सिर्फ 36 हजार रुपए देकर लगाए सोलर पंप बाकी पैसा देगी सरकार, जाने पूरी योजना

केंद्र सरकार ने कहा है कि उसकी किसानों को मुफ्त में सोलर पंप देने की कोई योजना नहीं है। हालांकि, सरकार ने कहा है कि वह किसानों सोलर पैनल और पंप देने के लिए एक नई योजना लेकर आ रही है। इस योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार दोनों 30-30 फीसदी योगदान देंगे। अन्य 40 फीसदी खर्च किसान को खुद वहन करना होगा।

जल्द लॉन्च करेंगे योजना

एक सवाल के जवाब में नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने राज्यसभा में कहा कि किसानों को सरकार की किसानों को मुफ्त में सोलर पंप देने की कोई योजना नहीं है। सिंह ने कहा कि हम ऐसी ही एक योजना जल्द लॉन्च करने वाले हैं जिसमें हम कुल लागत का 30 फीसदी खुद वहन करेंगे।

उन्होंने कहा कि हम आशा करते हैं कि सोलर पैनल और पंप की कुल लागत का 30 फीसदी राज्य वहन करेंगे। इसके अतिरिक्त राशि किसान को खुद वहन करनी होगी। एक अन्य सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि राजस्थान से सभी गांवों और मजरों में बिजली पहुंच गई है।

90,000 रुपए के पंप के लिए किसानों को देने होंगे सिर्फ 36,000 रुपए

नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के एक अधिकारी के अनुसार एक एक हॉर्सपावर सोलर पंप की लागत 90,000 रुपए आती है। ऐसे में किसानों को अपने खेत में सोलर पंप लगवाने के लिए 40 फीसदी हिस्सेदारी के रूप में 36,000 रुपए देने होंगे।

हालांकि, इस राशि को वहन करने के लिए किसानों को किस्त की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगा। एमएनआरई के अनुसार, किसानों को सब्सिडी दर पर सोलर पंप देने के मामले में राज्यों ने अपनी हामी भर दी है। इस योजना के देशभर के 27.5 लाख किसानों को सोलर पंप देने की तैयारी की गई है।

22 एकड़ में आमों का बाग़ लगा कर यह किसान ले रहा प्रति एकड़ 1.75 लाख का मुनाफा

प्रगतिशील किसान बलजिंदर सिंह आम रिवायती खेती से हटकर आम के बाग लगाकर इलाके में काफी पहचान बना चुके हैं और काफी आमदन कमा रहे हैं। रणजीत बाग के रहने वाले किसान बलजिंदर सिंह ने बताया कि बागबानी विभाग के सहयोग से इस क्षेत्र में काफी तरक्की हासिल की है।

उन्होंने बताया कि शुरू में 10-12 एकड़ से शुरू किए इस व्यवसाय को बलजिंदर सिंह ने 22 एकड़ मे तबदील किया और अपनी मेहनत और विभाग के सहयोग से अब वार्षिक एक एकड़ में से 1 लाख 75 हजार रुपए की आमदन प्राप्त कर रहा है। उन्होंने बताया कि बाग लगाकर शुरुआत के दौर में बाग में से आमदन एक पेंशन के रूप में मिलनी शुरू हो जाती है। इसलिए पानी और दवाइयों की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है।

उन्होंने बताया कि समय-समय पर विभाग की ओर से दवाइयां आदि उपलब्ध करवाई जाती हैं। वहीं, एक एकड़ बाग लगाने पर राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत बागबानी विभाग की ओर से 75 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है, जबकि स्प्रे पंप पर 50 प्रतिशत।

वहीं, बागबानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बलविंदर सिंह व बागवानी अधिकारी प्रितपाल सिंह ने बताया कि किसानों को रिवायती फसलों के चक्कर से बाहर निकालने के लिए फसली विभिन्नता से जोड़ा जा रहा है। दिनों-दिन घटते पानी के स्तर के चलते किसानों को सहायक व्यवसाय अपनाने चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि फसली विभिन्नता संबंधी किसी प्रकार की जानकारी के लिए बागबानी दफ्तर गुरदासपुर संपर्क किया जा सकता है।

एप्पल बेर का बाग लगाएं ,15 साल बगैर पूंजी का उत्पादन पाएं

एप्पल बेर लांग टाइम इंवेस्टमेंट है। इससे एक बार फसल लेने के बाद करीब 15 साल तक फसल ले सकते हैं। कम रखरखाव व कम लागत में अधिक उत्पादन के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बेर… लगभग सबने खाया और देखा होगा, लेकिन एप्पल जैसा आकार और खाने में बेर का स्वाद, यह शायद पहली बार ही सुना होगा, लेकिन यह सच्चाई है।  थाईलैंड का यह फल इंडिया में थाई एप्पल बेर के नाम से प्रसिद्ध है। थाईलैंड में इसको जुजुबी भी कहते हैं।

राजस्थान के सीकर के  रसीदपुरा गांव के अरविन्द और आनंद ने ऐसे ही बेर अपने 21 बीघा खेत में उगा रखे हैं। आनंद बताते हैं कि 14 माह पहले इस फल के 1900 पेड़ खेत में लगाए गए थे। यह दूसरा मौका है जब पेड़़ों में फल आए हैं।

पांच वर्ष बाद उन्हें 21 बीघा के इस खेत से सालाना करीब 25 लाख रुपए की आय होने वाली है। उन्हें इस वर्ष करीब आठ लाख रुपए की आय होगी। उनकी प्रेरणा लेकर करीब 50 और खेतों में थाई एप्पल बेर के पेड़ लगाए गए हंै।

चार माह में फल

बकौल अरविन्द और आनंद पेड़ लगाने के चार माह बाद इसमें फल आना शुरू हो जाता है। पहली बार फल प्रति पेड़ में दो से पांच किलो, दूसरी बार में प्रति पेड़ 20 से 40 और पांच वर्ष बाद प्रति पेड़ में एक से सवा क्विटल फल आते हैं। इसके लिए सीकर का क्षेत्र अनुकूल है। यह माइनस डिग्री से +50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी कारगर हुआ है। उनका कहना है कि अप्रेल माह में इसके पेड़ को नीचे से गन्ना की तरह काट दिया जाता है।

दिसंबर तक इसके फलों को बाजार में सप्लाई किया जा सकता है। यह बेर 60 से 120 ग्राम वजनी होता है। आनंद के पिता किशोर सिंह थाईलैंड गए थे। वहां पर थाई एप्पल बेर की खेती देखकर आए थे। इसके बाद हम दोनों भाइयों ने नेट पर इसके बारे में पढ़ा। अहमदाबाद जाकर इसकी खेती देखी। सीकर में इसका प्रयोग किया तो सफल रहा।

सेब व बेर के मिश्रित स्वाद वाले फल की मांग इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा, मुंबई समेत बड़े शहरों में बढ़ रही है। बेर के खरीदार अधिकांश निजी कंपनियां है। वे इन्हें विदेशों में निर्यात करती हैं। इसके आकर्षक रूप व स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ रही हैं।  पहले साल में  एक पौधे से 60 से 70 किलो का उत्पादन मिला। बाजार में इसका भाव 45 से 50 रुपए किलो तक जाता है।

गोबर भी बन सकता है आपकी कमाई का जरिया, जानिए कैसे ?

गोबर से खाद और बायो गैस बनने के बारे में तो सभी ने सुना होगा, लेकिन आज हम आपको गोबर से बने गमले और अगरबत्ती के बारे में बताएंगे, कि कैसे गोबर आपकी कमाई का बेहतर जरिया बन सकता है। इलाहाबाद जिले के कौड़िहार ब्लॉक के श्रींगवेरपुर में स्थित बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान में गोबर से बने उत्पादों को बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं दूसरे प्रदेशों के भी कई लोग इसका प्रशिक्षण ले चुके हैं।

प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं, “हमारे यहां गोबर की लकड़ी भी बनाई जाती है, इसका हम प्रशिक्षण भी देते हैं, इसे गोकाष्ठ कहते हैं। इसमें लैकमड मिलाया गया है, इससे ये ज्यादा समय तक जलती है, गोकाष्ठ के बाद अब गोबर का गमला भी काफी लोकप्रिय हो रहा है। गोबर से गमला बनने के बाद उसपर लाख की कोटिंग की जाती है। ये काफी प्रभावशाली है।”

जब कोई पौधा नर्सरी से लाते हैं तो वह प्लास्टिक की थैली में दिया जाता है और थैली हटाने में थोड़ी भी लापरवाही की जाए तो पौधे की जड़ें खराब हो जाती हैं और मिट्टी में लगाने पर पौधा पनप नहीं पाता। इस स्थिति से बचने के लिए गोबर का गमला काफी उपयोगी है। गमले को मशीन से तैयार किया जाता है।

इसमें मिट्टी भरकर पौधा लगाइए और जब इस पौधे को जमीन की मिट्टी में लगाना हो तो गड्ढा कर इस गमले को ही मिट्टी में दबा दीजिए। इससे पौधा खराब नहीं होगा और पौधे को गोबर की खाद भी मिल जाएगी। पौधा आसानी से पनप जाएगा।

संस्थान में केले के तने का भी अच्छा प्रयोग किया जा रहा है, प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं, “केले के तने से साड़ियां भी बनती हैं, इसी तरह से गोबर से एनर्जी केक बनाया जाता है, जो अंगीठी में तीन-चार घंटे तक आसानी से जल जाता है। ये गैस की तरह ही जलाया जाता है। इसी तरह स्टिकलेस अगरबत्ती भी बनाई जाती है।”

बायोवेद शोध संस्थान लाख के कई तरह के के मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्माण का प्रशिक्षण देकर कई हजार परिवारों को रोजगार के साथ अतिरिक्त आय का साधन उपलब्ध करा रहा है। संस्थान के निदेशक डॉ. बी.के. द्विवेदी बताते हैं, “जानवरों के गोबर, मूत्र में लाख के प्रयोग से कई मूल्यवर्धित वस्तुएं बनाई जा रही हैं।

गोबर का गमला, लक्ष्मी-गणेश, कलमदान, कूड़ादान, मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती, जैव रसायनों का निर्माण, मोमबत्ती एवं अगरबत्ती स्टैण्ड व पुरस्कार में दी जाने वाली ट्रॉफियों का निर्माण आदि शामिल हैं। इन सभी वस्तुओं का निर्माण बायोवेद शोध संस्थान करा रहा है।”

बहुत जल्द लॉन्च होगी ये नई योजना, किसान कमा सकेंगे 1 लाख रुपए

केंद्र सरकार किसानों के लिए जल्द ही एक नई स्कीम लॉन्च करने वाली है। इस स्कीम के तहत किसान अपने खेतों या खाली पड़ी जमीनों पर सोलर पैनल स्थापित कर बिजली उत्पादन का कारोबार कर सकते हैं। इससे किसानों को हर साल 1 लाख रुपए तक कमाने का मौका मिलेगा।

यह जानकारी केंद्रीय नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने लोकसभा में दी है। इस योजना के तहत किसान सोलर पैनल लगाकर दो मेगावाट तक बिजली का उत्पादन कर सकेंगे। इससे उनको 1 लाख रुपए तक सालाना आय हो सकेगी।

उन्होंने कहा कि किसानों की ओर से पैदा की जाने वाली इस बिजली को खरीदारी सरकार करेगी। इस योजना की घोषणा अगले 15 से 20 दिनों में कर दी जाएगी।

किराए पर भी जमीन दे सकते हैं किसान

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि सरकार ने प्रावधान किया है कि किसान अपनी जमीन पर सोलर पैनल लगाकर बिजली का उत्पादन कर सकता है या फिर बिजली उत्पादन के उद्देश्य से किराए पर देकर भी कमाई कर सकता है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत इस समय विश्व में सबसे ज्यादा नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करने वाला देश है और हमने 1,75,000 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने कहा कि हम 2022 तक इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उनके मंत्रालय ने 2020 तक 50 हजार सूर्य मित्र तैयार करने के उद्देश्य से सूर्या स्किल डवलपमेंट कार्यक्रम लॉन्च किया था। इस कार्यक्रम को सोलर पैनल की स्थापना, मेंटेनेंस और ऑपरेशन से जुड़े कार्यों के लिए नौकरियां पैदा करना था। कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण लेने वालों की कोर्स फीस, रहन-सहन और मूल्यांकन चार्ज मंत्रालय की ओर से वहन किया जाता है।

ऐसे होगी किसानों की कमाई

इस स्कीम का नाम संभवत: किसान ऊर्जा सशक्तिकरण मिशन (कुसुम) हो सकता है। ऊर्जा मंत्रालय  के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, एक मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाने में 5 एकड़ जमीन की जरूरत होती है। एक मेगावाट सोलर प्लांट से साल भर में लगभग 11 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन होता है। उन्होंने बताया कि किसान के पास एक एकड़ भी जमीन है तो वहां 0.20 मेगावाट का प्लांट लग सकता है।

इस प्लांट से सालाना 2.2 लाख यूनिट बिजली पैदा होगी। उन्होंने बताया कि कुसुम स्कीम के मुताबिक जो भी डेवलपर्स किसान की जमीन पर सोलर प्लांट लगाएगा, वह किसान को प्रति यूनिट 30 पैसे का किराया देगा। ऐसे में, किसान को प्रतिमाह 6600 रुपए मिलेंगे। साल भर में यह कमाई लगभग 80,000 रुपए की होगी। जमीन पर मालिकाना हक किसान का ही रहेगा। किसान चाहे तो सोलर प्लांट के साथ यहां छोटी-मोटी खेती भी कर सकता है।

अब जर्मन मशीन से खारा पानी को मीठा कर खारे पानी से होगी सिंचाई

खारेपानी के कारण फसलों का उत्पादन नहीं करने वाले किसानों के लिए ये लिए राहत की खबर है। अब जर्मन तकनीक की वाटर सॉफ्टनर मशीनों से खारे पानी को मीठा कर किसान आसानी से अब अपने खेतों में फसलों का उन्नत उत्पादन कर सकेंगे।

इसके लिए अठियासन रोड स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पर लगाए गए वाटर सॉफ्टनर मशीन का प्रयोग सफल रहा है। अब केवीके वैज्ञानिक जिलेभर के किसानों को कृषि प्रशिक्षण के दौरान खारे पानी को मीठा कर फसल उपयोग के लिए जानकारी देंगे। केवीके की ट्यूबवैल पर स्थापित इस मशीन के माध्यम से 5 से 8 हजार टीडीएस तक काम करने का दावा किया जा रहा है।

ऐसे में जिल क्षेत्रों में खारे पानी के कारण किसानों के सामने फसल सिंचाई को लेकर रही परेशानी से भी किसानों को काफी हद तक निजात मिलने की संभावना है। वैज्ञानिकों की माने तो खारे पानी में जो साल्ट बोड रहता है, जिसे ये मशीन अलग कर देती है। ऐसे में ये तकनीक किसानों के लिए खारे पानी को मीठा करने में काफी कारगर साबित हो रही है।

^ केवीके की ट्यूबवैल पर लगाए वाटर सॉफ्टनर संयंत्र से खारे पानी को मीठा कर पहले मूंग बीच उत्पादन, अब बगीचे और 2 हैक्टेयर में जीरे के उत्पादन में पानी काम में लिया जा रहा है। किसानों को प्रशिक्षण, संगोष्ठी के दौरान इस तकनीक के बारे में बताएंगे।

पाइप लाइन चॉक होने देना, बालों का झड़ना, खाज-खुजली और स्कीन के रुखेपन को दूर करती है। बोरवैल का पानी इस्तेमाल करने वाले लोग भी इस मशीन का उपयोग कर सकते हैैं। डॉ.एसआर कुमावत, सहायक प्राध्यापक

जमीन की उतरी स्तर पर बनने वाली सफेद परत को कम करके, जमीन पर आनेवाली दरारों में सुधार, जमीन मुलायम होकर, उपजाऊ बनती हैं।

  •  फसल और पौधों में पत्ते जलने का प्रमाण कम होकर खेत में हरियाली बढ़ती हैं।
  • नमकीन/खारे पानी से बंद पड़ने वाले ड्रिपर्स और स्प्रिंकलर साफ होकर पहले जैसे काम करना शुरू कर देते है। केमिकल ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कंडिशनर से निकला पानी भौतिक रचना के अनुसार हलका होने से पौधे के जड़ों को आसानी से मिलता है।

कम पानी में अधिक उत्पादन ले सकते है।, यानी पानी की 20 से 30 प्रतिशत तक बचत होती है। फसल की जड़ों पर मूली पर बना नमकीन स्तर कंडिशनर से निकले पानी में घुलकर साफ हो जाता है। मूली की कार्यक्षमता बढ़कर फसल हरीभरी रहने में मदद मिलती हैं।

  • फसल और पौधों के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथ पानी का पीएच विकसित होने के कारण फसल का उपयुक्त मूल द्रव्य मिलते है।
  • तीव्र विद्युत लहरी के कारण विषाणु का प्रमाण
  • पानी का कम होकर जैविक दृष्टि से पानी शुद्ध होता हैं।

इस बार धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में इतने रुपए की बढ़ोतरी, खरीफ सीजन की इन फसलों के भी बड़े दाम

किसानों की आय बढ़ाकर 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य लेकर चल रही केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2019-20 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में मात्र 3.3-3.4 फीसदी की बढ़ोतरी की सिफारिश ही की है, जबकि मई में खुदरा महंगाई दर ही 3.05 फीसदी हो गई।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान के एमएसपी में 60 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने की है।

खरीफ विपणन सीजन 2019-20 के लिए कॉमन वेरायटी के धान का एमएसपी 1,810 रुपये और ए-ग्रेड धान का एमएसपी 1,830 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की सिफारिश की गई है।

आमतौर पर सीएसीपी की सिफारिशों पर ही अंतिम मोहर लग जाती है। उन्होंने बताया कि खरीफ की अन्य फसलों ज्वार, बाजरा और मक्का के एमएसपी में सीएसीपी ने 6 से 7 फीसदी की बढ़ोतरी की सिफारिश की है।

तिलहनों के एमएसपी में ज्यादा बढ़ोतरी की उम्मीद

उन्होंने बताया कि खाद्य तेलों के आयात में कमी लाने के लिए चालू खरीफ सीजन में तिलहन की प्रमुख फसलों सोयाबीन और मूंगफली के एमएसपी में बढ़ोतरी 8 से 10 फीसदी करने की सिफारिश सीएसीपी ने की है।

खरीफ विपणन सीजन 2018-19 के लिए सोयाबीन का एमएसपी 3,399 रुपये और मूंगफली का 4,890 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। इसी तरह से सरकार ने कॉमन वेरायटी के धान का एमएसपी फसल सीजन 2018-19 के लिए 1,750 रुपये और ए-ग्रेड का एमएसपी 1,770 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।

मोटे अनाजों के एमएसपी में 6 से 7 फीसदी बढ़ोतरी की सिफारिश

मोटे अनाजों में मक्का का समर्थन मूल्य फसल सीजन 2018-19 के लिए 1,700 रुपये, ज्वार मालदंडी का 2,450 रुपये और बाजरा का 1,950 रुपये तथा रागी का समर्थन मूल्य 2,897 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। अन्य खरीफ फसलों में कपास मीडियम स्टेपल का एमएसपी 5,150 रुपये और लॉन्ग स्टेपल कपास का 5,450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

1 दिन में 3900 गैलन पानी निकालता है यह “पहिया पंप”,वीडियो देखें

भारत में बहुत से किसान चल रहे नाले ,नदी बड़े रजबाहे के करीब रहते हैं, हालांकि, कई कारकों के कारण वह पानी का उपयोग करने में असमर्थ हैं। ऐसे किसानो के लिए पानी की ऊर्जा का उपयोग करने में सक्षम यह अद्भुत पानी पहिया पंप बहुत कामयाब साबित हो सकता है।

इसे पहली बार 1746 में बनाया गया था और अब इसे पुनः निर्मित किया गया है और हल्के और सस्ती आधुनिक सामग्री का उपयोग करके बहुत ही कामयाबी से त्यार किया गया है ।इसका डिजाइन इतना आसान है के इसको कोई भी त्यार कर सकता है ।

वाटर व्हील पंप कैसे काम करता है

इस पानी पहिया पंप का 6 फ़ीट व्यास पहिया होता है , जिसे 1-1/4 इंच के 160 फीट की पॉलीथीन पाइप से त्यार किया जाता है, जो प्रति दिन 40 फीट की दुरी तक 3900 गैलन पानी पहुंचने में सक्षम होती है। पंप को काम करने के लिए कोई ईंधन या बिजली की आवश्यकता नहीं होती है और इसलिए पर्यावरण अनुकूल है।

एक बार जब कुंडली के निचले एक चौथाई हिस्से को पानी में डुबोया जाता है तो पानी के बहाव से पूरे कुंडल घूमती है, तो हवा का एक क्रम बदलता है और पानी पाइप के साथ कुंडली के केंद्र बिंदु की ओर बढ़ना शुरू हो जाता है और इस पंप के केंदर में एक और पाइप लगी होती जिस से हम पानी को काफी दुरी तक लेकर जा सकते है ।

ये पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

34 साल बाद मोदी सरकार फिर लागू करेगी ये टैक्स, किसानो और आम लोगो पर पड़ेगा असर

सरकारी गलियारों में चर्चा है कि इस साल बजट में एस्टेट ड्यूटी या इन्हेरिटेंस टैक्स फिर से लगाया जा सकता है. विपक्ष इस पर एतराज़ कर रहा है जबकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे सामाजिक विषमता घटेगी. सरकार के सामने पैसा जुटाने की चुनौती है. सोमवार को आए आंकड़े बता रहे हैं कि दो महीनों में जीएसटी कलेक्शन औसतन करीब 14,000 करोड़ महीने कम हो गया है.


अब ख़बर ये है कि नए निवेश के लिए ज़रूरी संसाधन जुटाने के रास्ते खोज रही सरकार एस्टेट ड्यूटी या इन्हेरिटेंस टैक्स फिर से लाने पर विचार कर रही है. ये टैक्स दरअसल पैतृक संपत्ति पर लिया जाता है. भारत में किसानो के पास भी पैतृक संपत्ति है और भी जिन लोगो के पास पैतृक संपत्ति है उन्हें सरकार को टेक्स देना पड़ेगा, इसे 1985 में खत्म कर दिया गया था.

इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नीति आयोग में जमीन मामलों के अध्यक्ष टी हक का कहना था कि भारत में अभी 1 फीसदी लोग 58 प्रतिशत संपत्ति पर नियंत्रित करते हैं. ऐसे लोगों पर इन्हेरिटेंस टैक्स लगाना चाहिए. भारत मं टैक्स-जीडीपी अनुपात कम है, इसे बढ़ाना जरूरी है. इससे भारत में सामाजिक असमानता घटाने में मदद मिलेगी. नोटबंदी के दौरान हुए फर्जीवाड़े पर ED ने की कार्रवाई, संपत्तियां अटैच

एसोचैम के असिस्टेंट सेक्रेटरी जनरल संजय शर्मा का कहना है कि हमें विश्वास है कि वित्त मंत्रालय सभी स्टेकहोल्डरों से सलाह-मशविरा करके ही इसका प्रपोजल तैयार कर रही है. हालांकि सवाल इस बात का है कि अगर इस प्रस्ताव को बजट में शामिल किया जाता है तो क्या विपक्ष को मंजूर होगा. कुछ विपक्षी सांसद यह मानते हैं कि जो टैक्स 1985 में खत्म किया गया उसे 34 साल बाद फिर लागू करना गलत होगा. सरकार को टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए नए विकल्पों पर विचार करना चाहिये ना कि नए टैक्स लगाकर.

द्विफसलीय चक्र से निकले किसान मछली पालन से कमा रहे है मोटा मुनाफा, एक एकड़ के पौंड से ही सवा लाख की तक कमाई

जिले के जिन किसानों ने धान-गेहूं के द्विफसलीय चक्र से निकलकर मछली पालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाया, वह आज मोटा मुनाफा ले रहे हैं।

पंजाब सरकार के डायवर्सिफिकेशन आैर तंदुरुस्त पंजाब अभियान के तहत डीसी पटियाला ने आसपास के क्षेत्रों में हो रहे मछली पालन की समीक्षा के लिए मछली पालन विभाग के अधिकारियों से मीटिंग की। जिले के गांव सुनियारहेड़ी के संजय इंदर सिंह चहल 22 एकड़ में पौंड बनाकर मछली पाल रहे हैं। 1987 से वह सफलतापूर्वक इस काम में लगे हैं।

ऐसे ही राजपुरा के गांव ढींढसा के परमजीत सिंह ने 1997 में पांच एकड़ जमीन ठेेके पर लेकर मछली पालन शुरू किया। 2008 में 10 एकड़ जमीन और लेकर मछली पालन के वैज्ञानिक तरीके को अपनाया। इसी क्रम में नानोकी गांव के रणजोध सिंह 19 एकड़ में और अवतार सिंह सात एकड़ में मछली उत्पादन कर रहे हैं। कुमार अमित बताते हैं कि ढ़ाई एकड़ के तालाब के लिए सरकार 7 लाख रुपए तक का ऋण दे रही है इस पर 80 हजार रुपए सब्सिडी है।

मछली पालकों को पूंग फार्म बीड़ दोसांझ नाभा में पांच दिन की निशुल्क ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें छह किस्म की मछलियों का पूंग भी मार्च से सितंबर महीने में दिया जाता है। विभाग के सहायक निदेशक अमरजीत सिंह बताते हैं कि प्रति एकड़ एक लाख से सवा लाख रुपए की कमाई तय है। इस व्यवसाय में लागत कम होने से लाभ अधिक रहता है।

झींगा मछली पालन कर रहीं हरपिंदर, 6 साल में पुरुषों को पछाड़ा, 4 राज्यों की सबसे बड़ी उत्पादक
किसान झींगा मछली से मोटी कमाई कर रहे हैं। इस सूची में सबसे ऊपर मुक्तसर के गांव छापियांवाली की महिला किसान हरपिंदर कौर हैं। हरपिंदर कौर ने बताया कि जमीन सेम प्रभावित होने से आमदनी नहीं थी। 2012 से मछली पालन शुरू किया था।

2017 में झींगा मछली का पालन शुरू किया आैर पहली बार 3.5 एकड़ में अच्छी पैदावार की। अब 14 एकड़ में पौंड है। 2017 में 14.80 टन पैदावार कर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली में सबसे ज्यादा पैदावार करने वाली किसान बनीं। मुक्तसर के गांव छापियांवाली में 14 एकड़ में बना रखा है पौंड

5 से 6 लाख रुपए प्रति एकड़ कमा रही हैं मुनाफा

हरपिंदर के अनुसार झींगा मछली से 12 से 14 लाख रुपए प्रति ऐकड़ मुनाफा आता है। सभी खर्च निकाल वह हर साल प्रति एकड़ में 5 से 6 लाख रुपए बचा रही हैं। हरपिंदर कौर के पति फतेह सिंह ने बताया कि पत्नी 2018 में हुए राज्य स्तरीय प्रोग्राम में सम्मानित हो चुकी है। इसके अलावा जिला मुक्तसर के डीसी से भी सम्मानित हो चुकी है। 2014 में 15 टन मछली उत्पादन कर वह पुरुषों को भी पछाड़ चुकी हैं।