21 करोड़ का सुल्तान, रोज खाता है 15 किलो, सेब-10 किलो गाजर

भारत में गायों की तरह ही सांड की काफी ज्यादा देखरेख की जाती. लेकिन हरियाणा का ये सांड अपने अजीबो गरीब शौक के लिए सोशल मीडीया पर खूब छाया हुआ है। तकरीबन 21 करोड़ का सांड रोजाना शाम को व्हिस्की पीता है लेकिन सांड की इस आदत से उसका मालिक बिल्कुल भी परेशान नहीं।

इस सांड का नाम ‘सुल्तान’ है और इसकी आदत पर उसके मालिक का कहना है कि वो शराब पीना काफी पसंद करता है और उसके ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है।

ये है सुलतान की खुराक

  • नरेश ने बताया कि सुलतान का वजन 16.5 क्विंटल है। उसकी खुराक में 15 किलो सेब, 10 किलो गाजर और 10 किलो दूध शामिल है। इनके अलावा हरा चारा और 10 किलो दाना उसकी खुराक में शामिल है।
  • सुलतान की खुराक पर खास ध्यान रखा जाता है। नरेश का कहना है कि यदि खुराक पर ध्यान नहीं रखा गया तो उसकी सेहत पर इसका सीधा असर होगा।
  • खुराक के अलावा उसकी साफ सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाता है, सुलतान रोज शैम्पू से नहाता है और तेल की मालिश कराता है।

शराब का शौकीन

वह कोई राजा महाराजा नहीं है लेकिन उसके शौक किसी राजा महाराजा से कम नहीं है। इक्कीस करोड़ रुपए कीमत का सुल्तान मात्र सात साल और 10 माह का है, लेकिन रोज शाम को खाने से पहले अलग-अलग ब्रांड की शराब पीता है।

प्रति सप्ताह में छ: दिन शाम के खाने से पहले शराब पीता है लेकिन मंगलवार का दिन सुल्तान का ड्राई डे होता है। हरियाणा के कैथल जिले में मुर्रा नस्ल का भैंसा सुल्तान इन दिनों शराब का शौकीन हो गया है।

सुल्तान की उम्र आठ साल की भी नहीं है और अब से पांच साल पहले नरेश ने उसे रोहतक से 2 लाख 40 हजार रुपए में खरीदा था। एक विदेशी ने पिछले दिनों इसकी कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी। सुबह के नाश्ते में सुल्तान देशी घी का मलीदा और दूध पीता है।

सुल्तान सोमवार को ब्लैक डॉग, बुधवार को 100 पाइपर, गुरुवार को बेलेनटाइन, शनिवार को ब्लैकलेबल या शिवास रीगल, रविवार को टीचर्स पीता है। कैथल के बूढ़ाखेड़ा गांव के रहने वाले सुल्तान के मालिक नरेश ने बताया कि वे सीमन बढ़ाने के लिए सुल्तान को शराब पिलाते हैं।यह दवाई की तरह दी जाती है। सुल्तान सालभर में 30 हजार सीमन (वीर्य) की डोज देता है जो 300 रुपए प्रति डोज बिकती है।

कूलर-पंखों में रहता है सुलतान

  •  सुलतान को गर्मी से बचाने के लिए उसके पास पंखे और कूलर लगाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में सुबह और शाम दो बार उसे नहलाया जाता है।
  •  दो मजदूर दिनभर उसकी देखभाल में लगाए जाते हैं, जो उसके खाने पीने के अलावा साफ सफाई और मालिश आदि करते हैं।
  •  हरियाणा के कैथल जिले के रहने वाले नरेश बैनिवाल ने बताया कि सुलतान नेशनल लेवल पर अवॉर्ड जीत चुका है। उसका यह भैंसा मुर्रा नस्ल का है।

इस हिसाब से वह सालाना 90 लाख रुपए कमा लेता है। सुल्तान वर्ष 2013 में हुई राष्ट्रीय पशु सौंदर्य प्रतियोगिता में झज्जर, करनाल और हिसार में राष्ट्रीय विजेता भी रह चुका है।

राजस्थान के पुष्कर मेले में एक पशु प्रेमी ने सुल्तान की कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी, लेकिन नरेश ने कहा कि सुल्तान उसका बेटा है और कोई अपना बेटा कैसे बेच सकता है।

जुताई से लेकर पिसाई तक सारे काम करेगी यह मशीन, 4 गुना कम हो जाएगी कृषि लागत

प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप योजना के तहत केरल शिवापुरम के ‘सेंट थामस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिग’ के छात्रों ने खेतीब़ाडी के कई कामो को एकसाथ अंजाम देने वाली एक ऐसी अद्भभुत मशीन तैयार की है, जो किसानो के लिए और खेतीबाडी के क्षेत्र में वरदान साबित हो सकती है।

छात्रो ने इस मशीन को ‘मन्नीरा’ नाम दिया है। ‘मन्नीरा’ एकसाथ जुताई, रोपाई, सिंचाई, कटाई, सूप, पिसाई यह सारे कार्य कर सकती है।

इस मशीन को बनाने का एकमात्र मकसद लागत को कम करके मुनाफा डबल करना है। हमे उम्मीद है कि यह मशीन कृषि क्षेत्र में एक क्रांति साबित होगी। जब 10 एकड़ की जमीन पर 5 साल के अंतराल में यही सारे कार्य अलग-अलग मशीनो द्वारा किए गए तो लागत लगभग 27,08,500 रुपए रही, वहीं मन्नीरा का उपयोग किया तो यह लागत गिरकर 6,20,500 रुपए आ गई ।

इम मशीन को ब़डी उपल्बधि बताते हुए छात्रों ने कहा कि अगर अंतिम निरीक्षण के बाद इसका चयन हो जाता है। तो हमें 2 लाख का अनुदान मिलेगा। गौर करने वाली बात यह है कि इस मशीन को बनाने की कीमत भी 2 लाख रूपये ही है.

इस किसान ने बिना किसी अनुभव के चंदन की खेती से ऐसे कमाए करोड़ों रूपये

किसानों की आमदनी को दोगुना करने हेतु सरकार भी अपनी ओर से प्रयासरत है लेकिन किसान यह समझ चुका है कि सरकार के प्रयास तब सफल होंगे जब अपनी खेती को लेकर वो खुद जागरूक होंगे। एक ऐसे ही जुझारू और जागरूक किसान हैं गुजरात के भरुच के पास अलपा गाँव में रहने वाले अल्पेश पटेल जो आज की मांग को देखते हुए खेती के साथ प्रयोग करने में सबसे आगे हैं।

अल्पेश पटेल एक ऐसे किसान है जिन्होंने अपने राज्य में बिना किसी पूर्व अनुभव के चंदन की खेती करने का निर्णय लिया। चंदन की खेती का निर्णय लेना एक बहुत जोखिम का काम है फिर भी खुद पर विश्वास कर उन्होंने यह जोखिम उठाया और सफलता प्राप्त की।

एक छोटे से गांव में रहने वाले अल्पेश भाई पटेल ने जब पहली बार अपनी खेती–बाड़ी के साथ कुछ नया प्रयोग करने का विचार किया तो उनकी राह बिलकुल आसान नहीं थी। 2003 में गुजरात में सरकार ने वहाँ के किसानों को चंदन की खेती करने की इजाज़त तो दी लेकिन नए मौसम और नए माहौल में अपने खेत पर चंदन की खेती का जोखिम उठाने को कोई किसान तैयार नहीं थे ऐसे में अल्पेश ने यह जोखिम उठाने का निश्चय किया।

अल्पेश ने करीब 5 एकड़ जमीन पर 1000 चंदन के पेड़ लगा दिए लेकिन शुरुआत में फसल खराब हो गई जिससे उन्हें आर्थिक हानि का सामना भी करना पड़ा। लेकिन चंदन की खेती करने का अल्पेश के मन में इरादा पक्का था। अल्पेश की मदद के लिए राज्य के कृषि अनुसंधान संस्थान ने हाथ बढ़ाया और उनके साथ आकर उनकी फसल पर शोध करने का फैसला किया।

हम सभी जानते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है और चंदन की खेती में तो सब्र रखना ही सबसे जरुरी बात होती है। चंदन की खेती को तैयार होने में 15 से 20 साल तक का समय लगता है और यही कारण है कि कई किसान इतना अधिक इंतजार नहीं कर पाते। और जो सब्र करते हैं, उन्हें चंदन की खेती पकने के बाद एक किलो चंदन की लकड़ी के लिए 10 से 12 हजार रुपए तक की राशि मिलती है।

अल्पेश ने सब्र रखा और उन्हें इसका फायदा भी मिला। उनकी खेती पकने पर उन्हें करोड़ो का लाभ प्राप्त हुआ। 10 लाख रुपये के निवेश से प्रारम्भ हुई चंदन की खेती की कीमत आज 15 साल बाद करीब 15 करोड़ रुपये पहुँच गयी है। मतलब 150 गुना का फायदा चंदन की खेती से अल्पेश को प्राप्त हुआ। गौरतलब है कि गुजरात समेत कुछ राज्यों में किसानों को अपनी चंदन की फसल बेचने के लिए परेशान नहीं होना पड़ता क्योंकि राज्य सरकार ने इसे बेचने और एक्सपोर्ट करने तक की जिम्मेदारी स्वयं ले रखी है।

अल्पेश को अपनी मेहनत के फलस्वरूप राज्य में सर्वश्रेष्ठ किसान का खिताब भी मिल चुका है और वे दक्षिण गुजरात में हजारों किसानों के लिए एक प्रेरणा बन चुके हैं। अल्पेश की सफलता को देखकर अन्य किसान भी अब जोखिम उठाने को तैयार हैं। और जो किसान चंदन की खेती नहीं कर पाए उन्होंने नीलगिरी की खेती शुरू कर दी है। नीलगिरी की लकड़ी से भी किसानों को काफी फायदा हो रहा है। यदि हमारे किसान इसी तरह जागरूक होने लगे तो वो दिन दूर नहीं जब यह कृषि प्रधान देश पुनः सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

आ गया त्रिशूल फार्म मास्टर जो कम पैसों में करे ट्रेक्टर के सारे काम

एक किसान के लिए सब से ज्यादा जरूरी एक ट्रेक्टर होता है । लेकिन महंगा होने के कारण हर किसान ट्रेक्टर खरीद नहीं सकता । क्योंकि छोटे से छोटा ट्रेक्टर भी कम से कम 4 लाख से शुरू होता है । लेकिन अब एक ऐसा ट्रेक्टर आ गया है जो ट्रेक्टर से 4 गुना कम कीमत पर भी ट्रेक्टर के सभी काम कर सकता है । जी हाँ यह है त्रिशूल कंपनी द्वारा त्यार किया हुआ त्रिशूल फार्म मास्टर ( Trishul Farm Master )

मोटर साइकिल जैसे लगने वाला यह ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है । त्रिशूल फार्म मास्टर से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।इसकी कीमत तकरीबन 1 लाख 45 हजार रु है।

त्रिशूल फार्म मास्टर मशीन की जानकारी

  • इंजन – 510 CC ,फोर स्ट्रोक
  • लंबाई – 7.5 फ़ीट . चौड़ाई – 3 फ़ीट. ऊंचाई – 4 फ़ीट.
  • वजन – 440 किलोग्राम
  • ग्राउंड से उचाई – 10 इंच
  • इंजन सिलेंडर – एक
  • प्रकार- एयर कूल्ड डीजल इंजन
  • Rated RPM – 3000
  • डीज़ल की खपत – 650 मी.ली एक घंटे में
  • गिअर – 4 आगे, 1 रिवर्स
  • डीज़ल टैंक कैपेसिटी – 14 लीटर

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

अगर आप इसे खरीदना चाहते है तो नीचे  दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क कर सकते है

घोड़ावदार रोड , गोंडल
Dist :राजकोट (गुजरात)
फ़ोन:98252 33400

12वीं के स्टूडेंट ने बनाया डिवाइस, किसान घर बैठे ऑपरेट कर सकते हैं खेतों में लगे वाटर पंप

दिल्ली के ईशान मल्होत्रा (17) ने प्लूटो नामक एक ऐसा डिवाइस बनाया है, जिसकी मदद से किसान घर बैठे खेतों में लगे वाटर पंप को ऑपरेट कर सकते हैं। वाटर पंप चालू और बंद करने के लिए उन्हें बार-बार खेतों में नहीं जाना पड़ेगा।

डिवाइस की खास बात यह है कि इसे स्मार्टफोन के अलावा सामान्य फोन से भी ऑपरेट किया जा सकता है। तीन साल में 500 डिवाइस बनाकर ईशान 300 डिवाइस किसानों को मुफ्त में बांट चुके हैं।

एक डिवाइस बनाने में खर्चा आता है 700 रुपए

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की ख्वाहिश रखने वाले ईशान जयपुर से 12वीं की पढ़ाई कर रहे हैं। एक डिवाइस बनाने में 700 रुपए खर्चा आता है। वह इसे इतने ही रुपए में किसानों को बेच देते हैं। इस डिवाइस को वाटर पंप के अंदर फिट किया जाता है।

इसमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी मदद से टेली कम्युनिकेशन के जरिए किसान वाटर पंप चालू या बंद कर सकते हैं। वाटर पंप चालू करने के लिए किसानों को अपने मोबाइल से 1111 और बंद करने के लिए 2222 नंबर डायल करना होगा।

शुरुआत में किसानों ने बनाया मजाक, फिर भी हार नहीं मानी

ईशान ने जून, 2015 में डिवाइस बनाने की शुरुआत की। उस वक्त उनकी उम्र 14 साल थी। जनवरी 2016 में पहला डिवाइस तैयार किया। डिवाइस लेकर जब वह किसानों के बीच पहुंचे तो उनका मजाक बनाया गया। ईशान ने किसानों की बातों को दरकिनार कर 2016-17 के बीच 500 डिवाइस बना डाले। काफी कोशिशों के बाद किसानों को डिवाइस की मदद से जब वाटर पंप ऑपरेट कर दिखाया, तब उन्हें विश्वास हुआ।

किसानों की परेशानी देख आया आइडिया

ईशान बताते हैं कि बचपन में वे किसानों की समस्याएं सुनते थे। किसानों को रोजाना सुबह-शाम घर से चार-पांच किमी पैदल चलकर खेतों में लगे वाटर पंप को चालू करने जाना पड़ता है। कई बार वहां पहुंचने पर लाइट चली जाती है। बारिश के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है और वाटर पंप चालू करने के दौरान किसानों को इलेक्ट्रिक शॉक लग जाता है।

किसानों की परेशानी देख ईशान ने एक ऐसा डिवाइस बनाने का फैसला किया। इसके जरिए वे देश के किसी भी कोने से वाटर पंप चालू कर सकें। डिवाइस बनाने के लिए ईशान ने क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म इंपैक्ट गुरु के जरिए 1.30 लाख रुपए का फंड जुटाया।

यह है ट्रेक्टर से चलने वाली मिनी कंबाइन ,पूरी जानकारी के लिए वीडियो पर क्लिक करें

भारत में फसल कटाई का काम कंबाइन से किया जाता है । कंबाइन चलाना बहुत ही मुश्किल काम होता है लेकिन अब ये काम बहुत आसान होने वाला है ।भारत में अब ऐसी कंबाइन आ चुकी है जिसे चलाना बहुत ही आसान है। कोई भी किसान इस कंबाइन को खुद चला सकता है । यह कंबाइन Gahir Agro Industries Limited द्वारा त्यार की गई है ।

इस कंबाइन का नाम Nippy 45 है । यह ट्रेक्टर से चलने वाली छोटी कंबाइन है ।इस कंबाइन की क्वालिटी बहुत ही बढ़िया है और इसके रख-रखाव का खर्च भी बहुत कम है । इसको चलाने के लिए कम से कम 45 डबल क्लच ट्रेक्टर जा उस से ऊपर की जरूरत पड़ती है । इस मशीन के कटर का साइज़ 7.5 फ़ीट है ।

वीडियो देखे

New Mini Combine Harvester on the Name of “NIPPY-45” Launched by Gahir Agro Industries.

Posted by Gahir Agro Industries Limited on Sunday, August 5, 2018

इसके अनाज निकलने वाले पाइप से किसी भी तरफ से अनाज निकला जा सकता है ।यह मिनी कंबाइन चलने मैं बहुत लाजवाब है और बहुत कम कीमत पर फसल काटती है । अगर आप इस मशीन की कीमत जा किसी प्रकार की और जानकारी चाहते है तो इस नंबर 097799 11580 पर संपर्क कर सकते है ।

मिर्च की खेती से नेक सिंह करते है 1 एकड़ से 2 लाख की कमाई

पटियाला जिले के नाभा से सटे गांव खोख के रहने वाले लगभग 71 वर्षीय नेक सिंह जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मार्केट की नब्ज पकड़ उन्होंने इतनी मेहनत की कि आज वह पंजाब के नंबर वन मिर्च उत्पादक हैं।

इनकम टैक्स भरने वाले गिने-चुने किसानों की फेहरिस्त में उनका नाम शुमार है। वह मिर्च की खेती से एक एकड़ में दो लाख रुपए कमा लेते हैं और इसी के दम पर उन्होंने अपनी चार एकड़ की पैतृक जमीन को बढ़ाकर 65 एकड़ तक कर लिया है।

इस तरह रहा संघर्ष का सफर

  • नेक सिंह बताते हैं कि बात साल 1965 की है। कुछ कारणों के चलते दसवीं की पढाई के बाद आगे नहीं पढ़ पाए। तेरह एकड़ जमीन पर काम शुरू किया, जिसमें से उनके हिस्से लगभग 4 एकड़ जमीन ही आई।
  • उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बस में कंडक्टर की नौकरी भी करनी पड़ी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
  • जिस वक्त राज्य में हरित क्रांति जोर पकड़ रही थी, उस करीब 20 साल की उम्र में नेक सिंह ने साहसिक कदम उठा खेती के लिए साढ़े 3 हजार रुपए के कर्ज से ट्यूबवेल लगाने का फैसला किया।
  •  सरकार की योजना के मुताबिक उन्होंने गेहूं और चावल की खेती शुरू की। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मदद से उन्हें एक स्थिर आमदनी जरूर मिल रही थी, लेकिन नेक सिंह संतुष्ट नहीं थे और वो और कमाना चाहते थे।
  •  इसी सिलसिले में सन 1980 से उन्होंने वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों से मिलना शुरू कर दिया। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के संपर्क में आने के बाद कपास और टमाटर के पौधों का परीक्षण किया और नई तकनीक सीखी।
  •  इसी का नतीजा रहा कि 1988 से लेकर 2000 तक उन्हें टमाटर की खेती से काफी आमदनी हुई। टमाटर के साथ ही उन्होंने 1991 से मिर्च की खेती भी शुरू कर दी और उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  •  बीते सीजन में उन्होंने साढ़े तीन एकड़ में मिर्च के पौधे लगाए, लेकिन बताते हैं उनका टारगेट 10 एकड़ तक पहुंचने का है। नेक सिंह गेहूं की खेती नहीं करते हैं, बल्कि रबी के मौसम में ज्यादा कमाई वाली फसल आलू, सूरजमुखी और खरीफ मौसम में मिर्च और बासमती चावल की खेती करते हैं।

इस तरह आया बदलाव

  •  पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के प्रयोगों को दोहराते हुए 1991 में वो मिर्च की सफल खेती से परिचित हुए। इस काम को समझने में उन्हें बेंगलुरु के इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर से भी काफी मदद मिली।
  •  नाभा के ये उद्यमी बताते हैं, “मैं देशभर के वैज्ञानिकों को जानता था जिन्होंने मुझे मिर्च की सीएच-1 प्रजाति के परीक्षण में शामिल होने का मौका दिया। साल दर साल मैंने विशेषज्ञों से मिल रही जानकारी की मदद से इस प्रजाति में सुधार करता रहा, जबकि मिर्च के आधिकांश किसान ये भी नहीं जानते हैं कि नर्सरी कैसे तैयार की जाती है।”
  •  बाद में उन्होंने मिर्च की खेती के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए पॉली हाउस का विकास किया। ये पॉली हाउस राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में काफी मशहूर था।

100 औरतें काम करती हैं नेक सिंह के फार्म पर, कमाती हैं 10 हजार तक

नेक सिंह इलाके की महिलाओं को काम करने का मौका देते हैं और उन्हें प्रति घंटा के लिए 40 रुपए देते हैं। नर्सरी की देखभाल, मिर्च चुनने, दूसरे काम में सहयोग करने जैसे काम के लिए हर साल 100 महिलाओं को काम पर रखते हैं। नेक सिंह बताते हैं कि उनके यहां काम करने का माहौल घर के जैसा है, वहीं उनके काम करने वाली महिलाएं हर महीने करीब 10 हजार रुपए कमा लेती हैं।

मिर्च की खेती संबंधी कुछ खास बातें

  •  एक एकड़ नर्सरी से 285 एकड़ खेती के लिए पौधे तैयार होते हैं।
  • मिर्च के पौधों (सैंपलिंग) से प्रति वर्ष 4500 रुपये से लेकर 6000 रुपए प्रति एकड़ तक आमदनी।
  •  हर साल पौधों (सैंपलिंग) से कुल आमदनी 26 से 50 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ पौधे से करीब साढ़े सात लाख से 14 लाख रुपए की आमदनी।
  •  पौधे के बढ़ने का समय 5 महीना (नवंबर से मार्च तक)
  •  पैदावार लागत (श्रम, लॉजिस्टिक्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पौधे के लिए बीज) ढाई लाख प्रति एकड़ श्रम लागत 40 रुपए प्रति घंटा।
  •  एक एकड़ में 180 से 220 क्विंटल हरी मिर्च के साथ 200 क्विंटल लाल मिर्च का उत्पादन होता है हरी मिर्च का बाजार मूल्य 12 से 25 रुपए प्रति किलो।
  • प्रति एकड़ सकल आय 6 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ कुल आमदनी ( पैदावार लागत को घटाने के बाद) पांच लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ लैंड लीज 20 से 40 हजार रुपए (कुल आमदनी से घटाकर)

अब जर्मन मशीन से खारा पानी को मीठा कर खारे पानी से होगी सिंचाई

खारेपानी के कारण फसलों का उत्पादन नहीं करने वाले किसानों के लिए ये लिए राहत की खबर है। अब जर्मन तकनीक की वाटर सॉफ्टनर मशीनों से खारे पानी को मीठा कर किसान आसानी से अब अपने खेतों में फसलों का उन्नत उत्पादन कर सकेंगे।

इसके लिए अठियासन रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर लगाए गए वाटर सॉफ्टनर मशीन का प्रयोग सफल रहा है। अब केवीके वैज्ञानिक जिलेभर के किसानों को कृषि प्रशिक्षण के दौरान खारे पानी को मीठा कर फसल उपयोग के लिए जानकारी देंगे। केवीके की ट्यूबवैल पर स्थापित इस मशीन के माध्यम से 5 से 8 हजार टीडीएस तक काम करने का दावा किया जा रहा है।

ऐसे में जिल क्षेत्रों में खारे पानी के कारण किसानों के सामने फसल सिंचाई को लेकर रही परेशानी से भी किसानों को काफी हद तक निजात मिलने की संभावना है। वैज्ञानिकों की माने तो खारे पानी में जो साल्ट बोड रहता है, जिसे ये मशीन अलग कर देती है। ऐसे में ये तकनीक किसानों के लिए खारे पानी को मीठा करने में काफी कारगर साबित हो रही है।

^ केवीके की ट्यूबवैल पर लगाए वाटर सॉफ्टनर संयंत्र से खारे पानी को मीठा कर पहले मूंग बीच उत्पादन, अब बगीचे और 2 हैक्टेयर में जीरे के उत्पादन में पानी काम में लिया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठी के दौरान इस तकनीक के बारे में बताएंगे।

पाइप लाइन चॉक होने देना, बालों का झड़ना, खाज-खुजली और स्कीन के रुखेपन को दूर करती है। बोरवैल का पानी इस्तेमाल करने वाले लोग भी इस मशीन का उपयोग कर सकते हैैं। डॉ.एसआर कुमावत, सहायक प्राध्यापक

जमीन की उतरी स्तर पर बनने वाली सफेद परत को कम करके, जमीन पर आनेवाली दरारों में सुधार, जमीन मुलायम होकर, उपजाऊ बनती हैं।

  •  फसल और पौधों में पत्ते जलने का प्रमाण कम होकर खेत में हरियाली बढ़ती हैं।
  • नमकीन/खारे पानी से बंद पड़ने वाले ड्रिपर्स और स्प्रिंकलर साफ होकर पहले जैसे काम करना शुरू कर देते है। केमिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कंडिशनर से निकला पानी भौतिक रचना के अनुसार हलका होने से पौधे के जड़ों को आसानी से मिलता है।

कम पानी में अधिक उत्पादन ले सकते है।, यानी पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। फसल की जड़ों पर मूली पर बना नमकीन स्तर कंडिशनर से निकले पानी में घुलकर साफ हो जाता है। मूली की कार्यक्षमता बढ़कर फसल हरीभरी रहने में मदद मिलती हैं।

  • फसल और पौधों के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथ पानी का पीएच विकसित होने के कारण फसल का उपयुक्त मूल द्रव्य मिलते है।
  • तीव्र विद्युत लहरी के कारण विषाणु का प्रमाण
  • पानी का कम होकर जैविक दृष्टि से पानी शुद्ध होता हैं।

यह है टॉप 5 मिनी ट्रेक्टर जाने कीमत और दूसरी जानकारी

भारत में करीब 85 प्रतिशत परिवार कुल खेती योग्य जमीन के करीब 36 प्रतिशत भाग में खेती करते हैं। छोटे किसानों की औसत जोत एक हेक्टेयर से अधिक की नहीं होती है।

इसलिए औसत किसान के लिए 35 एचपी या इससे अधिक के मानक ट्रैक्टर का इस्तेमाल करते हुए मशीनीकृत खेती करना काफी मुश्किल होता है जिसके कारण खेती में उत्पादकता और खेत की प्रति इकाई उपज प्रभावित होती है।

इस लिए किसानो के लिए 10 से 12 एचपी की क्षमता के ट्रैक्टर ऐसे छोटे और टुकड़ों में बंटे खेतों के लिए उपयुक्त होते हैं । आज हम आपको टॉप ट्रेक्टर कम्पनिओं द्वारा निर्मित कुश मिनी ट्रैक्टरों के बारे में बताएँगे जिसको छोटा किसान आसानी से खरीद सकता है ।

1. स्वराज 717

  • पावर – 17 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2.50 लाख

2. कप्तान 200DI

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 8 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 4 लाख

3. सोनालिका गरडेंटरक 20

 

  • पावर – 20 HP
  • सिलिंडर – 3
  • गेअर – 6 आगे 2 रिवर्स
  • कीमत – 3 लाख

4. महिंद्रा युवराज 215

  • पावर – 15 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 6 आगे 3 रिवर्स
  • कीमत – 2 लाख

5. EICHER 241 मिनी ट्रेक्टर  

  • पावर – 25 HP
  • सिलिंडर – 1
  • गेअर – 5 आगे 1 रिवर्स
  • कीमत – 4.41 लाख

नोट: इन सभी ट्रेक्टर की कीमत की जानकारी इंटरनेट से ली गई है जो आपके इलाके के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है

ऐसे बनाएं घर पर साइलेज,पुरे साल के लिए हरे चारे की टेंशन ख़तम

अपने दुधारु पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा पाना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनोती बनता जा रहा है। ऐसे में पशुपालक घर पर ही साइलेज बनाकर अपने पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा सकते है। इसके लिए सरकारी मदद भी मिलती है।

शुरुआत में पशु साइलेज ज्यादा नहीं खा पाता है लेकिन बार-बार देने से वह उसे चाव से खाने लगता है। जब चारे की कमी हो तो साइलेज खिलाकर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पशु को साइलेज खिलाने के बाद बचे हुए हिस्से को भी हटा देना चाहिए। अगर भूसा दे रहे हो तो उस हिस्से को उस में मिलाकर दें।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

साइलेज बनाने के लिए सरकार द्वारा यूरिया ट्रीटमेंट किट और साइलेज बनाने के लिए किट दी जाती है। अगर कोई पशुपालक साइलेज बनाना चाहता है तो उसका प्रशिक्षण भी ले सकता है। साइजेल बनाने लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK Center) में भी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पशुपालक इस तरह बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए जिस भी हरे चारे का इस्तेमाल आप कर रहे हो उसको 2 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़ों में काट कर कुटटी बना लेना चाहिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा चारा साइलो पिट में दबा कर भरा जा सके। अब उस कुट्टी किए हुए चारे को दबा-दबा भर दें।

ताकि बरसात का पानी अंदर न जा सके। फिर इसके ऊपर पोलीथीन की शीट बिछाकर ऊपर से 18-20 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त बिछा देनी चाहिए। इस परत को गोबर व चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता है और दरारें पड़ जाने पर उन्हें मिट्टी से बन्द करते रहना चाहिए ताकि हवा व पानी गड्ढे में न पहुंच सके।

लगभग 50 से 60 दिनों में यह साइलेज बनकर तैयार हो जाता है। गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी और पोलोथीन शीट हटाकर आवश्यकतानुसार पशु को खिलाया जा सकता है। साइलेज को निकालकर गड्ढे को फिर से पोलीथीन शीट और मिटटी से ढ़क देना चाहिए और धीरे-धीरे पशुओं केा इसका स्वाद लग जाने पर इसकी मात्रा 20-30 किलो ग्राम पति पशु तक बढ़ायी जा सकती है ।

किन-किन फसलों से बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए सभी घासों से या जिन फसलों में घुलनशील कार्बोहार्इडे्रटस अधिक मात्रा में होती हैं जैसे ज्वार मक्की, गिन्नी घास नेपियर सिटीरिया आदि से तैयार किया जा सकता है। साइलेज बनाते समय चारे में नमी की मात्रा 55 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

साइलेज जिन गड्ढ़ों में भरा जाता है। उन गड्ढ़ों को साइलोपिटस कहते है। गड्ढा (साइलो) ऊंचा होना चाहिए और इसे काफी सख्त बना लेना चाहिए। साइलो के फर्श और दीवारें पक्की बनानी चाहिए और अगर पशुपालक पक्की नहीं कर सकता तो लिपाई भी कर सकता है।

इन बातों को रखें ध्यान

  • साइलेज बनाने के लिए जो यूरिया है उसको साफ पानी में और सही मात्रा के साथ बनाना चाहिए।
  • घोल में यूरिया पूरी तरह से घुल जाना चाहिए।
  • पूरी तरह जब तैयार हो जाए तभी पशुओं को साइलेज खिलाएं।
  • यूरिया के घोल का चारे के ऊपर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।