चौथी क्लास में तीन बार फेल होने वाला आज दे रहा है दे रहे 700 को रोजगार

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के सिरसा के किसान अशोक चंद्राकर चौथी क्लास में तीन बार फेल हो गए, तो 12 साल की उम्र में सब्जी बेचनी शुरू की। वे गली-गली घूमकर सब्जी बेचा करते थे। आज उनके पास 100 एकड़ जमीन है और रेंट के खेतों को मिलाकर कुल 900 एकड़ में खेती करते हैं। उन्होंने करीब 700 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है।

अलग-अलग देशों में सब्जियां कर रहे सप्लाई…

आज अशोक सालाना 10 करोड़ की सब्जियां देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करते हैं। 1973 में जन्मे अशोक का पढ़ाई में मन लगा नहीं, इसलिए उन्होंने काम में मन लगाया। उनके माता-पिता गांव के ही एक घर में काम किया करते थे। अशोक ने 14 साल की उम्र में नानी से एक खेत बटाई पर लेकर सब्जी उगानी शुरू की। इसे वे खुद घूम-घूमकर चरोदा, सुपेला भिलाई, चंदखुरी की गलियों में बेचते। इसी पैसे से पहले तीन, फिर चार, पांच आगे चलकर दस एकड़ खेत रेघा में ले लिया। उनका कारोबार बढ़ने लगा।

अशोक के पास आज सौ एकड़ की मालिकाना जमीन सिरसा, तर्रा सहित कई जगहों पर है। इसके अलावा नगपुरा, सुरगी, मतवारी, देवादा, जंजगीरी, सिरसा जैसे गांवों में बटाई की जमीन है, जिस पर सब्जियां उगाई जा रही हैं। इसमें नगपुरा में सबसे अधिक दो सौ एकड़ पर टमाटर लगा है। आज उनके पास 25 से ज्यादा ट्रैक्टर व दूसरी गाड़ियां हैं। आधुनिक मशीनें हैं, जो दवा छिड़काव से लेकर सब्जियों को काटने का काम करती हैं।

अशोक के मुताबिक, आजकल लोग शॉर्टकट के चक्कर में रहते हैं, अगर आप किसी प्लान पर लगातार चलते हैं और इंतजार करते हैं, तो आपको रिजल्ट जरूर मिलेंगे। मेहनत का कोई ऑप्शन हो ही नहीं सकता। कल तक मैं दो-दो हजार के लिए तरसता था और आज 15-15 हजार रुपए वेतन दे रहा हूं।

यह है McDonald’s के साथ अपना बिजनेस शुरू करने का प्रोसैस, करोड़ों कमा सकते हैं आप

McDonald’s साल 1955 से फ्रेंचाइजी मॉडल पर काम कर रहा है. रेस्टोरेंट का बिजनेस करने का मन बना रहे हैं तो आपके पास एक बेहतरीन मौका है. दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट फूड रेस्टोरेंट चेन मैक्डोनल्ड्स (McDonald’s) की फ्रेंचाइजी ले सकते हैं.

अगर आपको भारत में इस रेस्टोरेंट की फ्रेंचाइजी लेनी है तो इसके लिए डेवलपमेंट लाइसेंस लेना होगा. भारत में कंपनी डायरेक्ट फ्रेंचाइजी नहीं देती है. इसके लिए कंपनी ने पूरे भारत में फ्रेंचाइजी देने के लिए दो कंपनियों को नियुक्त किया हुआ है.

अगर आपको पश्चिमी भारत और साउथ इंडिया में रेस्टोरेंट खोलना है तो आपको हार्डकैस्टल रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड से संपर्क करना पड़ेगा. वहीं, अगर आपको उत्तर भारत या पूर्वी भारत में रेस्टोरेंट का फ्रेंचाइजी लेना है तो कनॉट प्लाजा रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड से संपर्क कर सकते हैं. McDonald’s रेस्टोरेंट की फ्रेंचाइजी 20 साल के लिए मिलती है.

नियम और शर्तें

McDonald’s की फ्रेंचाइजी लेने से पहले आप फ्रेंचाइजी डिस्क्लोजर डॉक्युमेंट यानी FDD को अच्छे से पढ़ें. इस डॉक्युमेंट में सारे नियम और तरीके समझाए गए हैं. फ्रेंचाइजी लेने के लिए आपके पास कितनी जगह होनी चाहिए, आपको इस तरह की ट्रेनिंग मिलेगी ये सारी जानकारी इस डॉक्युमेंट में होती है. FDD को आप गूगल से डाउनलोड भी कर सकते हैं.

कितना आएगा खर्च

अगर आप मौजूदा रेस्टोरेंट प्लेयर हैं तो कंपनी आपका रेस्टोरेंट भी McDonald’s में कन्वर्ट कर सकती है. अगर अलग से फ्रेंचाइज बनाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको नया इन्वेस्टमेंट ही करना होगा. McDonald’s की फ्रेंचाइजी में 6 से 14 करोड़ का भारी-भरकम इन्वेस्टमेंट लगेगा.

इसके अलावा, आपके पास 5 करोड़ की लिक्विड कैपिटल होनी चाहिए. कैपिटल के अलावा आपको 30 लाख की फ्रेंचाइजी फीस भी देनी होगी. रेस्टोरेंट की कुल बिक्री का 4 फीसदी सर्विस फीस के रूप में देना होगा.

कैसे मिलेगी जमीन

रेस्टोरेंट की फ्रेंचाइजी लेने के लिए जमीन होना जरूरी है. इसके लिए दो विकल्प हैं. पहला आपके पास अपनी जमीन हो. अगर अपनी जमीन नहीं है तो ऑपरेटर लीज के तहत McDonald’s 11 महीने की लीज पर जगह मुहैया कराती है.

4 तरह से मिलती है फ्रेंचाइजी

ट्रेडिशनल रेस्टोरेंट– ट्रेडिशनल रेस्टोरेंट के लिए आप फूड कोर्ट, स्टोर फ्रंट जैसे लोकेशन शामिल होते हैं. ट्रेडिशनल रेस्टोरेंट के लिए 20 साल का फ्रेंचाइजी मिलती है.
सेटेलाइट लोकेशन– सेटेलाइट लोकेशन में रिटेल स्टोर, एयरपोर्ट, कॉलेज, हॉस्पिटल जैसे लोकेशन शामिल है. मतलब आपके पास इन लोकेशन के आसपास जमीन होनी चाहिए.

STO एंड STAR लोकेशन– इसमें छोटे शहरों के रिटेल स्टोर्स, पेट्रोल पंप के कंपाउड्स और उसके आस पास की जगह शामिल है. एसटीओ एंड एसटीएआर लोकेशन के लिए भी 20 साल का फ्रेंचाइजी मिलता है.
BLF फ्रेंचाइजी– कॉरपोरेट ऑफिस के कंपाउड में आपके पास जगह हो, इस फ्रेंचाइजी में एक ऑप्शन यह भी है कि अगर आपके पास पहले से कोई रेस्टोरेंट हैं तो आप उसे McDonald’s में कनवर्ट कर सकते हैं.

कभी सोचा है कि Mi Phones के साथ क्यों नहीं मिलता ईयरफोन, यह है वजह

क्या आपके पास भी Mi का फ़ोन है? और आपने कभी सोचा है की Xiaomi अपने किसी भी फोन के साथ ईयरफोन क्यों नहीं देता? तो आइये जानते हैं क्या है इसके पीछे की सचाई..आज के समय में हर किसी के पास स्मार्टफोन होता है. साथ में लोग कम कीमत में अच्छा स्मार्टफोन खरीदना पसंद करते हैं.

हालांकि बाजार में कई ऐसे बड़े ब्रांड हैं जो कम कीमत पर मोबाइल बेचते हैं. लेकिन जब बात ग्राहकों के भरोसे की आती है तो उन्हें Mi Phone सबसे बेस्ट ऑप्शन में से एक लगता है. अपने बेहतरीन फीचर्स की वजह से ये स्मार्टफोन सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है.

लेकिन इस फोन के साथ कभी भी ईयरफोन क्यों नहीं मिलता? आज हम आपको इससे जानकारी देंगे. दरअसल जब भी हम Mi का स्मार्टफोन खरीदते हैं, तो हमें उसके साथ कभी भी ईयरफोन नहीं मिलता. हालांकि हम कभी इस बात पर ज्यादा ध्यान भी नहीं देते.

लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Mi कभी भी चार्जर और हैंडसेट के अलावा कुछ भी नहीं देती है. Mi अपने स्मार्टफोन अपने बॉक्स में से ईयरफोन ना रखकर अलग से बेचता है. जिस वजह से हैंडसेट की कीमत औरों के मुकाबले थोड़ी कम हो जाती है.

Mi कंपनी अच्छे से जानती है कि ग्राहक ईयरफोन कहीं से भी कीमत में खरीद सकते हैं. जिसका बखूबी फायदा उठाकर Mi कंपनी अपने ईयरफोन 700 से 2000 रुपए की कीमत में अलग से बेचती है. इस तरह हम ये कह सकते हैं कि Mi कंपनी जो कीमत अपने स्मार्टफोन में कम कर देती है. वही पैसे वो अपने ईयरफोन को बेचकर आसानी से कमा भी लेती है.

इस राज्य में दूध से महंगा बिक रहा है गौमूत्र, किसानों को बढ़ सकता है मुनाफा

किसानों के लिए डेयरी उद्दोग भी एक अच्छी आमदनी का जरिया बनता जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में किसानों के बीच डेयरी उद्दोग रफतार पकड़ता दिखाई दिया है.

एसे कई उदाहरण देखन को मिले हैं जिसमें युवाओं ने मल्टीनेश्नल कंपनी की जॉब छोड़कर डेयरी उद्दोग को व्यवसाय के तौर पर अपनाया है. वहीं डेयरी किसान गायों के जरिए कई तरह से कमाई कर सकते हैं यह बात तो लगभग सभी डेयरी किसानों ने सुना है. और यह बात सच भी साबित हो रही है.

राजस्थान के डेयरी किसान अब गाय के दूध को नहीं बल्कि गौमूत्र को भी अपनी मुनाफे का जरिया बना रहे हैं… गौमूत्र की मांग इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि किसान थोक बाजार में गिर और थारपारकर जैसी हाई ब्रीड गायों के मूत्र को बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं.

किसान गौमूत्र को 15 से 30 रुपए प्रति लीटर पर बेच रहे हैं. वहीं राज्य में गाय के दूध की कीमत 22 से 25 रुपए प्रति लीटर ही है. किसान गौमूत्र उन किसानों को बेच रहे हैं जो किसान जैविक खेती करते हैं. किसान ऐसा मान रहे हैं कि जब से वह गौमूत्र बेच रहे हैं तब से उनकी कमाई लगभग 30 प्रतिशत बढ़ गई है.

जैविक खेती करने वाले किसान गौमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों के विकल्प में करते हैं… इसके साथ ही लोग औषधिक उद्देश्यों और अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग करते हैं. राज्य में ऐसे एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी भी हैं जो गौमूत्र का प्रयोग अपने ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोजेकेट के लिए करती हैं और लगभग हर महीने 300 से 500 लीटर गौमूत्र का प्रयोग करते हैं.

अब जर्मन मशीन से खारा पानी को मीठा कर खारे पानी से होगी सिंचाई

खारेपानी के कारण फसलों का उत्पादन नहीं करने वाले किसानों के लिए ये लिए राहत की खबर है। अब जर्मन तकनीक की वाटर सॉफ्टनर मशीनों से खारे पानी को मीठा कर किसान आसानी से अब अपने खेतों में फसलों का उन्नत उत्पादन कर सकेंगे।

इसके लिए अठियासन रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर लगाए गए वाटर सॉफ्टनर मशीन का प्रयोग सफल रहा है। अब केवीके वैज्ञानिक जिलेभर के किसानों को कृषि प्रशिक्षण के दौरान खारे पानी को मीठा कर फसल उपयोग के लिए जानकारी देंगे। केवीके की ट्यूबवैल पर स्थापित इस मशीन के माध्यम से 5 से 8 हजार टीडीएस तक काम करने का दावा किया जा रहा है।

ऐसे में जिल क्षेत्रों में खारे पानी के कारण किसानों के सामने फसल सिंचाई को लेकर रही परेशानी से भी किसानों को काफी हद तक निजात मिलने की संभावना है। वैज्ञानिकों की माने तो खारे पानी में जो साल्ट बोड रहता है, जिसे ये मशीन अलग कर देती है। ऐसे में ये तकनीक किसानों के लिए खारे पानी को मीठा करने में काफी कारगर साबित हो रही है।

^ केवीके की ट्यूबवैल पर लगाए वाटर सॉफ्टनर संयंत्र से खारे पानी को मीठा कर पहले मूंग बीच उत्पादन, अब बगीचे और 2 हैक्टेयर में जीरे के उत्पादन में पानी काम में लिया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठी के दौरान इस तकनीक के बारे में बताएंगे।

पाइप लाइन चॉक होने देना, बालों का झड़ना, खाज-खुजली और स्कीन के रुखेपन को दूर करती है। बोरवैल का पानी इस्तेमाल करने वाले लोग भी इस मशीन का उपयोग कर सकते हैैं। डॉ.एसआर कुमावत, सहायक प्राध्यापक

जमीन की उतरी स्तर पर बनने वाली सफेद परत को कम करके, जमीन पर आनेवाली दरारों में सुधार, जमीन मुलायम होकर, उपजाऊ बनती हैं।

  •  फसल और पौधों में पत्ते जलने का प्रमाण कम होकर खेत में हरियाली बढ़ती हैं।
  • नमकीन/खारे पानी से बंद पड़ने वाले ड्रिपर्स और स्प्रिंकलर साफ होकर पहले जैसे काम करना शुरू कर देते है। केमिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कंडिशनर से निकला पानी भौतिक रचना के अनुसार हलका होने से पौधे के जड़ों को आसानी से मिलता है।

कम पानी में अधिक उत्पादन ले सकते है।, यानी पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। फसल की जड़ों पर मूली पर बना नमकीन स्तर कंडिशनर से निकले पानी में घुलकर साफ हो जाता है। मूली की कार्यक्षमता बढ़कर फसल हरीभरी रहने में मदद मिलती हैं।

  • फसल और पौधों के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथ पानी का पीएच विकसित होने के कारण फसल का उपयुक्त मूल द्रव्य मिलते है।
  • तीव्र विद्युत लहरी के कारण विषाणु का प्रमाण
  • पानी का कम होकर जैविक दृष्टि से पानी शुद्ध होता हैं।

कोटा के किसान ने विकसित की आम की नई प्रजाति

फलों के राजा कहे जाने वाले आम का नाता हमारी सभ्यता से शुरू से ही रहा है। अमूमन गर्मी के सीजन में ही आम का उत्पादन होता है। लेकिन अब दिन-प्रतिदिन विज्ञान के बढ़ते कदम की वजह से आम का उत्पादन अन्य सीजनों में भी होने लगा है।

भारत में इस समय 1500 से अधिक आम की किस्में पाई जाती हैं। सभी किस्म अपने आप में अच्छा खासा महत्व रखती है। ऐसी ही एक किस्म खोज निकाली है कोटा के एक किसान ने। इन्होंने ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसका साल के तीनों सीजन में उत्पादन होता है। यानी पूरे साल भर ये प्रजाति फल देती है, इसीलिए इसका नाम रखा गया है ‘सदाबहार।’

कोटा में बागवानी करने वाले गिरधरपुरा गांव के किसान किशन सुमन की बाग से उत्पादित होने वाला सदाबहार आम की कुछ खूबी अल्फांसो आम की तरह हैं। अल्फांसो भारत का सब से खास किस्म का आम है। इसे आम का सरताज कहा जाता है। बस इसी सरताज से मिलती जुलती चीजों जैसा सदाबहार आम है। आम की ये प्रजाति अपने आप में अलग तरीके की है।

किशन सुमन ने 1995 में गुलाब, मोगरा और मयूरपंखी (थूजा) की खेती शुरू की और तीन वर्षों तक फूलों की खेती करते रहे। इसी दौरान उन्होंने गुलाब के ऐसी किस्म को विकसित किया जिसमें एक ही पौधे मं सात रंग के फूल लगते हैं। उनके द्वारा उत्पादित इस किस्म का उन्हें अच्छा रिटर्न मिला। इसके बाद उन्होंने अन्य फसलों पर भी काम करना शुरू किया।

सुमन बताते हैं कि “मैंने सोचा है कि अगर मैं गुलाब की किस्म में परिवर्तन कर सकता हूं तो फिर आमों के साथ क्यों नहीं। मैंने विभिन्न किस्मों के आमों को इकठ‍्ठा किया और उन्हें पोषित किया। जब पौधे पर्याप्त बड़े हो गए, तो मैंने उन्हें रूटस्टॉक पर तैयार किया। इसके बाद फिर काफी हद तक परिवर्तन आया।

गुलाब किशन को कामयाबी 2000 में मिलती दिखी। उन्होंने अपने बगीचे में एक आम के पेड़ की पहचान की, जो तीन मौसमों में खिल गया था। जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्टूबर। उन्होंने पांच पेड़ों को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस पेड़ की अच्छी विकास आदत थी और इसमें गहरे हरे पत्ते थे। इन पेड़ों की एक खास बात यह भी थी कि इन पौधों में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं थी। धीरे-धीरे वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध होते गए। हनी बी नेटवर्क के एक स्वयंसेवक सुंदरम वर्मा ने सुमन के नवाचार के बारे में जमीनी तकनीकी नवाचारियों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के लिए संस्थागत अंतरिक्ष, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) को सूचित किया।

इसके बाद एनआईएफ ने सदाबहार पौधे बेचने या उपहार देने के लिए कहा, मैंने उन्हें पौधे दिए। एनआईएफ ने मुझे ये सलाह दी कि अपनी किस्म को सत्यापित कराएं। वे कहते हैं कि उनकी सलाह मानते हुए अपनी किस्म को प्रमाणित करने के लिए मैंने 11 वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी किस्म के पौधे लगाए। वह कहते है कि एनआईएफ को “मैंने 2012 में 20 पौधों का उपहार दिया था। अब पेड़ फल दे रहा है और जब फल पकता है, त्वचा नारंगी रंग प्राप्त करती है, जबकि अंदरूनी फल गेरुआ रंग का होता है।

खास प्रकार की किस्म को विकसित करने वाले किशन सुमन को अब तक कई अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। मार्च 2017 में सुमन को 9वीं द्विवार्षिक ग्रासरूट इनोवेशन और राष्ट्रपति भवन में आयोजित उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के दौरान फार्म इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

इनके फलों की तारीफ करते हुए हरदेव चौधरी कहते हैं कि सदाबाहर पूरे वर्ष खिलते हैं। फल का स्वाद मीठा होता है और एक बौने विविधता के रूप में विकसित होते हैं। वे कहते हैं कि आम की इस नस्ल को किचन ग्रार्डन में बर्तन में रखकर कुछ समय बाद उत्पादित किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि मौजूदा किस्मों की स्थिति को देखते हुए इसकी क्षमता बड़ी है। ऑक्सीजन की अत्याधिक उपलब्धता होने के कारण ये उत्पादकों के लिए भी बेहद फायदेमंद हो सकता है। वे कहते हैं कि ये किस्म देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का एकमात्र हाईब्रिड आम है जो कि साल में तीन बार फल देता है।

राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बने है सदाबहार

किशन सुमन द्वारा उत्पादित की जा रही आम की ये किस्म अब राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बन चुके हैं। सदाबार आम किस्म के यहां पर चार पौधे लगाए गए है। किशन के अनुसार उनके चार बीघा खेत में आम के 22 मदर प्लांट्स और 300 ग्राफ्टेड प्लांट्स लगे हुए हैं।

सदाबहार नाम की आम की यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। बौनी किस्म होने से इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। इसमें वर्ष भर नियमित रूप से फल आते हैं और ये सघन रोपण के लिए भी उपयुक्त है। जब से राष्ट्रपति भवन में सुमन के आमों को लगाया गया था, तब से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

सुमन ने दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नर्सरी और व्यक्तियों को 800 रुपये से अधिक, 800 रुपये के लिए उपलब्ध कराया है। सुमन ने कहा, “मुझे नाइजीरिया, पाकिस्तान, कुवैत, इराक, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी लोग कॉल करके सदाबहार के बारे में पूछ रहे हैं।

सुमन के अनुसार एक पौधा लगभग 5 साल बाद फल देता है। मेरे लिए एक अच्छी बात यह है कि उत्पादक लंबे समय तक का इंतजार करते हैं लेकिन वे शिकायत नहीं करते हैं। ये सदाबार अन्य किस्मों से बहुत अलग है।

छत पर खेत बनाकर बस 19 हजार में उगाते हैं 700kg सब्ज़ियां

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है, लेकिन दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में आजकल इमारतों की छत पर इस तरह की खेती हो रही है. कुछ इसी तरह के आइडिया को आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख ने अपनाकर अपना बिजनेस शुरू किया है. उनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है. आइए जानें उनके बारे में…

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

इन दोनों ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

जैविक सामग्री से लैस इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैंगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई साग और मिर्च उगता हैं. पानी मीठा होने की वजह से सब्जियां भी स्वादिष्ट होती हैं.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है, जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

जिस तरह से खेती के लिए जमीन कम हो रही हैं, भविष्य में इन क्यारियों की मांग बढ़ेगी, 4 फीट गुणा 4 फीट की चार क्यारियों लगाने पर एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. एक घंटा इन क्यारियों में समय लगाने से मन लायक सब्जी उगाई जा सकती है.

ये भी हैं तरीका

खेतों के घटने और ऑर्गनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं.

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता. मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं.

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है. इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है. इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

 हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं.इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं.मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है. वहीं, बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते.

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं.

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ बताती हैं कि उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है.कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है. कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है. ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे. छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है.

  • कंपनी हमारी कृषि के मुताबिक, ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिये हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं.
  • शर्मा के मुताबिक, एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है. फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है.
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं. अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है. यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं.

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

यह हैं जर्मनी से जुड़े 10 अजीबो गरीब रोचक तथ्य, जो आप नहीं जानते होंगे

जर्मनी विश्व के ताकतवर देशों में से एक है। जिसने विश्वयुद्ध के बाद कंगाल होने पर भी हार नहीं मानी और आज वह सफलता प्राप्त कर ली है जिस पर विश्वास करना भी मुमकिन नहीं है। आइए जानते हैं जर्मनी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य…

जर्मनी की जनसँख्या

जर्मनी की जनसंख्या लगभग भारत के देश आंध्र प्रदेश के बराबर ही है। जर्मनी की जनसंख्या मात्र 8 करोड़ है।

इस देश की ताकत के पीछे ताकत के देश के नागरिकों की देशभक्ति और मेहनत है जो मुश्किलों में भी मुस्कुराना जानते हैं.

कईं राज्यों से मिलकर बना है यह देश

यहां की राजधानी एक राज्य नहीं बल्कि कई राज्य रह चुके हैं जिनमें Aachen , Regensburg , Frankfun-am-main , Bonn and berlin शामिल है।

जेल से फरार होने पर नही मिलती सज़ा

जर्मनी में माना जाता है कि लोगों को अपनी आजादी से जीने का हक है इसलिए जेल से भागने पर भी उन्हें सजा नहीं दी जाती।

अटपटे देश के चटपटे लोग

जर्मनी के लोगों का अंदाज बड़ा अटपटा है वहां के लोग फोन पर बात शुरू करने पर ‘हेलो’ नहीं बल्कि अपना नाम लेकर बातचीत शुरू करते हैं।

नही है स्पीड लिमिट

जर्मनी के 70 परसेंट हाईवे पर वाहन की कोई स्पीड लिमिट नहीं है लेकिन वहां के वाहनों का रोड पर ही इंधन खत्म हो जाना गैरकानूनी माना जाता है।

किताबें छपने में है अव्वल

जर्मनी की पहली पत्रिका सन 1963 में शुरू की गई थी जहां पर अब तक दुनिया की सबसे अधिक किताबें छापी जा चुकी हैं।साल 1989 से साल 2009 के बीच Germany में 2 हज़ार से ज्यादा स्कूल बंद करने पड़े थे क्योंकि उनमें बच्चों की कमी थी।

लगातार कम हो रही है जनसंख्या

जर्मनी और जापान की जन्म दर संख्या सबसे कम है जर्मनी में पिछले 10 साल में दो लाख जनसंख्या कम हो चुकी है।

जर्मनी का बजट

जर्मनी का रक्षा बजट मात्र इतना है कि अमेरिका में एक कुत्ते को खाना खिलाया जा सके। यानी यह देश पालतू जानवरों पर इंसानों से अधिक खर्व्ह करता है.

कर्ज़ से उबरा देश

पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी बिल्कुल कंगाल हो चुका था उन पर लगभग कितना कर्जा था कि उसकी तुलना 96000 टन सोने की कीमत के बराबर की गई थी।

जन्मदिवस को मानते हैं बुरा

जर्मनी में कभी एडवांस हैप्पी बर्थडे नहीं कहा जाता क्योंकि वह उसे अपना बैड लक मानते हैं।

दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले कारे जर्मनी में बनाई जाती है। जिनमें BMW और AUDi शामिल है।

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर किसान, जानिए कितनी है संपत्ति

देश में आमतौर पर किसान की इमेज एक मेहनतकश व्‍यक्ति की है। जबकि, दुनिया के कुछ देशों में यह स्थिति बिलकुल अलग है। आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि चीन के लियू योंघाउ की नेटवर्थ  29,480 करोड़ रुपए है। योंघाउ दुनिया के सबसे अमीर किसान हैं।

आइए जानते हैं दुनिया के ऐसे ही 5 अमीर किसानों के बारे में…

  • चीन के लियू योंघाउ दुनिया के सबसे बड़े किसान हैं। फोर्ब्‍स मैग्‍जीन के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 29480 करोड़ रुपए है।
  • 1982 में योंघाउ व उनके दो भाइयों ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती शुरू की थी।
  • तीनों भाइयों ने चीन के चेंगडू में कुल 150 डॉलर लगाकर मूर्गी पालन भी शुरू किया।
  • आज योंघाउ के पास चीन और ऑस्‍ट्रेलिया में हजारों हेक्‍टेयर के एग्रीकल्‍चर फार्म हैं।
  • योंघाउ चीन की सबसे बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनी न्‍यू होप ग्रुप के मालिक हैं।

  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार अमेरिका के लोवा निवासी हैरी स्‍टाईन की कुल संपत्ति 22,780 करोड़ रुपए है।
  • हैरी स्‍टाईन का लोवा के एडेल में 10000 एकड़ का सोयाबीन और मक्‍का का फार्म है।
  • स्‍टाईन मूल रूप से अपनी हाईब्रिड बीजों के लिए जाने जाते हैं।
  • प्रमुख बीज कंपनी मोंनसेंटो और सिंग्‍नेंटा को इनके फार्म से ही बीज आपूर्ति की जाती है।
  • हैरी ने 1960 में खेती करनी शुरू की थी और 5 साल बाद ही वे हार्इब्रिड बीज उगाने लगे।
  • उन्‍होंने हाल ही में अपनी स्‍टाईन सीड नाम से कंपनी शुरू की है जिसके बीज सबसे महंगे हैं।

  • ब्‍लेरो मैगी ब्राजील के एग्रीबिजनेस मोघुल एंड्रे मैगी के बेटे हैं। ये ब्राजील के सबसे बड़े सोयाबीन किसान हैं।
  • मैगी के फार्म्स को छोड़ दिया जाए तो ब्राजील सोयाबीन उत्‍पादन में दूसरे नंबर से सीधे 5 नंबर पर आ जाएगा।
  • वे ब्राजील में करीब 4 लाख हेक्‍टेअर फार्म में सोयाबीन की खेती कराते हैं और दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट सोयाबीन उत्‍पादक हैं।
  • मैगी दो बार ब्राजील के सीनेटर चुने गए हैं और मई में उन्‍हें ब्राजील का एग्रीकल्‍चर मिनिस्‍टर बनाया गया है।
  • उनके फार्म की सोयाबीन का सबसे बड़ा खरीददार चीन है जो 1990 से डायरेक्‍ट इंपोर्ट कर रहा है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 7705 करोड़ रुपए है।

  • टॉनी का नंबर दुनिया के पांच बड़े किसानों में चौथा है, उन्‍होंने 1951 में 25 गायों से डेयरी फार्मिंग शुरू की थी।
  • ऑस्‍ट्रेलिया के एडिल्विश निवासी टॉनी पेरिच ऑस्‍ट्रेलिया के सबसे बड़े डेयरी फार्मर के रूप में जाने जाते हैं।
  • आज उनके पास 2 हजार गाय हैं और 11000 हेक्‍टेअर का एग्रीकल्‍चर फार्म है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 5159 करोड़ रुपए है।
  • टॉनी ने हाल ही में 1200 फ्लैट वाली एक हाउसिंग सोसाइटी को भी डेवलप करना शुरू किया है।

  • दुनिया का सबसे बड़े इन्‍वेस्‍टर वारेन बफे के बड़े बेटे हावर्ड बफे भी एक किसान हैं।
  • हावर्ड को उनके पिता ने 3 बार कॉलेज में एडमिशन दिलाया लेकिन उन्‍होंने तीनों बार पढ़ाई छोड़ दी
  • 80 के दशक में हावर्ड ने सोयाबीन और मक्‍का की खेती शुरू कर दी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  • वे आज 3900 एकड़ में अरीजोना में, 9200 एकड़ साउथ अफ्रिका में और 4400 एकड़ में अमेरिका में खेती करते हैं।
  • उनके पास 50 से ज्‍यादा छोटे बड़े ट्रैक्‍टर हैं। उनके पास कुल मिलकार 2,50,000 डॉलर से ज्‍यादा की एग्री मशीनरी है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल नेट वर्थ यानी संपत्ति 1340 करोड़ रुपए से अधिक है।