अंबानी के नौकरों के बच्चे विदेश में करते हैं पढ़ाई, सैलरी जानकार उड़ जाएंगे होश

दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो भारत के सबसे अमीर उद्योगपति मुकेश अंबानी को ना जानता हो! मुकेश अंबानी को नाम और शोहरत के साथ उनके लाइफस्टाइल के लिये भी जाना जाता है। जब मुकेश अंबानी ने अपना घर बनवाया तो पूरी दुनिया जानना चाहती थी कि उनका घर कैसा दिखता होगा।

उनके घर का नाम एंटिलिया है और यह 27 मंज़िला इमारत है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस घर को संभालने और इसकी देखरेख करने वाले कर्मचारियों की सैलेरी कितनी है, शायद नहीं। तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस घर के कर्मचारियों की सैलेरी के बारे में, जिसे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

आज हम आपको मुकेश अंबानी के घर में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन के बारे में बताने जा रहे हैं। लेकिन वेतन पैकेज के बारे में पता लगाने से पहले, एंटीलिया के बारे में जानना ज़रूरी है, वह घर जहां मुकेश अंबानी और उनका परिवार रहता है।

यह बकिंघम महल के बाद दुनिया में सबसे महंगी आवासीय संपत्तियों में से एक है। आपको बता दें कि एंटिलिया की कीमत 1 मिलियन डॉलर से अधिक है, जो इसे दुनिया की सबसे महंगी निजी संपत्ति बनाता है। एंटीलिया मुंबई में अल्टामाउंट रोड, कुम्बाला हिल पर स्थित है।

एंटिलिया की खासियत है कि यह घर रिक्टर स्केल पर 8 रेटेड भूकंप से बच सकता है। गौरतलब है कि अंबानी का घर विवादों का हिस्सा रहा है। इस तरह के शानदार घर के साथ उसके रखरखाव की देखभाल करने के लिये निश्चित रूप से एक विशाल टीम की ज़रूरत पड़ती है।

मुकेश अंबानी अपने कर्मचारियों को नौकर नहीं समझते बल्कि वह उन्हें अपने परिवार का ही सदस्य मानते हैं और उनसे उसी आदर के साथ बात करते हैं, जैसे किसी परिवार के सदस्य के साथ किया जाता है। जब उनके 600 कर्मचारियों के भुगतान की बात आती है तो इस मामले में वह काफी उदार हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले कर्मचारियों की शुरूआती आय 6 हजार रुपये थी और अब वे हर महीने 2 लाख रुपये कमाते हैं। इसमें शिक्षा और जीवन बीमा भत्ता भी शामिल है। साथ ही एम्प्लॉई के दो बच्चों को अमेरिका में जाकर पढ़ाई करने का मौका भी मिलता है।

जैसा कि आप जानते हैं अंबानी के घर को जेड सुरक्षा दी गई है इसके लिये वे 15 लाख रुपये महीने भुगतान करते हैं। बिजनेस टायकून के लिये सीआरपीएफ एक जेड सुरक्षा के रूप में अपने संसाधन को तैनात किये हुए हैं।

यूं चमकी दो भाइयों की किस्मत, जाल में फंसी 5.5 लाख की मछली

एक मछली ने मुंबई के दो मछुआरे भाइयों को एक ही दिन में लखपति बना दिया। शायद उन भाइयों को भी अंदाजा नही था कि उनकी किस्मत इस तरह बदलने वाली है। वह रोज की तरह पालघर समुद्रतट पर मछलियां पकड़ने गए थए और किस्मत से उनके जाल में घोल मछली फंस गई। जब वे मछली को बाजार में बेचने गए तो वह 5.5 लाख में बिकी। आस-पास के लोगों के अनुसार बहुत दिनों के बाद यहां किसी को घोल मछली मिली।

मुंबई का मछुआरा महेश अपने भाई के साथ शुक्रवार को मछली पकड़ने गया था। मुर्बे तट पर उनको अपना जाल भारी लगा। जब उन्होंने देखा तो पाया कि उनके जाल में घोल मछली फंसी थी। मछली का वजन लगभग 30 किलोग्राम था।

महेश और उनके भाई द्वारा पकड़ी गई घोल फिश की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। सोमवार को मछली को बेचने के लिए बोली लगाई गई। मछली को खरीदने के लिए व्यापारियों की लंबी लाइन लगी थी। यह बोली बीस मिनट तक चली और और मछली को 5.5 लाख रुपये में एक व्यापारी ने खरीद लिया।

जानिए क्यों खास हैं यह मछली

घोल मछली खाने में स्वादिष्ट तो होती ही है। इस मछली में चमत्कारी औषधीय गुण पाए जाते हैं जिसके कारण पूर्वी एशिया में इसकी कीमत बहुत ज्यादा है। यहां तक कि घोल (ब्लैकस्पॉटेड क्रॉकर, वैज्ञानिक नाम प्रोटोनिबा डायकांथस) को ‘सोने के दिल वाली मछली’ के रूप में भी जाना जाता है। बाजार में अलग-अलग मछली की अलग-अलग कीमतें होती हैं। रविवार को मछुआरे महेश ने उसे सबसे ऊंची कीमत पर बेचा।

यह मछली मुख्यत: सिंगापुर, मलयेशिया, इंडोनेशिया, हॉन्ग-कॉन्ग और जापान में निर्यात की जाती है। घोल मछली जो सबसे सस्ती होती है उसकी कीमत भी 8,000 से 10,000 तक होती है।’ मई में भायंदर के एक मछुआरे विलियम गबरू ने यूटान से एक मंहगी घोल पकड़ी थी। वह मछली 5.16 लाख रुपये में बिकी थी।

दवाइयों और कॉस्मेटिक में घोल मछली का उपयोग

घोल मछली का उपयोग दवाई निर्माता कंपनी भी करती हैं। इसकी स्किन में उच्च गुणवत्ता वाला कोलेजन (मज्जा) पाया जाता है। इस कोलेजन को दवाओं के अलावा क्रियाशील आहार, कॉस्मेटिक उत्पादों को बनाने में प्रयोग किया जाता है। बीते कुछ वर्षों में इन सामग्री की वैश्विक मांग बढ़ रही है। यहां तक कि घोल का महंगा कमर्शल प्रयोग भी होता है। उदाहरण के तौर पर मछली के पंखों को दवा बनाने वाली कंपनियां घुलनशील सिलाई और वाइन शुद्धि के लिए इस्तेमाल करती हैं।

अब गाय के गोबर से बनेगे कपड़े, नीदरलैंड में हुई बड़ी खोज

गाय जिसे हमारे देश में माता का दर्जा दिया जाता है. गाय हमारे बहुत काम आती है चाहे वो खेती करने का काम हो या फिर दूध देने का ही क्यों ना हो. वैसे गाय का गोबर भी बहुत फायदेमंद होता है और इससे उपले और कीटनाशक दवाइयां बनाने में भी उपयोग में लिया जाता है.

लेकिन अगर हम आपसे कहे कि गाय के गोबर से ड्रेस भी बन सकती है तो शायद आप ये सुनकर हैरान हो जाएंगे और इसे मजाक ही समझेंगे. लेकिन हम आपको बता दें ये सच है. नीदरलैंड की एक स्टार्टअप कंपनी ने गाय के गोबर से ड्रेस बनाई है.

जी हां… जलिला एसाइदी की एक महिला नीदरलैंड की रहने वाली हैं जो बायोआर्ट एक्सपर्ट हैं. जलिला स्टार्टअप चलाती हैं. जलिला ने गोबर में से सेल्यूलोज़ अलग करके उससे एक ड्रेस बनाने का तरीका निकाला है.

जलिला की इस नायाब तरकीब के लिए उन्हें चिवाज वेंचर एंड एचएंडएम फाउंडेशन ग्लोबल अवॉर्ड भी मिला है. इस अवार्ड के साथ उन्हें दो लाख डॉलर (1.40 करोड़ रुपये) की इनामी राशि भी प्राप्त हुई है.

जलील ने ‘वन डच’ नाम से कुछ साल पहले ही एक स्टार्टअप शुरू किया था. उन्होंने अपने इस एक्सपेरिमेंट में गाय के गोबर को रीसाइकिल करके उससे पेपर, बायो-डीग्रेडेबल प्लास्टिक और ड्रेसेस भी बनाई हैं.

ज़लीला ने गोबर से जो सेल्युलोज़ निकाला है उसे उन्होंने ‘मेस्टिक’ नाम दिया है. ज़लीला ने अपने इस इनोवेशन के जरिए सबसे पहले उससे टॉप और शर्ट बनाए. ज़लीला ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि गोबर को सभी लोग वेस्ट समझते थे और इसे बदबूदार भी मानते थे लेकिन गोबर बहुत ही काम की चीज़ है और आने वाले समय में गोबर से बनीं ड्रेस फैशन शोज़ में भी दिखेंगी.

ये है दुनिया का सबसे ‘बदकिस्मत आदमी’ ! 6.5 लाख करोड़ की चीज 52 हजार रुपये में बेच दी

अगर कोई शख्स अपनी चीज को 52 हजार रुपये में बेच दे और कुछ साल के बाद उसकी कीमत बढ़कर लाख नहीं, बल्कि लाखों करोड़ रुपये हो जाए तो इसे उस आदमी की बदकिस्मती ही कहा जा सकता है. कुछ ऐसा ही एप्पल के को-फाउंडर रोनाल्ड के साथ हुआ और वह दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी के जरिए टॉप-10 अमीरों की लिस्ट में शामिल होने से वंछित रह गए.

एक गलत फैसला जिंदगी को पूरी तरह बदल सकता है. कुछ ऐसा ही हुआ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी के मालिक के साथ. एप्पल दुनिया की सबसे बड़ी टेक्‍नोलॉजी कंपनी है. शुरुआती दौर में इसने कई उतार-चढ़ाव देखे. अगर आपसे पूछा जाए कि एप्पल के कितने फाउंडर थे तो शायद जवाब होगा दो, लेकिन बहुत कम लोग एप्पल के तीसरे फाउंडर के बारे में जानते होंगे. इन शख्स का नाम रोनाल्ड वेन है. लेकिन वो दुनिया के सबसे बदकिस्मत इंसान के तौर पर जाने जाते हैं.

एप्पल की शुरुआत 1 अप्रैल, 1976 को हुई थी. इसे शुरू करने वाले लोगों में स्टीव जॉब्स, स्टीव वॉजनिएक और रोनाल्ड वेन थे. रोनाल्ड वेन उस समय कंपनी के सबसे अनुभवी इंसान थे. 42 साल के रोनाल्ड ने ही एप्पल का पहला लोगो भी डिजाइन किया था. इतना ही नहीं, एप्पल कंपनी का पार्टनरशिप एग्रीमेंट भी रोनाल्ड ने ही बनाया था. एक तरह से देखा जाए तो कंपनी की बुनियाद रोनाल्ड के बलबूते पर खड़ी हुई थी, लेकिन कुछ ऐसा हो गया कि उन्होंने 800 डॉलर में अपने शेयर बेचकर कंपनी छोड़ दी.

रोनाल्ड के मुताबिक कंपनी छोड़ने का फैसला उनका अपना था. उन्हें जॉब्स के साथ काम करने में दिक्कत हो रही थी. भले ही जॉब्स लोगों के सामने एक अच्छे स्पीकर के तौर पर सामने आए हों, लेकिन असल में जॉब्स बहुत जिद्दी और जोड़-तोड़ करने वाले इंसान थे. 21 साल के स्टीव जॉब्स, 25 साल के स्टीव वॉजनिएक और 42 साल के रोनाल्ड वेन ने मिलकर इस कंपनी की शुरुआत की थी. उस समय रोनाल्ड कंपनी के 10 प्रतिशत शेयर धारक थे.

रोनाल्ड वेन ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि उस समय वो 22,000 डॉलर प्रति साल कमाते थे. अपने शानदार करियर को छोड़कर वो उम्र के ऐसे पड़ाव में कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे. कंपनी छोड़ने के बाद कुछ साल तक जॉब्स और वॉजनिएक- रोनाल्ड को वापस बुलाते रहे, लेकिन रोनाल्ड ने उनकी बात नहीं मानी, उस वक्त रोनाल्ड को यह नहीं पता था कि वह कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं.

एप्पल धीरे-धीरे दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनती चली गई. इसके बाद वो दुनिया के सबसे अनलकी इंसान कहलाने लगे. अगर देखा जाए तो रोनाल्ड की मौजूदगी के बिना एप्पल का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन फिर भी रोनाल्ड को बहुत कम लोग जानते हैं. इन आंकड़ों को देखकर ये बात साफ हो जाती है कि रोनाल्ड दुनिया के सबसे बदकिस्मत इंसान हैं.

चौथी तक पढ़ीं कुलवंत कौर हैं गूगल की भी ‘अम्‍मा’, इनकी प्रतिभा जान रह जाएंगे हैरान

चेहरे की झुर्रियों में उनका जिंदगी का अनुभव ही नहीं, बल्कि इतिहास व धर्म के ज्ञान की बारीकियां भी छिपी हैं, लेकिन ज्ञान पिपासा कुछ ऐसी है कि बुढ़ापे में भी वह पढ़ाई की दूसरी पारी शुरू करने जा रही हैं। वह 55 साल की हैं और मात्र चौथी तक पढ़ाई की है, लेकिन दिमाग कंप्यूटर की तरह दौड़ता है। हम बात कर रहे हैं पटियाला जिला के गांव सालूवाल की कुलवंत कौर। उनकी विलक्षण प्रतिभा के कारण लोगों ने उनको ‘गूगल बेबे’ का नाम दे दिया है।

कंप्यूटर की तरह दौड़ता है 55 साल की ‘गूगल बेबे’ का दिमाग, वर्ल्‍ड टूर पर भी जाएंगी दरअसल वह भारतीय व सिख इतिहास तथा धर्मो से जुड़े लगभग हर सवाल का जवाब गूगल से भी पहले दे देती हैं। उनकी इसी के कारण उनका नाम पड़ गया है ‘गूगल बेबे’।

करना चाहती हैं पीएचडी

जुनून व जज्बा हो तो पढ़ाई के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। इस बात को सिद्ध करते हुए ‘गूगल बेबे’ पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर धर्म अध्ययन विभाग में रिफ्रेशर कोर्स शुरू करेंगी। इसके लिए सरबत दा भला ट्रस्ट के एसपी सिंह ओबराय ने उनकी बात यूनिवर्सिटी के अधिकारियों से करवाई तो उनके प्रश्नों के उत्तर कुलवंत कौर ने तुरंत देकर उन्हें भी प्रभावित कर दिया। फिर उनको दाखिला मिल गया।

कुलवंत कौर भारतीय और सिख इतिहास व अन्य धर्मो से जुड़े हर सवाल का तुरंत दे देती हैं जवाब,  वह कहती हैं कि मौका मिला तो इसी विषय में पीएचडी भी करूंगी। ओबराय ने उन्हें वर्ल्‍ड टूर पर ले जाने की भी बात कही है, ताकि युवा पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने के लिए धार्मिक ग्रंथों की कहानियां बेबे सुना सकें।

पढ़ाई का था जुनून, मगर..

कुलवंत कौर ने बताया कि उनके पिता प्रीतम सिंह इंजीनियर थे और काम के सिलसिले में आगरा में बस गए थे। वहीं उनका जन्म हुआ और चौथी तक की शिक्षा ग्रहण की। पिता जी से अनेक ऐतिहासिक व धार्मिक कहानियां सुनीं। वे सभी जेहन में बैठ गईं तथा उनके बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा कभी शांत नहीं हुई। फिर पारिवारिक परेशानियों व जमीनी झगड़े के कारण परिवार को पंजाब में अपने गांव लौटना पड़ा।

स्कूल छूटा, लेकिन पढ़ना नहीं छोड़ा

वह कहती हैं स्कूल तो छूट गया, ‘मैंने पढ़ना नहीं छोड़ा। इसके बाद जहां भी, जिसके पास भी, मुझे कोई पुस्तक मिलती कुछ समय के लिए उससे लेकर पढ़ने लगती। पढ़ने के बाद मैं लौटा देती थी।’ कुलवंत ने बताया कि उनकी रुचि इतिहास व धर्म में ही रही। एक बार जिस पुस्तक को पढ़ा वह फिर भूली नहीं।

सब फीड है दिमाग के कंप्यूटर में

कुलवंत कौर ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया, हिस्ट्री ऑफ पंजाब सहित विभिन्न धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया है। भारत में आर्यों के आने से लेकर महमूद गजनी के 17 हमलों, अलाउद्दीन खिलजी, सिकंदर- पोरस, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक सम्राट सहित महाराजा रणजीत सिंह, जस्सा सिंह आहलूवालिया, जस्सा सिंह रामगढ़िया आदि राजा महाराजाओं की कहानियां ही नहीं उनके परिवारों की विस्तृत जानकारी भी उनके दिमाग में कंप्यूटर की हार्ड डिस्क की तरह फीड है।

यही नहीं, हिंदू, ईसाई, इस्लाम, यहूदी, बोद्ध धर्म की तमाम जानकारी भी उनके पास मिल जाती है। अब भी वह अखबार पढ़ने की शौकीन है और विशेषकर पंजाबी अखबार पढ़ती हैं।

जब जागो तभी सवेरा

वह कहती हैं, ‘ बचपन में परिवार के हालात ऐसे हो गए कि हम पांच बहनों व तीन भाइयों में से केवल बड़े भाई व एक बहन ही आगरा में पढ़ पाए थे। शादी के बाद पति का प्रोत्साहन नहीं मिला। दिशा वुमन वेलफेयर ट्रस्ट की हरदीप कौर ने हुनर को पहचान दिलाई तो दुनिया ही बदल गई। मेरी आज भी पढ़ने में रुचि है और आगे पढ़कर अपने ज्ञान में वृद्धि करना चाहती हूं। मेरा बेटा जगजीत सिंह, बेटी मनप्रीत कौर सपोर्ट करते हैं। पति निर्मल सिंह अब दुनिया में नहीं हैं।

जीभ में चम्मच लगाकर ऐसे 1 मिनट में पता करें आपको कोई बीमारी तो नहीं

आमतौर पर चम्मच को खाना बनाने या खाना खाने में यूज किया जाता है। लेकिन अगर इसका एक खास तरीके से यूज किया जाए तो इससे हम कई तरह की बीमारियों का पता लगा सकते हैं। हम यहां आपको एक ऐसी खास ट्रिक बताने जा रहे हैं जिसमें चम्मच के जरिए एक मिनट में कई तरह की बीमारियों का पता किया जा सकता है।

बता दें यूनिवर्सिटी ऑफ टोरोनटो की असिस्टेंट प्रोफेसर और ब्रॉडकास्ट मेडिकल जर्नलिस्ट डॉ. जोलीन हूबर की रिसर्च में यह बात सामने आई है। इसमें डॉ. हूबर ने चम्मच को जीभ पर लगाकर हेल्थ स्टेटस चेक करने के तरीके को करके भी दिखाया है।

ऐसा है तरीका

  • चम्मच के उभरे भाग को चीभ पर धीरे-धीरे तब तक रगड़ें जब तक इस पर लार न लग जाए।

  • इसके बाद इसे किसी साफ पॉलिथिन पैकेट में पैक कर दें।

  • अब इसे लाइट के पास एक मिनट के लिए रख दें।

  • एक मिनट बाद अगर इससे मीठी गंध आ रही है तो आपको डायबिटीज हो सकती है।

  • अगर चम्मच पर पीली परत चढ़ जाती है तो यह थाइरॉयड का संकेत हो सकता है।

  • अगर चम्मच पर सफेद कलर की परत चढ़ जाती है तो यह बॉडी में इन्फेक्शन होने का संकेत हो सकता है।

  • अगर चम्मच पर नारंगी रंग की परत जमा हो जाती है तो यह किडनी से जुड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है।

लोगों की जिंदगी बचाता है यह “गोल्डन ब्लड ग्रुप” , पूरी दुनिया में है इस ब्लड ग्रुप के सिर्फ 43 लोग

दुनियाभर में पाए जाने वाले ब्लड ग्रुप में कई काफी कॉमन हैं, जिनके बारे में ज्यादातर लोगों को पता है। लेकिन कई ब्लड ग्रुप ऐसे हैं, जो बेहद कम लोगों में पाए जाते हैं, ‘बॉम्बे ब्लड ग्रुप’ भी उन्हीं में से एक है।

माना जाता है कि 10 लाख लोगों में से सिर्फ 4 लोगों में ही ये पाया जाता है। लेकिन दुनिया में इससे भी रेयर किस्म का एक ब्लड ग्रुप है, जिसका नाम Rh-null है। जिसे ‘गोल्डन ब्लड’ भी कहा जाता है। ये इतना रेयर है कि पिछले 44 सालों के दौरान दुनिया में सिर्फ 43 लोगों में ही ये मिला है, और इसके एक्टिव डोनर भी सिर्फ 9 ही हैं।

एंटीजेन्स बताते हैं ब्लड ग्रुप

  • एक इंसान के रेड ब्लड सेल्स में पाए जाने वाले एंटीजेन्स के आधार पर उसका ब्लड ग्रुप तय होता है। एंटीजेन्स ही खून में एंटीबॉडीज बनाते हैं जो शरीर को वायरस और बैक्टीरिया से होने वाली खतरनाक बीमारियों से बचाते हैं।
  • आमतौर पर खून में पाए जाने वाले रेड ब्लड सेल्स में 342 तरह के एंटीजेन्स हो सकते हैं। किसी शख्स की बॉडी में एंटीजेन्स जितने कम होते हैं, उसका ब्लड ग्रुप भी उतना ही रेयर होता है।
  • दुनिया के इस रेयरेस्ट ब्लड ग्रुप को Rh-null इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें एंटीजेन्स की मात्रा बेहद कम होती है। इसके Rh सिस्टम में 342 में से 160 कॉमन एंटीजेन्स नहीं होते हैं।
  • Rh ब्लड ग्रुप सिस्टम दुनिया में पाए जाने वाले 35 ब्लड ग्रुप सिस्टम्स में से एक है। इस सिस्टम में 49 ब्लड ग्रुप एंटीजेन्स बताए गए हैं।

1974 में हुई थी खोज

  • गोल्डन ब्लड ग्रुप का पहला मामला 44 साल पहले साल 1974 में स्विटजरलैंड के शहर जिनेवा में मिला था। जब 10 साल का थॉमस यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में एक इंफेक्शन को चेक कराने गया था।
  • जांच के दौरान थॉमस का खून किसी ब्लड ग्रुप से नहीं मिला। इसके बाद हैरान डॉक्टर्स ने उसे अन्य ब्लड टेस्ट कराने के लिए एम्सटर्डम या पेरिस जाने को कहा। जहां हुए टेस्ट के बाद पता चला कि थॉमस का ब्लड ग्रुप Rh-null है।

माना जाता है यूनिवर्सल डोनर ग्रुप

  • Rh-null को सच्चा यूनिवर्सल डोनर ग्रुप माना जाता है, क्योंकि ये ब्लड उन सभी लोगों को दिया जा सकता है, जिनके पास रेयर ब्लड ग्रुप है। इसी वजह से जिन लोगों के पास ये ब्लड ग्रुप है, उन्हें कई लोगों की जिंदगी बचाने वाला माना जाता है। लेकिन जब कभी उनके साथ ऐसा कुछ होता है, तो उनकी जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। क्योंकि वैसा ही ब्लड ग्रुप मिलना बेहद मुश्किल होता है और जरूरी नहीं कि कोई डोनर मिलने पर आपको वो सही वक्त पर मिल भी जाए।
  • जिनेवा में जब एक बच्चे को गोल्डन ब्लड की जरूरत पड़ी, तो थॉमस को वहां होने के बावजूद इसे डोनेट करने के लिए फ्रांस जाना पड़ा था। क्योंकि स्विटजरलैंड के कड़े कानूनों की वजह से वहां रहकर ब्लड डोनेट करना संभव नहीं था। यहां तक कि थॉमस को इसके लिए पैसा भी नहीं दिया गया था।
  • रेयरेस्ट ब्लड ग्रुप होने की वजह से थॉमस आम लोगों की तरह उन जगहों पर नहीं जा सकता, जहां आधुनिक मेडिकल सुविधाएं नहीं हैं। वो हमेशा अपने पास एक कार्ड रखता है, जिसमें उसके ब्लड ग्रुप के बारे में साफ-साफ लिखा है। सीढ़ियां उतरने से लेकर ड्राइव करने तक हर काम वो बेहद सावधानी के साथ करता है। ताकि गलती से भी कोई चोट ना लग जाए या कोई दुर्घटना ना हो जाए।

जानें डॉक्टर सफेद कोट क्यों पहनते हैं?

अकसर आपने हॉस्पिटल में डॉक्टर और नर्स को सफेद कोट पहने देखा होगा. हर नौकरी पेशा लोगों की अपनी पहचान होती है हैना! चाहे वो डॉक्टर हो या फिर वाकील. अलग-अलग प्रोफेशन में यूनिफार्म के रंग बदल जाते है. डॉक्टर अधिकतर सफेद कोट और वकील काला कोट पहनते हैं. परन्तु क्या आपने कभी सोचा है कि डॉक्टर सफेद कोट ही क्यों पहनते हैं.

सफेद कोट या लैब कोट यानी एप्रन (apron) चिकित्सा क्षेत्र में पेशेवरों द्वारा पहना जाता है जो कि घुटने तक लंबा होता है. ये कोट सफेद या हल्के रंग के सूती, लिनन या सूती पॉलिएस्टर मिश्रण से बना होता है, जिससे इसे उच्च तापमान पर धोया जा सकता है और सफेद होने के कारण आसानी से पता चल जाता है कि साफ हुआ है या नहीं.

क्या आप जानते हैं कि डॉक्टरों ने लैब वैज्ञानिकों से सफेद कोट को ग्रहण किया है?

19वीं शताब्दी के मध्य से पहले, केवल वैज्ञानिक जो प्रयोगशालाओं या लैब में काम करते थे, वे लैब कोट पहनते थे जो कि हल्का गुलाबी या पीले रंग का होता था. तभी प्रयोगशाला वैज्ञानिकों ने यह दिखाकर चिकित्सकों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया था कि दवाओं द्वारा कराया गया इलाज बेकार था, इस प्रकार चिकित्सकों को दोषी ठहराया गया.

जबकि उस समय वैज्ञानिकों को सार्वजनिक और शासकों द्वारा प्रशंसा मिलती थी, वहीं चिकित्सकों पर उस समय उतना विश्वास नहीं किया जाता था. इसलिए चिकित्सा पेशा विज्ञान में बदल गया. इस प्रकार चिकित्सकों ने वैज्ञानिक बनने का फैसला किया.

आखिरकार, बादमें यह सोचा गया कि प्रयोगशालाओं में किए गए आविष्कार निश्चित रूप से बीमारी का इलाज करने में सफलता प्रदान कर सकते हैं. इसलिए भी चिकित्सक, खुद को वैज्ञानिकों के रूप में प्रस्तुत करने की मांग कर रहे थे और तभी उन्होंने वैज्ञानिक प्रयोगशाला कोट को अपने कपड़े के मानक के रूप में अपनाया और चिकित्सकों ने 1889 AD में कोट को पहचानने योग्य प्रतीक के रूप में पहनना शुरू किया.

जब लैब कोट चिकित्सा पेशे द्वारा अपनाया गया था, तो उन्होंने अपने कोट का रंग सफेद पसंद किया. आधुनिक सफेद कोट कनाडा में दवा के लिए डॉ जॉर्ज आर्मस्ट्रांग (Dr. George Armstrong,1855-1933) द्वारा पेश किया गया था जो मॉन्ट्रियल जनरल अस्पताल में एक सर्जन थे और कनाडाई मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष.

आखिर सफेद रंग को ही क्यों चुना गया?

चिकित्सा पेशे के नए मानक के रूप में सफेद रंग को अच्छे कारणों से चुना गया है. शुद्धता का प्रतिनिधित्व करने वाला यह रंग चिकित्सक द्वारा किए गाए कमिटमेंट को दर्शाता है. सफेद भलाई का प्रतिनिधित्व करता है. उदाहरण के लिए, मूसा, जीसस और संतों को अक्सर सफेद रंग के पहने हुए लिबास के रूप में वर्णित किया जाता है. सफेद स्वच्छता व्यक्त करता है और संक्रमण की शुद्धता को भी दर्शाता है.

इसके अलावा, सफेद कोट, उद्देश्य की गंभीरता का भी तो प्रतीक है. यह चिकित्सक के चिकित्सकीय इरादे से संचार करता है और एक प्रतीकात्मक बाधा के रूप में कार्य करता है जो चिकित्सक और रोगी के बीच पेशेवर दूरी को बनाए रखता है.

शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सफेद रंग को शांती और सुकून का रंग माना जाता है और डॉक्टर्स का काम अपने मरीजों का इलाज करना और राहत महसूस करवाना है. इसलिये ही तो डॉक्टर्स हमेशा सफेद कोट पहनते है. ऐसा भी माना जाता है कि हॉस्पिटल में आकर मरीज तनाव भरे माहौल में पॉजीटिव रह सके इसलिये भी डॉक्टर्स हमेशा सफेद कोट पहनते है. देखा जाए तो डॉक्टर्स के सफेद कोट पहनने की शुरूआत बीसवीं शताब्दी से हुई थी.

डॉक्टरों द्वारा सफेद कोट पहनने के कारणों के बारे में एक आंतरिक सर्वेक्षण ने निम्नलिखित परिणाम दिए:

  • रोगियों, नर्सों और अन्य डॉक्टरों द्वारा सफेद कोट से आसानी से पहचान हो जाती है.
  • सफेद कोट में बड़ी जेब होने के कारण सामान ले जाने में जैसे स्टेथोस्कोप आदि में आसानी होती है.
  • सफेद कोट के कारण चिकित्सक के रूप में स्थिति पर जोर दिया जा सकता है.
  • डॉक्टरों के लिए सामाजिक उम्मीदों का होना.
  • परिवेश और मरीजों से संक्रमण के खिलाफ स्वयं की रक्षा.
  • स्वच्छता की छाप छोड़ना.
  • स्वयं से दूषितकरण के खिलाफ रोगियों की रक्षा.
  • सफेद रंग का कोट शरीर के तापमान को बनाए रखना में मदद करता है.

एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि 82% बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक अपने पेशेवर पोशाक के रूप में सफेद कोट पहनना पसंद नहीं करते हैं, यह सोचते हुए कि यह बच्चों और मानसिक रूप से परेशान मरीजों के साथ बातचीत को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है.

सफेद कोट समारोह (White Coat Ceremony,WCC) क्या है?

सफेद कोट समारोह एक अपेक्षाकृत नया अनुष्ठान है जो मेडिकल स्कूल में प्रवेश के समय और हाल ही में कई स्वास्थ्य-संबंधित स्कूलों और व्यवसायों में प्रवेश के दौरान दिया जाता है. इसकी उत्पत्ति 1989 में शिकागो विश्वविद्यालय के प्रिट्जर स्कूल ऑफ मेडिसिन (University of Chicago’s Pritzker School of Medicine) में हुई थी.

यानी सफेद कोट समारोह कुछ चिकित्सा, ऑप्टोमैट्री, दंत, शारीरिक चिकित्सा, फार्मेसी, चिकित्सक सहायक, और पशु चिकित्सा स्कूलों में अपेक्षाकृत एक नया अनुष्ठान है जो छात्रवृत्ति से नैदानिक स्वास्थ्य विज्ञान के अध्ययन से छात्र के संक्रमण को चिह्नित करता है. कई मेडिकल स्कूलों में इसका जश्न मनाया जाता है.

हम कह सकते हैं कि बीसवीं शताब्दी से डॉक्टरों ने सफेद कोट पहनना शुरू किया था क्योंकि सफेद रंग शांति, पवित्रता, इमानदारी इत्यादि का प्रतीक माना जाता है. डॉक्टर जिस प्रकार मरीजों को नया जीवन प्रदान करते हैं उसी प्रकार सफेद रंग शीतलता देता है ओर एक पहचान को भी चिन्हित करता है.

चांद पर नहीं पहुंचा था इंसान, अमेरिका ने रचा था स्वांग

हो सकता है कि आपको ये जानकारी न हो कि 20 जुलाई को इतिहास में एक बड़ी घटना हुई थी। जी हां, इसी दिन इसांन का पैर सबसे पहले चंद्रमा पर पड़ा था। यह दावा किया था अमेरिकी एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने। इस बात को बीते 49 साल पूरे हो चुके हैं।

जी हां, 20 जुलाई 1969 को इंसान ने पहली बार चंद्रमा पर कदम रखा। अपोलो-11 मिशन को लीड करते हुए एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने सबसे पहले चंद्रमा पर कदम रखने की हिम्मत जुुटाई। भले ही अमेरिका ने चंद्रमा पर इंसान पहुंचा देने का कारनामा किया हो, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस बात पर आज भी कई लोगों को शक होता है। इनका कहना है कि नील कभी चंद्रमा पर उतरे ही नहीं।

ये लोग आज भी मानने को तैयार नहीं है कि एयरोनॉटिकल इंजीनियर और अमेरिकी सैनिक पायलट नील आर्मस्ट्रांग ने ऐसा कोई भी महान काम किया था। कुछ तो ये तक कहते हैं कि आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा पर कभी कदम रखा ही नहीं। वह ऐसे कई तथ्य रखते हैं, जो आर्मस्ट्रॉन्ग को सिलसिलेवार गलत साबित करने का दावा करते हैं। इन बिंदुओं से आप भी अछूते होंगे।

दरअसल, एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका रूस के पहली बार स्पेस में जाने से स्पेस प्रोग्राम में पिछड़ गया था। ऐसे में दुनिया के लिए NASA ने चांद पर जाने का नाटक रचा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये चांद पर जाने का सारा खेल फिल्म स्टूडियो में रचा गया था। उन्होंने मिशन से जुड़ी हुई कई तस्वीरों को ध्यान से देखने पर ऐसा कहा था।

दिखाई गई तस्वीरों में अमेरिकी झंडा हवा में उड़ता हुए दिखाई दे रहा है। जबकि एक्सपर्ट मानते हैं कि चंद्रमा पर जो वायुमंडल नहीं है इस कारण झंडा यूं लहरता हुआ नहीं दिखाई दे सकता। जब लोगों का ध्यान इन बिंदुओ पर पड़ा तो उनके दीमाग में भी यह चीजे आई।

सिर्फ इतना ही नहीं चांद पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरो के निशान देखकर पहले लोगों को बेहद खुशी हुई थी। लेकिन चांद पर ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि चन्द्रयान जिसका वजन 4 टन था उसने चन्द्रमा पर कोई निशान नहीं छोड़े, तो फिर आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरों के निशान कैसे बन गए..? यह सवाल एक्सपर्ट टीम ने उठाया।

एक तस्वीर ऐसी सामने आई जिसमें चांद से तारों का नजर नहीं आना बेहद चौंकाने वाली बात थी क्योंकि चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, लेकिन इस तस्वीर में तारे दिख ही नहीं रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये भी है कि दुनिया के सबसे बड़े मिशन की मशीन के ब्लूप्रिंट्स आज तक किसी ने नहीं देखे। अमेरिका का कहना है कि वो किसी तरह से गायब हो गए। जिस वजह ये तस्वीरें इस मिशन की सच्चाई को बंया करती है।

आपकी जिंदगी को बहुत ही आसान बना सकते हैं ये यह 17 जुगाड़

बैचलर्स की ज़िंदगी आसान नहीं होती. बेचारों को मूवी देखते हुए कॉलेज की पढ़ाई करनी होती है, लेटे-लेटे लाइट का स्विच ऑन करना होता है, गंदे कपड़ों में थोड़े से साफ़ कपड़े पहनने पड़ते हैं. बहुत मुश्किल होती है बेचारों की लाइफ़ में. इनकी ज़िंदगी को थोड़ा आसान बनाने के लिए थोड़े बैचलर हैक्स दे रहे हैं, इस्तेमाल करो और ख़ुश रहो.

  • शर्ट के बटन को उधड़ने से बचाने के लिए नेल पॉलिश का इस्तेमाल करना.

  • अगर फ़ोन के अलार्म की आवाज़ नहीं सुनाई देती, तो खाली गिलास में फ़ोन रखकर सोना.

  • बची हुई कोल्ड ड्रिंक से टॉयलेट साफ़ करना.

  • सुबह उठने के बाद कॉफ़ी की जगह सेब खाना. ये आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है.

  • माइक्रोवेव में एक साथ ज़्यादा खाना गर्म करने के लिए ये ट्रिक अपनाएं.

  • एक बोतल को आधा भर कर फ़्रिजर में रख दें. इससे उसमें बर्फ़ जम जाएगी और बाद में इसे निकाल कर नॉर्मल पानी से भर लें. इस तरह आप हर वक़्त ठंडे पानी का लुत्फ़ उठा सकते हैं.

  • Garbage Bags कई बार यूज़ किया जा सकता है. इसके लिए बस आपको उसके निचले हिस्से में एक अख़बार लगाना है. ये नमी सोख लेगा और बैग को गंदा होने से बचाएगा.

  • टी-बैग्स का इस्तेमाल जूतों और ट्रैवलिंग बैग की दुर्गंध दूर करने के लिए करें.

  • लैपटॉप को कूल रखने के लिए अंडे की ट्रे को इस तरह यूज़ करें.

  • लेटते हुए मूवी या फिर वीडियोज़ देखने के लिए इस ट्रिक को अपनाना.

  • जींस के Loose Zippers खुलने से रोकने के लिए चाबी का छल्ले यूज़ करें.

  • अपने फ़ोन के पासवर्ड में Accented Letters का यूज़ करें, ताकि कोई इसे डिकोड न कर सके.

  • ट्रैवल करते समय नींद आए और बैग चोरी होने का डर सताए, तो बैग के एक हैंडल को अपने पैर में डालकर सोना.

  • चीज़ें उधार देते वक़्त फ़ोन से सबूत के तौर पर उसके साथ दोस्त की फ़ोटो लेना. ताकि आपको याद रहे कि आपने फ़लानी चीज़ किसे दी थी.

  • लैपटॉप/कंप्यूटर को Accidental Shut-down से बचाने के लिए इस ट्रिक का इस्तेमाल करें.

  • Earphones में लेफ़्ट और राइट को पहचाने के लिए उनमें से एक में गांठ लगाना.

  • Extension Cords को Unplugged होने से बचाने के लिए उनमें भी एक गांठ लगा देना.