आ गया हाथ ,सोलर और बॅटरी तीनो से चलाया जाने वाला स्प्रे पंप

थ्री इन वन स्प्रे पंप एक आधुनिक स्प्रे पंप है । ज्यादातर किसनो के पास हाथ से चलने वाला पंप होता है । जिस से काम भी कम होता है और साथ में मेहनत भी बहुत करनी पड़ती है ऐसे किसानो के लिए हीरा एग्रो ले कर आया है 3 इन 1 स्प्रेअर।

कम मेहनत के साथ इसके और भी बहुत से फायदे है जो निचे लिखे हुए है ।

1) 3 इन 1 स्प्रेअर हाथ से,सोलर पर और बॅटरी से तीनो से चलाया जाता है ।
2) 16 लिटर की क्षमता ।
3) एक बार बॅटरी चार्ज करने के बाद 25 बार स्प्रे कर सकते है ।
4) स्प्रेअर नोझर अत्यंत उत्तम तकनीकी से बना होने के कारण स्प्रे एक जैसा आता है ।
5) इंजिनियरिंग प्लास्टिक से बने होने के कारण आयु मर्यादा बढ जाती है ।
6) 3 इन 1 स्प्रेअर को उत्तम बेल्ट होने के कारण पीठ दर्द नही होता ।

कहाँ से खरीदें

अगर आप इसे खरीदना चाहते है तो इसकी कीमत सिर्फ 3500 रु के करीब ज्यादा जानकारी के लिए आप हिरा अॅग्रो कॅाल सेंटर से 7741903237 / 9370722722 संपर्क कर सकते है । अगर आप व्हाट्सअप का प्रयोग करते है ।

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सोलर स्प्रेअर कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

एक शहर जिसने छत पर सब्ज़ी उगाकर दूर की बेरोज़गारी

दक्षिण अफ्रीका के शहरों में खेती की एक विधा शांति से देश की शहरी गरीबी और बेरोज़गारी से लड़ रही है। दक्षिण अफ्रीका में लोग इसे शहरी खेती कहते हैं। जोहेनसबर्ग जैसे शहरों में 60 प्रतिशत तक सब्जी इसी छत वाली खेती से आती है।

शहरी खेती और कुछ नहीं, बल्कि घरों की छत पर की जाने वाली खेती ही है जिसे शौकिया तौर पर भारत में भी बहुत से शहरी करते हैं। लेकिन बस अंतर तकनीक और फसलों के चुनाव और प्रबंधन का है।

बेरोजगारी मिटाने के लिए एक गंभीर औजार

अफ्रीका में छत पर की जाने वाली या रूफटॉप खेती का शौक नहीं, बल्कि बेराज़गारी मिटाने के एक गंभीर औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए वहां के प्रशासन और शोधकर्ताओं ने मिलकर ऐसी फसलों और सब्ज़ियों के सुझाव और उन्नत बीज जारी किये जो आसानी से छत पर उगाई जा सकें। इसका असर भी जल्द ही दिखने लगा।

एक छोटी सी सोच ने दिया रोजगार

अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनल अलजज़ीरा के अनुसार, अफ्रीका जैसे देश में जहां हर चार में से एक व्यक्ति बेरोज़गार है, इस छोटी सी सोच ने बहुतों को रोज़गार दिया है। भारत में भी रूफटॉप खेती को लेकर कई प्रयास किये गए। साल 2014-15 में कर्नाटक सरकार ने नागरिकों को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप तकनीक में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर छूट की घोषणा की थी।

भारत के लोगों को फिलहाल फायदा नहीं

इसी तरह राजस्थान में भी घर की छत पर सब्ज़ियां उगाने वाले लोगों को सब्सिडी की तोहफा देने की घोषणा की गई थी। हालांकि भारत में ये प्रयास एकीकृत रूप से अभी तक लागू नहीं किये जा सके हैं। संगठित न होने के कारण ही इनसे लोगों और बाज़ार को फायदा नहीं हो पा रहा है

इस विधि से खेती करने से नहीं करना पड़ेगा कीटनाशक दवाइओं पर खर्च

किसान खेत की जुताई का काम अक्सर बुवाई के समय करते हैं। जबकि फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर ग्रीष्म ऋतू में खेत को खाली रखना बहुत ही ज्यादा लाभप्रद हो सकता हैं।

क्योंकि फसलों में लगने वाले कीट जैसे सफेद लट, कटवा इल्ली, लाल भृंग की इल्ली तथा व्याधियों जैसे उखटा, जड़गलन ककी रोकथाम की दृष्टि से गर्मियों में गहरी जुताई करके खेत खाली छोड़ने से भूमि का तापमान बढ़ जाता हैं जिससे भूमि में मौजूद कीटों के अंडे, प्यूपा, लार्वा और लट ख़त्म हो जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप रबी एवं खरीफ में बोई जाने वाली तिलहनी, दलहनी खाद्दान्न फसलों और सब्जयों में लगने वाले कीटों- रोगों का प्रकोप काम हो जाता हैं।

क्योंकि जुताई के समय भूमि में रहने वाले कीट उनकी अपरिपक्व अवस्था जैसे प्यूपा, लार्वा भूमि की सतह पर आ जाते हैं जिन पर प्रतिकूल वातावरण एवं उनके प्राकृतिक शत्रुओ विशेषकर परभक्षी पक्षियों का आक्रमण सहज हो जाता हैं। अतः गर्मी में गहरी जुताई करने से एक सीमा तक कीड़े एवं बिमारियों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। जिस से आपका कीटनाशक का खर्च बिलकुल कम हो जाएगा

जुताई कब करें

गर्मियों की जुताई का उपयुक्त समय यथासंभव रबी की फसल कटते ही आरंभ कर देनी चाहिए क्योंकि फसल कटने के बाद मिट्टी में थोड़ी नमी रहने से जुताई में आसानी रहती हैं तथा मिट्टी के बड़े- बड़े ढेले बनते हैं।

जिसे भूमि में वायु संचार बढ़ता हैं। जुताई के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा रहता हैं क्योंकि कीटों के प्राकृतिक शत्रु परभक्षी पक्षियों की सक्रियता इस समय अधिक रहती हैं अतः प्रातः काल के समय में जुताई करना सबसे ज्यादा लाभदायक होता हैं।

गर्मियों की जुताई कैसे करें

गर्मी की जुताई 15 सेमी. गहराई तक किसी भी मिट्टी पलटने वाले हल से ढलान के विपरीत करनी चाहिए। लेकिन बरनी क्षत्रों में किसान ज्यादातर ढलान के साथ- साथ ही जुताई करते हैं जिससे वर्षाजल के साथ मृदा कणों के बहने की क्रिया बढ़ जाती हैं।

अतः खेतों में हल चलाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहियें की यदि खेत का ढलान पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ होतो जुताई उतर से दक्षिण की और यानी ढलान के विपरीत ढलान को काटते हुए करनी चाहियें। ऐसा करने से बहुत सारा वर्षा का जल मृदा सोख लेती हैं और पानी जमीन की निचली स्थान तक पहुंच जाता हैं जिससे न केवल मृदा कटाव रुकता हैं बल्कि पोषक तत्व भी बहकर नहीं जा पाएंगे।

इन आसान तरीकों से मिलेगा मोती की तरह साफ दूध

किसान भाइयों भारत दुनिया का कुल 18.43 फीसदी दुग्ध उत्पादन करता है. ये तो हम सभी लोग जानते है कि दूध में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है. सबसे बड़ी समस्या आती है दूध को खराब होने से बचाना.

ज्यादा दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथ साथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध मिल सके.

अक्सर देखा जाता है कि कच्चा दूध जल्दी खराब होता है. खराब दूध अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

  • थनों में इंफैक्शन का होना.
  • पशुओं का बीमार होना.
  • पशुओं में दूध के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.
  • हार्मोंस की समस्या.
  • पशुओं की साफसफाई न होना.
  • दूध दुहने का गलत तरीका.
  • दूध दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.
  • दूध जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.
  • चारे व पानी का खराब होना.
  • थनों का साफ न होना.

स्वच्छ दूध उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

  •  पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.
  • बीड़ी सिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध में बदबू आ सकती है.
  • पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.
  • शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.
  • दूध दुहने वाला सेहतमंद व साफ सुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.
  • दूध रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.
  • दूध दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

  • दूध दुहने से पहले थन से दूध की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध में इंफैक्शन हो सकता है.
  • दूध दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.
  • एक पशु का दूध 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.
  • दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.
  • दूध के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए त तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.
  • स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.
  • पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.
  • दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.
  • दूध दुहते समय ग्वालों को दूध या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.
  • एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

  • दूध की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है

.दूध की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है।

मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

आवारा पशुओं को खेतों से दूर रखने के लिए अपनाएं यह 10 तरिके

भारत का हर एक किसान आवारा पशुओं के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च समेत कई घरेलू चीजों से तैयार हर्बल घोल इस दिशा में कारगर साबित हो रहा है।

हर्बल घोल की गंध से नीलगाय,गाय और दूसरे जानवर 20-30 दिन तक खेत के आसपास नहीं फटकते हैं। कृषि के जानकार, वैज्ञानिक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) के किसान सलाहकार किसानों को इऩ देसी नुस्ख़ों को आजमाने की सलाह दे रहे हैं।

नीलगाय झुंड में रहती हैं तो जितना ये फसलों को खाकर नुकसान करती हैं उससे ज्यादा इनके पैरों से नुकसान पहुंचता है। सरसों और आलू के पौधे एक बार टूट गए तो निकलना मुश्किल हो जाता है।

परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए। हालांकि लंबे समय के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि ये (नीलगाय) बहुत चालाक जानवर हैं तो बाड़ लगवाना सबसे बेहतर रहता है।

नीलगाय,गाय रोकने के लिए इस तरह बनायें हर्बल घोल

  • नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  • खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  • खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  • खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  • नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  • एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  • गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  • देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  • कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

यह मशीन करती है गेहूं की नई तकनीक से बुवाई ,कम पानी में होती है अधिक सिंचाई

समय के साथ-साथ खेती में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। अभी भी बहुत से किसान गेहूं की बुवाई बीज को हाथों से छिड़क कर ही करते हैं, लेकिन आज के समय ऐसी मशीन आ गई है जिससे किसान गेहूं की बुवाई कर सकते हैं, जिससे न सिर्फ समय की बचत होती है बल्कि इससे कई और फायदे भी होते हैं। आइये हम आपको बताते हैं कि ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल से गेहूं की बुवाई कैसे होती है और इसके क्या फायदे हैं।

ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल मशीन (Raised Bed Seed Drill Machine) मिट्टी उठा कर बुवाई करने की तकनीक पर आधारित है। इसमें मिट्टी उठाने के लिये रिजर तथा बेड बनाने के लिये बेड शेपर लगे होते हैं। रेजर बनने वाली नाली (बरे) की चौड़ाई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। मशीन के अगले भाग में लगे रेजर मिट्टी उठाने के लिये का कार्य करते हैं, फरो ओपनर इस उठी हुई मिट्टी पर बुवाई करता हैं, तथा बेड शेपर उस उठी हुई मिट्टी को रूप देते हैं।इस प्लांटर के द्वारा बेड पर दो या तीन लाइन बीज एवं खाद की बुवाई की जाती है।

इस तकनीक से बुवाई करने से फसल वर्षा के पानी का भरपूर उपयोग करती है तथा सिंचाई की स्थिति में काफी कम पानी लगता है तथा कार्य जल्दी पूरा हो जाता है। इस मशीन के द्वारा 25 प्रतिशत खाद एवं बीज की बचत होती है। इस पद्धति से बुवाई करने से 4 एकड़ की सिंचाई करने में जितना पानी लगता है उतने ही पानी से 6 से 8 एकड़ की सिंचाई की जा सकती है।इस प्लांटर के द्वारा बुवाई करने के बाद निकाई गुड़ाई आसानी से की जा सकती है।

साथ ही इस विधि से गेहूं की बुवाई करने से आप ज्यादा उत्पादन ले सकते है और नदीन भी बहुत कम उगते है । रेज्ड बेड सीड ड्रिल से सिर्फ गेहूं ही नहीं और भी बहुत सारी फसलें जैसे मक्का ,सोयबीन,दालें आदि की बुवाई कर सकते है । बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाती है आप किसी भी बुवाई मशीन त्यार करने वाली वर्कशाप पर पता कर सकते है ।

यह मशीन कैसे बिजाई करती है उसके लिए वीडियो देखें

पूसा यूनिवर्सिटी की और से गेहूं की तीन नईं किस्मे विकसित किसानों को कर देंगी मालामाल

खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बाद किस्मों के सुधार में लगे देश के कृषि वैज्ञानिकों ने भोजन में बड़े पैमाने पर उपयोग होने वाले गेहूं की तीन नई किस्में विकसित की है। चालू रबी सीजन में किसानों को फील्ड ट्रायल के तौर पर बोने के लिए इन किस्मों के बीज दिए जायेंगे।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजवीर यादव ने बताया कि बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित 57वें अखिल भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान गेहूं की छह किस्मों की पहचान की गई। इनमें तीन किस्में एचडी 3226, एचडी 3237, एचआई 1620 आईएआरआई ने विकसित की हैं।

उन्होंने बताया कि चालू रबी सीजन में कुछ प्रगतिशील किसानों को इन किस्मों के बीज फील्ड ट्रायल के तौर पर बुवाई के लिए दिए जायेंगे तथा सक्षम अधिकारी द्वारा अधिसूचना जारी के बाद, इन किस्मों के बीज किसानों के लिए उपलब्ध कराये जायेंगे।

उन्होंने बताया कि एचडी 3226 किस्म की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता जहां 57.7 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है, वहीं इसमें प्रोटीन की मात्रा 12.80 फीसदी है जोकि अन्य किस्मों से ज्यादा है। साथ ही इस किस्म में ब्लैक, ब्राउन और येलो रस्ट के साथ करनाल बंट की प्रतिरोधक क्षमता भी है।

उन्होंने बताया कि एचडी 3226 किस्म की बुवाई सिंचित क्षेत्रों के राज्यों पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तर भारत के अन्य राज्यों के लिए उपयुक्त है। अच्छी पैदावार के लिए इस किस्म की बुवाई समय से यानि नवंबर के पहले सप्ताह में करना उपयुक्त है। इसी तरह से एचडी 3237, एचआई 1620 किस्मों की बुवाई इन राज्यों में किसान असिचिंत क्षेत्रों में भी कर सकते हैं।

इन किस्मों से जहां किसान गेहूं की अधिकतम पैदावार ले सकेंगे, वहीं रोग प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है।

जाने हरियाणा की मंडियों में किस कीमत पर बिका बासमती

हरियाणा में बासमती की आवक शुरू हो गई है। नई आवक के साथ कुश किसान पिछले साल की रखी हुई बासमती भी ला रहे है। पंजाब में तरणतारण और अमृतसर में भी बासमती की आवक शुरू हो गई है।

हरियाणा में नई बासमती का शुरआती भाव अच्छा है । पिछले साल परचेजरों द्वारा हाथ से कटाई वाली धान की किस्म 1509 को प्रति क्विंटल 2729 रुपए और कंबाइन से काटी गई फसल 2550 प्रति क्विंटल तक खरीदी थी।

इस शुक्रवार को सिरसा में नई 1509 धान 2700 रूपये बिका तो पीबी 1 पुरानी का भाव 2900 रूपये रहा । डीपी 1401 यहाँ 3120 रूपये बिका । घरोंडा मंडी में नये 1509 का भाव 2531 रूपये रहा तो टोहाना में इसका भाव 2800 रूपये रहा ।

कुरुक्षेत्र में 1509 2425 बिका । गोहाना में 1509 का रेट 2511 और पूंडरी में 2370 रूपये बिका । लाडवा में 2300 से लेकर 2630 रूपये तक बिका । रौदोर में 2300 से 2550 और ऐलनाबाद में 1509 का भाव 2500 से 2700 रूपये रहा । तरनतारन में 1121 का भाव 2870 रूपये अधिकतम रहा ।
नरेला में 1509 का भाव 2700 रूपये रहा ।