50 हजार रुपए हैं आपके पास तो लगाएं बैटरी वाटर प्‍लांट

पिछले कुछ सालों में बैटरी वाटर की डिमांड लगातार बढ़ रही है। वाहनों और इन्‍वर्टर में लगी बैटरियों में कुछ महीनों के अंतराल में पानी डालने की जरूरत होती है। यह पानी अलग तरह का होता है। यह बैटरी वाटर ऑटोमोबाइल मार्केट के अलावा लगभग हर रेसिडेंशियल मार्केट में बिकता है।

ऐसे में, शहरों में बैटरी वाटर मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्‍लांट भी लग रहे हैं। अगर आप भी कोई ऐसा बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, जिसे लगाने में ज्‍यादा पैसा खर्च नहीं होता तो आप बैटरी वाटर मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्‍लांट लगा सकते हैं।

बिजनेस में संभावना को देखते हुए सरकार प्रधानमंत्री इम्‍प्‍लॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम के तहत इस प्रोजेक्‍ट़़ को लोन भी देती है। आज हम आपको इस पूरे प्रोजेक्‍ट के बारे में बताएंगे, ताकि आप इस प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के आधार पर लोन लेकर अपना बिजनेस शुरू कर सको।

कितना आएगा खर्च

सरकार के मॉडल प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के मुताबिक, अगर आपके पास लगभग 50 हजार रुपए हैं तो आप बैटरी वाटर प्‍लांट लगा सकते हैं, क्‍योंकि इस पूरे प्रोजेक्‍ट की कॉस्‍ट 4 लाख 70 हजार रुपए है और प्रधानमंत्री इम्‍प्‍लॉयमेंट जतरेशन प्रोग्राम के तहत आप लोन भी ले सकते हैं। इस प्रोग्राम के तहत 90 फीसदी लोन केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता है।

यह है प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट

इक्‍वीपमेंट ( हॉट एयर ब्‍लॉवर, प्‍लास्टिक ड्रम, वाटर लिफ्टिंग पंप, हार्डनेस टेस्टिंग किट, पीएच मीटर, सेमीऑटोमैटिक फिलिंग मशीन, 1 एचपी मोटर, क्‍वालिटी कंट्रोल इक्‍वीपमेंट) पर लगभग 2 लाख 25 हजार रुपए का खर्च आएगा। जबकि आपको लगभग 2 लाख 45 हजार रुपए की वर्किंग कैपिटल की जरूरत पड़ेगी। जिससे आपके प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट 4 लाख 70 हजार रुपए हो जाएगी।

कितनी होगी इनकम

प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोजेक्‍ट शुरू होने के बाद एक साल के दौरान आपको लगभग 9 लाख रुपए के रॉ-मैटेरियल की जरूरत पड़ेगी। इस तरह आपकी कॉस्‍ट ऑफ प्रोडक्‍शन 14 लाख 70 हजार रुपए आएगी।

एक साल में आप 250 किलोलीटर बैटरी वाटर का प्रोडक्‍शन करेगा और इसे बेचकर आपको 16 लाख रुपए मिलेंगे। इस आपको लगभग 1 लाख 29 हजार रुपए की इनकम होगी।

मिलेगी 25 फीसदी तक सब्सिडी

अगर आप इस प्रोग्राम के तहत लोन लेते हैं तो आपको 25 फीसदी तक सब्सिडी भी मिलती है। शहरी क्षेत्रों में 15 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र में 25 फीसदी सब्सिडी दी जाती है, जबकि स्‍पेश्‍ल कैटेगिरी के लोगों को 25 व 35 फीसदी सब्सिडी दी जाती है।

ऐसे करें ड्राईफ्रूट का बिजनेस, होगी 40 हजार रुपए महीना तक इनकम

ड्राई फ्रूट हर घर की बेसिक जरूरत है। खासकर फेस्टिवल टाइम में ड्राईफ्रूट सबसे ज्यादा गिफ्ट के तौर पर एक्सचेंज किया जाता है। इंडियन फैमिली की इसी बेसिक जरूरत पर अपना बिजनेस खड़ा कर सकते हैं। यहां हम आपको बता रहे हैं कि कैसे आप ड्राई फ्रूट का बिनजेस शुरू 40 से 50 हजार रुपए महीना कमा सकते हैं।

शुरू कर सकते हैं ड्राईफ्रूट का बिजनेस

ड्राईफ्रूट का बिजनेस शुरू करने के लिए दुकान चाहिए होगी। अगर आपके पास अपनी दुकान है तो आप किराए से बच जाएंगे। वहीं, आप कि‍राए पर दुकान लेकर पर भी काम शुरू कर सकते हैं।

आप अपने एरिया के आसपास दुकान ले सकते हैं। दुकान लेने से पहले यह जरूर देख लें कि आपकी दुकान के आसपास कितनी दुकानें ड्राईफ्रूट की है। ताकि, आपके लिए सेल करना आसान हो।

चाहिए होंगे ये लाइसेंस

  • दुकान चलाने और बिजनेस करने के लिए आपको जीएसटी नंबर चाहिए होगा। जीएसटी नंबर जीएसटी पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने के बाद मिल जाएगा।
  • अगर किराए की दुकान पर कारोबार कर रहे हैं तो रेन्ट एग्रीमेंट चाहिए होगा। एमसीडी से दुकान चलाने का लाइसेंस भी लेना होगा।
  • फूड लाइसेंस सरकारी फूड अथॉरिटी एफएसएसएआईएस से लेना होगा।

होलसेल बाजार से खरीद सकते हैं दाल

अपने एरिया के ड्राईफ्रूट के होलसेल बाजर से दाल मंगा सकते हैं। ड्राईफ्रूट इंपोर्टर से भी खरीद सकते हैं। इनकी जानकारी ऑनलाइन मिल जाएगी।

इन्वेस्टमेंट और कमाई

खारी बावली में ड्राईफ्रूट और अनाज के होलसेलर सतिंदर जैन ने बताया कि ड्राईफ्रूट का बिजनेस 5 लाख रुपए के इन्वेस्टमेंट से शुरु किया जा सकता है। 5 लाख रुपए के इन्वेस्टमेंट में हर महीने 40 से 50 हजार रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं। जैन ने कहा कि ड्राईफ्रूट बेचकर रोजाना आसानी से 1,500 से 2,000 रुपए की सेल हो जाती है।

इतना मिलता है मार्जिन

होलसेल बाजार से लेकर रिटेल में 100 रुपए की सेल में 10 से 25 रुपए का मार्जिन मिलता है।

खड़ा कर सकते हैं अपना ड्राईफ्रूट ब्रांड

अपनी पैकेजिंग मशीन खरीदकर ब्रांड नाम के साथ भी ड्राईफ्रूट बेच सकते हैं। ड्राईफ्रूट की क्‍वॉलिटी अच्छी होने पर लंबे समय में इसका फायदा मिलता है।

ऑनलाइन भी बेच सकते हैं ड्राईफ्रूट

अपना ब्रांड बनाने पर ऑनलाइन मार्केट जैसे बिग बास्केट, अमेजन पैन्ट्री जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी ड्राईफ्रूट बेच सकते हैं।

ऑनलाइन कैसे बेचें प्रोडक्ट

कैसे जुड़ सकते हैं ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से

  • ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर कारोबारी को रजिस्टर कराना होगा
  • कारोबारी को पैन, जीएसटी और बैंक अकाउंट की डिटेल देनी होगी
  • कंपनी सेलर के साथ एमओयू या करार भी करती है
  • करार के बाद आप वेबसाइट पर अपने प्रोडक्ट और साड़ी की फोटोग्राफ अपलोड कर सकते हैं।
  • वैरिफिकेशन के बाद प्रोडक्ट वेबसाइट पर दिखने लगते हैं।
  • ज्यादातर कंपनियां सेलर से प्रोडक्ट ऑनलाइन बिकने के बाद कारोबारी से 1 से 9 फीसदी कमीशन लेती हैं।
  • ऑनलाइन पेमेंट में प्रोडक्ट कस्टमर के पास पहुंचने के बाद सेलर यानी कारोबारी के अकाउंट में ट्रांसफर कर दी जाती है।

सिर्फ 20 रुपए खर्च करके घर पर ही बना सकते हैं वॉटर टैंक अलार्म

पानी की टंकी में कई बार पानी फुल हो जाने पर समझ नहीं आता है। ऐसे में पानी टंकी से गिरता रहता है। इस प्रॉब्लम को दूर करने के लिए इस वीडियो में आज आप देखेंगे वॉटर टैंक अलार्म बनाने का तरीका। इस अलार्म को सिर्फ 20 रुपए खर्च करके बनाया जा सकता है।

वॉटर टैंक अलार्म बनाने के लिए एक पुराना मोबाइल चार्जर, एक बाइक इंडीकेटर बजर और वायर की जरूतर पड़ेगी। सबसे पहले ग्लू की मदद से मोबाइल चार्जर के ऊपर बाइक इंडीकेट बजर को चिपका दें। चार्जर और बजर के रेड वायर्स को आपस में जोड़ लें और काले वायर्स को खुला छोड़ दें।

अब खुले वायर्स में एक्स्ट्रा वायर जोड़ लें। इसके बाद चार्जर को घर के अंदर स्विच में लगा लें। और लंबे वायर को पानी की टंकी में सबसे ऊपर लगा दें। जैसे ही टंकी का पानी फुल होकर इस वायर के मुंह तक पहुंचेगा वैसे ही घर में लगा बजर बजने लगेगा

वीडियो देखे

रिटायरमेंट के बाद 60 दिन की ली ट्रेनिंग,ऐसे खड़ा किया 35 लाख रु का कारोबार

अपने देश में रिटायरमेंट के बाद लोग काम करना पसंद नहीं करते हैं। रिटायरमेंट के बाद लोग घर पर अपने परिवार के साथ वक्त बिताने की सोचते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो रिटायरमेंट के बाद अपना बिजनेस शुरू करने का जज्बा रखते हैं और वो अपना एक अलग मुकाम भी खड़ा कर रहे है।

हरियाणा के रहने वाले राजकुमार खरब भी ऐसे ही शख्स हैं जिसने नौकरी से रिटायर होने के बाद न सिर्फ अपना बिजनेस शुरू किया, बल्कि वो इससे अच्छी खासी कमाई भी कर रहे हैं।

 2 महीने का किया कोर्स

राजकुमार खरब हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर थे। नौकरी से रिटायर होने के बाद ऑर्गेनिक फार्मिंग में खुद का एंटरप्राइज खोलना चाहते थे।

इसलिए 2015 में उन्होंने करनाल स्थित इंडियन सोसायटी ऑफ एग्रीबिजनेस प्रोफेशनल्स के तहत एग्री-क्लिनिक एंड एग्री-बिजनेस सेंटर्स को ज्वाइन किया। यहां पर उन्होंने 2 महीने का कोर्स किया। यहां उनको मार्केट सर्वे, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के साथ अन्य बिजनेस डेवलपमेंट के बारे में जानकारी मिली।

कोर्स पूरा होने के बाद उन्होंने अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और आज उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए हो गया है। उनके सफल बिजनेस के बारे में एग्रीक्लिनिक ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की है।

मार्केट में उतारा ऑर्गेनिक गुड़

एग्रीक्लिनिक से ट्रेनिंग पूरा होने के बाद उनको अपना बिजनेस शुरू करना था। इसके लिए उन्होंने मार्केट में सर्वे कर जानना चाहा कि लोग बाजार में नया क्या खोज रहे हैं और बिजनेस का मौका कहां है। उन्होंने पाया कि बाजार में जो गुड़ मिल रहा है वो अच्छी क्वालिटी का नहीं है और उसमें मिठास भी नहीं है। एग्री फील्ड में काम करने का अनुभव होने की वजह से उन्होंने आर्गेनिक गुड़ बाजार में लॉन्च करने का फैसला किया। फिर एआरबी ऑर्गेनिक जैगरी की शुरुआत हुई।

बिना लोन शुरू किया बिजनेस राजकुमार ने अपने बिजनेस की शुरुआत बिना लोन से की। उन्होंने बिजनेस शुरू करने लिए अपनी जमा-पूंजी लगाई। उन्होंने 20 एकड़ की जमीन को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार किया। जहां आज ऑर्गनिक तरीके से गन्ने की खेती होती है। अपने साथ उन्होंने अन्य किसानों को भी ऑर्गेनिक खेती के फायदे के बारे में बताया। वो एक खास तकनीक से गुड़ बनाते हैं औऱ उनके इस तकनीक को हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से लाइसेंस मिला हुआ है।

सालाना 35 लाख रु है टर्नओवर

ऑर्गेनिक गुड़ की डिमांड बाजार में अच्छी है। बाजार में ऑर्गेनिक गन्ने के रस को भी अच्छी कीमत मिल जाती है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन बेहतर हो जाता है। वो अपनी तकनीक को दूसरे किसानों और स्मॉल स्केल फैक्ट्रियों को बेचकर भी कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा वो कमर्शियल मॉडल पर बायोगैस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भी चला रहे हैं।

उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए है। ग्रो ऑर्गेनिक, बाय ऑर्गेनिक राजकुमार इस प्रकार के मॉडल डेवलप कर ग्रामीण युवाओं और पारंपरिक रूरल एंटरप्राइज को नया जीवन देकर उन्हें वाणिज्यिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रहे है। उभरते एग्रीप्न्योर्स के लिए उनका का संदेश है- ऑर्गेनिक उपजाएं, ऑर्गेनिक खरीदें और अगली पीढ़ी के लिए प्लेनेट को बचाओ।

ऐसे ढोईं गईं ट्रकों से भारी-भरकम मशीनें, देखते रह जाएगे आप

आपने अक्सर सड़कों पर को ट्रक से ढोते हुए देखा होगा। लेकिन, कभी-कभी यह नजारा हैरतअंगेज भी हो जाता है, क्योंकि इन ट्रकों का साइज उस पर लदी मशीनों की तुलना में काफी छोटा होता है। ट्रकों द्वारा सबसे ज्यादा वजन ढोने का रिकॉर्ड सबसे पहले लंदन में बना था,

जब सितंबर, 2013 में एक ट्रक से 650 टन वजनी ट्रांसफॉर्मर को सरे सिटी से विक्टोरिया डॉक्स तक लाया गया था। इसके बाद कई रिकॉर्ड बने और टूटते चले गए, लेकिन अब यह रिकॉर्ड सऊदी अरब की लॉजिस्टिक कंपनी के नाम है,

जिसके ट्रकों ने 4,800 टन वजनी वाटर डिसैलिशन मशीन लेकर करीब 20 किमी का सफर तय किया था। आज हम आपको ट्रकों द्वारा ढोईं गईं भारी-भरकम मशीनों की कुछ ऐसी ही फोटोज दिखा रहे हैं, जिसे देखकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे।

फोटोज में देखें कैसे ट्रकों पर ढोए गए ये भारी भरकम सामान…

स्विटरजरलैंड की पनालपिना लॉजिस्टिक कंपनी ने इस 570 टन वजनी पेट्रोकेमिकल मशीन को लेकर करीब 60 किमी का सफर तय किया था।

160 पहियों का यह ट्रक जब एक रॉकेट शटल को लेकर कैलिफोर्निया से गुजरा तो इसी फोटोज खींचने के लिए हजारों लोगों की लाइन लग गई थी।

अमेरिका की युमा सिटी में विशाल 520 टन वजनी माइनिंग ट्रक को ले जाता हुआ एक ट्रक।

अमेरिका के कैनेडी स्पेस सेंटर से सैटर्न वी-अपोलो रॉकेट को लॉन्चिंग पैड तक एक ट्रक से ले जाया गया था।

साल 2013 में 640 टन वजनी, 328 फीट लंबे और 16 फीट चौड़े ट्रांसफॉर्मर को एक ट्रक से डिडकोट पावर स्टेशन से एक ट्रक पर लोड किया गया था।

अमेरिका के इदाहो नेशनल लेबोरेटरी से दो हीट ट्रांसफर रिएक्टर एक ट्रक से ले जाया गया था।

बेलारूस की मिंस्क सिटी से करीब 1050 टन वजनी माइनिंग मशीन को ले जाता हुआ ट्रक।

सितंबर, 2012 में सऊदी अरब की लॉजिस्टिक कंपनी के नाम है, जिसके ट्रकों ने 4,800 टन वजनी वाटर डिसैलिशन मशीन लेकर करीब 20 किमी का सफर तय किया था।

यहां सरकार सोने के लिए दे रही है 22 करोड़ रुपए,

जापान दुनिया एक ऐसा देश जहां लोग इतना ज्यादा काम करते हैं कि उन्हें नींद पूरी करने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। ये एक बड़ी वजह है कि जापान इस समय भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी बना हुआ है।

बता दें कि जापान की सरकार की ओर से जारी ‘डेथ फॉर ओवरवर्क’ पर जारी किए गए वाइट पेपर के मुताबिक पिछले कुछ सालों में ऐसा होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों की हालत खराब हो गई है।

यहां वर्कर्स करते हैं फुल टाइम जॉब

यहां आधे से ज्यादा वर्कर्स फुल टाइम जॉब करते हैं। इन वर्कर्स का कहना है कि उनके पास पर्याप्त नींद लेने का समय भी नहीं है।सरकार की ओर से जारी किए गए वाइट पेपर के मुताबिक यहां बहुत कम रेस्ट पीरियड के लिए कोई कानून नहीं है।

इस समस्या को लेकर सरकार ने एक सर्वे किया। इस सर्वे में करीब 1700 कंपनियों में से सिर्फ 2 फीसदी कंपनियां ही ऐसी मिलीं जो मिनिमम रोजाना रेस्ट पीरियड देती हैं। इनके अलावा बची हुई कंपनियां ऐसा नहीं करतीं।

सरकार ने निकाला इसका तोड़

वहीं अब जापान सरकार ने इसका तोड़ निकाला है। उपाय ये है कि जापान की सरकार ने करीब अगले वित्त वर्ष के लिए 22 करोड़ रुपए पूरी तरह से अलग रख दिए हैं। इस रकम को छोटी और मिडिल क्लास कंपनियों को मिनिमम रेस्ट पीरीयड अपनाने वाले प्रोग्राम को बढ़ावा देने में दिए जाएंगे।

इस प्रोग्राम के तहत सरकार हर कंपनी को 5 लाख येन (करीब 30 लाख रुपए) देगी। सरकार ऐसा इसलिए करेगी ताकि कंपनी कर्मचारी नियमों, ट्रेनिंग और सॉफ्टवेयर को अपडेट कर सके। इससे उनकी कॉस्ट भी कम होगी और कर्मचारियों को भी आराम मिल सकेगा।

599 रु. में सरकार करा रही है सोलर कोर्स, बिजनेस से लेकर नौकरी करना होगा आसान

आने वाले समय में सोलर पावर की डिमांड बढ़ेगी, जिसके चलते इस सेक्‍टर में नए बिजनेस और जॉब्‍स के मौके भी बनेंगे। इसे समझते हुए सरकार जल्‍द से जल्‍द ऐसे प्रोफेशनल्‍स तैयार करना चा‍हती है, ताकि सोलर सेक्‍टर को स्किल्‍ड लेबर की कमी न रहे।यही वजह है कि सरकार ने मात्र 599 रुपए में सोलर कोर्स शुरू किया है।

सरकार का दावा है कि यह कोर्स करने वाले युवा सोलर पावर प्रोजेक्‍ट्स के इंस्‍टॉलेशन, ऑपरेशन एंड मेंटिनेंस, मैनेजमेंट, स्टैब्लिशमेंट और डिजाइन का काम कर सकते हैं। बल्कि इस कोर्स को करने वाले युवा सोलर एनर्जी सेक्‍टर में नया बिजनेस भी शुरू कर सकते हैं।

आप भी सरकार के इस ट्रेनिंग प्रोग्राम का फायदा उठा सकते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि कैसे आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम से जुड़ सकते हैं और इस ट्रेनिंग प्रोग्राम से आपको क्‍या-क्‍या फायदा हो सकता है।

ये हैं कोर्स के चैप्‍टर

अगर आप यह कोर्स करना चाहते हैं तो आपको फोटोवोल्टिक सिस्‍टम के बेसिक, इलेक्‍ट्रोमैगनेटिक स्‍पेक्‍ट्रम के बेसिक और शेडो एनालाइसिस, सोलर पावर सिस्‍टम के डिजाइन, अर्थिंग (ग्राउंडिंग) सिविल कंस्‍ट्रक्‍शन एंड लाइटिंग प्रोटेक्‍शन, सोलर पावर प्‍लांट्स के टेस्टिंग एवं कमिशनिंग, ऑपरेशन एंड मेंटिनेंस, पर्सनल प्रोएक्टिव इक्विपमेंट, सेफ्टी, सोलर पीवी का कम्‍प्‍लीट इंस्‍टॉलेशन (प्रेक्टिकल) के बाद नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ विंड एनर्जी का वर्चुअल टूर कराया जाएगा।

30 दिन में होगा कोर्स पूरा

यह कोर्स 30 दिन का है। इसके लिए आपको ऑनलाइन कोर्स परचेज करना होगा। कोर्स परचेज करने के बाद आपको हर रोज कोर्स के चैप्‍टर पढ़ने होंगे। 30 दिन का कोर्स पूरा होने के बाद आप का टेस्‍ट होगा। टेस्‍ट के पासिंग मार्क्‍स 60 फीसदी होंगे। आप अगर यह कोर्स करना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले https://www.iacharya.in/site/ पर रजिस्‍ट्रेशन करना होगा। इसके आप कोर्स परचेज कर सकते हैं।

मोबाइल से भी कर सकते हैं कोर्स

यह कोर्स पूरी तरह ऑनलाइन है। आप अपने लैपटॉप और कम्‍प्‍यूटर के अलावा अपने स्‍मार्ट फोन में भी इस वेबसाइट को खोलकर पूरा कोर्स कर सकते हैं। यह वेबसाइट मोबाइल इनेबल्‍ड है।

यह मिलेगा सर्टिफिकेट

यह कोर्स आईआचार्य सिलिकॉन लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ विंड एनर्जी ( जो मिनिस्‍ट्री ऑफ न्‍यू एंड रिन्‍यूएबल एनर्जी की यूनिट है) और एसआरआरए के संयोजन में आपको सर्टिफिकेट मिलेगा।

जाने कैसे काम करता है ड्रिप सिंचाई सिस्टम ,और किसानो के लिए क्यों जरूरी है

किसानों को ड्रिप सिंचाई को क्यों अपनाना चाहिए

ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है।इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है ।

फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है।अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।

ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है ।आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है।

इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम में ड्रिप सिंचाई एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है अत% कृषको को इसे बड़े पैमाने पर अपनाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई में स्तेमाल होने वाले उपकरण तथा उनका कार्य

  • पंप:- पानी की आपूर्ति
  •  फिल्टर यूनिट:- पानी को छानने की व्यवस्था। जिससे की ड्रिप सिस्टम के कार्यकलाप में कोई बाधा उत्पन्न न हो । इसमें होते है, वाटर फिल्टर। बालू फिल्टर (बालू अलग करने के लिए) ।
  •  फ्रटीगेसन यूनिट:- सिंचाई वाले पानी में तरल खाद मिलाने की व्यवस्था।
  •  प्रेशर गेज:- ड्रिप सिस्टम में पानी का प्रेशर को इंगित करता है।
  •  मीटर:- ड्रिप सिस्टम में पानी के प्रवाह को इंगित करता है।
  •  मुख्य पाइप लाइन:- लेटरलस में पानी की सप्लाई करती है।
  •  लेटरल्स:- कम मोटाई वाली ट्यूब्स। ड्रीपर्स को पानी की सप्लाई करती है।
  •  ड्रीपर्स:- पानी को पौध जड़ क्षेत्र में बूंद-बूंद सप्लाई करते है।

अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था को इस्थापित करते वक्त कुछ तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि। भूमि स्थलाकृति। मिट्टी। पानी। फसल और कृषि जलवायु स्थिति इत्यादि । फव्वारा सिंचाई (स्प्रींल्कर सिंचाई व्यवस्था) व्यवस्था से तुलना करें तो ड्रिप सिंचाई ज्यादा फायदेमंद साबित होगी ।

ड्रिप सिंचाई के फायदे-

  • पानी उपलब्धता की समस्या से जूझ रहे इलाके के लिए फायदेमंद
  • फसल की बंपर पैदावार और वक्त से पहले फसल तैयार होने की संभावना बढ़ जाती है
  • सीमित इस्तेमाल की वजह से खाद और पोषक तत्वों के ह्रास को कम करता है
  • पानी का अधिकतम और बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल
  • अंतरसांस्कृतिक या अंतरफसलीय कार्य को ड्रिप व्यवस्था आसान बनाता है
  • पौधे की जड़ तक पानी का वितरण एक समान और सीधे होता है
  • घास-फूस को बढ़ने और मिट्टी के कटाव को रोकता है
  • असमान आकार की भूमि या खेत में ड्रिप व्यवस्था का बहुत प्रभावकारी तरीके से इस्तेमाल हो सकता है

  • बिना किसी परेशानी के पुनरावर्तित अपशिष्ट पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है
  • दूसरी सिंचाई तरीकों के मुकाबले इसमे मजदूरी का खर्च कम किया जा सकता है
  • पौधे और मिट्टी जनित बीमारियों के खतरे को भी कम करता है
  • इसका संचालन कम दबाव में भी किया जा सकता है जिससे ऊर्जा खपत में होनेवाले खर्च को भी कम किया जा सकता है
  • खेती किये जाने योग्य जमीन को बराबर किये जाने की भी जरूरत नहीं होती है
  • एक समान पानी वितरण होने से पौधे के जड़ क्षेत्र में एकसमान नमी की क्षमता को बनाए रखा जा सकता है
  • खाद या सूक्ष्म पोषक तत्वों को कम से कम क्षति पहुंचाए फर्टीगेशन (ड्रिप व्यवस्था के साथ खाद को सिंचाई वाले पानी के साथ प्रवाहित करना) किया जा सकता है
  • वॉल्व्स और ड्रिपर की सहायता से पानी के कम या ज्यादा प्रवाह को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है
  • ड्रिप व्यवस्था की वजह से सिंचाई की बारंबरता में मिट्टी के प्रकार की भूमिका बिल्कुल नगण्य होती है
  • कुल मिलाकर ड्रिप व्यवस्था वक्त और धन दोनों की बचत करता है

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

कमाल की है यह दूध दुहने वाली मशीन, एक मिंट में निकलती है 2 लीटर दूध

देश के तमाम ग्रामीण इलाकों में गाय या भैंस का दुध दुहने में हाथों का इस्तेमाल किया जाता है और सदियों से यही पारंपरिक तरीका अपनाया जा रहा है। लेकिन जब से डेयरी फार्मिंग की नई-नई तकनीकें सामने आई हैं पारंपरिक तरीके पीछे छूटते जा रहे हैं। मिल्किंग मशीन यानी दूध दुहने की मशीन ने डेयरी फार्मिंग और पशुपालन की दुनिया में क्रांति ला दी है।

मशीन से दुध निकालना काफी सरल है और इससे दूध का उत्पादन भी 15 फीसदी तक बढ़ जाता है। मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनिया भर में इस्तेमाल की जा रही है। आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध निकालने के लिए मशीन का सहारा ले रहे हैं।

पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को मिल्किंग मशीन के नाम से जानते हैं। इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है। इससे पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है। इससे दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है।

इस मशीन से गाय को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो। शुरुआत में गाय मशीन को लेकर दिक्कत कर सकती है लेकिन धीरे-धीरे इसे आदत हो जाती है और फिर मशीन से दूध दुहने में कोई दिक्कत नहीं होती।

मशीन से मिलता है स्वच्छ दूध

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथ-साथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी प्रकार की गंदगी नहीं आती। इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है। पशुपालक के दूध निकालते समय उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है। दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

मिल्किंग मशीन के बारे में जानकारी

मिल्किंग मशीन कई तरह की होती है। जो डेयरी किसान अपनी डेयरी में पांच लेकर पचास गाय या भैंस पालते हैं उनके लिए ट्रॉली बकेट मिल्किंग मशीन पर्यापप्त है। ये मशीन दो तरह की होती सिंगल बकेट और डबल बकेट। सिंगल बकेट मिल्किंग मशीन से 10 से 15 पशुओं का दूध आसानी से दुहा जा सकता है वहीं डबल बकेट मिल्किंग मशीन से 15 से चालीस पशुओं के लिए पर्याप्त है।

ट्रॉली लगी होने के कारण इस मशीन को फार्म में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सुविधाजनक होता है। दिल्ली-एनसीआर में डेयरी फार्म के उपकरण बनाने वाली कंपनी के सेल्स हेड और आधुनिक डेयरी फार्मिंग के जानकार रोविन कुमार ने बताया कि मशीन से दूध दुहने से पशु और पशुपालक दोनों को ही आराम होता है।

उन्होंने बताया कि मशीन के अंदर लगे सेंसर गाय के थनों में कोई दिक्कत नहीं होने देते और निर्वाध रूप से दूध निकलने देते हैं। उन्होंने बताया कि मशीन से दूध दुहने में 4 से 5 मिनट का वक्त लगता है, जिसमें कुल दूध का साठ फीसदी दूध शुरुआत के दो मिनट में निकल आता है और बाकी का बाद में।

आपको बता मिल्किंग मशीन  की कीमत 26000 रुपए  है । दिल्ली-एनसीआर में इन मशीनों को बनाने वाली कई कंपनियां हैं और पशुपालकों को ये मशीन आसानी से उपलब्ध है। लेकिन घबराने की जरूरत नहीं बगैर ट्राली के भी ये मशीने उपलब्ध हैं और रेट भी काफी कम हैं।

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन को फार्म के एक हिस्से में स्थापित किया जाता है। इसमें जरूरत के हिसाब से एक से लेकर तीन बकेट तक बढ़ाया जा सकता है। इस मशीन के रखरखाव में खर्चा कम आता है और एक-एक कर पशुओं को मशीन के पास दुहने के लिये लाया जाता है। ये मशीन 15 से 40 पशुओँ वाले डेयरी फार्म के लिए पर्याप्त है।

मशीन से भैंस का दूध दुहना भी आसान

रोविन कुमार ने बताया की गाय और भैंस दोनों के थनों में थोड़ा अंतर होता है, मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर इससे भैंस का दूध भी आसानी से दुहा जा सकता है। भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन के क्लस्टर बदलने होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, बिहार में मिल्किंग मशीन का प्रचल तेजी से बढ़ता जा रहा है। और लोग पारंकपरिक तरीके के बजाए मशीन के जरिए दूध दुहने को तवज्जो दे रहे हैं।

उत्पादन ज्यादा और लागत कम

एक और अहम बात है मशीन द्वारा दूध दुहने से दूध की मात्रा में 10 से 15 फीसदी बढ़ोतरी हो जाती है। मशीन मिल्किंग द्वारा दूध की उत्पादन लागत में काफी कमी तो आती ही है, साथ-साथ समय की भी बचत होती है। यानी परेशानी भी कम और दूध भी ज्यादा। इसकी सहायता से पूर्ण दुग्ध-दोहन संभव है जबकि परम्परागत दोहन पद्धति में दूध की कुछ मात्रा अधिशेष रह जाती है।

मशीन द्वारा लगभग 1.5 से 2.0 लीटर तक दूध प्रति मिनट दुहा जा सकता है. इसमें न केवल ऊर्जा की बचत होती है बल्कि स्वच्छ दुग्ध दोहन द्वारा उच्च गुणवत्ता का दूध मिलता है। इन मशीनों का रखरखाव भी बेहद सरल है, सालभर के मेंटिनेंस का खर्चा मात्र 300 रुपये आता है।

मिल्किंग मशीनों पर मिलती है सब्सिडी

कई राज्य सरकार मिल्किंग मशीनों की खरीद पर सब्सिडी भी दे रही है और बैंकों से इन्हें खरीदने के लिए लोन भी मिल रहा है। पशुपालकों को इसके लिए अपने जिले के पशुपालन अधिकारी और बैंकों के कृषि और पशुपालन विभाग के अफसरों से संपर्क करना चाहिए।

मशीन से दूध दुहने के दौरान बरतें सावधानी

अगर पशु के पहले ब्यांत से ही मशीन से दूध निकालेंगे तो पशु को मशीन से दूध निकलवाने की आदत हो जाएगी। शुरुआत में मशीन द्वारा दूध दुहते समय पशु को पुचकारते हुए उस के शरीर पर हाथ घुमाते रहना चाहिए, ताकि वह अपनापन महसूस करे। दूध दुहने वाली मशीन को पशुओं के आसपास ही रखना चाहिए ताकि वे उसे देख कर उस के आदी हो जाएं, वरना वे अचानक मशीन देख कर घबरा सकते हैं या उसकी आवाज से बिदक सकते हैं।

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