाए, इसी उम्मीद के साथ आज सातवां दिन भी निकल आया। मामूली बढ़ोतरी के साथ 1509 धान 2350 रुपये प्रति क्विंटल पर आई है। ऐसे में उनका खर्च भी पूरा नहीं हो सकता। सरकार को किसानों समस्या की तरफ ध्यान देना चाहिए।

झाड़ भी ठीक नहीं निकला, अब मंडी में आ रही दिक्कतें

किसान गीता राम चार दिनों से मंडी में ही हैं। इस बार 1509 धान का उत्पादन प्रति एकड़ महज 16 से 17 ¨ क्वटल रहा है। कुछ भावों ने फजीहत कर दी। पिछले दिनों मौसम की मार का असर भी रहा। अब मंडी में भी धक्के खाने पड़ रहे हैं। सरकार को धान के भावों में बढ़ोतरी करनी चाहिए, जिससे किसानों का खर्च निकल सके।

अच्छे भाव की उम्मीद भी टूटी

गंजोगढ़ी निवासी इंद्रजीत सिंह ने कहा कि इस बार उम्मीद थी कि अच्छा रेट आएगा, लेकिन वह भी टूट गई है। सीजन के शुरुआती चरण में 1509 का किसानों को अच्छा भाव मिला, लेकिन अब कम हो गया। अक्सर ऐसा होता है कि जब 1509 की आवक कम हो जाएगी जब भाव बढ़ेंगे, जिससे किसानों को अच्छे भाव का लाभ नहीं मिल पाता।

हर रोज बचाइए सिर्फ 75 रुपए, बेटी के कन्यादान के लिए मिलेंगे 11 लाख

सिर्फ 75 रुपए रोज बचाकर आप अपनी बेटी को सुखी जीवन दे सकते हैं। 75 रुपए रोज बचाकर बेटी की शादी के लिए 11 लाख रुपए आपको मिल जाएंगे जिससे बेटी भी खुश रहेगी और आप भी।

यह प्लान एलआईसी का है जिसके तहत आपको 18 साल तक 75 रुपए रोज जमा करने होंगे। तीन साल के लिए लॉक-इन पीरियड होगा। यानी कि बच्ची के जन्म के तुरंत बाद यह प्लान शुरू कर देते हैं तो बेटी के 21 साल होने पर आपके हाथ में 11 लाख रुपए होंगे। एलआईसी के इस प्लान के तहत आपको कई कवर भी मिलेंगे।

क्या है प्लान

एलआईसी के इस प्लान का नाम है प्लान 833, जीवन लक्ष्य। इस प्लान की खासियत है कि बच्ची के पिता के नहीं रहने पर या असमायिक मृत्यु होने पर एलआईसी को किस्त नहीं देना होगा, लेकिन बच्ची को निर्धारित अवधि के बाद पैसे मिल जाएंगे।

पिता के नॉर्मल निधन होने पर तत्काल रूप से 5 लाख मिलने का प्रावधान है। दुर्घटना होने पर 10 लाख रुपए तक मिलेंगे औऱ विवाह के लिए 11.50 लाख रुपए। एलआईसी के मुताबिक कन्यादान पॉलिसी का सबसे बड़ा फायदा है कि इससे आपके इंवेस्टमेंट पर बेहतर रिटर्न मिलता है।

 

कितनी राशि देने पर क्या-क्या मिलेंगे

इस पॉलिसी के तहत 1000 रुपए प्रतिमाह देने पर बच्ची के पिता के रिस्क कवर होने के साथ उसकी मां की दुर्घटना होने पर 2 लाख रुपए मिलेंगे। 21 साल के लिए बच्ची को 4.25 लाख रुपए मिल जाएंगे।

2000 रुपए प्रतिमाह जमा करने पर बच्ची की मां का दुर्घटना कवर 4 लाख का रहेगा, वहीं बच्ची को 8.5 लाख रुपए मिल जाएंगे। 3000 रुपए प्रतिमाह जमा करने पर बच्ची की मां का दुर्घटना कवर 6 लाख रुपए का होगा और बच्ची को 21 साल के बाद 12.75 लाख रुपए मिलेंगे।

मां की दुर्घटना पर मिलेगा 20 लाख

अगर आप 10,000 रुपए प्रतिमाह इस प्लान के तहत जमा करते हैं तो बच्ची की मां का दुर्घटना कवर 20 लाख को होगा और बच्ची को 21 साल के बाद 52.50 लाख रुपए मिलेंगे। इस प्लान के संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए आप एलआईसी की नजदीकी ब्रांच से संपर्क कर सकते हैं।

लुधियाना के पन्नू पकौड़े वाले के बाद अब पटियाला के चाट वाले ने सरेंडर किए 1.12 करोड़ रु.

लुधियाना के पन्नू पकौड़े वाले पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की रेड में 60 लाख रुपए सरेंडर करने के बाद अब पटियाला के फाेकल प्वाइंट स्थित रिंकू चाट वर्ल्ड कारखाने में दस्तावेजाें की चेकिंग के बाद मालिक मनोज ने 1.12 करोड़ रुपए सरेंडर किए हैं।

इसकी पुष्टि इंस्पेक्टर मंदीप कालरा ने की है। यह रेड पटियाला व लुधियाना-3 के प्रिंसिपल कमिश्नर इनकम टैक्स परनीत सचदेव की अगुवाई में की गई। सूत्रों के मुताबिक रिंकू चाट वर्ल्ड की ओर से कोई रिटर्न नहीं भरी जा रही थी।

चाट के कारीगर से बैंक्वेट हॉल तक का सफर…

रिंकू चाट वर्ल्ड का मालिक मनोज साल 2000 से पहले चाट कारीगर था। इसके बाद दुकान लेकर चाट का कारोबार शुरू किया। चाट के साथ कैटरिंग का कारोबार भी शुरू किया। इसके बाद अपने बैंक्वेट हॉल डाल लिए और शादी समारोह व कारपोरेट फंक्शन के ऑर्डर बुक कर खासा ब्रांड तक तैयार कर लिया।

अब 400 रुपए किलो पहुंचा पन्नू के पकौड़े का दाम…

60 लाख रुपए सरेंडर करने के बाद पन्नू पकौड़े वाले के पकौड़ों के दाम अब 400 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। इससे पहले ये दाम 320 रुपए किलो थे।

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।

पशुओं  के लिए घर पर त्यार करें यह दलिया, 100% दूध बढ़ने की है गरंटी

आज हम आपको एक ऐसा दलिया बनाना सिखएंगे जिस से आपके पशु की दूध देने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी और यह सस्ता है कोई महंगा नहीं है ।इसमें दो चीजें का ध्यान जरूर रखें एक इसके बनाने की विधि और दूसरा इसको देने का समय दोनों को ध्यान से समझें ।

दलिया बनाने के लिए सबसे पहले आपको चाहिए गेहूं का दलिया। गेहूं का दलिया आप मक्की का और चीज का भी ले सकते हैं लेकिन गर्मी में गेहूं का दलिया सबसे अच्छा रहता है और इसके साथ आपको चाहिए तारा मीरा अगर आपको मिलता है तो बहुत अच्छी बात है अगर नहीं मिलता है तो कोई बात नहीं है ।

इसके बाद आती है हमारी शक्कर की जगह गुड का इस्तेमाल कर सकते है लेकिन गर्मी में शक्कर सबसे अच्छी रहती है । इसके साथ आप सरसों का तेल और मीठा सोढा का इस्तेमाल करें मीठा सोढा पांचन शक्ति के लिए बहुत अच्छा होता है । इसके अलावा किसान इसमें हमारे कॉटन सीड और कैल्शियम आदि डाल सकते है ।

इसको बनाना कैसे है सबसे पहले आपको लेना है दलिया और इसमें आपको पानी डाल कर आग पर पका लेना है उसके बाद हम इसमें हम सबसे पहले शक्कर डालेंगे और इसके बाद किसान भाइयो सरसों का तेल डालना है जोकि आपको सौ ग्राम के लगभग लेना है अपने पशुओं के हिसाब से अगर आपका पशु ज्यादा बड़ा है भी या तो आप इसको ज्यादा भी ले सकते है ।

तारामीरा भी आप 50 ग्राम तक इस्तेमाल कर सकते हैं कोई दिक्कत नहीं है ज्यादा भी कर लिया तो कोई प्रॉब्लम नहीं है यह पशु के लिए बहुत अच्छा है और इसके बाद सबसे जरूरी चीज आती है कि मीठा सोडा इसको इस्तेमाल करना अगर आपको इस्तेमाल करना है तो आप एक चम्मच दे सकते है लेकिन पशु को आपके पशु को दस्त वगैरह नहीं लगी होनी चाहिए ।

इस दलिया की पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए हुए वीडियो को देखें ।

बिजनेस के लिए ऐसे ले सकते है बिना गारंटी के 10 लाख रु तक का लोन

देश में छोटे और मध्यम आकार के उद्योग शुरू करने से जुड़ी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) की शुरुआत की थी। इस योजना के दो प्रमुख उद्देश्य हैं,

पहला- स्वरोजगार के लिए आसान लोन उपलब्ध करवाना और दूसरा- छोटे उद्यमों के माध्यम से रोजगार के नए अवसर सामने लाना। यह लोन नॉन-कॉर्पोरेट छोटे व्यवसायों के लिए बनाया गया है,

इसलिए मुद्रा लोन शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों में अकेले या पार्टनरशिप में छोटी निर्माण यूनिट चलाने वालों से लेकर दुकानदारों, छोटा व्यवसाय/व्यापार करने वालों, छोटी इंडस्ट्रीज चलाने वालों, कारीगरों, खाद्य उत्पादों से जुड़ा व्यापार करने वालों और सर्विस सेक्टर में काम करने वालों तक के काम की योजना है।

ये लोन वाणिज्यिक (कमर्शियल) बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, छोटे फाइनेंस बैंकों, सहकारी बैंकों, माइक्रोफाइनेंस (सूक्ष्म-वित्त ) संस्थानों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में आवेदन देकर पाया जा सकता है।

मुद्रा लोन से जुड़े चार प्रमुख सवाल

कितना लोन मिल सकता है?

मुद्रा लोन के तहत अधिकतम 10 लाख रुपए तक का लोन लिया जा सकता है। इस लोन को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है— शिशु ऋण, जिसमें अधिकतम सीमा 50 हजार रुपए है, किशोर ऋण, जिसमें 50 हजार से 5 लाख रुपए तक की सीमा है और तरुण ऋण, जिसमें अधिकतम 10 लाख रुपए तक की सीमा रखी गई है।

किसे मिल सकता है?

कोई भी व्यक्ति जो अपना स्वयं का व्यवसाय शुरु करना चाहता है, वह इस योजना के तहत लोन ले सकता है। इसके साथ ही अगर कोई अपने मौजूदा व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहता है, तो भी उसे इस योजना के माध्यम से लोन मिल सकता है।

कैसे ले सकते हैं?

मुद्रा लोन के लिए उस सरकारी या किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्थान में आवेदन देना होगा, जो मुद्रा लोन देता हो। आवेदन के लिए आपके कारोबार की पूरी जानकारी/प्लान सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे।

 कितना ब्याज देना होगा?

मुद्रा लोन की खास बात यह है कि इसमें कोई निश्चित ब्याज दर नहीं है। अलग-अलग बैंक लोन पर अलग-अलग दर से ब्याज वसूल सकते हैं। दर का निर्धारण कारोबार की प्रकृति और उससे जुड़े जोखिम के आधार पर तय होता है। वैसे सामान्यतः ब्याज दर 12 प्रतिशत के आसपास रहती है।

यह है मुद्रा लोन पाने की पूरी प्रक्रिया

पहला चरण-

सबसे पहले आवेदक को एक बिजनेस प्लान तैयार करना होता है। साथ ही लोन के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज भी तैयार करने होते हैं। सामान्य दस्तावेजों के साथ बैंक आपसे आपका बिज़नेस प्लान, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, भविष्य की आय के अनुमान संबंधी दस्तावेज भी मांगेगा, ताकि उसे आपकी आवश्यकता की जानकारी हो, साथ ही यह भी अंदाजा लग सके कि आपको लाभ कैसे होगा या लाभ कैसे बढ़ेगा।

दूसरा चरण-

मुद्रा लोन देने वाले बैंक/वित्तीय संस्था न का चयन करना होता है। आवेदक एक से अधिक बैंकों का चयन कर सकता है। बैंक को दस्तावेजों के साथ लोन एप्लिकेशन फॉर्म भरकर जमा करना होगा। किस तरह के बैंक/संस्था न मुद्रा लोन देते हैं, इसकी जानकारी ऊपर दी गई है।

तीसरा चरण

आवेदन सही पाए जाने पर बैंक या वित्तीय संस्थान मुद्रा लोन पास करेगा और आवेदक को मुद्रा कार्ड प्रदान किया जाएगा।

मुद्रा योजना के चार बड़े फायदे

  • इस योजना के तहत बिना गारंटी के लोन लिया जा सकता है।
  • इसके लिए किसी भी तरह की प्रोसेसिंग फीस नहीं चुकानी पड़ती।
  • लोन भुगतान अवधि को पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • लोन लेने वाले को मुद्रा कार्ड दिया जाता है, जिस का उपयोग कारोबारी जरूरत पर आने वाले खर्च के लिए कर सकता है।

जरूरी दस्तावेज़ (डॉक्यूमेंट्स चेकलिस्ट)

सामान्यत: मुद्रा लोन के लिए आपको आवेदन फॉर्म के साथ निम्न दस्तावेज़ जमा करने होते हैं। ऋण की राशि , व्यापार की प्रकृति , बैंक नियमों आदि के आधार पर दस्तावेज़ों की संख्या कम या ज्यादा हो सकती है।

मुद्रा लोन आवेदन, बिज़नेस प्लान या प्रोजेक्ट रिपोर्ट, पहचान संबंधी दस्तावेज़ जैसे पैन कार्ड , आधार कार्ड , मतदाता पहचान पत्र आदि । एक से ज्यादा आवेदकों की स्थिति में पार्टनरशिप संबंधी दस्तावेज़ (डीड), टैक्स रजिस्ट्रेशन, बिज़नेस लाइसेंस आदि ।

निवास के प्रमाण संबंधी दस्तावेज़, जैसे टेलीफोन बिल/बिजली बिल आदि आवेदक की 6 महीने से कम पुरानी तस्वीरें, मशीन या अन्य सामग्री का कोटेशन जिसे खरीदना चाहते हैं, साथ ही जहां से खरीदेंगे उस सप्लायर/दुकानदार के बारे में जानकारी, श्रेणियां(एससी/एसटी/ओबीसी/अल्पसंख्यक), अगर लागू हो तो पिछले दो वर्षों की बैलेंस शीट और प्रोजेक्टेड बैलेंस शीट (दो लाख से ऊपर के लोन पर)।

ज्यादा मुनाफे के लिए करें ब्रोकली की खेती

ब्रोकोली की खेती ठीक फूलगोभी की तरह की जाती है। इसके बीज व पौधे देखने में लगभग फूल गोभी की तरह ही होते हैं। लेकिन इसका रंग हरा होता है इसलिए इसे हरी गोभी भी कहते है उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में जाड़े के दिनों में इन सब्जियों की खेती बड़ी सुगमता पूर्वक की जा सकती है जबकि हिमाचल प्रदेश , उत्तरांचल और जम्मू कश्मीर में में इनके बीज भी बनाए जा सकते है।

सब्जियों की पैदावार में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। लेकिन आज भी हमारी ज्यादातर सब्जियों की कम उत्पादकता व कमजोर गुणवत्ता की । आगे आने वाले समय में सब्जियों का उत्पादन व विदेशों में उन की सप्लाई दोनों ही बढ़ सकते हैं।

इस तरह की सब्जियों में ब्रोकली का नाम बहुत मशहूर है. इस की खेती पिछले कुछ सालों से धीरेधीरे बड़े शहरों के आसपास कुछ किसान करने लगे हैं। बड़े महानगरों में इस सब्जी की मांग भी अब बढ़ने लगी है ।पांच सितारा होटलों व पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है और जो किसान इस की खेती कर के इस को सही बाजार में बेचते हैं, उन को इस की खेती से बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।

ब्रोकोली की बाज़ार मांग

पांच सितारा होटल तथा पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है तथाजो किसान इसकी खेती करके इसको सही बाजार में बेचते हैं उनको इसकी खेती से बहुत अधिक लाभ मिलता है क्योंकि इसके भाव कई बार 30 से 50 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक या इससे भी उपर मिल जाते हैं। यहां ये बताना उचित रहेगा कि ब्रोकोली की खेती करने से पहले इसको बेचने का किसान जरूर प्रबंध कर लें क्योकि यह अभी महानगरों, बड़े होटल तथा पर्यटक स्थानों तक ही सीमित है। साधारण, मध्यम या छोटे बाजारों में अभी तक ब्रोकोली की मांग नहीं है।

कृषकों के लिए ब्रोक्कोली की खेती के फायदे

बाजार में ब्रोक्कोली की कीमत सामान्य गोभी से कहीं ज्यादा है. बड़े शहरों में बाजारों इसकी कीमत 100 रुपये से लेकर 250 रुपये प्रति किलो होती है. बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और झारखण्ड जैसे कई प्रदेशों में इसकी आयात दिल्ली और पुने जैसे बड़े शहरों से होने के कारण इसकी कीमत और बढ़ जाती है. तो छोटे शहरों के किसानों के पास अच्छा अवसर है की वो अपने लोकल मार्केट में ही अच्छे दामों पर ये फसल बेच सकते हैं. मांग बढ़ने पर निर्यात कर के आमदनी और बढ़ाई जा सकती है.

ब्रोक्कोली की खेती से कितनी आमदनी बन सकती है

यदि आपके पास 1 एकर प्लाट (43500 स्क्वायर फ़ीट) का क्षेत्र उपलब्ध है तो आप तक़रीबन 125000 से 150000 रुपये तक की आमदनी 3-4 महीने में हो सकती है.

ब्रोकोली के पौधे = 6000 कम से कम
पौधों का नुकसान = 1000 पौधे
स्वस्थ पौधे = 5000

मार्केट रेट के हिसाब से आप हर पौधे (या फूल) को 75 से 150 रुपये तक में बेच सकते हैं, क्यों कि हर पौधे का वजन 500 ग्राम से 1 किलो तक का होगा. मैं इस गणना के लिए 75 रुपये प्रति पीस भी मानू तो,

आमदनी = 5000 x 75 = 375000 रुपए
आपके खर्चे = 1 लाख से लेकर डेढ़ लाख तक (सिंचाई, बीज, कीटनाशक दवाइयाँ, ट्रांसपोर्टेशन, इत्यादि)
आपका कुल मुनाफा = 125000 से 175000 रुपये तक (केवल 3-4 महीने में)

लगाने का समय

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ब्रोकोली उगाने का उपयुक्त समय ठण्ड का मौसम होता है इसके बीज के अंकुरण तथा पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए तापमान 20 -25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए इसकी नर्सरी तैयार करने का समय अक्टूम्बर का दूसरा पखवाडा होता है पर्वतीय क्षेत्रों में क़म उचाई वाले क्षेत्रों में सितम्बर- अक्टूम्बर , मध्यम उचाई वाले क्षेत्रों में अगस्त सितम्बर , और अधिक़ उचाई वाले क्षेत्रों में मार्च- अप्रैल में तैयार की जाती है ।

बीज दर

गोभी की भांति ब्रोकली के बीज बहुत छोटे होते है। एक हेक्टेअर की पौध तैयार करने के लिये लगभग 375 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है ।

नर्सरी तैयार करना

ब्रोकोली की पत्ता गोभी की तरह पहले नर्सरी तैयार करते है और बाद में रोपण किया जाता है कम संख्या में पौधे उगाने के लिए 3 फिट लम्बी और 1 फिट चौड़ी तथा जमीन की सतह से 1.5 से. मी. ऊँची क्यारी में बीज की बुवाई की जाती है क्यारी की अच्छी प्रकार से तैयारी करके एवं सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर बीज को पंक्तियों में 4-5 से.मी. की दूरी पर 2.5 से.मी. की गहराई पर बुवाई करते है बुवाई के बाद क्यारी को घास – फूस की महीन पर्त से ढक देते है तथा समय-समय पर सिचाई करते रहते है जैसे ही पौधा निकलना शुरू होता है ऊपर से घास – फूस को हटा दिया जाता है नर्सरी में पौधों को कीटों से बचाव के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र का प्रयोग करें ।

रोपाई

नर्सरी में जब पौधे 8-10 या 4 सप्ताह के हो जायें तो उनको तैयार खेत में कतार से कतार , पक्ति से पंक्ति में 15 से 60 से. मी. का अन्तर रखकर तथा पौधे से पौधे के बीच 45 सें०मी० का फ़सला देकर रोपाई कर दें । रोपाई करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए तथा रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें ।

खाद और उर्वरक

रोपाई की अंतिम बार तैयारी करते समय प्रति 10 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में 50 किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद कम्पोस्ट खाद इसके अतिरिक्त 1 किलोग्राम नीम खली 1 किलोग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर क्यारी में रोपाई से पूर्व समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद क्यारी की जुताई करके बीज की रोपाई करें ।

प्रजातियाँ

ब्रोकली की किस्मे मुख्यतया तीन प्रकार की होती है श्वेत , हरी व बैंगनी |

बैंगनी –इनमे हरे रंग की गंठी हुई शीर्ष वाली किस्मे अधिक पसंद की जाती है इनमे नाइन स्टार , पेरिनियल,इटैलियन ग्रीन स्प्राउटिंग,या केलेब्रस,बाथम 29 और ग्रीन हेड प्रमुख किस्मे है |

संकर किस्मों में- पाईरेट पेकमे ,प्रिमिय क्राप ,क्लीपर , क्रुसेर , स्टिक व ग्रीन सर्फ़ मुख्य है |

अभी हाल भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र कटराई द्वारा ब्रोकली की के.टी.एस.9 किस्म विकसित की गई है इसके पौधे मध्यम उचाई के ,पत्तियां गहरी हरी ,शीर्ष सख्त और छोटे तने वाला होता है | भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने हाल ही में पूसा ब्रोकोली 1 क़िस्म की खेती के लिये सिफ़ारिश की है तथा इसके बीज थोड़ी मात्रा में पूसा संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, कटराइन कुल्लू घाटी , हिमाचल प्रदेश से प्राप्त किये जा सकते हैं|

मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।