2 महीने कोर्स के बाद शुरू किया खेतीबाड़ी बिजनेस, अब हर महीने होती है एक लाख की कमाई

अब एग्रीकल्चर में करियर सिर्फ खेती-बाड़ी तक ही सीमित नहीं रह गया है। एग्रीकल्चर सेक्टर के बदले माहौल का परिणाम है कि अन्य सेक्टरों की ही तरह एग्रीकल्चर सेक्टर भी लोगों को काफी आकर्षित कर रहा है।

किसानों की आमदनी बढ़ाने और एग्रीकल्चर को एक करियर के रूप में बनाने के लिए सरकार कुछ कोर्स भी कराती है जिसका फायदा उत्तर प्रदेश के शामली के रहने वाले धन प्रकाश शर्मा ने भी उठाया। एग्रीकल्चर में बीएससी करने के बाद उन्होंने सरकार द्वारा कराए जा रहे कोर्स किया और आज वो हर महीने 1 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं।

2 महीने के कोर्स ने बदली जिंदगी

धन प्रकाश शर्मा ने बातचीत में बताया कि उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से एग्रीकल्चर में बीएससी किया है। एग्रीकल्चर में डिग्री लेने के बाद एक प्राइवेट कंपनी में मार्केट की नौकरी लगी। नौकरी में उनको मन नहीं लगा और एक एग्रीकल्चर में अपना कुछ करने का विचार आया।

इसमें सरकार द्वारा चलाए जा रहे एग्री क्लिनिक एग्री बिजनेस सेंटर ने उनकी मदद की। उन्होंने दो महीने का कोर्स किया जिसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई।उन्होंने 12 साल नौकरी की और बाद में 15 हजार की नौकरी छोड़ उन्होंने लो कॉस्ट फार्म मशीनरी की शुरुआत की।

21.5 लाख रुपए का लोन लिया

शर्मा ने लो कॉस्ट मशीनरी की शुरुआत करने लिए 21.5 लाख रुपए यूनाइटेड बैंक से लोन लिया। इसके बाद उन्होंने ‘नैपसैक स्प्रेयर’ की मैन्युफैक्चरिंग शुरू। यह एक स्प्रेयर मशीन है जिसके जरिए किसान के लिए केमिकल्स के छिड़काव में बहुत मददगार है।

3 महीने 5.5 लाख का हुआ नेट प्रॉफिट

3 महीने में 5.5 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट इस बात का सबूत है कि उनके नैपसैक स्प्रेयर किसानों का मददगार साबित हुआ। वो किसानों के काम को आसान बनाने के लिए स्प्रेयर को रिडिजाइन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वो बैट्री चालित स्प्रेयर भी बनाए हैं जो किसानों की मेहनत को कम करता है।

3 साल में खड़ा किया 1 करोड़ का बिजनेस

धन प्रकाश ने 2015 में पशुपति एग्रोटेक की नींव रखी थी। तीन साल में ही उनकी कंपनी का टर्नओवर 1 करोड़ रुपए हो गया। इसमें से 10-12 फीसदी का प्रॉफिट हो जाता है। उनका बिजनेस 3-4 राज्यों में फैला है और उन्होंने अपने यहां 6 लोगों को रोजगार मुहैया करवाया है।

हजार रुपए से शुरू होता है प्रोडक्ट

उनके प्रोडक्ट्स की कीमत 1 हजार रुपए से शुरू होती और 3 हजार रुपए तक जाती है। उन्होंने एक स्प्रेयर डेवलप किया है जो ट्रैक्टर के साथ काम करता है जिसकी कीमत 36 हजार रुपए है।

बिजनेस बढ़ाने का है प्लान

धन प्रकाश अपने बिजनेस को बढ़ाना चाहते हैं। उनका कहना है कि वो सीड्स और पेस्टिसाइड्स के फील्ड में कदम रखना चाहते हैं। इसके अलावा लो कॉस्ट और एनर्जी इफिशन्ट्ली सोलर ड्रायर, सीड्स ड्रिल, मल्टीपर्सपस सिकलर्स, प्लांटर्स मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस बढ़ा है।

सोमवार को देश की अलग-अलग मंडियों में इस भाव बिका बासमती

हरियाणा की मंडियों में अब पूसा 1509 का आम भाव 3000 रुपए हो चुका है। सोमवार को भी 1509 में तेजी बरकरार रही। कुछ मंडियों में यह 3100 रुपए तक भी बिक गया। वहीं दूसरी ओर बासमती 1121 में भी ग्राहकी मजबूत दिखी।

पूंडरी में 1121 3717 रुपए बिका तो जींद में यह 3700 रुपए बोला गया। 1121 का आम भाव अब 3625 रुपए हो गया है। पीबी 1 के भावों में स्थिरता है और ये 3000 हजार के आसपास टिका हुआ है।

पंजाब बासमती धान भाव,

पंजाब की फाजिल्का में सोमवार को बासमती 1121 का रेट 3281 रुपये क्विंटल रहा।पंजाब के अमृतसर में 1509 का शुरुआती भाव 3040 और परमल का 1550 से 1690 रहा। बुढलाडा में बासमती 1121 3350, पूसा 1509 2990 और डीबी 3050 रुपए बिका। फरीदकोट में बासमती 1121 3442 और 1509 3002 रुपए बिका।

हरियाणा बासमती धान भाव,

सोमवार को टोहाना में बासमती 1121 3500 रुपए और डीपी 1401 3100 रुपए बिका।रोहतक की बेरी मंडी में बासमती 1121 3600, पूसा 1509 3050 और शरबती 2315 रुपए बिका। खरखोदा में 1509 का भाव 3011 और पानीपत में 3041 रुपए क्विंटल रहा।

समालखा में बासमती 1121 3681 और 1509 का रेट 3061 रुपए रहा। अलेवा मंडी में 1509 का भाव सोमवार को 3095 रुपए और बासमती 1121 का भाव 3634 रुपए रहा। कैथल मंडी में बासमती 1121 3610 रुपए बिका। फतेहाबाद में बासमती 1121 का रेट 3400, पूसा 1509 का भाव 3120 और डीपी 1401 का रेट 3344 रुपए रहा।

सिरसा में पीबी 1 3085, 1509 3000 और डीपी 1401 3071 रुपए बिका। रानियां में पीबी वन 3031 रुपए बिका। ऐलनाबाद में पीबी 1 3170, डीपी 1401 3200 और 1509 3000 रुपए बिका। रतिया में पीबी 1 3045 रुपए क्विटल बिका।कैथल में बासमती 1121 3350 से 3685 रुपए तक बिका। 1509 का भाव 2950 से 3100 रुपए तक रहा। डीपी 3250 रुपए तक बिका।

उत्‍तर प्रदेश बासमती धान भाव,

यूपी की खैर मंडी में पूसा 1509 2900 ओर सुगंध 2431 रुपये बिका। राजस्थान की बूंदी मंडी में 2509 का भाव 2500 से 2961 ओर सुगंध का 2200 से 2400 रुपये रहा। नरेला में 1121 का रेट 3661, 1509 का 2981 ओर शरबती का 2260 रहा।

मध्‍यप्रदेश बासमती धान भाव,

मध्य प्रदेश की डबरा मंडी में पूसा 1509 2300 से 2700, सुगंध 1950 से 2200 रुपए बिका। आवक करीब 28 हजार बोरी रही। दतिया में 1509 का भाव 2480 से 2790 रुपए रहा। पिपरिया में पूसा 2905, 1509 2660 और बासमती 1121 2960 रुपए बिका। रायसेन में पीबी 1 का भाव 2700 से 3000 रुपए रहा।

राजस्थान के किसान ने अपने गांव को बना दिया मिनी इजरायल , सालाना 1 करोड़ की कमाई

खेती किसानी के मामले में इजरायल को दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। वहां रेगिस्तान में ओस से सिंचाई होती है, दीवारों पर गेहूं, धान उगाए जाते हैं, भारत के लाखों लोगों के लिए ये एक सपना ही है। इजरायल की तर्ज पर राजस्थान के एक किसान ने खेती शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर सुन कर आप उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे।

दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर राजस्थान के जयपुर जिले में एक गांव है गुड़ा कुमावतान। ये किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) का गांव है। खेमाराम ने तकनीकी और अपने ज्ञान का ऐसा तालमेल भिड़ाया कि वो लाखों किसानों के लिए उदाहरण बन गए हैं। आज उनका मुनाफा लाखों रुपए में है। खेमाराम चौधरी ने इजरायल के तर्ज पर चार साल पहले संरक्षित खेती (पॉली हाउस) करने की शुरुआत की थी। आज इनके देखादेखी आसपास लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं, लोग अब इस क्षेत्र को मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम अपनी खेती से सलाना एक करोड़ का टर्नओवर ले रहे हैं।

सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मिला मौका

राजस्थान के जयपुर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर गुड़ा कुमावतान गांव है। इस गाँव के किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) को सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मौका मिला। इजरायल से वापसी के बाद इनके पास कोई जमा पूंजी नहीं थी लेकिन वहां की कृषि की तकनीक को देखकर इन्होंने ठान लिया कि उन तकनीकाें को अपने खेत में भी लागू करेंगे।

सरकारी सब्सिडी से लगाया पहला पॉली हाउस

चार हजार वर्गमीटर में इन्होने पहला पॉली हाउस सरकार की सब्सिडी से लगाया। खेमाराम चौधरी गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “एक पॉली हाउस लगाने में 33 लाख का खर्चा आया, जिसमे नौ लाख मुझे देना पड़ा जो मैंने बैंक से लोन लिया था, बाकी सब्सिडी मिल गयी थी। पहली बार खीरा बोए करीब डेढ़ लाख रूपए इसमे खर्च हुए।

चार महीने में ही 12 लाख रुपए का खीरा बेचा, ये खेती को लेकर मेरा पहला अनुभव था।” वो आगे बताते हैं, “इतनी जल्दी मै बैंक का कर्ज चुका पाऊंगा ऐसा मैंने सोचा नहीं था पर जैसे ही चार महीने में ही अच्छा मुनाफा मिला, मैंने तुरंत बैंक का कर्जा अदा कर दिया। चार हजार वर्ग मीटर से शुरुआत की थी आज तीस हजार वर्ग मीटर में पॉली हाउस लगाया है।”

मिनी इजरायल के नाम से मशहूर है क्षेत्र

खेमाराम चौधरी राजस्थान के पहले किसान थे जिन्होंने इजरायल के इस माडल की शुरुआत की थी। आज इनके पास खुद के सात पॉली हाउस हैं, दो तालाब हैं, चार हजार वर्ग मीटर में फैन पैड है, 40 किलोवाट का सोलर पैनल है। इनके देखादेखी आज आसपास के पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं।

इस जिले के किसान संरक्षित खेती करके अब अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। पॉली हाउस लगे इस पूरे क्षेत्र को लोग अब मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम का कहना है, “अगर किसान को कृषि के नये तौर तरीके पता हों और किसान मेहनत कर ले जाए तो उसकी आय 2019 में दोगुनी नहीं बल्कि दस गुनी बढ़ जाएगी।”

मुनाफे का सौदा है खेती

अपनी बढ़ी आय का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “आज से पांच साल पहले हमारे पास एक रुपए भी जमा पूंजी नहीं थी, इस खेती से परिवार का साल भर खर्चा निकालना ही मुश्किल पड़ता था। हर समय खेती घाटे का सौदा लगती थी, लेकिन जबसे मैं इजरायल से वापस आया और अपनी खेती में नये तौर-तरीके अपनाए, तबसे मुझे लगता है खेती मुनाफे का सौदा है, आज तीन हेक्टयर जमीन से ही सलाना एक करोड़ का टर्नओवर निकल आता है।”

खेमाराम ने अपनी खेती में 2006-07 से ड्रिप इरीगेशन 18 बीघा खेती में लगा लिया था। इससे फसल को जरूरत के हिसाब से पानी मिलता है और लागत कम आती है। ड्रिप इरीगेशन से खेती करने की वजह से जयपुर जिले से इन्हें ही सरकारी खर्चे पर इजरायल जाने का मौका मिला था जहाँ से ये खेती की नई तकनीक सीख आयें हैं।

इजरायल मॉडल पर खेती करने से दस गुना मुनाफा

जयपुर जिले के बसेड़ी और गुढ़ा कुमावतान गाँव के किसानों ने इजरायल में इस्तेमाल होने वाली पॉली हाउस आधारित खेती को यहां साकार किया है। नौवीं पास खेमाराम की स्तिथि आज से पांच साल पहले बाकी आम किसानों की ही तरह थी। आज से 15 साल पहले उनके पिता कर्ज से डूबे थे। ज्यादा पढ़ाई न कर पाने की वजह से परिवार के गुजर-बसर के लिए इनका खेती करना ही आमदनी का मुख्य जरिया था। ये खेती में ही बदलाव चाहते थे, शुरुआत इन्होने ड्रिप इरीगेशन से की थी। इजरायल जाने के बाद ये वहां का माडल अपनाना चाहते थे।

कृषि विभाग के सहयोग और बैंक के लोंन लेने के बाद इन्होने शुरुआत की। चार महीने में 12 लाख के खीर बेचे, इससे इनका आत्मविश्वास बढ़ा। देखते ही देखते खेमाराम ने सात पॉली हाउस लगाकर सलाना का टर्नओवर एक करोड़ का लेने लगे हैं। खेमाराम ने बताया, “मैंने सात अपने पॉली हाउस लगाये और अपने भाइयों को भी पॉली हाउस लगवाए, पहले हमने सरकार की सब्सिडी से पॉली हाउस लगवाए लेकिन अब सीधे लगवा लेते हैं, वही एवरेज आता है, पहले लोग पॉली हाउस लगाने से कतराते थे अभी दो हजार फाइलें सब्सिडी के लिए पड़ी हैं।”

इनके खेत में राजस्थान का पहला फैन पैड

फैन पैड (वातानुकूलित) का मतलब पूरे साल जब चाहें जो फसल ले सकते हैं। इसकी लागत बहुत ज्यादा है इसलिए इसकी लगाने की हिम्मत एक आम किसान की नहीं हैं। 80 लाख की लागत में 10 हजार वर्गमीटर में फैन पैड लगाने वाले खेमाराम ने बताया, “पूरे साल इसकी आक्सीजन में जिस तापमान पर जो फसल लेना चाहें ले सकते हैं, मै खरबूजा और खीरा ही लेता हूँ, इसमे लागत ज्यादा आती है लेकिन मुनाफा भी चार गुना होता है।

डेढ़ महीने बाद इस खेत से खीरा निकलने लगेगा, जब खरबूजा कहीं नहीं उगता उस समय फैन पैड में इसकी अच्छी उपज और अच्छा भाव ले लेते हैं।” वो आगे बताते हैं, “खीरा और खरबूजा का बहुत अच्छा मुनाफा मिलता है, इसमें एक तरफ 23 पंखे लगें हैं दूसरी तरफ फब्बारे से पानी चलता रहता है ,गर्मी में जब तापमान ज्यादा रहता है तो सोलर से ये पंखा चलते हैं,फसल की जरूरत के हिसाब से वातावरण मिलता है, जिससे पैदावार अच्छी होती है।”

ड्रिप इरीगेशन और मल्च पद्धति है उपयोगी

ड्रिप से सिंचाई में बहुत पैसा बच जाता है और मल्च पद्धति से फसल मौसम की मार, खरपतवार से बच जाती है जिससे अच्छी पैदावार होती है। तरबूज, ककड़ी, टिंडे और फूलों की खेती में अच्छा मुनाफा है। सरकार इसमे अच्छी सब्सिडी देती है, एक बार लागत लगाने के बाद इससे अच्छी उपज ली जा सकती है।

तालाब के पानी से करते हैं छह महीने सिंचाई

खेमाराम ने अपनी आधी हेक्टेयर जमीन में दो तालाब बनाए हैं, जिसमें बरसात का पानी एकत्रित हो जाता है। इस पानी से छह महीने तक सिंचाई की जा सकती है। ड्रिप इरीगेशन और तालाब के पानी से ही पूरी सिंचाई होती है। ये सिर्फ खेमाराम ही नहीं बल्कि यहाँ के ज्यादातर किसान पानी ऐसे ही संरक्षित करते हैं। पॉली हाउस की छत पर लगे माइक्रो स्प्रिंकलर भीतर तापमान कम रखते हैं। दस फीट पर लगे फव्वारे फसल में नमी बनाए रखते हैं।

सौर्य ऊर्जा से बिजली कटौती को दे रहे मात

हर समय बिजली नहीं रहती है, इसलिए खेमाराम ने अपने खेत में सरकारी सब्सिडी की मदद से 15 वाट का सोलर पैनल लगवाया और खुद से 25 वाट का लगवाया। इनके पास 40 वाट का सोलर पैनल लगा है। ये अपना अनुभव बताते हैं, “अगर एक किसान को अपनी आमदनी बढ़ानी है तो थोड़ा जागरूक होना पड़ेगा।

खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं की जानकारी रखनी पड़ेगी, थोड़ा रिस्क लेना पड़ेगा, तभी किसान अपनी कई गुना आमदनी बढ़ा सकता है।” वो आगे बताते हैं, “सोलर पैनल लगाने से फसल को समय से पानी मिल पाता है, फैन पैड भी इसी की मदद से चलता है, इसे लगाने में पैसा तो एक बार खर्च हुआ ही है लेकिन पैदावार भी कई गुना बढ़ी है जिससे अच्छा मुनाफा मिल रहा है, सोलर पैनल से हम बिजली कटौती को मात दे रहे हैं।”

रोजाना इनके मिनी इजरायल को देखने आते हैं किसान

राजस्थान के इस मिनी इजरायल की चर्चा पूरे राज्य के साथ कई अन्य प्रदेशों और विदेश के भी कई हिस्सों में है। खेती के इस बेहतरीन माडल को देखने यहाँ किसान हर दिन आते रहते हैं। खेमाराम ने कहा, “आज इस बात की मुझे बेहद खुशी है कि हमारे देखादेखी ही सही पर किसानों ने खेती के ढंग में बदलाव लाना शुरू किया है। इजरायल माडल की शुरुआत राजस्थान में हमने की थी आज ये संख्या सैकड़ों में पहुंच गयी है, किसान लगातार इसी ढंग से खेती करने की कोशिश में लगे हैं।”

(साभार-गांव कनेक्शन)

अपने खेत में लगाएं पोली हाउस, सरकार देगी आधा पैसा, पारम्परिक खेती से 10 गुना ज्यादा होगी कमाई

अगर आपके पास खेती करने के लिए जमीन कम है और आप खेती को प्रोफेशन के तौर पर अपनाना चाहते हैं तो पॉलीहाउस आपके लिए शानदार विकल्प है। पॉलीहाउस लगाकर आप कम जमीन में भी सालाना लाखों रुपए की कमाई कर सकते हैं।

पॉलीहाउस का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि खराब मौसम, बारिश या दूसरे जानवरों से आपकी फसल पूरी तरह से सुरक्षित रहती है। इसके अलावा पॉलीहाउस में फसल की उत्पादकता पारंपरिक खेती की तुलना में 10 गुना तक अधिक होती है।

साथ पॉलीहाउस में सब्जी या फल जो भी आप उगाते हैं उसकी क्वालिटी भी काफी अच्छी होती है। इसकी वजह से पॉलीहाउस में उगाए गए उत्पाद की बाजार में बेहतर कीमत मिलती है।

कितनी आती है लागत

बरेली में पॉलीहाउस में खेती करने वाले युवा और प्रगितशाल किसान पंकज चौधरी ने बताया कि पॉलीहाउस में खेती एक शानदार विकल्प है। पॉलीहाउस लगाने में लागत जरूर अधिक आती है लेकिन इससे किसान को फायदा भी ज्यादा होता है।

पंकज चौधरी ने बताया कि अगर कोई व्यक्ति 4,000 वर्ग मीटर में पॉलीहाउस लगाता है तो इस पर लगभग 35 लाख रुपए लागत आती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार पॉलीहाउस लगाने पर आने वाली लागत का 50 फीसदी सब्सिडी देती है। कोई भी व्यक्ति केंद्र सरकार से या राज्य सरका से यह सब्सिडी ले सकता है।

बेमौसमी सब्जी की होती है खेती

पॉलीहाउस में आम तौर पर बेमौसमी सब्जियों की खेती की जाती है। पॉलीहाउस में लगभग पूरे साल खीरा और शिमला मिर्च की खेती की जा सकती है। इसके अलावा पॉलीहाउस में ऐसी सब्जियों की खेती भी कर सकते हैं जिनको ठंड से नुकसान होता है।

पंकज चौधरी ने बताया कि इस बार बारिश ज्यादा होने की वजह से खेतों में पानी भर गया था। इससे पारंपरिक खेती करने वाले किसानों की फसलों को काफी नुकसान हुआ। लेकिन मेरे पॉलीहाउस में खीरे के उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ा और बाजार में खीरा कम आने से मुझे खीरे की कीमत भी ज्यादा मिली।

बैंक भी देते हैं पॉलीहाउस लगाने के लिए लोन

अगर आपके पास पॉलीहाउस लगाने के लिए पैसा नहीं है तो आप बैंक से लोन भी ले सकते हैं। भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया सहित ज्यादातर पीएसयू और प्राइवेट सेक्टर के बैंक पॉलीहाउस लगाने के लिए पॉलीहाउस की लागत का 80 फीसदी तक लोन देते हैं। यानी आपको लागत का सिर्फ 20 फीसदी निवेश करना होगा।

पिछले साल के मुकाबले 300 महंगा बिक रहा है 1121 बासमती जाने हरियाणा की मंडिओं में 1121 बासमती के भाव

उचाना -उचाना अनाज मंडी में इन दिनों किसानों को 1121 धान के भाव बीते साल से अधिक मिल रहे हैं। इन दिनों 1121 की आवक होनी शुरू हो गई है। मार्केट कमेटी सचिव जोगिंद्र सिंह ने बताया कि इस बार 1121 का भाव 3350 रुपये प्रति क्विंटल तक टॉप पर रहा है तो बीते साल ये भाव 3000 हजार रुपये प्रति क्विंटल इन दिनों मिल रहे थे।

सचिव ने बताया कि 1509 धान के भाव 2846 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रहे हैं। बीते साल भी 2800 रुपये प्रति क्विंटल तक के भाव इस समय मिल रहे थे। अब 39 हजार 540 क्विंटल 1121 धान मंडी में आ चुकी है।

पूंडरी-अनाज मंडी में शनिवार को 1121 धान की बोली करवाई गई। जिसके कारण मंडी में 1121 के धान में 100 रुपए प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी रही। इससे किसानों में खुशी का माहौल बना है। मंडी में बोली पर धान 3250 रुपए से लेकर 3581 रुपए प्रति क्विंटल तक बिका। मंडी में लगभग 3 हजार बोरी 1121 धान की आवक थी।

अलेवा– अलेवा अनाज मंडी में पिछले कई दिनों सेे धान की किस्म 1509 के भावों में आए दिन पचास से सौ रुपए तक की बढ़ोतरी हो रही है। गुरूवार को धान की किस्म 1509 के भाव में 50रुपए तक का इजाफा हुआ है।

बुधवार को एजेंसियों ने हाथ से कटाई वाली धान की किस्म 1509 को प्रति क्विंटल 2900 रुपए व पूसा 1121 को 3250 रुपए प्रति क्ंिवटल तक की खरीदा। मंगलवार को इसके भाव 2900 रुपए प्रति क्ंिवटल तक पहुंच गए है।

साढ़े पांच करोड़ रुपये खर्च कर यहां के 850 किसानों का कर्ज चुकाएंगे अमिताभ बच्चन

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने घोषणा की है कि वह उत्तर प्रदेश के 850 से ज्यादा किसानों का कर्ज चुकाएंगे. उन्होंने पहले भी महाराष्ट्र के 350 से ज्यादा किसानों को ऋण चुकाने में मदद की थी. इसके लिए वह 5.5 करोड़ रुपये खर्च करेंगे.

वह जिन किसानों की मदद करेंगे, उनकी पहचान कर ली गई है. बच्चन ने अपने ब्लॉग में कहा कि 350 से ज्यादा किसानों को कर्ज चुकाने में दिक्कत हो रही थी. उन्हें खुदकुशी से रोकने के लिए कुछ दिन पहले उनका ऋण चुकाया गया है.

इससे पहले आंध्र और विदर्भ के किसानों का कर्ज चुकाया गया था. अब उत्तर प्रदेश के 850 से ज्यादा किसानों की पहचान की गई है और उनके 5.5 करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज को चुकाने में मदद की जाएगी.

76 वर्षीय अभिनेता ने अपने ब्लॉग पर लिखा, “उत्तर प्रदेश के 850 किसानों की सूची तैयार कर ली गई है और उनके 5.5 करोड़ के कर्ज चुकाने का इंतजाम किया जाएगा. इसके लिए संबंधित बैंक से बात कर ली गई है.”

अभिनेता ने यह साझा किया कि वह अजीत सिंह की भी मदद करेंगे जो केबीसी कर्मवीर में दिखे थे.

अमिताभ ने हाल ही में सरकारी एजेंसियों के माध्यम से 44 ऐसे परिवारों को आर्थिक सहायता की थी, जिनके परिवार के सदस्यों ने देश के लिए अपनी जान दी थी. अमिताभ ने इस अनुभव को बहुत संतोषजनक बताया था.

दोगुनी कमाई करने के लिए ऐसे करें मिर्च की उन्नत खेती

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है।  मिर्चों में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइसिन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है।  भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है।  इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है।

मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।  बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिर्चो में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्रा पायी जाती है।  मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं।  एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है।

दोगुनी कमाई

हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें।

फैजाबाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के सब्जी वैज्ञानिक डा.एसपी सिंह के अनुसार प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 35-40 हजार रुपये आती है। इतने रकबे में करीब 60 क्विंटल तक उपज संभव है। बाजार में यह 20 रुपये प्रति किग्रा के भाव से भी बिके, तो भी किसान को करीब एक लाख 20 हजार रुपये मिलेंगे। 40 हजार की लागत निकालने के बाद भी करीब दो गुने का लाभ होगा

जलवायु

मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है।  लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।  गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।  बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है।

यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।  मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है. तेज़  मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।  फूलते समय ओस गिरना या तेज़  वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदाई होता है।  क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

क़िस्में

पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियॉ चौड़ी होती हैं।  फल 9-10 सें०मी० लम्बे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं।  इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर सूखी मिर्च के लिए होती है।

पूसा सदाबाहर : इस क़िस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सें०मी० होते हैं।  फल 6-8 सें मी. लम्बे, गुच्छों में , 6-14 फल  प्रति  गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है।  औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर , सूखी मिर्च के लिए होती है।  यह क़िस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

नर्सरी प्रबन्ध

नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए।  पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है।  नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है।  नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए ।  नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौड़ाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्ये में कठिनाई आती है।  नर्सरी की उंचाई 6 इंच या आधा फीट रखनी चाहिए।  बीज की बुआई कतारों में करें।  कतारों का फासला 5-7 सें०मी० रखा जाता है।  पौध लगभग 6 सप्ताह में तैयार हो जाती है।

मृदा एवं खेती की तैयारी

मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वेतम होती हैं। जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है।  बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।

जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है।  गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।  खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज-दर

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफ़ी होता है।

निराई-गुड़ाई

पौधों की वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है।  पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है।

सिंचाई

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।

बुआई

मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।  बडे फलों वाली क़िस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।  पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।

उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।  इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है।  यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

पौध संरक्षण

आर्द्रगलन रोग  यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है।  इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है।  इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।  इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग  इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है।  इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग  यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है।  यह रोग बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है।  शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।  एवं वृद्धि रुक जाती है।  अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।  यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है।  अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।  इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।  इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग  इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।  बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है।  तथा वृद्धि रुक जाती है।  यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।

थ्रिप्स एवं एफिड  ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है।  रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

उपज

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर होती है।

इतने रुपए गिर चुके है बासमती के भाव, किसान हुए निराश

इस बार किसानों पर हर तरफ से मार पड़ रही है। उत्पादन भी कम है और भाव भी अच्छे नहीं मिल रहे। किसानों से बात की तो कोई खुश नजर नहीं आया। धान खरीद के लिए कोई दो दिन से करनाल मंडी में है तो कोई चार दिन से। वे अच्छे भाव आने के इंतजार में डेरा डाले हुए हैं।

बासमती 1509 किस्म के साथ पहुंचे थे। किसान राजबीर ने कहा कि सीजन के शुरुआत में अच्छा रेट था, लेकिन अब स्थित खराब है। सबसे अच्छी ढेरी 2350 रुपये प्रति क्विंटल तक जा रही है। शुरआत में बासमती 1509 2600 रुपये तक बिक चूका है । ये सिर्फ हरयाणा की बात नहीं पंजाब की मंडिओं में भी भाव में गिरावट आ गई है ।

खर्च भी पूरा करना मुश्किल

काछवा गांव निवासी ईश्वर ने कहा कि वह पिछले छह दिनों से अनाज मंडी में आए हैं। धान का भाव ठीक मिल जाए, इसी उम्मीद के साथ आज सातवां दिन भी निकल आया। मामूली बढ़ोतरी के साथ 1509 धान 2350 रुपये प्रति क्विंटल पर आई है। ऐसे में उनका खर्च भी पूरा नहीं हो सकता। सरकार को किसानों समस्या की तरफ ध्यान देना चाहिए।

झाड़ भी ठीक नहीं निकला, अब मंडी में आ रही दिक्कतें

किसान गीता राम चार दिनों से मंडी में ही हैं। इस बार 1509 धान का उत्पादन प्रति एकड़ महज 16 से 17 ¨ क्वटल रहा है। कुछ भावों ने फजीहत कर दी। पिछले दिनों मौसम की मार का असर भी रहा। अब मंडी में भी धक्के खाने पड़ रहे हैं। सरकार को धान के भावों में बढ़ोतरी करनी चाहिए, जिससे किसानों का खर्च निकल सके।

अच्छे भाव की उम्मीद भी टूटी

गंजोगढ़ी निवासी इंद्रजीत सिंह ने कहा कि इस बार उम्मीद थी कि अच्छा रेट आएगा, लेकिन वह भी टूट गई है। सीजन के शुरुआती चरण में 1509 का किसानों को अच्छा भाव मिला, लेकिन अब कम हो गया। अक्सर ऐसा होता है कि जब 1509 की आवक कम हो जाएगी जब भाव बढ़ेंगे, जिससे किसानों को अच्छे भाव का लाभ नहीं मिल पाता।

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।