अब बेकार पड़ी एक एकड़ जमीन से भी किसान कमा सकेंगे 80,000 सालाना, सरकार ला रही है ये योजना

किसान अब अपनी बेकार या कम उपज देने वाली जमीन से भी पैसा कमा सकेंगे। सरकार सोलर बिजली के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसानों की बंजर या बेकार पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने जा रही है। सरकार इसे सोलर फार्मिंग का नाम दे रही है।

सोलर प्लांट के लिए एक एकड़ जमीन देने पर उन्हें घर बैठे सालाना लगभग 80,000 रुपए मिलेंगे। सोलर फार्मिंग को अमली जामा पहनाने के लिए नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय किसान ऊर्जा सशक्तिकरण मिशन (कुसुम) लांच करने की तैयारी में है। योजना के मुताबिक किसान खेतों में सोलर प्लांट के साथ वहां सब्जी व अन्य छोटी-मोटी फसल भी उगा सकते हैं।

 साल भर में होगी 80,000 की कमाई

नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय  के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एक मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाने में 5 एकड़ जमीन की जरूरत होती है। एक मेगावाट सोलर प्लांट से साल भर में लगभग 11 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन होता है। उन्होंने बताया कि किसान के पास एक एकड़ भी जमीन है तो वहां 0.20 मेगावाट का प्लांट लग सकता है।

इस प्लांट से सालाना 2.2 लाख यूनिट बिजली पैदा होगी। उन्होंने बताया कि कुसुम स्कीम के मुताबिक जो भी डेवलपर्स किसान की जमीन पर सोलर प्लांट लगाएगा, वह किसान को प्रति यूनिट 30 पैसे का किराया देगा। ऐसे में, किसान को प्रतिमाह 6600 रुपए मिलेंगे। साल भर में यह कमाई लगभग 80,000 रुपए की होगी। जमीन पर मालिकाना हक किसान का ही रहेगा। किसान चाहे तो सोलर प्लांट के साथ यहां छोटी-मोटी खेती भी कर सकता है।

बिजली खरीद पर सब्सिडी

मंत्रालय के मुताबिक किसानों की जमीन पर लगने वाले सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली को खरीदने के लिए सरकार बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को सब्सिडी देगी। सरकार की योजना के मुताबिक डिस्कॉम को प्रति यूनिट 50 पैसे की सब्सिडी दी जाएगी। एमएनआरई के मुताबिक ऐसे में किसानों की जमीन पर लगने वाले सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली की बिक्री सुनिश्चित रहेगी। जल्द ही इस स्कीम को कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाएगा।

किसान चाहे तो कर सकते हैं खेती

मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक किसान चाहे तो खेत में शेड लगाकर शेड के नीचे सब्जी या अन्य उत्पादों की खेती कर सकता है और शेड पर सोलर पैनल लगवा सकता है। सिंचाई के अभाव में बहुत किसान अपने खेत से कुछ भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। रिटर्न नहीं मिलने की वजह से किसानों ने अपनी जमीन को बेकार भी छोड़ रखा है। ये किसान अब सोलर फार्मिंग कर सकते हैं।

चारा मिलाने से डालने तक 4 लोगों का काम अकेले करती है यह मशीन

डेरी फार्मिंग में हर दिन नई से नई मशीन आ रही है जो डेरी के काम को और आसान कर रही है अब सिर्फ 2 -3 आदमी बड़े से बड़ा डेरी फार्म संभाल सकते है ।

आज हम जिस मशीन की बात कर रहे है वो भी 4 काम कर देती है ।इस मशीन का नाम JF Mix 2000 है यह मशीन काटने और मिक्सिंग करने का काम करती है ।

यह मशीन भूसे को फीड के साथ अपने आप ही मिक्स कर देती है और उसके बाद इस मशीन की सहयता से आप पशुओं को चारा सीधे ही उनकी नांद में डाल सकते है ।

यह मशीन वहां पर ज्यादा कामयाब है जहाँ पर काफी ज्यादा पशु होते है और लेबर की कमी हो । इस मशीन को ट्रेक्टर के साथ चलाया जाता है और आप इस मशीन को कहीं भी लेकर जा सकते है । इस मशीन को खरीदने के लिए आप नीचे दी हुए नंबर पर क्लिक करें ।

और ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखें

पंजाब के किसान ने शुरू की ‘ड्रैगन फ्रूट’ की खेती , एक बार की मेहनत-कमाई 15 साल तक

गुजरात के कच्छ जिले में होने वाला ड्रैगन फ्रूट अब प्रदेश के किसानों के लिए आय का अच्छा जरिया बन गया है। बरनाला के गांव ठुल्लेवाल के किसान हरबंत सिंह इसकी खेती से खूब मुनाफा कमा रहे हैं। अब वह दूसरे किसानों को भी इसकी खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

बड़ी बात यह है कि इसकी कलमें एक बार लगाने पर यह 15 साल तक फल देती हैं। यानी एक बार बिजाई के बाद 15 साल कमाई ही कमाई। इसके साथ ही इसे पानी खड़ा होने वाली जमीन के अलावा किसी भी किस्म की मिट्‌टी में लगाया जा सकता है। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पानी की भी नाममात्र जरूरत रहती है।

गर्मी के सीजन में 10 दिन में एक बार और सर्दियों में एक महीने में एक बार सिंचाई की आवश्यकता रहती है। किसान इस फ्रूट के साथ धान को छोड़कर कोई भी फसल लगाकर कमाई दोगुनी कर सकते हैं। एक किला जमीन में इसकी 1600 कलमें लगती हैं।

15 साल तक इसमें फ्रूट लगेगा जो तीसरे साल से भरपूर उत्पादन देने लगेगा। मेहनत के बल पर एक एकड़ से 50 क्विंटल फल हो सकते हैं जिसे बेचकर पांच लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। अन्य कोई फसल इतनी कमाई नहीं दे पाती।

ड्रैगन फ्रूट के यह फायदे:

सिविल अस्पताल बरनाला के डॉक्टर मनप्रीत सिद्धू ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट शरीर में एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। शरीर में खून, चर्बी, दिल व चमडी में हर तरह की समस्या ऑक्सीडेंट से पैदा होती है। ड्रैगन फ्रूट खून को साफ करने, शरीर की फालतू चर्बी को रिमूव करने, प्लेटनेट सेंल बढाने आदि का काम करता है।

कब लगाएं :

हरबंत सिंह ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की कलम को दो महीने तक गमले में तैयार की जाती है। अप्रैल से लेकर सिंतबर तक इसे किसी भी समय लगाया जा सकता है। गर्मियां इसके लिए अनुकूल समय है।

अब…दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी

डेढ़ साल पहले की बात है। मैंने सोशल मीडिया पर ड्रैगन फ्रूट के बारे जाना और कच्छ (गुजरात) से 400 पौधे ले आया। इसकी खेती की जानकारी नहीं थी, लेकिन रिस्क लेकर एक पौधे की 70 रुपए कीमत चुकाई। 28 हजार रुपए खर्च करके 400 पौधे लेकर आया और दो कनाल में इन्हें लगाया।

पहले साल 58 हजार रुपए खर्च करके एक साल तक इन्हें पाला। इससे मुझे 40 हजार के फल प्राप्त हुए। इसके अलावा मैनें करीब 50-60 कलमें भी बेचीं। सफल प्रयोग के बाद अब मैं खुश हूं तथा दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी कर रहा हूं।’ -हरबंत सिंह, किसान

किसान ने देसी जुगाड़ से बना लिया अपना कोल्ड स्टोर अब ख़राब नहीं होता प्याज

किसान रोहित पटेल मध्य प्रदेश के धार जिले के रहने वाले हैं। देशी तकनीक के जरिए रोहित पटेल ने प्याज स्टोरेज का ऐसा कारगर जुगाड़ निकाला है कि हर साल प्याज बेच कर ठीक ठाक लाभ कमा रहे हैं। कोल्ड स्टोरेज की वजह से रवि पटेल अपने प्याज खेत से निकालकर तुरंत नहीं बेचते,

कुछ दिन अपने देशी जुगाड़ तकनीक के कोल्ड स्टोरेज में रखकर प्याज के ठीक ठाक दाम मिलने का इंतजार करते हैं और फिर बेचते हैं। प्याज को खेत से निकालते ही 2 से 3 रुपए किलो के भाव पर बेचने के बजाय बारिश का मौसम बीत जाने के बाद रवि पटेल 30 से 35 रुपए किलो में बेच कर लाभ कमा रहे हैं। तीसरे साल भी उन्होंने प्याज का इसी तकनीक से स्टोरेज किया है।

दरअसल रोहित ने प्याज के कोल्ड स्टोरेज तैयार करने के लिए कोई भारी भरकम इंतजाम नहीं किया है। थोड़ा सा दीमाग लगा कर उन्होंने उपोयगी बंदोवस्त किया है। बंद कमरे में लोहे की जाली को जमीन से 8 इंच ऊंचा बिछा देते हैं रवि। ऐसा करने के लिए कुछ-कुछ दूरी पर दो-दो ईंटें रखते हैं।

उसके ऊपर प्याज का स्टोरेज करते हैं। लगभग 100 स्क्वेयर फीट की दूरी पर एक बिना पेंदे की कोठी रखते हैं। ड्रम के ऊपरी हिस्से में एग्जॉस्ट पंखे लगा देते हैं। पंखे की हवा जाली के नीचे से प्याज के निचले हिस्से से उठ कर ऊपर तक आती है। इससे पूरे प्याज में ठंडक रहती है। दोपहर में हवा गर्म होती है, इसलिए दिन की बजाय रातभर पंखे चलाते हैं।

पटेल ने इस तकनीक से 1000 क्विंटल प्याज का भंडारण किया है। 2000 क्विंटल और खेतों में हैं, जो इसी तरह भंडारण करने वाले हैं। पिछले साल उन्होंने बारिश बाद 200 क्विंटल प्याज 35 रु. किलो के भाव बेचे थे।

पटेल बताते हैं कि इस तकनीक से 80 फ़ीसदी तक प्याज को सड़ने से बचाया जा सकता है। रोहित के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज तैयार करने से पहले जहां 10 प्याज खराब होते थे, तो अब 2 होते हैं। इसकी वजह बताते हुए रवि कहते हैं कि किसी प्याज में सड़न लगती थी, तो आसपास के प्याज खराब कर देता था। अब कोई प्याज सड़ता है तो पंखे की हवा से वहीं सूख जाता है।

अपनी जुगाड़ पर फुले नहीं समा रहे रोहित बतात हैं कि प्याज की फसल अमूमन मार्च-अप्रैल में निकलती है। इस समय आवक अधिक होने से प्याज का मंडी भाव 2 से 3 रु. किलो तक पहुंच जाता है। बारिश के बाद यही भाव 30 से 35 रु. किलो न्यूनतम होता है लेकिन प्याज गर्मी से जल्दी खराब होने के कारण इसका स्टोरेज किसान के लिए चुनौती होता है।

ज़ाहिर है अपने जुगाड़ से रवि ने अपने लिए एक लाभकारी रास्ता तो तैयार कर लिया। जरा जोर आप भी लगाएंगे तो आप भी ऐसा कुछ कर पाएंगे। फिलहाल आप अपने प्याज को इस तरीके से सड़ने से बचाइए और बेहतर आमदनी का इंतजाम कीजिए।

अब जर्मन मशीन से खारा पानी को मीठा कर खारे पानी से होगी सिंचाई

खारेपानी के कारण फसलों का उत्पादन नहीं करने वाले किसानों के लिए ये लिए राहत की खबर है। अब जर्मन तकनीक की वाटर सॉफ्टनर मशीनों से खारे पानी को मीठा कर किसान आसानी से अब अपने खेतों में फसलों का उन्नत उत्पादन कर सकेंगे।

इसके लिए अठियासन रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर लगाए गए वाटर सॉफ्टनर मशीन का प्रयोग सफल रहा है। अब केवीके वैज्ञानिक जिलेभर के किसानों को कृषि प्रशिक्षण के दौरान खारे पानी को मीठा कर फसल उपयोग के लिए जानकारी देंगे। केवीके की ट्यूबवैल पर स्थापित इस मशीन के माध्यम से 5 से 8 हजार टीडीएस तक काम करने का दावा किया जा रहा है।

ऐसे में जिल क्षेत्रों में खारे पानी के कारण किसानों के सामने फसल सिंचाई को लेकर रही परेशानी से भी किसानों को काफी हद तक निजात मिलने की संभावना है। वैज्ञानिकों की माने तो खारे पानी में जो साल्ट बोड रहता है, जिसे ये मशीन अलग कर देती है। ऐसे में ये तकनीक किसानों के लिए खारे पानी को मीठा करने में काफी कारगर साबित हो रही है।

^ केवीके की ट्यूबवैल पर लगाए वाटर सॉफ्टनर संयंत्र से खारे पानी को मीठा कर पहले मूंग बीच उत्पादन, अब बगीचे और 2 हैक्टेयर में जीरे के उत्पादन में पानी काम में लिया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठी के दौरान इस तकनीक के बारे में बताएंगे।

पाइप लाइन चॉक होने देना, बालों का झड़ना, खाज-खुजली और स्कीन के रुखेपन को दूर करती है। बोरवैल का पानी इस्तेमाल करने वाले लोग भी इस मशीन का उपयोग कर सकते हैैं। डॉ.एसआर कुमावत, सहायक प्राध्यापक

जमीन की उतरी स्तर पर बनने वाली सफेद परत को कम करके, जमीन पर आनेवाली दरारों में सुधार, जमीन मुलायम होकर, उपजाऊ बनती हैं।

  •  फसल और पौधों में पत्ते जलने का प्रमाण कम होकर खेत में हरियाली बढ़ती हैं।
  • नमकीन/खारे पानी से बंद पड़ने वाले ड्रिपर्स और स्प्रिंकलर साफ होकर पहले जैसे काम करना शुरू कर देते है। केमिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कंडिशनर से निकला पानी भौतिक रचना के अनुसार हलका होने से पौधे के जड़ों को आसानी से मिलता है।

कम पानी में अधिक उत्पादन ले सकते है।, यानी पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। फसल की जड़ों पर मूली पर बना नमकीन स्तर कंडिशनर से निकले पानी में घुलकर साफ हो जाता है। मूली की कार्यक्षमता बढ़कर फसल हरीभरी रहने में मदद मिलती हैं।

  • फसल और पौधों के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथ पानी का पीएच विकसित होने के कारण फसल का उपयुक्त मूल द्रव्य मिलते है।
  • तीव्र विद्युत लहरी के कारण विषाणु का प्रमाण
  • पानी का कम होकर जैविक दृष्टि से पानी शुद्ध होता हैं।

जिन गायों को बेकार समझ लोगों ने छोड़ दिया, उन्‍हीं से यहाँ होती है लाखों की कमाई

दूध नहीं दे पाने की स्थिति में जिन गायों को किसानों और गौपालकों ने अनुपयोगी समझकर लावारिस भूखा-प्यासा भटकने के लिए छोड़ दिया था। अब उन्हीं गायों के गोबर और पेशाब से नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में कैचुआ खाद, नैचुरल खाद और धूपबत्ती बनाई जा रही है।

वहीं पेशाब से कैमिकल रहित गोनाइल और कीटनाशक दवाईयां व मच्छर भगाने की धूपबत्ती तैयार की जा रही है। कीटनाशक दवाईयां खेती और बागवानी के लिए बेहद उपयोगी हैं। इससे नगर निगम को भी अभी तक करीब 3 लाख रुपये का आर्थिक लाभ हो चुका है।

गौमूत्र से बन रहा गौनाइल

प्रकृति में गाय के गोबर और पेशाब को सबसे पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिन्दू धर्म में गाय के पेशाब और गोबर का उपयोग पंचगव्य में किया जाता है, कहा जाता है कि इसके पीने से मनुष्य के सभी दोष दूर हो जाते हैं। नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में करीब 6000 गाय हैं, इन गायों से प्रतिदिन नगर निगम को 60 हजार किलो गोबर मिलता है।

इस गोबर का नगर निगम ने कई तरह से उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं गाय की पेशाब जिसका अभी तक कोई उपयोग नहीं होता था उससे वहां पर अब फिनाइल के स्थान पर गौनाइल बन रहा है, जो फिनाइल से भी बेहतर कार्य करता है। साथ ही पेशाब से बनने वाले कीटनाशकों का उपयोग खेती में किया जा रहा है। जिससे खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का खात्मा तो होता ही है साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी इसका कोई विपरित असर नहीं पड़ता।

धूपबत्ती में आयुर्वेदिक औषधी और घी का उपयोग

नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में बनाई जा रही धूपबत्ती में गाय का गोबर, लाल चंदन, नागरमोथा, जटामासी, कपूर काचरी, गौमूत्र और देशी घी डाला जाता है। इनको मिलाने के बाद इसे आकार देकर सूखने के लिए रखा जाता है।

गौनाइल ऐसे हो रही तैयार

गौनाइल बनाने के लिए गाय और बछियाओं का गौमूत्र एकत्रित किया जाता है, इसके बाद इसमें चीड़ का तेल और नीम मिलाया जाता है। इससे जहां भी पोछा लगाया जाता है वहां के कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

 मच्छर भगाने वाली धूप

गोबर, गौमूत्र में जामारोजा, तुलसी, नीमगिरी, चीड़ का तेल, कपूर तेल, नीम तेल, नागरमोथा, मैंदा लकड़ी और रोहतक लकड़ी को मिलकर धूपबत्ती तैयार की जा रही है। बताया जाता है कि इसके जलाने से घर में सुगंध तो रहती ही है साथ ही मच्छर भी भाग जाते हैं।

खाद भी हो रही तैयार

गाय के गोबर से गौशाला में कैचुआ खाद भी तैयार की जा रही है, इस खाद को उद्यानों और किसानों को दिया जाएगा। गाय के गोबर को एकत्रित कर उसके स्ट्रक्चर बनाए गए हैं इन पर समय-समय पर पानी का छिड़काव किया जाता है। जब यह सूख जाता है तो इसे छान कर किसानों को जैविक खाद बेचने के लिए तैयार किया जा रहा है।

गोबर से बन रही गोबर गैस

गाय के ताजे गोबर से प्रदेश के सबसे बड़े गोबर गैस प्लांट से गैस तैयार हो रही है, इस गैस से गौशाला में कार्य करने वाले कर्मचारियों एवं गौशाला का भ्रमण करने के लिए आने वाले करीब 200 लोगों का भोजन तैयार होता है। वहीं इससे निकलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

निगम आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं-

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोबर गैस प्लांट और कैचुआ खाद को किसानों में बेचा जाता है। साथ ही गौनाइन का भी उत्पादन शुरू हो गया है जल्द ही इसे बड़े स्तर पर करने के लिए गौशाला में ही बाटलिंग प्लांट लगाया जाएगा। वहीं मार्केट में जल्द ही धूपबत्ती भी ला रहे हैं।

फैक्ट फाइल

  • वर्ष 2017-18 में किसानों को गौशाला से 2.5 लाख रुपये की खाद बेची गई।
  •  होली पर करीब 42 हजार रुपये के कण्डे बेचे गए, साथ ही श्मशान में भी अभी तक करीब 30 शवों का लकड़ी विहीन कण्डों से दाह संस्कार किया गया।
  • 40 हजार की अभी तक गौनाइल बिक चुकी है।
  • अभी तक करीब 10 हजार रुपये की धूपबत्ती बनायी जा चुकी है। इसे जल्द ही मार्केट में लाया जाएगा।

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं।
  • इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

ताईवानी तकनीक से ऐसे करें सब्जी की खेती, 10 गुना अधिक होगा मुनाफा

चंदौली (जितेंद्र उपाध्याय)। सब्जी की आधुनिक खेती देखना है तो आपको बेदहां गांव आना होगा। चंदौली जिले में स्थित इस गांव के सुरेंद्र सिंह ने इस विधा में महारथ हासिल कर ली है। ताइवानी पद्धति से सब्जी उगाकर वे सामान्य की अपेक्षा दस गुना तक अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

पैदावार इतनी है कि हर रोज 20 मजदूर लगाने पड़ते हैं। इससे स्थानीय लोगों को दैनिक रोजगार भी मुहैया हो गया है। बेदहां और मिर्जापुर के मड़िहान में इस पद्धति से की जा रही सब्जी की खेती अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय है।

कैसे करते हैं खेती :

खेत की अच्छी जोताई के बाद गीली भुरभुरी मिट्टी की मेड़ बनाकर उसमें चार-चार इंच की दूरी पर बीज डालते हैं। मेड़ को प्लास्टिक से ढक दिया जाता है। जैसे ही बीज अंकुरित होते हैं, प्लास्टिक में छेद कर पौधे बाहर निकल आते हैं। इस विधि में न तो ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही ज्यादा लागत आती है। फसल में कीड़े भी नहीं लगते हैं। हां, ऊंचाई वाले खेत पर ही फसल उगाई जा सकती है।

बीज और प्लास्टिक ताइवान के :

हरी मिर्च, शिमला मिर्च, खरबूज, तरबूज, टमाटर, खीरा आदि के बीज वे ताइवान से मंगाते हैं। भारतीय बीजों की तुलना में ताइवान के बीज छह से सात गुना ज्यादा पैदावार देते हैं। एक बार तोड़ाई के बाद भी पौधे खड़े रहते हैं। छह माह की फसल में 12 बार तोड़ाई करते हैं।

एक हेक्टेयर में 50 हजार लागत :

हरी मिर्च को ही लें तो पारंपरिक विधि के मुकाबले इस विधि में इसकी लागत काफी कम आती है। एक हेक्टयर में 50 हजार लागत आती है पर मुनाफा चार लाख रुपये तक मिलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि कभी कभी तो इतनी पैदावार हो जाती है कि कई मंडियों में फसल पहुंचानी पड़ती है। हर जिंस में मुनाफा करीब आठ से दस गुना तक होता है।

सिंचाई भी न के बराबर :

इस पद्धति में सिंचाई और उर्वरक की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। पानी में उर्वरक मिलाकर मेड़ों में डाल दिया जाए तो वह हर पौधे की जड़ में पहुंच जाता है। टपक विधि से भी सिंचाई करते हैं। पौधे के ऊपर पानी टपकाकर भी उनकी सिंचाई हो जाती है। प्लास्टिक से ढक दिए जाने के कारण नीचे से उत्पन्न होने वाली वाष्प सहायक साबित होती है।

प्लास्टिक के कई फायदे :

मेड़ों पर बिछाई गई प्लास्टिक से न तो घास पैदा होती है और न ही कीट पतंग फसल को नष्ट कर पाते हैं। घास प्लास्टिक के नीचे ही रहती है और पेड़ों तक नहीं पहुंच पाती। पौधों को बीमारी व कीटों से बचाने के लिए आर्गेनिक दवा का छिड़काव किया जाता है।

फसल से मिला बड़ा फायदा :

सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि धान और गेहूं की फसल पैदा करते-करते थक गए थे। छह साल पूर्व किसान कॉल सेंटर, सब्जी अनुसंधान केंद्र व पूसा इंडस्ट्रीज में जाकर सब्जी की खेती की तकनीक देखी। वहां के सदस्य बने और अपने यहां शुरुआत की। उन्हें भरपूर लाभ मिलता है पर मंडियों में दस फीसद आढ़तिया शुल्क अनावश्यक लगता है। यह बंद होना चाहिए।

यह गन्ना किसान एक एकड़ से कमाता है 2 लाख 80 हज़ार रुपए

युवाओं का कृषि के प्रति बढ़ते रुझान की मिसाल उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में रहने वाले किसान अचल मिश्रा ने पेश की है। इन्होंने गन्ने की आधुनिक तरीके से खेती करते हुए कई बार प्रदेश स्तरीय व जिला स्तरीय पुरुस्कार प्राप्त किए हैं। इस वर्ष भी इन्होंने गन्ना के अच्छे उत्पादन के मद्देनज़र जिले में प्रथम पुरुस्कार प्राप्त किया है।

उनका मानना है कि गन्ने की खेती के लिए उन्होंने केंद्रीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ व कोयबंटूर स्थिति अनुसंधान केंद्रों से सफल खेती की जानकारी प्राप्त की है। यदि उनकी शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो वह लखनऊ विश्वविद्दालय से एल.एल.बी की डिग्री हासिल की है।

वर्ष 2005 से खेती प्रारंभ करने वाले अचल ने साल 2007-08 में गन्ना की खेती से सर्वाधिक उत्पादन के पैमानों पर खरा उतरते हुए उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस वर्ष भी उन्होंने गन्ने की COO- 238 किस्म से प्रति बीघे लगभग 250 क्विंटल से ऊपर की उपज प्राप्त की है। जिस दौरान गन्ने की लंबाई लगभग 18.5 फीट प्राप्त की साथ ही वजन भी अच्छा आंका गया।

बताते चलें कि गन्ने की खेती में वह गोबर की खाद, हरी खाद आदि का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही कीटनाशकों आदि का इस्तेमाल कम से कम करते हैं। पेड़ी की फसल के दौरान वह गन्ने की पत्ती को सड़ाकर एक बेहतर खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यूरिया का इस्तेमाल वह स्प्रे के तौर पर करते हैं। जिस दौरान उसकी 2 से 3 किलोग्राम की मात्रा प्रति एकड़ स्प्रे करते हैं। तो वहीं उनका मानना है यह भी है कि गन्ने की खेती विशेषकर पानी पर निर्भर करती है।

उन्होंने 12 बीघे की खेती से यह साबित कर दिया कि कम रकबे में अच्छी खेती के द्वारा अच्छी कमाई की जा सकती है। शुरुआती दौर में उन्होंने खेती की अधिक जानकारी न होने के कारण महाराष्ट्र के किसानों से भी मुलाकात कर जानकारी ली और गन्ने की अच्छी खेती के गुर सीखे। एक एकड़ की खेती से अचल ने अब 2 लाख 80 हजार रुपए की शुद्ध बचत प्राप्त की।

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर किसान, जानिए कितनी है संपत्ति

देश में आमतौर पर किसान की इमेज एक मेहनतकश व्‍यक्ति की है। जबकि, दुनिया के कुछ देशों में यह स्थिति बिलकुल अलग है। आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि चीन के लियू योंघाउ की नेटवर्थ  29,480 करोड़ रुपए है। योंघाउ दुनिया के सबसे अमीर किसान हैं।

आइए जानते हैं दुनिया के ऐसे ही 5 अमीर किसानों के बारे में…

  • चीन के लियू योंघाउ दुनिया के सबसे बड़े किसान हैं। फोर्ब्‍स मैग्‍जीन के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 29480 करोड़ रुपए है।
  • 1982 में योंघाउ व उनके दो भाइयों ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती शुरू की थी।
  • तीनों भाइयों ने चीन के चेंगडू में कुल 150 डॉलर लगाकर मूर्गी पालन भी शुरू किया।
  • आज योंघाउ के पास चीन और ऑस्‍ट्रेलिया में हजारों हेक्‍टेयर के एग्रीकल्‍चर फार्म हैं।
  • योंघाउ चीन की सबसे बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनी न्‍यू होप ग्रुप के मालिक हैं।

  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार अमेरिका के लोवा निवासी हैरी स्‍टाईन की कुल संपत्ति 22,780 करोड़ रुपए है।
  • हैरी स्‍टाईन का लोवा के एडेल में 10000 एकड़ का सोयाबीन और मक्‍का का फार्म है।
  • स्‍टाईन मूल रूप से अपनी हाईब्रिड बीजों के लिए जाने जाते हैं।
  • प्रमुख बीज कंपनी मोंनसेंटो और सिंग्‍नेंटा को इनके फार्म से ही बीज आपूर्ति की जाती है।
  • हैरी ने 1960 में खेती करनी शुरू की थी और 5 साल बाद ही वे हार्इब्रिड बीज उगाने लगे।
  • उन्‍होंने हाल ही में अपनी स्‍टाईन सीड नाम से कंपनी शुरू की है जिसके बीज सबसे महंगे हैं।

  • ब्‍लेरो मैगी ब्राजील के एग्रीबिजनेस मोघुल एंड्रे मैगी के बेटे हैं। ये ब्राजील के सबसे बड़े सोयाबीन किसान हैं।
  • मैगी के फार्म्स को छोड़ दिया जाए तो ब्राजील सोयाबीन उत्‍पादन में दूसरे नंबर से सीधे 5 नंबर पर आ जाएगा।
  • वे ब्राजील में करीब 4 लाख हेक्‍टेअर फार्म में सोयाबीन की खेती कराते हैं और दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट सोयाबीन उत्‍पादक हैं।
  • मैगी दो बार ब्राजील के सीनेटर चुने गए हैं और मई में उन्‍हें ब्राजील का एग्रीकल्‍चर मिनिस्‍टर बनाया गया है।
  • उनके फार्म की सोयाबीन का सबसे बड़ा खरीददार चीन है जो 1990 से डायरेक्‍ट इंपोर्ट कर रहा है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 7705 करोड़ रुपए है।

  • टॉनी का नंबर दुनिया के पांच बड़े किसानों में चौथा है, उन्‍होंने 1951 में 25 गायों से डेयरी फार्मिंग शुरू की थी।
  • ऑस्‍ट्रेलिया के एडिल्विश निवासी टॉनी पेरिच ऑस्‍ट्रेलिया के सबसे बड़े डेयरी फार्मर के रूप में जाने जाते हैं।
  • आज उनके पास 2 हजार गाय हैं और 11000 हेक्‍टेअर का एग्रीकल्‍चर फार्म है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 5159 करोड़ रुपए है।
  • टॉनी ने हाल ही में 1200 फ्लैट वाली एक हाउसिंग सोसाइटी को भी डेवलप करना शुरू किया है।

  • दुनिया का सबसे बड़े इन्‍वेस्‍टर वारेन बफे के बड़े बेटे हावर्ड बफे भी एक किसान हैं।
  • हावर्ड को उनके पिता ने 3 बार कॉलेज में एडमिशन दिलाया लेकिन उन्‍होंने तीनों बार पढ़ाई छोड़ दी
  • 80 के दशक में हावर्ड ने सोयाबीन और मक्‍का की खेती शुरू कर दी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  • वे आज 3900 एकड़ में अरीजोना में, 9200 एकड़ साउथ अफ्रिका में और 4400 एकड़ में अमेरिका में खेती करते हैं।
  • उनके पास 50 से ज्‍यादा छोटे बड़े ट्रैक्‍टर हैं। उनके पास कुल मिलकार 2,50,000 डॉलर से ज्‍यादा की एग्री मशीनरी है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल नेट वर्थ यानी संपत्ति 1340 करोड़ रुपए से अधिक है।