बिहार के किसानों ने सूखे में ही ऊगा दी स्ट्रॉबेरी की खेती, अब एक बीघे से होती है 2.5 से 3 लाख की कमाई

बिहार का एक छोटा सा गांव है चिल्हाकी बीघा जो एक सूखा प्रभावित क्षेत्र के अंतर्गत आता है, यहां सिर्फ 60 घर हैं। यह गांव रबी, गेहूं, दालों, सरसों और सब्ज़ियों की खेती के लिए जाना जाता था। कृषि के अवसर होने के बावजूद गांव के लोग अक्सर पलायन कर जाते हैं क्योंकि उन्हें कृषि से कम ही लाभ मिल पाता है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस गांव में, जो न तो हिल स्टेशन है और न ही यहाँ की ज़मीन ही उपजाऊ है परन्तु यहाँ के लोगों ने स्ट्रॉबेरीज की फसल उगाने में सफलता प्राप्त की है। इससे गांव वालों के न केवल लाभ की सीमा में बढ़ोत्तरी हुई है बल्कि इस अविकसित इलाक़े में रोजगार के अवसर में भी वृद्धि हुई है।

इस गांव में यह परिवर्तन बृजकिशोर मेहता के बेटे गुड्डू कुमार की वजह से आया जो हरियाणा के हिसार में एक फार्म में काम करता है। जब बृजकिशोर ने अपने बेटे से हिसार के उसके काम के बारे में पूछा तब उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में बताया।

इस गांव की जलवायु हिसार से काफ़ी मिलती जुलती थी। बृजकिशोर ने इसीलिए इसे लगाने के बारे में सोचा। जोखिम लेने से पूर्व बृजकिशोर औरंगाबाद के कृषि विज्ञान केंद्र गए। उन्होंने बृजकिशोर को समस्तीपुर जिले के सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी इन पूसा जाने की सलाह दी। वहां पर कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि बिहार में स्ट्रॉबेरी की खेती करना असंभव है। बृजकिशोर यह सुनकर दुःखी और निराश हो गए।

यह सब सुनकर भी बृजकिशोर जोख़िम लेने पर अड़े थे। वे अपने बेटे के साथ हिसार के किसानों से मिले। आख़िर में उन्होंने अपने फार्म में 2013 में स्ट्रॉबेरी के सात पौधे लगाए।

स्ट्रॉबेरी की खेती की सफलता को देखकर गांव के लोगों ने भी बृजकिशोर से सलाह लेकर इसकी खेती प्रारम्भ कर दी। यह बदलाव पूरे गांव और आस-पास के क्षेत्रों में पहुंच गया और इससे खेती में फायदा भी होने लगा। गांव के लोग जो पलायन कर बाहर चले गए थे वे भी वापस लौटने लगे।

विलेज स्क्वायर से बातचीत के दौरान एक स्थानीय निवासी प्रेमानंद कुमार कहते हैं, “ मैं बहुत खुश हूँ कि मैं इससे महीने में 7000 रुपये कमा लेता हूँ।”

आज ब्रजकिशोर और उनके तीन लड़के ने अपने काम के लिए 15 परमानेंट कर्मचारी और 30 टेंप्रेरी कर्मचारी रखे हुए हैं। वे अपने दो बीघा जमीन के अलावा लीज में 6 बीघा जमीन लेकर स्ट्रॉबेरी बो रहे हैं। पड़ोसी गांवों की बहुत सारी महिलाओं को भी इस गांव में नौकरी मिल रही है। उन्हें इसके लिए 1 दिन का ₹200 और खाना मिल रहा है।

कुछ किसान स्ट्रॉबेरी की खेती लगाने से जुड़े जोखिम से डरे हुए हैं क्योंकि इसमें शुरूआती इन्वेस्टमेंट और जमीन की तैयारी की काफी जरूरत होती है अगर यह अच्छे से हो गया तो बेहतर लाभ प्राप्त होता है। शुरुआत में इस गांव में स्ट्रॉबेरी के वितरण को लेकर बड़ी चुनौती थी क्योंकि खरीददार विश्वास ही नहीं कर पाते थे कि यह बिहार में संभव है। पर जैसे-जैसे संख्या बढ़ी, व्यापारियों ने खरीदने से मना कर दिया।

इस स्थिति को देखते हुए किसानों कीमत घटाकर स्ट्रॉबेरी बेचने लगे। वह ₹200 और ₹300 प्रति किलो की दर से होलसेल व्यापारियों को बेचते थे। आखिर में बहुत संघर्ष के बाद व्यापारियों ने गांव वालों के लिए मदद का हाथ बढ़ाया। कोलकाता से 10 व्यापारियों ने जो होलसेल फ्रूट मार्केट से आते थे वह सीधे चिल्हाकी बीघा के खेतों से ताजे स्ट्रोबेरी रोजाना ले जाते थे।

इस गांव में और आस-पास के क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी की खेती की डिमांड बढ़ने लगी। इससे गांव वालों को बहुत फायदा पहुंचने लगा। यहां के किसान कम समय में एक बीघे से 2.5 से 3 लाख तक कमा लेते थे। इस खेती का कांसेप्ट कृषि के किसी भी रिसर्च पेपर में नहीं मिलता था। वहां के कृषि विज्ञान केंद्र ने चिल्हाकी बीघा गांव के कुछ किसानों के स्ट्रॉबेरी की खेती के मॉडल को लेकर ट्रेनिंग की शुरुआत की। वे खेती की प्लानिंग और खेती से जुड़ी हर चीज में किसानों की हर संभव मदद करने लगे।

किसानों द्वारा पैदा की गई सोयाबीन अमेरिका-ईरान की लड़ाई में इस तरह भारत को करा रही है अरबों की कमाई

एक तरफ अमेरिका और ईरान आपस में बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं भारत सरकार के लिए यह लड़ाई बड़ी कमाई या सेविंग का सौदा साबित हो रही है। भारत जहां ईरान से सब्सिडी पर कच्चा तेल खरीद रहा है, वहीं उसकी कीमत के बदले बड़े स्तर पर सोयाबीन का निर्यात कर रहा है।

स्थिति यह हो गई है कि अगर इसी तरह निर्यात जारी रहता है तो भारत से ईरान के लिए सोयाबीन का निर्यात 20 गुना बढ़ सकता है। निश्चित तौर पर इससे सरकार के साथ ही भारत के किसानों को भी फायदा होगा।

ईरान में पैदा नहीं होता सोयाबीन

अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान रुपए के बदले में दुनिया के तीसरे बड़े ऑयल कंज्यूमर भारत को कच्चे तेल का निर्यात करने को राजी हो गया था। तेल के मामले में संपन्न ईरान को इस रुपए को भारतीय गुड्स खरीदने पर खर्च करना होगा।

वहीं ईरान प्रोटीन रिच सोयाबीन का घरेलू स्तर पर उत्पादन नहीं करता है। सोयाबीन के भारी निर्यात से भारत में सोयाबीन की कीमतों को सपोर्ट मिलेगा और किसानों की शिकायतें सीमित होंगी। किसान लगातार सरकार के कम कीमतों के कारण राहत देने की मांग कर रहे हैं। सरकार को भी मई में आम चुनाव के लिए पब्लिक के बीच जाना होगा।

20 गुना हो सकता है निर्यात

एसईए के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी. वी. मेहता ने कहा कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान ईरान के लिए भारत का सोयाबीन एक्सपोर्ट बढ़कर 4.50 लाख टन तक पहुंच सकता है, जबकि बीते वित्त वर्ष में यह महज 22,910 टन ही रहा था। उन्होंने कहा कि अगर ईरान पर प्रतिबंध जारी रहते हैं तो अगले वित्त वर्ष यानी 2019-20 में यह 5 लाख टन पहुंच सकता है।

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

किसान ने विकसित की वो तकनीक,जिससे हर घर कमा सकता है महीने के 50 हजार रु

तकनीकी के मामले में इजरायल दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देश इस छोटे से देश से सीखने जाते हैं। लेकिन भारत का एक किसान है, इजरायल के लोग उससे सीखने आते हैं। इस किसान ने जो तकनीकी विकसित की है अब वो इजरायल में लागू की जा रही है।

इस हाईटेक तकनीकी का नाम ‘चोका सिस्टम’ है। यह एक ऐसी तकनीकी है जिसे देश के हर कोने, हर गांव का किसान अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। शायद यही वजह है कि इजरायल में भी लोकप्रिय हो रही है। ये तकनीक है किसान को कमाई कराने की, उसे गांव में ही रोजगार देने, पानी बचाने की और जमीन को सही रखने की। इस किसान की माने तो यही तो तकनीकी है जिसके सहारे गायों को लाभकारी बनाने हुए उन्हें बचाया भी जा सकता है।

‘चोका सिस्टम’ की जिस गांव से शुरुआत हुई है वहां हर घर सिर्फ दूध के कारोबार से हर महीने 10 से 50 हजार रुपए कमाता है।इजरायल को ज्ञान देने वाले इस किसान का नाम है लक्ष्मण सिंह। 62 साल के लक्ष्णम सिंह राजस्थान के जयपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर लाहोडिया गांव के रहने वाले हैं।

ये गांव कभी भीषण सूखे का शिकार था।गरीबी और जागरुकता की कमी के चलते यहां आए दिन लड़ाई दंगे होते रहते हैं, युवा गांव छोड़-छोड़ शहर में मजदूरी करने को मजबूर हो रहे थे।

करीब 40 साल पहले लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव को बचाने के लिए मुहिम शुरु की। बदलाव रंग भी लाया कि आज इजरायल जैसा देश इस गांव का मुरीद है। आज लापोडि़या समेत राजस्थान के 58 गांव चोका सिस्टम की बदौलत तरक्की की ओर है। यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है। किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। पशुपालन करते हैं। और पैसा कमाते हैं। 350 घर वाले इस गांव में आज 2000 के करीब आबादी रहती है।

चोका सिस्टम से पशुओं को घास मिलती है और जलस्तर ठीक रहता है

गांव के विकास के लिए रुपयों की कम से कम जरुरत पड़े इसके लिए श्रमदान का सहारा लिया गया। गांव के लोगों को इससे जोड़ने के लिए 1977 में उन्होंने ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोडिया रखा। इस समूह को ये जिम्मेदारी दी गयी कि गांव के हर किसी व्यक्ति में ये भाव पैदा करना है कि वो अपने गांव का मजदूर नहीं बल्कि मालिक है।

ऐसे बनता है ‘चोका सिस्टम’

चोका सिस्टम हर पंचायत की सार्वजनिक जमीनों पर बनता है। एक ग्राम पंचायत में 400 से 1,000 बीघा जमीन खाली पड़ी रहती है, इस खाली जमीन में चोका सिस्टम ग्राम पंचायत की सहभागिता से बनाया जाता है। खाली पड़ी जमीन में जहां बरसात का नौ इंच पानी रुक सके वहां तीन चौड़ी मेड (दीवार) बनाते हैं, मुख्य मेड 220 फिट लम्बाई की होती है और दोनों साइड की दीवारे 150-150 फिट लम्बी होती हैं।

इस गांव में अब नहीं होती है अब कभी पानी की कमी

भूमि का लेवल नौ इंच का करते हैं जिससे नौ इंच ही पानी रुक सके इससे घास नहीं सड़ेगी। इससे ज्यादा अगर पानी रुका तो घास जमेगी नहीं। हर दो बीघा में एक चोका सिस्टम बनता है, एक हेक्टेयर में दो से तीन चोका बन सकते हैं। एक बारिश के बाद धामन घास का बीज इस चोका में डाल देते हैं इसके बाद ट्रैक्टर से दो जुताई कर दी जाती है।

सालभर इसमें पशुओं के चरने की घास रहती है। इस घास के बीज के अलावा देसी बबूल, खेजड़ी, बेर जैसे कई और पेड़ों के भी बीज डाल जाते हैं। चोका सिस्टम के आसपास कई नालियां बना दी जाती हैं। जिसमें बरसात का पानी रुक सके। जिससे मवेशी चोका में चरकर नालियों में पानी पी सकें।

एक बिहारी पड़ा थाइलैंड और जापान पर भारी

एक बिहारी सब पर भारी वाली कहावत तो आप ने सुनी होगी वहीं एक बिहारी किसान ने गन्ने के उत्पादन का रिकॉर्ड तोड़ा जिसका लोहा आज थाइलैंड और जापान भी मान रहे हैं। वैसे ये यकीन करना थोड़ा मुश्किल है क्यूंकि जहां गन्ने का प्रति एकड़ औसत उत्पादन 250 से 500 क्विंटल तक हो, वहां कोई 1018 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर सकता है। पर ऐसा एक बिहारी किसान ने कर दिखाया

दो दशक पूर्व मैट्रिक पास करने के बाद जिसे रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा था आज उसके खेतों की फल-सब्जियां बिक्री के लिए सीधे मॉल जा रही हैं। अपनी दो दशकों की मेहनत से उन्होंने न केवल अपनी बल्कि गांव के लोगों की जीवन दशा में बदलाव की पटकथा भी लिखी है।

इस बिहारी किसान की थाईलैंड-जापान यात्रा वाया हरियाणा शुरू हुई। मुजफ्फरपुर के छोटे से कस्बे सकरा के रहने वाले दिनेश प्रसाद ने मैट्रिक तक चंदनपट्टी हाईस्कूल में पढ़ाई की। बात 1996 की है। बिहारी मजदूरों का पलायन हो रहा था।

दिनेश भी गांव के लोगों के साथ रोजगार की तलाश में हरियाणा पहुंच गए। वहां के खेतों में बिहारी मजदूरों की तरह काम करने की बजाय उन्होंने बटाई पर खेती शुरू की। जैविक उर्वरक, जीरो टिलेज और सीड ट्रांसप्लांट तकनीक के इस्तेमाल से आधुनिक खेती की।

आरंभ में पांच एकड़ खेती के मुनाफे ने मनोबल बढ़ाया। आज हरियाणा में करीब 125 एकड़ और अपने गांव में 138 एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। गांव में तो उनकी मात्र आठ एकड़ भूमि है लेकिन 130 एकड़ जमीन लीज पर लेकर फलों और सब्जियों की आधुनिक और जैविक खेती से पैदावार का रिकॉर्ड बनाया। छह वर्षों के दौरान दिनेश प्रसाद ने हरियाणा में उन्नत खेती का ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया कि वे राज्य सरकार की नजर में आ गए।

दरअसल 2001 में हरियाणा सरकार ने चीनी मिलों से किसानों की सूची मंगाई थी। उस सूची में दिनेश प्रसाद एकलौते किसान थे जिन्होंने एक एकड़ में 1018 क्विंटल गन्ना उपजाकर चीनी मिल को बेचा था।

हरियाणा सरकार के नुमाइंदे दिनेश के खेत पहुंचे। उन्हें मंच पर आमंत्रित कर वहां के मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया। इसके बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने गांव सकरा में हरियाणा पैटर्न पर पहले अपनी जमीन पर ही खेती शुरू की।

पड़ोसी किसानों से बातचीत कर उन्हें भी आधुनिक कृषि के लिए प्रेरित किया। अब गांव में अपनी आठ एकड़ भूमि के अलावा करीब 130 एकड़ लीज जमीन पर फल- सब्जी उपजा रहे हैं। आधुनिक और जैविक खेती की शोहरत फैली तो रिलायंस फ्रेश सहित अन्य कृषि उत्पाद का कारोबार करने वाली कंपनियों ने दिनेश प्रसाद से उनकी उपज खरीदने का करार कर लिया। अब इनके खेत की सब्जी और फल सीधे एग्री-मार्केट और मॉल में पहुंच रहे हैं।

तीन महीने जापान में रहे : हरियाणा सरकार से सम्मान मिलने के बाद दिनेश प्रसाद पर केंद्र सरकार की नजर भी गई। 2003 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन्हें कृषि के क्षेत्र में अपने अनुभव व शोध साझा करने के लिए जापान भेजा।

करीब तीन माह तक दोभाषिये (ट्रांसलेटर) के साथ जापान में कृषि विकास का अध्ययन किया। 2006 में थाइलैंड जाकर उन्होंने वहां खेती के आधुनिक तौर तरीकों का अध्ययन किया। अमरूद, केला, पपीता, कंद, पुदीना, धनिया, गेहूं, गन्ना, बाजरा से लेकर वे ऐसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं।

किसानो को लखपति बना रही है अमरुद की यह नई किसम VNR BIHI

इन दि‍नों इंसान के सि‍र जि‍तने मोटे अमरूद ने बाजार में काफी हलचल मचा रखी है। एक अमरूद का वजन डेढ़ कि‍लो तक पहुंच जाता है और इसकी पैदावार करने वाले कि‍सानों का माल हाथोंहाथ बि‍क रहा है।

यह भारी भरकम अमरूद न केवल देखने में सुंदर लगता है बल्‍कि इसका टेस्‍ट भी बेहतरीन है। अमरूद की इस कि‍स्‍म का नाम है VNR BIHI जि‍सने कई कि‍सानों को मालामाल कर दि‍या है। जि‍न भी इलाकों में यह पैदा हो रहा है वहां इसकी काफी मांग है। इसकी कीमत 150 रुपए से लेकर 370 रुपए कि‍लो तक है।

प्राइवेट जॉब छोड़ शुरू की खेती

नीरज एक सॉफ्टवेयर इंजीनि‍यर थे मगर अब वह जींद के संगतपुरा गांव में खेतीबाड़ी करते हैं। वह इस अमरूद की बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। इन्‍होंने अमरूद के करीब 1600 पेड़ लगाए हैं और साल में दो बार फसल लेते हैं।

एक पेड़ पूरे साल में 75 से 100 कि‍लो अमरूद देता है। नीरज ऑनलाइन इनकी सप्‍लाई करते हैं। वह एक पैकेट 555 रुपए में देते हैं जि‍समें आमतौर पर तीन अमरूद होते हैं, जि‍नका कुल वजन 1600 ग्राम से 1800 ग्राम होता है।

कैसे की जाती है इसकी खेती

इसकी खेती करना आसान काम नहीं है। काफी रखरखाव करना होगा। जब फल आते हैं तब खासतौर पर देखभाल करनी होती है। फलों की बैगिंग करनी होती है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में होनी चाहि‍ए। नीरज कि‍सानों को इस पौधे को लगाने और रखरखाव की ट्रेनिंग भी देते हैं, मगर ये फ्री नहीं है। वह इसके लि‍ए फीस लेते हैं। ट्रेनिंग आमतौर पर दो दि‍न की होती है।

कहां से मि‍ल सकता है पौधा

अमरूद की यह प्रजाति वैसे तो थाईलैंड से आई है। यहां अभी इसकी पौध मि‍लती है। इसे आप डायरेक्‍ट VNR की नर्सरी से खरीद सकते हैं। कंपनी की वेबसाइट पर रेट सहि‍त इसकी पूरी जानकारी दी गई है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबि‍क, अगर आप 1 से 10 पौधे लेते हैं तो प्रति पौधा इसकी कीमत 330 रुपए है। पौधों की गि‍नती बढ़ने पर रेट कम हो जाते हैं।

द्विफसलीय चक्र से निकले किसान मछली पालन से कमा रहे है मोटा मुनाफा, एक एकड़ के पौंड से ही सवा लाख की तक कमाई

जिले के जिन किसानों ने धान-गेहूं के द्विफसलीय चक्र से निकलकर मछली पालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाया, वह आज मोटा मुनाफा ले रहे हैं।

पंजाब सरकार के डायवर्सिफिकेशन आैर तंदुरुस्त पंजाब अभियान के तहत डीसी पटियाला ने आसपास के क्षेत्रों में हो रहे मछली पालन की समीक्षा के लिए मछली पालन विभाग के अधिकारियों से मीटिंग की। जिले के गांव सुनियारहेड़ी के संजय इंदर सिंह चहल 22 एकड़ में पौंड बनाकर मछली पाल रहे हैं। 1987 से वह सफलतापूर्वक इस काम में लगे हैं।

ऐसे ही राजपुरा के गांव ढींढसा के परमजीत सिंह ने 1997 में पांच एकड़ जमीन ठेेके पर लेकर मछली पालन शुरू किया। 2008 में 10 एकड़ जमीन और लेकर मछली पालन के वैज्ञानिक तरीके को अपनाया। इसी क्रम में नानोकी गांव के रणजोध सिंह 19 एकड़ में और अवतार सिंह सात एकड़ में मछली उत्पादन कर रहे हैं। कुमार अमित बताते हैं कि ढ़ाई एकड़ के तालाब के लिए सरकार 7 लाख रुपए तक का ऋण दे रही है इस पर 80 हजार रुपए सब्सिडी है।

मछली पालकों को पूंग फार्म बीड़ दोसांझ नाभा में पांच दिन की निशुल्क ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें छह किस्म की मछलियों का पूंग भी मार्च से सितंबर महीने में दिया जाता है। विभाग के सहायक निदेशक अमरजीत सिंह बताते हैं कि प्रति एकड़ एक लाख से सवा लाख रुपए की कमाई तय है। इस व्यवसाय में लागत कम होने से लाभ अधिक रहता है।

झींगा मछली पालन कर रहीं हरपिंदर, 6 साल में पुरुषों को पछाड़ा, 4 राज्यों की सबसे बड़ी उत्पादक
किसान झींगा मछली से मोटी कमाई कर रहे हैं। इस सूची में सबसे ऊपर मुक्तसर के गांव छापियांवाली की महिला किसान हरपिंदर कौर हैं। हरपिंदर कौर ने बताया कि जमीन सेम प्रभावित होने से आमदनी नहीं थी। 2012 से मछली पालन शुरू किया था।

2017 में झींगा मछली का पालन शुरू किया आैर पहली बार 3.5 एकड़ में अच्छी पैदावार की। अब 14 एकड़ में पौंड है। 2017 में 14.80 टन पैदावार कर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली में सबसे ज्यादा पैदावार करने वाली किसान बनीं। मुक्तसर के गांव छापियांवाली में 14 एकड़ में बना रखा है पौंड

5 से 6 लाख रुपए प्रति एकड़ कमा रही हैं मुनाफा

हरपिंदर के अनुसार झींगा मछली से 12 से 14 लाख रुपए प्रति ऐकड़ मुनाफा आता है। सभी खर्च निकाल वह हर साल प्रति एकड़ में 5 से 6 लाख रुपए बचा रही हैं। हरपिंदर कौर के पति फतेह सिंह ने बताया कि पत्नी 2018 में हुए राज्य स्तरीय प्रोग्राम में सम्मानित हो चुकी है। इसके अलावा जिला मुक्तसर के डीसी से भी सम्मानित हो चुकी है। 2014 में 15 टन मछली उत्पादन कर वह पुरुषों को भी पछाड़ चुकी हैं।

नौजवान किसानों का कमाल, इस खेती से सिर्फ 8 एकड़ ज़मीन से 6 महीनों में कमा लिए 35 लाख रूपये

पंजाब का नौजवान खेत में मेहनत कर विदेश गए युवकों से ज्यादा पैसा कमा रहा है वो भी 5 एकड़ से। इसकी मिसाल गांव मवी कलां के नौजवान गुरदीप सिंह एवं बलकार सिंह हैं। इनके पास 8 एकड़ जमीन है।

इसमें यह 5 साल से सर्दियों में करेला,तरबूज, कद्दू, धनिया, मटर की फसल से 6 महीने में ₹35 लाख कमा रहे हैं।  इन नौजवानों ने बताया कि पंजाब कि सरकार अगर उनकी सहायता करे तो वह आैर भी ज्यादा उत्पादन कर सकते हैं। अन्य नौजवान और किसान भी इसे देखकर उत्साहित होंगे।

नौजवान किसान बलकार सिंह गुरदीप सिंह ने बताया उनके बुजुर्ग पहले गेहूं की खेती करते थे, लेकिन उसमें सिर्फ 6 महीने में एक लाख से ज्यादा की कमाई नहीं होती थी। अब वह एक एकड़ में ₹10 लाख की कमाई 6 महीने में कर रहे हैं।

इससे वह धीरे-धीरे आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। सब्जी में अन्य फसलों से मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है लेकिन मुनाफा भी दुगना मिलता है।बागवानी विभाग समाना के अधिकारी डॉक्टर दिलप्रीत सिंह ने बताया कि सब्जी के काश्तकारों की भी सरकारी मदद हो रही है।

यह सच है कि कुछ सालों से सब्सिडी नहीं आ रही थी लेकिन इस साल सब्सिडी आ गई है। जो किसान सब्जी की खेती कर रहे हैं, उसको प्रति एकड़ 30,000 सब्सिडी मिलेगी।

किसानों को मिलेगा 3 लाख रुपए तक का बिना ब्याज लोन, इस तरीक को हो सकती है घोषणा

एनडीए सरकार संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र के लिए एक ऐसा पैकेज देने के प्रस्ताव पर काम कर रही है जिसके तहत ब्याज रहित और बिना गारंटी के कर्ज दिया जाएगा और आय बढ़ाई जाएगी।

सूत्रों का कहना है कि कृषि मंत्रालय इस बारे में नीति आयोग के साथ बातचीत करके एक ऐसी योजना बनाने वाले है जिसमें छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने और वित्तीय राहत प्रदान करने के उपाय शामिल होंगे। इसमें 3 लाख रुपये तक का ब्याज रहित कर्ज भी शामिल है।

सरकार फिलहाल उन किसानों को ब्यज रहित कर्ज मुहैया करवाती है जिन्होंने समय पर अपना कर्ज वापस कर दिया हो। बैंक ब्याज रहित कर्ज देने से हिकचते रहते हैं लेकिन माना जा रहा है कि वह सरकार का साथ देंगे यदि वह ब्याज की राशि का भुगतान करे। इस साल पेश होने वाले अंतरिम बजट में इस प्रस्ताव की घोषणा हो सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बैंक मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बातचीत कर रही है।

सरकार का दूसरा प्रस्ताव किसानों को बिना गारंटी के कर्ज उपलब्ध करवाने का है। इस कर्ज की राशि 2-3 लाख रुपये होगी। हालांकि बैंक तब तक बिना गारंटी के कर्ज देने को लेकर सहज नहीं है जबतक कि सरकार क्रेटिड गारंटी तंत्र को लागू नहीं करती है।

बैंकर्स और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया राज्यों द्वारा किए जाने वाली कर्जमाफी के खिलाफ हैं। आरबीआई के गवर्नर शशिकांत दास ने कहा था कि कर्जमाफी से क्रेडिट कल्चर और कर्जदाताओं के व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।वित्त मंत्रालय पहले ही सभी मंत्रालयों और विभागों से नई योजनाओं को लेकर उनकी फिंडिग जरूरतों के बारे में पूछ चुका है। ताकि वह फरवरी में पेश होने वाले बजट में उसे शामिल कर सके।

नई योजनाओं के लिए धन आवंटन से छोटे किसानों के लिए आय सहायता उपायों को शामिल करने की उम्मीद है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हालांकि सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि क्या सभी किसानों के ब्याज को माफ किया जाए या फिर केवल उनका जो समय पर कर्ज चुका देते हैं।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने एक योजना प्रस्तावित की है। सीबीआई की शोध रिपोर्ट के अनुसार, ‘किसानों की कर्जमाफी इस परेशानी का हल नहीं है। हमें किसानों की आय को बढ़ाना होगा। इसीलिए पूरे भारत में आय बढ़ाने वाली योजना को लागू करने की सख्त जरूरत है।’ देश में 21.6 करोड़ छोटे और मंझले किसान हैं। जिनमें से ज्यादातर कर्ज वापस करने या कर्ज के लिए गारंटी देने की स्थिति में नहीं हैं। इस तरह की योजना के जरिए उनकी जरूरतों को पूरा किया जाएगा।

अब फसलों के अवशेषों से भी होगी किसानों को कमाई, NTPC में पराली से बिजली का उत्पादन शुरू

धान की कटाई के बाद खेतों में पड़ी पराली के राष्ट्रीय समस्या बनकर सामने आती है. दिल्ली समेत आसपास के राज्यों के आसमान में घिरते घुएं के बाद और सैटेलाइट से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में जलते खेतों की तस्वीरें हर बार एक नई बहस को जन्म देती हैं. पराली और प्रदूषण एकदूसरे के पूरक बन गए हैं. सख्त कानून बनाने के बाद भी पराली जलाने की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है, क्योंकि इसे जलाना किसान के लिए मजबूरी है. लेकिन अब इस समस्या का समाधान खोज लिया गया है.

पराली से बिजली बनाई जा रही है. और नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) ने पराली से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है. दादरी (गाजियाबाद) स्थित एनटीपीसी की एक यूनिट में पराली से बिजली बनाई जा रही है.

एनटीपीसी के मुताबिक, धान की पराली और अन्य कृषि अवशेषों से बनी पेलेट्स से बिजली की निर्माण किया जा रहा है. हालांकि अभी पाराली समेत अन्य कृषि अवशेष की कम आपूर्ति होने के कारण बड़े स्तर पर बिजली का निर्माण नहीं हो पा रहा है. लेकिन आने वाले दिनों में पराली की पेलेट्स की आपूर्ति की समस्या को दूर कर लिया जाएगा. एनटीपीसी दादरी में सात फीसदी तक कोयला के साथ बायोमास पैलेट्स मिलाना सफल रहा है। इससे पावर प्लांट की सुरक्षा और क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा.

एनटीपीसी से मिली जानकारी के मुताबिक, देशभर में फैले एनटीपीसी के 21 ताप बिजली घरों में पराली और अन्य कृषि अवशेषों से बने पेलेट्ल से बिजली बनाने की योजना बनाई है. इन सभी पावर प्लांट्स की खपत क्षमता सालाना 19400 टन है. इस समय हर साल करीब 154 मिलियन टन कृषि अवशेष पैदा होता है.

यदि इसका इस्तेमाल एनटीपीसी में किया जाता है तो इससे 30 हजार मेगावाट बिजली पैदा होगी, जो डेढ़ लाख मेगावाट क्षमता के सोलर पैनल से होने वाले बिजली उत्पादन के बराबर है. इससे लगभग एक लाख करोड़ का बाज़ार खड़ा हो सकता है. पेलेट्स की आपूर्ति के लिए एनटीपीसी ने निविदा आमंत्रित की हैं. स्टार्टअप और अन्य उद्यमी www.ntpctender.com पर पंजीकरण कराकर फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं.

किसान भी बना रहे हैं बिजली

हालांकि एनटीपीसी ने तो बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन शुरू किया है, लेकिन कई स्थानों पर काफी समय से पराली से बिजली बनाने का काम हो रहा है. पंजाब के अबोहर में तो पराली से बिजली उत्पादन किया जा रहा है. अबोहर से करीब 25 किलोमीटर दूर गद्दाडोब गांव में एक फैक्टरी करीब पांच हजार किसानों की पराली खरीदकर बिजली बनाने का काम किया जा रहा है.