किसानों के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी अब वापिस नहीं देने होंगे ये पैसे

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से किसानों को मिल रहे वित्तीय लाभ की धनराशि से बैंक अपना बकाया नहीं वसूल सकेंगे।  केंद्र की ओर से वित्त मंत्रालय ने देश के सभी बैंकों को निर्देश जारी किया है कि वो किसानों के कर्ज की भरपाई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत मिल रहे पैसों से न करें।

दरअसल इसके पीएम किसान योजना के तहत हर लघु और सीमांत किसान को प्रति एकड़ जमीन के हिसाब से सहायता राशि के रूप में सालाना 6000 रुपए की राशि दी जाती है।

योजना के पैसों से बैंक करते थे कर्ज की भरपाई

किसानों को यह राशि 2000 हजार रुपए की तीन किस्तों में दी जाती है। इसकी पहली किस्त का भुगतान 3.12 करोड़ किसानों को हो चुका है, जबकि दूसरी किस्त का पैसा 2.66 करोड़ किसानों के बैंक खाते में पहुंच चुका है। हालांकि देश के कई हिस्सों से खबरें आ रही थी, कि किसानों के खाते में पैसे डालने के बाद वापस ले लिया जाता है। हालांकि ऐसा नहीं था किसानों के खाते में पीएम किसान योजना के तहत आने वाले पैसों से बैंक किसानों के कर्ज की भरपाई कर लेते थे।

वित्त मंत्रालय ने जारी किया निर्देश

ऐसे में वित्त मंत्रालय को किसानों की ओर से शिकायत मिली कि जिन किसानों पर बैंकों का बकाया है, उनके खाते में पीएम किसान योजना का पैसा आते ही बैंक उससे कर्ज की भरपाई कर लेते हैं। योजना का लाभ उठाने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश आगे है, जहां के 1.12 करोड़ किसानों को पहली व दूसरी किस्त मिल चुकी है। योजना के तहत सीधे खाते में पैसे ट्रांसफर किए जा रहे हैं।

अमीर किसानों को बिजली पर सब्सिडी क्यों ? हाईकोर्ट ने हरियाणा-पंजाब से मांगा जवाब

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा सरकार को अमीर किसानों को दी जा रही ट्यूबवेल सबसिडी और मुफ्त बिजली की सुविधा बंद करने को कहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार इसे वापिस क्यों नहीं लेती। इस पर हाईकोर्ट ने दोनों राज्यों से जवाब मांगा है जिस पर अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी।

चीफ जस्टिस कृष्णा मुरारी एवं जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ ने यह आदेश इस मामले को लेकर एडवोकेट एच.सी. अरोड़ा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं। पंजाब सरकार ने कहा था कि जिस नीति के तहत किसानों को खेतों में पंपसैट के लिए मुफ्त बिजली दी जा रही हैं, उसमे आमिर और गरीब का कोई फर्क नहीं रखा गया है।

बावजूद इसके पी.एस.पी.सी.एल. ने गत वर्ष 23 फरवरी को एक सर्कुलर जारी कर कहा है कि अगर कोई किसान इस सब्सिडी को छोड़ना चाहता है तो वो छोड़ सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इसे किसी कि स्वेछा पर नहीं छोड़ा जा सकता। इस मामले में अब सरकार कार्रवाई कर यह सब्सिडी वापस ले सकती है।

अरोड़ा ने हाईकोर्ट से मांग की है कि ऐसे अमीर किसानों जिनमें मुख्यमंत्री सहित अन्य मंत्री और पूर्व मंत्री, आई.ए.एस. और आई.पी.एस. भी शामिल हैं, उन्हें इस सबसिडी का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। यह सब्सिडी सिर्फ गरीब और जरूरतमंद किसानों को ही दी जानी चाहिए। इनको मिल रही सब्सिडी तत्काल प्रभाव से बंद की जानी चाहिए।

केवल जरुरतमंदों को ही मिले सब्सिडी का लाभ

अरोड़ा ने कहा कि एक ओर सरकार अपने वित्तीय संकट का रोना रो रही है और अपने कर्मियों तक को समय पर वेतन नहीं दे पा रही है। दूसरी ओर खुद मंत्री, नेता और बड़े-बड़े अधिकारी अपने खेतों में मुफ्त में बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और यह राशि सरकार के खजाने से पी.एस.पी.सी.एल. को जारी की जा रही है।

लिहाजा किसे सब्सिडी दी जाए और किसे नहीं सरकार पहले इसे तय करे। इस सब्सिडी से क्रीमी लेयर को बाहर करे और जरूरतमंदों को ही सब्सिडी दी जाए, इससे सरकारी खजाने को भी राहत मिलेगी।

किसानो की जरूरत के हिसाब से बनाई गई है ये अनोखी बाइक, जाने कितनी होगी कीमत

कहते है की आवशकता ही अविष्कार की जननी है । ऐसे ही किसानो की जरूरत के हिसाब से त्यार क्या गया है यह लीफान तिपहिया कार्गो (lifan cargo tricycle) । इसमें लीफान के इंजन के साथ एक ट्राली जुडी हुई होती है ।

यह 800 किल्लो तक का वजन उठा कर 80 किल्लो मीटर की स्पीड से भाग सकता है । इसकी चैसी फ्रेम और कार्गो बॉक्स मजबूत होता है। इसका इंजन एक सिलेंडर होता है ।यह पेट्रोल से चलता है गियर शिफ़्ट में इसके 5 आगे + 1 रिवर्स होता है ।

यह तीन मॉडल (175cc , 200cc , 150cc ,250cc ) में आता है । 150cc वाले लीफान इंजन कार्गो 3 व्हीलर मोटरसाइकिल थोक कीमत 36000 रुपये है । जो की मॉडल के हिसाब से बढ़ती रहती है ।

फ़िलहाल ये भारत में नहीं मिलता पर जल्द ही ये भारत में लांच होने जा रहा है , चीन की दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी लिफान ने इस साल भारत में मोटरसाइकिल निर्माण कारखाना लगाने का इरादा जताया है। इस प्रकार विश्व के दूसरे नंबर के विशालतम दोपहिया बाजार में चीन की पहली कंपनी का प्रवेश हो जाएगा।

कंपनी के उप महाप्रबंधक चू श्याओमन ने यहां बताया कि कंपनी फैक्ट्री लगाने के लिए करीब 180 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। कारखाना संयुक्त उपक्रम में लगाया जाएगा। उन्होंने बताया कि संभवत: पुणे में एक इंजन निर्माण संयंत्र भी लगाया जाएगा।

सूखे इलाकों में पैसे कमाना है तो करें लेमनग्रास की खेती, खेती और बिक्री की पूरी जानकारी

एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन-टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल (तेल) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है।

इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है। लेमनग्रास को नींबू घास, मालाबार या कोचिन घास भी कहते हैं। भारत समेत ये उन देशों में पाया जाता है जहां की जलवायु गर्म है।

भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता है, जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है उसमें एक लेनमग्रास भी है।

लेमनग्रास की खेती सूखा प्रभावित इलाकों जैसे मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड तक में की जा रही है। सीमैप के गुणाभाग और शोध के मुताबिक एक हेक्टेयर लेमनग्रास की खेती में शुरु में 30000 से 40000 हजार की लागत आती है।

एक बार फसल लगाने के बाद साल में 3 से 4 कटाई ली जा सकती हैं, जिससे करीब 100-150 किलो तेल निकलता है। इस तरह से एक लाख से एक लाख 60 हजार तक आमदनी हो सकती है, खर्चा निकालने के बाद एक हेक्टेयर में किसान को प्रतिवर्ष 70 हजार से एक लाख 20 हजार तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है।

मेंथा और खस की तरह ही लेमनग्रास की पेराई होती है, और पेराई संयंत्र भी लगभग एक जैसा ही होता है। पत्तियां काटकर उन्हें टंकी में भरकर आसवन किया जाता है।

नर्सरी, रोपाई और निराई-गुड़ाई

लेमनग्रास की जड़ लगाई जाती है, जिसके लिए पहले नर्सरी तैयार की जाए तो लागत कम हो सकती है। अप्रैल से लेकर मई तक इसकी नर्सरी तैयार की जाती है, एक हेक्टेयर की नर्सरी के लिए लेमनग्रास के करीब 10 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 55-60 दिन में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।

यानि जुलाई अगस्त में तैयार नर्सरी यानि स्लिप (जड़ समेत एक पत्ती) को कतार में 2-2 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। हर तरह की मिट्टी और जलवायु में पैदा होनी वाली इस फसल में गोबर की खाद और लकड़ी की राख सबसे ज्यादा फायदा करती है। लेमनग्रास को ज्यादा निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं होती, साल में दो से तीन निराई गुड़ाई पर्याप्त हैं।

ज्यादा सूखे इलाकों में पूरे साल में 8-10 सिंचाई की जरुरत होगी। उत्तर प्रदेश में ऐसी फसलों पर शोध के लिए कन्नौज में सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) है। यहां के अवर शोधकर्ता कमलेश कुमार ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन को इसके फायदे गिनाते हुए बताया, इसकी पत्ती से लेमन-टी यानि नीबू चाय के साथ साबुन, निरमा, डिटर्जेंट, तेल, हेयर आयल, मच्छर लोशन, सिरदर्द की दवा व कास्मेटिक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है।”

यूपी में सीतापुर जिले के बंभौरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हर्षचंद वर्मा के मुताबिक इसमें कीट-पतंगे रोग नहीं लगते हैं, लेकिन एक कोई रोक का प्रकोप दिखे तो नीम की पत्तियों को गोमूत्र में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक लेमग्रास का तेल जिस परफ्यूम,डियो या क्रीम आदि में पड़ा होता है उसके उपयोग से लोगों में ताजगी आ जाती है। चीन में कहीं-कहीं पर इसे सिरदर्द ,पेटदर्द में उपयोग करते हैं, इसके कुछ गुण मुंहासे ठीक करने में भी काम आते हैं। भारत में सर्दी जुखाम के दौरान काफी लोग इसका गाढ़ा पीते हैं।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कई राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हो रही है।

लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित

  • प्रति हेक्टेयर सलाना लागत- 40,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 30,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • कुल उत्पादन से कमाई- 1,60,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 1,00,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • शुद्ध मुनाफा (सालाना) 1,20,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 70.000 रुपए (बिना सिंचाई)

लेमनग्रास के तेल का उपयोग

लेमनग्रास का सबसे ज्यादा उपयोग परफ्यूम उद्योग में होता है। इसके साथ ही, तेल, डिटर्जेट, वांशिग पाउडर, हेयर आयर मच्छर लोशन, कास्मेटिक, सिरदर्द की दवा समेत कई प्रोडक्ट में इस्तेमाल होता है

गर्मियों में इन बातों का रखे ध्यान, नहीं घटेगा दूध उत्पादन

गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। इस मौसम में ज्यादातर पशुपालक पशुओं के खान-पान पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, जिससे दूध उत्पादन घट जाता है। इसलिए इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल बहुत जरूरी है।

पशुचिकित्सक डॉ रुहेला बताती हैं “पशुओं को दिन में तीन से चार बार पानी पिलायें, उतनी बार ताजा पानी दें। सुबह और शाम नहलाना जरूरी है। गर्मियों में पशुओं का दूध घट जाता है इसलिए इनके खान-पान का विशेष ध्यान दें हरा चारा और मिनिरल मिक्चर दें इससे पशु का दूध उत्पादन नहीं घटेगा। इस मौसम पशुओं को गलाघोटू बीमारी का टीका लगवा लें। यह टीका नजदीकी पशुचिकित्सालय में दो रुपए लगता है।”

गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है। अधिक समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है। इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधे। इस मौसम में नवजात बच्चों की भी देखभाल जरूर करें। अगर पशुपालक उनका ढंग से ख्याल नहीं रखता है तो उसको आगे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • सीधे तेज धूप और लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए ।
  • नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से सारा म्यूकस (लेझा बेझा) बाहर निकाल देना चहिए।
  • यदि बच्चे को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो तो उसके मुंह से मुंह लगा कर सांस प्रक्रिया को ठीक से काम करने देने में सहायता पहुंचानी चहिए।
  • नवजात बछड़े का नाभि उपचार करने के तहत उसकी नाभिनाल को शरीर से आधा इंच छोड़ कर साफ धागे से कस कर बांध देना चहिए।

  • बंधे स्थान के ठीक नीचे नाभिनाल को स्प्रिट से साफ करने के बाद नये और स्प्रिट की मदद से कीटाणु रहित किये हुए ब्लेड की मदद से काट देना चहिए। कटे हुई जगह पर खून बहना रोकने के लिए टिंक्चर आयोडीन दवा लगा देनी चहिए।
  • नवजात बछड़े को जन्म के आधे घंटे के अंदर खीस पिलाना बेहद जरूरी होता है। यह खीस बच्चे के भीतर बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
  • अगर कभी बच्चे को जन्म देने के बाद मां की मृत्यु हो जाती है तो कृत्रिम खीस का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए एक अंडे को फेंटने के बाद 300 मिलीलीटर पानी में मिला देते हैं । इस मिश्रण में 1/2 छोटा चम्मच अरेंडी का तेल और 600 मिली लीटर सम्पूर्ण दूध मिला देते हैं। इस मिश्रण को एक दिन में 3 बार 3-4 दिनों तक पिलाना चहिए।इसके बाद यदि संभव हो तो नवजात बछड़े/बछिया का नाप जोख कर लें। साथ ही यह भी ध्यान दें कि कहीं बच्चे में कोई असामान्यता तो नहीं है। इसके बाद बछड़े/बछिया के कान में उसकी पहचान का नंबर डाल दें।

नवजात बछड़े/बछिया का आहार

नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध यानी खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है।

यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा चारा-भूसा पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है।

बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।

इस तरह करें रेशम की खेती, एक एकड़ में होगी 6 लाख की कमाई

रेशम की खेती ऐसा व्यवसाय है जिसमें किसान काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। दुनिया के कुल कच्चे रेशम में से 14 फीसदी भारत में उत्पादित होता है। रेशम की चारों वैराइटी उत्पादित करने के कारण दुनिया में भारत का अलग स्थान है।

खास ही नहीं आम लोगों के बीच भी सिल्क के परिधान काफी डिमांड में रहते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान इस खेती से जुड़ रहे हैं। इस खेती को Sericulture कहा जाता है और इसमें काफी मुनाफा कमाया जा सकता है।

ऐसे कर सकते हैं रेशम की खेती

इस खेती में सिल्कवर्म यानी रेशम के कीड़ों को पाला जाता है और मल्बरी यानी शहतूत के पौधों को उगाया जाता है। रेशम के कीड़े इसी पेड़ के पत्तों को खाकर रेशम बनाते हैं। रेशम के कीड़े पालने के लिए आपको 1200 से 1400 वर्ग मीटर के शेड की जरूरत पड़ेगी।

इसके साथ ही आपको तकरीबन एक एकड़ जमीन में शहतूत के पेड़ लगाने होंगे। एक बार में आप तकरीबन इन कीड़ों के 200 अंडे रख सकते हैं। एक साल में दस बार अंडे रखे जा सकते हैं। यानी एक साल में दस बैच में रेशम निकल सकता है।

इतना आएगा सालाना खर्च

रेशम के कीड़े पालने में शेड बनाने, नेट खरीदने और मेहनताना मिलाकर लगभग 1.50 लाख रुपए का खर्च आए। शहतूत की खेती में आपको खाद, पानी, पौधे सब मिलाकर तकरीबन 20 हजार रुपए खर्च करने होंगे। यह खर्च एक बार का है।

इसके बाद रेशम के कीड़ों के अंड़ों के प्रबंधन में आपको 60 हजार और खर्च करने पड़ेंगे। यानी शुरुआत में आपको लगभग 2.30 लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे। इसके बाद आपको सिर्फ 60 हजार रुपए सालाना खर्च करने होंगे।

होगी इतनी कमाई

10 अंड़ों में से आपको 7 किग्रा रेशम मिलेगा। एक साल में आपको एक शेड में से दस बैच में 2000 अंड़े मिलेंगे। केंद्रीय सिल्क बोर्ड के मुताबिक वर्तमान में बाजार में रेशम के कीड़े के कुकून 300 से 500 रुपए प्रति किलो के बीच बिक्री हो जाता है।

ऐसे में आप 2000 अंड़ों से औसतन 5.50 से 6 लाख रुपए तब कमा सकते हैं। साल के 60 हजार खर्च को हटाने के बाद आपको 5 से 5.40 लाख रुपए की आय हो सकती है। यह सिर्फ शुरुआती अनुमान है। धीरे-धीरे पेड़ों के बड़ो होने के साथ आप रेशम के कीड़ों की संख्या भी बढ़ा सकते हैं।

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

जानिए कैसे किसान सतनाम बने एक बीघे की फसल से करोड़पति

डबरा मध्यप्रदेश के गांव गंगाबाग़ के निवासी सरदार सतनाम अपने एक बीघा खेत को 15 साल के लिए सागौन के 500 पौधों के नाम कर दिया। उसकी उन्होंने मन लगाकर देखभाल किया। आज सतनाम की मेहनत के बरदौलत सागौन के ये सभी पौधे जवान हो चुके है।

वर्तमान समय में प्रति पौधों की कीमत न्यूनतम 20000 रूपये आकी जा रही है। अब इन्ही पौधों की बरदौलत सतनाम ने एक करोड़ का इंतजाम कर लिया है. और इन्ही के सहारे उन्होंने अपने परिवार के जीवन में सुख और समिर्धि की एक नई आस जगा दी है। सतनाम की यह युक्ति अन्य किसानो के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है.

1 बीघा खेत में 600 पौधे लगाए

किसान ने 15 साल पहले ही अपने एक बीघा खेत में ही सागौन के 600 पौधों को लगया था. वे इन पौधों को लगाने के सबसे पहले वे शासन और प्रशासन से मदद मांगी थी. लेकिन उन्हें वहां से कोई मदद नहीं मिली।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वे अपने में ठान लिया की उन्हें इन पौधों की देखभाल करना है. और लगातार 15 सालो से अपनी बेजोड़ मेहनत के बरदौलत आज अपने 1 बीघे खेत में 500 पेड़ खड़े कर रखे है. इस समय 1 पेड़ की कीमत 20000 रूपये मिल रही है. जब ये पौधे और बड़े होंगे तो उनकी कीमत और भी मिलेगी।

सागौन की खेती करे

गांव में ऐसे भी कई किसान है जो केवल गेंहू और धान की खेती पर निर्भर है. लेकिन सूखा पड़ने पर सभी के सामने आर्थिक संकट आ जाता है. उन्होंने बताया की पिछले साल भी गांव में सूखा पढ़ा था। सूखे के स्थित में यदि किसान के पास एक पुख्ता धनराशि हो तो वह इस सूखे से निपट सकता है। मै अब तो गांव गांव जाकर किसानो को सागौन की खेती करने का सलाह दे रहा हूँ..

5 साल में 20000 दे जाता है एक पौधा

सतनाम ने बताया के वे 2003 में 40 रूपये के हिसाब से उन्होंने 600 सागौन के पौधे ख़रीदे थे. और पौधों को लगाने के लिए गढ्ढे खुदवाये थे. उस समय ये सब करने में उनके लगभग 70000 हजार रूपये खर्च हो गए थे. उन्होंने बताया के पौधे लगाते समय उनसे एक गलती हो गई थी उनको पौधे लगभग 2 मीटर के दूरी पर लगाना था लेकिन पौधे पास पास लग गए थे.

इसके बाद पौधे कमजोर होकर टूट गए.मेरे लगभग 100 बेकार हो गए। लेकिन बचे 500 पौधे आज एक पेड़ बनकर तैयार है.  एक पेड़ लगभग 50 साल तक जीवित रहता है. इस दौरान वह बढ़ता चला जाता है और 5 साल में ही लगभग 20000 की कीमत दे जाता है..इस तरह सतनाम अपनी 15 साल की मेहनत से आज सतनाम करोड़पति हो चुके है

रूपये सीधे किसान के खाते में आते है

जिले पंचायत डबरा के सीईवो ज्ञानेंद्र का कहना है की सागौन के 200 पौधों के लगाने और देखभाल के लिए के लिए किसानो को डेढ़ लाख रूपये तक की मदद की जाती है. जो कि किसान के सीधे बैंक खाते में डाले जाते है लेकिन उस पर शासन एक शर्त भी होती कुल पौधों में से लगभग 50 फिसदी पौधे जीवित रहने चाहीए। पहले ये योजना कृषि विज्ञान केंद्र के पास थी लेकिन अब ये योजना जनपद पंचायत के पास हो गई है.

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं।
  • इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

अब हर छोटे किसान के घर होगा महिंद्रा का यह ट्रैक्टर, कंपनी ने किया ऐलान

महिंद्रा एंड महिंद्रा छोटे किसानों के लिए अब सौगात लेकर आने की तैयारी में है। महिंद्रा बहुत जल्द ऐसा ट्रैक्टर लाने की तैयारी कर रही है। जिसकी कीमत 2 लाख से भी कम होगी। हम इसे मिनी ट्रैक्टर कहकर संबोधित कर सकते हैं।

आपको बता दें,यह पहली बार नहीं है जब महिंद्रा कुछ नया करने जा रही है इससे पहले कंपनी ने युवराज का प्रयोग किया था। जो कि कामयाब नहीं रहा। भारत में लगभग 90 प्रतिशत छोटे किसान जिनके पास 5 एकड़ से कम की जमीन है

भारत में ऐसे बहुत से किसान हैं जो पैसे देकर जुताई करवाते हैं। महिंद्रा इस ट्रैक्टर के माध्यम से ऐसे ही किसानों को आकर्षित करना चाहता है। फिलहाल भारत में मौजूद ट्रैक्टर की कीमत लगभग 4 लाख तक होती है। ट्रैक्टर के जुताई के अलावा भी कई काम होते हैं जिनमें खाद ढ़ोना, ट्रॉली में सामान ढ़ोना,आदि हैं

महिंद्रा के प्रबंध निदेशक पवन गोयनका ने अपने बयान कहा कि कंपनी का मकसद उन किसानों को कार्यक्षमता वाला ट्रैक्टर प्रदान करना था जो बाजार में मौजूद महंगी मशीन खरीदने में सक्षम नहीं हैं। इस ट्रैक्टर से 5 एकड़ से कम की खेती करने वाले किसान भी इस्तेमाल कर सकते हैं।