देश में दूध का कारोबार बढ़ाने के लिए सरकार उठाने जा रही है ये बड़ा कदम

भारत में डेयरी उद्योग को बढ़ाने तथा देशी नस्लों के संरक्षण और विकास के लिए सरकार राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केन्द्र बना रही है। इस योजना के तहत जहां एक तरफ भारत में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया जाएगा, वहीं दूसरी तरफ लोगों को दुधारू जानवरों के बारे में जागरूक भी किया जाएगा। लोगों को बताया जाएगा कि वे किस तरह अपने जानवरों को स्वस्थ रख सकते हैं।

सरकार स्वदेशी नस्लों के संरक्षण के लिए 50 करोड़ रुपए की लागत से देश में दो राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केन्द्र भी स्थापित किए हैं। राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केन्द्र पहला दक्षिणी क्षेत्र में चिन्तलदेवी, नेल्लोर में और दूसरा उत्तरी क्षेत्र इटारसी, होशंगाबाद में है। बता दें दोनों ही राज्य आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश को 25 करोड़ की राशि जारी की जा चुकी है।

राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केन्द्र का उद्देश्य

सरकार इस योजना के तहत देशी बोवाईन नस्लों का संरक्षण और परीक्षण करना और उनके उत्पाद तथा उत्पादकता को बढ़ाना चाहती है। इसके अलावा संकटाधीन नस्लों को लुप्त होने से बचाना उद्देश्य है।भारत सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि देश के किसान ज्यादा से ज्यादा आय अर्जित करें, युवाओं को रोजगार मिले, आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को उनका अपना हक मिले, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा मिले।

2022 तक प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता को 500 ग्राम करना चाहती हैं सरकार

सरकार वर्ष 2022 तक प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता को 500 ग्राम करना चाहती हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार, विगत 3 वर्षों मे दुग्ध उत्पादन 137.7 मिलियन टन से बढ़कर 165.4 मिलियन टन हो गया है। वर्ष 2014 से 2017 के बीच वृद्धि 208% से भी अधिक रही है।

इसी तरह प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 2013-14 307 ग्राम से बढकर वर्ष 2016-17 में 355 ग्राम हो गई है जोकि15.6% की वृद्धि है। इसी प्रकार 2011-14. की तुलना में 2014-17 में डेयरी किसानों की आय में 23.77% की वृद्धि हुई।

भारत में लॉन्च हुए दो नए हाईटेक ट्रैक्टर ,जानें क्या है इस ट्रैक्टरों में खास

आईटीएल (इंटरनेशनल ट्रैक्टर लिमिटेड) ने बुधवार को अपने दो बहुप्रतीक्षित टैक्टर सोलिस (SoliS) और यन्मार (YANMAR) लॉन्च किए। आईटीएल कंपनी इसके लिए जापान यन्मार एग्रीबिजनेस कंपनी लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। यह ट्रैक्टर लेटेस्ट हाईटेक फीचर्स से लैस है। कंपनी का दावा है कि दोनों ट्रैक्टर में कई ऐसे फीचर और टेक्नोलॉजी है जो किसानों के लिए स्मार्ट खेती में मददगार होंगे।

कीमत का खुलासा नही

कंपनी की तरफ से अभी दोनों टैक्टर की कीमत का खुलासा नहीं किया गया है। सोलिस और यन्मार दोनों ही ट्रैक्टर मेड इन इंडिया हैं और इसमें पावरफुल उपकरण, एडवांस फीचर्स हैं जो टफ्नेस, ड्युरेबिलिटी, पावर और बेहतरीन प्रदर्शन का अनुभव कराएंगे।

कंपनी ने कहा कि सोलिस और यन्मार ट्रैक्टर भारत में खेती के तरीकों में बदलाव लाएएंगे। उन्होंने कहा कि कंपनी ने साल 2011 में पहला सोलिस ट्रैक्टर यूरोप में निर्यात किया था। तब से अब तक 8 साल में 120 देशों में सोलिस के 1 लाख से भी ज्यादा कस्टमर हैं। इस ट्रैक्टर को शुरुआत में पंजाब को होशियारपुर में निर्यात के लिए बनाया जाता था।

5 सालों में 50 हजार ट्रैक्टर बिक्री का लक्ष्य

Solis यूरोप के टॉप-5 ट्रैक्टर ब्रांड में शामिल है। भारत में टैक्टर की लॉन्च के बाद कंपनी अगले 5 सालों में 50 हजार ट्रैक्टर की बिक्री का लक्ष्य तय किया है। साथ ही अगले 2 साल में करीब 400 डीलरशिप स्टोर खोलने का प्लान है। कंपनी के पास 20 से लेकर 120 हार्सपावर के टैक्टर की रेंज मौजूद है।

यहां किसानों को मिलती है 2.5 लाख रूपये सैलरी, रहने- खाने का खर्च अलग से

अब देश के किसानों को फेसबुक के जरिए नौकरी का ऑफर मिल रहा है। बड़ी जमीनों वाले करोड़पति फेसबुक पर विज्ञापन देकर किसानों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। फेसबुक पर ‘Wanted Farmers’ नाम से विज्ञापन दिए जा रहे हैं।

इनमें किसानों को 1.80 लाख रुपए से लेकर 2.40 लाख रुपए तक का सालाना पैकेज ऑफर किया जा रहा है। इसके अलावा खाने और रहने की सुविधा भी मुफ्त में मिलेगी। यह विज्ञापन तमिलनाडु स्थित कीरईकड़ई की तरफ से फेसबुक पर पोस्ट किया गया है। लेकिन यह ऐसा अकेला विज्ञापन नहीं है।

क्या लिखा है विज्ञापन में

इस विज्ञापन में लिखा है, ‘प्रिय किसान बंधु, हमें इस समाज के लिए स्वास्थ्यवर्धक भोजन उत्पन्न करने को आपकी जरूरत है। लोगों की जिंदगियां स्वस्थ और बेहतर बनाने में हमारा योगदान दें।’ इन विज्ञापनों में सैलरी पैकेज आकर्षक दिया गया है। यह किसानों के लिए राहत की बात है क्योंकि देश के छोटे और सीमांत किसान आर्थिक परेशानी से जूझ रहे हैं।

IT प्रोफेशनल्स और डॉक्टर्स दे रहे हैं विज्ञापन

BusinessLine में प्रकाशित खबर के मुताबिक ऐसे विज्ञापन कई अमीर लोग दे रहे हैं। इनमें आईटी पेशवर और डॉक्टर शामिल हैं, जिनमें खेती के प्रति लगाव पैदा हुआ है। सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर GV Ramanjaneyulu के मुताबिक, ‘करोड़पति लोग जमीन के बड़े टुकड़े खरीद रहे हैं। कई लोग इन्हें इन्वेस्टमेंट के तौर पर खरीद रहे हैं, जबकि कई खेती के उद्देश्य से। इन लोगों के पास पैसा है, इसलिए ये लोग जमीन तो खरीद लेते हैं, लेकिन खेती की पद्धतियां न आने के चलते उन्हें किसानों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में वे विज्ञापनों का सहारा ले रहे हैं।’

बढ़ रही है ऑर्गेनिक फूड की डिमांड

Farmers’ Producer Organisation (FPO) का कॉन्सेप्ट देश में तेजी से बढ़ रहा है। ये FPO शहरी इलाकों में ऑर्गेनिक फूड की बढ़ती डिमांड को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं। ऑर्गेनिक खेती की पद्धति के लिए उन्हें प्रोफेशनल किसानों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में जिन किसानों के पास विशेष प्रकार का अनाज उगाने का अनुभव है और नए तरीकों से खेती करनी आती है, वे अच्छी डिमांड में हैं।

अब बेकार पड़ी एक एकड़ जमीन से भी किसान कमा सकेंगे 80,000 सालाना, सरकार ला रही है ये योजना

किसान अब अपनी बेकार या कम उपज देने वाली जमीन से भी पैसा कमा सकेंगे। सरकार सोलर बिजली के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसानों की बंजर या बेकार पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने जा रही है। सरकार इसे सोलर फार्मिंग का नाम दे रही है।

सोलर प्लांट के लिए एक एकड़ जमीन देने पर उन्हें घर बैठे सालाना लगभग 80,000 रुपए मिलेंगे।  योजना के मुताबिक किसान खेतों में सोलर प्लांट के साथ वहां सब्जी व अन्य छोटी-मोटी फसल भी उगा सकते हैं।

 साल भर में होगी 80,000 की कमाई

नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय  के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एक मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाने में 5 एकड़ जमीन की जरूरत होती है। एक मेगावाट सोलर प्लांट से साल भर में लगभग 11 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन होता है। उन्होंने बताया कि किसान के पास एक एकड़ भी जमीन है तो वहां 0.20 मेगावाट का प्लांट लग सकता है।

इस प्लांट से सालाना 2.2 लाख यूनिट बिजली पैदा होगी। उन्होंने बताया कि कुसुम स्कीम के मुताबिक जो भी डेवलपर्स किसान की जमीन पर सोलर प्लांट लगाएगा, वह किसान को प्रति यूनिट 30 पैसे का किराया देगा। ऐसे में, किसान को प्रतिमाह 6600 रुपए मिलेंगे। साल भर में यह कमाई लगभग 80,000 रुपए की होगी। जमीन पर मालिकाना हक किसान का ही रहेगा। किसान चाहे तो सोलर प्लांट के साथ यहां छोटी-मोटी खेती भी कर सकता है।

बिजली खरीद पर सब्सिडी

मंत्रालय के मुताबिक किसानों की जमीन पर लगने वाले सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली को खरीदने के लिए सरकार बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को सब्सिडी देगी। सरकार की योजना के मुताबिक डिस्कॉम को प्रति यूनिट 50 पैसे की सब्सिडी दी जाएगी। एमएनआरई के मुताबिक ऐसे में किसानों की जमीन पर लगने वाले सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली की बिक्री सुनिश्चित रहेगी। जल्द ही इस स्कीम को कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाएगा।

किसान चाहे तो कर सकते हैं खेती

मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक किसान चाहे तो खेत में शेड लगाकर शेड के नीचे सब्जी या अन्य उत्पादों की खेती कर सकता है और शेड पर सोलर पैनल लगवा सकता है। सिंचाई के अभाव में बहुत किसान अपने खेत से कुछ भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। रिटर्न नहीं मिलने की वजह से किसानों ने अपनी जमीन को बेकार भी छोड़ रखा है। ये किसान अब सोलर फार्मिंग कर सकते हैं।

आ गया बर्षा पंप, अब सिंचाई के लिए न बिजली की जरूरत और न ही ईंधन की

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है ? आप कुछ देर के लिए सोचेंगे और कहेंगे सिंचाई की सुविधा, क्योंकि इसके बिना सारी तैयारियां अधूरी रह जाती है। और अगर हम आपको कहें कि सिंचाई के लिए हमारे पास एक ऐसा वाटर पंप है जो बिना बिजली और किसी ईंधन के ही चलती है तो क्या कहेंगे?

आज हम इसी खास तकनीक के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसका विकास नीदरलैंड में हुआ है और जो हमारे पड़ोसी देश नेपाल में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इस तरह की तकनीक भारत के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां आज भी चौबीस घंटे बिजली की बात तो छोड़ दीजिए कई जगहों पर तो बिजली पहुंचती भी नहीं है।

ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक कृषि के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। यह वाटर पंप जिस तकनीक पर काम करता है उसके लिए भारत की परिस्थिति बिल्कुल सही जगह है। तो चलिए अब विस्तार से इस खास तकनीक से लैस पंप के लिए बात करते हैं।

बर्षा पंप से किसानों के खेतों में होगी वर्षा

हाल में नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों में सिंचाई को बेहद आसान बनाने के लिए एक नया सिंचाई पंप विकसित किया है। यह एक ऐसा बर्षा पंप है, जिसके लिए किसानों को बिजली या ईंधन का खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा।

बस किसानों को इस पंप को नहर या नदी में रखना होगा और इसके सहारे किसान आसानी से अपने आस-पास के खेतों में सिंचाई कर सकेंगे। किसानों के लिए यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को सिंचाई संबंधी एक बड़ी समस्या दूर हो सकेगी।

किसानों के लिए सिंचाई बड़ी समस्या

अपने खेतों में सिंचाई के लिए किसानों को बड़ी मुश्किल उठानी पड़ती है। एक तरफ जहां कुछ किसान आस-पास की नदियों, नालों या नहर में सिंचाई पाइप लगाकर डीजल पंप के जरिये अपने खेतों की सिंचाई करते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर किसान अन्य जटिल तरीकों से खेतों से सिंचाई की व्यवस्था करते हैं, ताकि अपने खेतों में सही स्थिति और समय पर रोपाई कर सकें।

असल में बर्षा पंप का निर्माण नीदरलैंड की कंपनी क्यूस्टा ने किया है। इस बर्षा पंप के लिए यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केवाईसी की ओर से यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकि खोज का अवॉर्ड दिया गया है।

शोधकर्ताओं की मानें तो यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है और विकासशील देशों में यह तकनीक बहुत कारगार साबित होगी। चूंकि पहला बर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया है और नेपाल में बारिश को बर्षा कहा जाता है। इसलिए इस पंप का नाम बर्षा रखा गया है।

ऐसे चलता है बर्षा पंप

असल में यह पंप पानी की लहरों से चलता है। लहरों से टकराकर बर्षा पंप का एक बड़ा सा पहिया घूमता है और इससे वायु का दबाव बनता है। इस वायु के दबाव की वजह से ही पानी को एक नली के जरिये किसानों के खेतों तक पहुंचा देता है।

ऐसे में नदी, नहर या नालों में पानी की लहर की गति ही इस पंप के लिए कारगार होती है और जितनी तेज पानी की रफ्तार होगी, उतनी दूर तक किसानों के खेत तक पानी पहुंच सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण न फैलाने की वजह से यह बर्षा पंप पर्यावरण के भी अनुकूल है। अब एशिया में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इस बर्षा पंप के निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो इस बर्षा पंप के जरिए फसल का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यह पंप एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी छोड़ता है। पानी की रफ्तार अच्छी होने पर इस पंप के जरिये 82 फीट की ऊंचाई तक भी पानी को पहुंचाया जा सकेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल में ही इस पंप की पूरी लागत वसूल हो जाएगी।

बर्षा पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

अनपढ़ किसान का देसी जुगाड़, खेतों की जुताई के लिए कबाड़ से बना लिया Power Tiller

आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है, इस कहावत को सच कर दिखाया है विष्णुगढ़ के उच्चघाना निवासी रमेश करमाली ने। उसके छोटे भाई ने दो भैंस बेच दी तो रमेश को खेती के लिए परेशानी होने लगी। खेती के लिए दूसरों से बैल मांगना पड़ता था। अनपढ़ रमेश ने महज आठ हजार रुपये जुगाड़ कर खेती ही नहीं शुरू की बल्कि पावर टीलर बनाकर खेती के लिए बैल और भैंसों का झंझट भी दूर कर दिया।

यह चमत्कार कबाड़ में फेंके उस स्कूटर के इंजन से हुआ जिसे किसी ने उसे तीन हजार रुपये में कबाड़ के रूप में बेच दिया था। पेशे से मोटर मैकेनिक रमेश ने इसमें थोड़ा बदलाव किया और फिर घर में टीलर तैयार कर खेतों की जुताई शुरू कर दी।

रमेश का पावर टीलर दस गुणा कम दर पर खेतों की जुताई कर रहा है। ढाई लीटर पेट्रेल में दस कट्ठा जमीन अर्थात पांच घंटे की भरपूर जुताई इस मशीन से की जा सकती है। रमेश की यह मशीन पूरे गांव के लिए प्रेरणादायी बन गई है।

कंपनी में नहीं मिली मैकेनिक की नौकरी

रमेश करमाली तीन भाई बहनों में सबसे बड़ा है। तीन साल की उम्र में वह पिता के साथ पुणे चला गया। पिता मजदूरी करते थे, वह भी 90 -साल की उम्र में 1995 में बजाज शोरूम में काम पर लगा दिया गया। 2005-6 में उसे पुणे में ही बजाज कंपनी में प्रशिक्षण पाने का मौका मिला।

वहां बजाज के दोपहिया वाहन की सेल्फ की गड़बड़ी ठीक करने पर उसको पुरस्कृत किया गया। नौकरी का भी ऑफर हुआ लेकिन पढ़ा-लिखा नहीं होने के कारण उसे नौकरी नहीं मिली। वह वापस अपना गांव आ गया और ऑन काल मोटरसाइकिल रिपेयिरंग का काम करता है।

पैसे के अभाव ने सुझाया उपाय

छोटे भाई द्वारा खेती के लिए दो भैंस बेच देने पर रमेश परेशान था। इसी उधेड़बुन में उसे पोर्टेबल पावर टीलर बनाने की एक तरकीब आई। इसके लिए सबसे पहले 20 इंच बाय 41 इंच का चेचिस बनाया। अब इंजन और हैंडल की जरूरत पूरी करने के लिए कबाड़ में तीन हजार रुपये में मिले स्कूटर का इंजन लगा दिया। गेयर बॉक्स, हैंडल और दोनों चक्कों को निकाल कर बनाए उस चेचिस में फिट कर दिया। बाद में उसे स्टार्ट कर चला कर देखने पर उसके मुताबिक पावर टीलर सही निकला।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है।

जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

इस तरह अपनी आय दुगने से ज्यादा कर सकते हैं किसान, कृषि वैज्ञानिक ने किया दावा

केंद्र सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कर रही है। विपक्ष के द्वारा इस दावे पर खड़े किये जा रहे सवालों से इतर वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों की आय दोगुनी या उससे भी अधिक करना संभव है, लेकिन इसके लिए किसानों को पारंपरिक खेती की बजाय आधुनिक तकनीकों से व्यावसायिक खेती को अपनाना होगा।

गेहूं या चावल जैसी ज्यादा लागत और कम बचत वाली फसलों की बजाय फलों, फूलों, सब्जियों या किसी अन्य व्यावसायिक उपज को खेती का केंद्र बनाना होगा। केंद्र की तरफ से इसके लिए किसानों को तकनीकी और वित्तीय मदद उपलब्ध करवानी होगी।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के वैज्ञानिक डॉ. एके दुबे ने अमर उजाला को बताया कि किसान को ‘अन्न उत्पन्न करने वाली सोच’ की बजाय ‘व्यावसायिक सोच’ को अपनाना चाहिए। जैसे कोई किसान एक एकड़ भूमि पर गेंहू या चावल जैसी फसल का उत्पादन करके अधिकतम पचास से साठ हजार रूपये का लाभ कमा पाता है,

लेकिन इसी भूमि पर अगर वह नींबू की व्यावसायिक खेती वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से करता है तो सभी खर्चे काटने के बाद वह प्रति एकड़ न्यूनतम दो लाख रूपये से लेकर चार लाख रूपये वार्षिक आय का शुद्ध लाभ कमा सकता है।

नींबू की फसल के लिए कुछ जानकारी

इस वर्ग में नींबू, मौसमी फल, मीठी नारंगी, संतरा, ग्रेप फ्रूट, चकोतरा या टैंजरिन जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं। अपने गुणों के कारण भारत में कागजी नींबू की खेती काफी लाभप्रद है। इसके लिए पूसा इंस्टिट्यूट द्वारा उत्पन्न की गई पूसा अभिनव और पूसा उदित सबसे बेहतर किस्में हैं। ये एक वर्ष में दो बार, अगस्त-सितंबर और मार्च-अप्रैल के बीच तैयार होती हैं।

नींबू के एक पौधे को 15X15 फीट की जगह चाहिए। इस तरह एक एकड़ में लगभग 180 पौधे तैयार किये जा सकते हैं। प्रति पौधा प्रति वर्ष दो हजार तक फल दे सकता है। एक एकड़ में नींबू के पौधे लगाने में 15 से 20 हजार रूपये तक की लागत आ सकती है। शुरू के तीन से चार वर्ष किसान पौधों के बीच इंटरक्रॉपिंग कर अन्य फसलें उगाते रह सकते हैं, लेकिन इसके बाद पौधे बड़े हो जाते हैं और फल देना शुरू कर देते हैं। किसान इस दौरान आय करने लगता है। लेकिन पांचवें से छठें वर्ष में पौधे पूर्ण व्यावसायिक बन जाते हैं और किसान इनसे प्रति एकड़ लाखों रूपये की आय कमा सकते हैं।

प्रति वर्ष प्रत्येक पौधे को 50 किलो देसी खाद, 600 ग्राम नाइट्रोजन, 400 ग्राम फास्फोरस, 600 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। कीटनाशक, फफूंदनाशक, जुताई-सिंचाई और फसल को बाज़ार तक पहुंचने को मिलाकर प्रति वर्ष डेढ़ लाख रूपये तक की लागत आ सकती है। उत्पादित फसल आज के बाज़ार की दर से लगभग सात लाख रूपये में बिक सकती है और इस तरह किसान किसी आकस्मिक नुकसान को झेलने के बाद भी चार लाख रूपये से अधिक की आय कर सकता है।

नींबू में अगस्त-सितंबर वाली फसल में किंकर नाम की बीमारी लग सकती है। इससे 30 फीसद तक फसल खराब हो सकती है। लेकिन उचित कीटनाशकों के उपयोग से यह नुकसान दस फीसद से भी कम किया जा सकता है। मार्च-अप्रैल में गर्म मौसम होने के कारण यह बीमारी नहीं लगती। वैज्ञानिक डॉ. एके दुबे ने बताया कि वे किंकर बीमारी प्रतिरोधी नींबू की फसल तैयार करने में जुटे हैं। प्रयास चल रहा है कि वर्ष 2025 तक वे पूसा अभिनव की ऐसी प्रजाति विकसित कर दें जिसमें यह बीमारी नहीं लगेगी।

किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार लेकर आ रही है ये नई योजना

केंद्र सरकार ने इस बार भी आम बजट (Budget 2019) में किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का अपना संकल्‍प दोहराया है। इसके लिए कृषि विभाग तेजी से काम कर रहा है। किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्‍य से जनपद में वन स्टॉप शॉप (One Stop Shop) खोली जाएंगी। इसके जरिए किसानों को खेती की नई तकनीकों की जानकारी भी दी जाएगी।

आवेदन के लिए रखी कुछ शर्तें

मेरठ जनपद में 14 वन स्टॉप शॉप (One Stop Shop) खोलने की योजना है। इसके लिए कृषि विभाग ने आवेदन मांगे हैं। विभाग ने आवेदन के लिए कुछ शर्तें भी जारी की है। उप कृषि निदेशक शैलेंद्र कुमार का कहना है क‍ि वन स्टॉप शॉप (One Stop Shop) के कृषि स्‍नातकों से आवेदन मांगे गए हैं।

शासन की तरफ से मेरठ जनपद को 14 उद्यमिता केंद्रों की स्थापना का लक्ष्‍य दिया गया है। वन स्टॉप शॉप (One Stop Shop) के लिए कृषि स्नातक/कृषि व्यवसाय प्रबंधन आदि में निपुण युवाओं से आवेदन मांगे गए हैं। इनकी अधिकतम उम्र 40 वर्ष होनी चाहिए। इसमें एससी एसटी और महिला अभ्‍यर्थियों को उम्र में पांच साल की छूट मिलेगी।

4 लाख रुपये का आएगा खर्च

उप कृषि निदेशक शैलेंद्र कुमार ने बताया कि इस योजना में करीब 4 लाख रुपये का खर्च आएगा। इसमें से 3.50 लाख रुपये तक का लोन मिल जाएगा। इस योजना का लाभ उठाने के इच्‍छुक लाभार्थी कृषि विभाग के किसी भी प्रोफार्मा ले सकते हैं। उनको यह प्रारूप 10 जुलाई तक उप कृषि निदेशक कार्यालय में जमा कराने होंगे। इसके साथ ही उन्‍हें जरूरी कागजात भी देने होंगे।

किसान ने विकसित की वो तकनीक,जिससे हर घर कमा सकता है महीने के 50 हजार रु

तकनीकी के मामले में इजरायल दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देश इस छोटे से देश से सीखने जाते हैं। लेकिन भारत का एक किसान है, इजरायल के लोग उससे सीखने आते हैं। इस किसान ने जो तकनीकी विकसित की है अब वो इजरायल में लागू की जा रही है।

इस हाईटेक तकनीकी का नाम ‘चोका सिस्टम’ है। यह एक ऐसी तकनीकी है जिसे देश के हर कोने, हर गांव का किसान अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। शायद यही वजह है कि इजरायल में भी लोकप्रिय हो रही है। ये तकनीक है किसान को कमाई कराने की, उसे गांव में ही रोजगार देने, पानी बचाने की और जमीन को सही रखने की। इस किसान की माने तो यही तो तकनीकी है जिसके सहारे गायों को लाभकारी बनाने हुए उन्हें बचाया भी जा सकता है।

‘चोका सिस्टम’ की जिस गांव से शुरुआत हुई है वहां हर घर सिर्फ दूध के कारोबार से हर महीने 10 से 50 हजार रुपए कमाता है।इजरायल को ज्ञान देने वाले इस किसान का नाम है लक्ष्मण सिंह। 62 साल के लक्ष्णम सिंह राजस्थान के जयपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर लाहोडिया गांव के रहने वाले हैं।

ये गांव कभी भीषण सूखे का शिकार था।गरीबी और जागरुकता की कमी के चलते यहां आए दिन लड़ाई दंगे होते रहते हैं, युवा गांव छोड़-छोड़ शहर में मजदूरी करने को मजबूर हो रहे थे।

करीब 40 साल पहले लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव को बचाने के लिए मुहिम शुरु की। बदलाव रंग भी लाया कि आज इजरायल जैसा देश इस गांव का मुरीद है। आज लापोडि़या समेत राजस्थान के 58 गांव चोका सिस्टम की बदौलत तरक्की की ओर है। यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है। किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। पशुपालन करते हैं। और पैसा कमाते हैं। 350 घर वाले इस गांव में आज 2000 के करीब आबादी रहती है।

चोका सिस्टम से पशुओं को घास मिलती है और जलस्तर ठीक रहता है

गांव के विकास के लिए रुपयों की कम से कम जरुरत पड़े इसके लिए श्रमदान का सहारा लिया गया। गांव के लोगों को इससे जोड़ने के लिए 1977 में उन्होंने ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोडिया रखा। इस समूह को ये जिम्मेदारी दी गयी कि गांव के हर किसी व्यक्ति में ये भाव पैदा करना है कि वो अपने गांव का मजदूर नहीं बल्कि मालिक है।

ऐसे बनता है ‘चोका सिस्टम’

चोका सिस्टम हर पंचायत की सार्वजनिक जमीनों पर बनता है। एक ग्राम पंचायत में 400 से 1,000 बीघा जमीन खाली पड़ी रहती है, इस खाली जमीन में चोका सिस्टम ग्राम पंचायत की सहभागिता से बनाया जाता है। खाली पड़ी जमीन में जहां बरसात का नौ इंच पानी रुक सके वहां तीन चौड़ी मेड (दीवार) बनाते हैं, मुख्य मेड 220 फिट लम्बाई की होती है और दोनों साइड की दीवारे 150-150 फिट लम्बी होती हैं।

इस गांव में अब नहीं होती है अब कभी पानी की कमी

भूमि का लेवल नौ इंच का करते हैं जिससे नौ इंच ही पानी रुक सके इससे घास नहीं सड़ेगी। इससे ज्यादा अगर पानी रुका तो घास जमेगी नहीं। हर दो बीघा में एक चोका सिस्टम बनता है, एक हेक्टेयर में दो से तीन चोका बन सकते हैं। एक बारिश के बाद धामन घास का बीज इस चोका में डाल देते हैं इसके बाद ट्रैक्टर से दो जुताई कर दी जाती है।

सालभर इसमें पशुओं के चरने की घास रहती है। इस घास के बीज के अलावा देसी बबूल, खेजड़ी, बेर जैसे कई और पेड़ों के भी बीज डाल जाते हैं। चोका सिस्टम के आसपास कई नालियां बना दी जाती हैं। जिसमें बरसात का पानी रुक सके। जिससे मवेशी चोका में चरकर नालियों में पानी पी सकें।