इस राज्य के किसानों को मिलेगा 160 रुपए का बोन्स, 2000 रुपए प्रति क्विंटल बिकेगा गेहू

मध्य प्रदेश में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 15 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है। राज्य के दो लाख किसानों से बीते साल की इसी अवधि तक खरीदे गए गेहूं की तुलना में 1.60 लाख टन अधिक है। साथ ही इसका सुरक्षित भंडारण किया जा रहा है।

खाद्य नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य में 25 मार्च से समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी शुरू हुई है तथा 17 अप्रैल तक राज्य में 15 लाख मीट्रिक टन गेंहू की खरीदी की गई। पिछले साल की तुलना में इस साल 600 खरीदी केंद्र ज्यादा बनाए गए हैं।

समितियां किसानों के खातों में सीधे भुगतान कर रही हैं। राज्स से चालू रबी में 75 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया गया है, जबकि पिछले रबी सीजन में राज्य से 73.13 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी।

कुल खरीदे गए गेहूं में से 71 फीसदी का मंडियों से हो चुका है उठाव

आधिकारिक तौर पर दावा किया गया है कि खरीदी में कोई दिक्कत न आए इसके लिए अगले एक माह की खरीदी के लिए पर्याप्त बोरे उपलब्ध हैं। खरीदे गए गेहूं में से 71 फीसदी हिस्से को भंडारण स्थल तक भेजा जा चुका है। भंडारण के लिए 4 लाख टन से ज्यादा की क्षमता के सायलो बैग उपयोग में लगाए गए हैं तथा जहां भी भंडारण सुविधा की कमी है वहां 14 लाख मीट्रिक टन के ओपन कैंप बनाए गए हैं। पिछले साल खरीदा गया गेहूं अब भी कई गोदामों में रखा हुआ है, जिसे अन्यत्र भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

मध्य प्रदेश सरकार दे रही है 160 रुपये बोनस

हाल ही में बेमौसम बारिश से मंडियों में रखा गेहूं भीग गया थी, इस स्थिति से निपटने के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए है कि खुले में गेहूं को न रखा जाए। राज्य सरकार की ओर से गेहूं किसानों को 160 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। इस तरह कुल मिलाकर प्रति क्विंटल 2,000 हजार रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने चालू रबी सीजन के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,840 रुपये क्विंटल तय किया है। बीते साल समर्थन मूल्य 1735 रुपये क्विंटल था।

इस डेयरी की गाय सिर्फ दूध ही नहीं बिजली भी देती है

आप ने कभी सुना है के गाय दूध के साथ बिजली भी देती हो ? लेकिन ऐसा हो रहा है राजधानी लखनऊ से करीब 14 किलोमीटर दूर बिजनौर कस्बे से सटा सरवन गाँव के डेयरी में गाय दूध तो देती है साथ में उसके गोबर से बायोगैस प्लांट में डाल कर पहले सीएनजी और फिर उस से बिजली पैदा की जाती है ।

लखनऊ के सरवन गाँव निवासी प्रगतिशील पशुपालक जयसिंह डेयरी रोजगार को अपनाकर खुद के रोजगार के साथ ही दूसरे पशुपालकों के लिए भी आय के स्रोत बना रहे हैं। इनकी इस पहल से एक बार फिर क्षेत्र के पशुपालकों में अच्छी कमायी की आस जगने लगी है।

वहीं युवा पशुपालकों के लिए ये प्रेरणा के स्रोत भी बन रहे हैं। पशुपालक जयसिंह बताते हैं कि दूध डेयरी में नवाचारों के माध्यम से वे अच्छा मुनाफा कमा पाने में कामयाब हुए हैं। वर्तमान में उनकी डेयरी के माध्यम से लगभग 150 से ज्यादा पशुपालक आर्थिक रूप से सबल बन रहे हैं।

राजयसिंह छोटे स्तर के पशुपालकों से अच्छी कीमत पर दूध खरीदते हैं और उसे पैक करके बाजार में बेचने का कार्य करते हैं। इनकी डेयरी गांव में पूरे एक एकड़ में बनी हुई है। जयसिंह बताते हैं कि आस-पास के पशुपालकों से वे उनके दूध का फैट और एसएनएफ देखकर बाजार कीमत से ज्यादा में ही दूध खरीदते हैं ।

एक हजार लीटर दूध की खपत

जयसिंह के फार्म में खुद के 150 पशु हैं, जिनमें से 50 गाय और 100 भैंसे शामिल हैं। इनसे प्रतिदिन 500 लीटर दूध का उत्पादन होता है। जबकि 500 लीटर वे दूसरे पशुपालकों से खरीदते हैं। इस दूध को पाश्चराइज करके फिर पैकिंग करके बेचा जाता है।” जयसिंह अपने डेयरी संचालन के बारे में बताते हैं कि 140 क्यूब घनमीटर का बॉयोगैस प्लांट उन्होंने डेयरी में लगाया है, जिससे सीएनजी (कम्प्रेस नेचुरल गैस) उत्पादित करते हैं।

इस गैस के माध्यम से ही जेनरेटर चलाकर वो 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं। इस बिजली के माध्यम से ही डेयरी में लगे उपकरण संचालित किए जाते हैं। साथ ही पास के नर्सिंग कॉलेज में भी बिजली देते हैं, जिससे इस कार्य में लगने वाला उनका खर्चा भी निकल आता है।” यही नहीं इस बिजली के द्वारा ही इन्होंने आटा चक्की भी स्थापीत कर रखी है, जिससे पूरे गांव का आटा पीसा जाता है।

सालों पुराने पेड़ों को उखाड़कर दूसरे जगह रोपता है ये मशीन, इन खास तकनीक से है लैस

अब भारत के बड़े बड़े शहरों में कम से कम उन पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं रह गई, जो 20 साल तक पुराने हैं, या जिनकी जड़े 6-7 फुट गहराई तक ही गई हैं। अलग-अलग प्रोजेक्ट में रुकावट बन रहे पेड़ों को काटना नहीं पड़ेगा।

बल्कि जर्मनी की एक मशीन के जरिए इन्हें उखाड़कर दूसरी जगह लगा दिया सकते है। दिलचस्प बात ये है कि जिन पेड़ों का पता बदला है, उसमें से 99 फीसदी लहलहा रहे हैं। लगाए जाने के बाद हल्की बारिश ने इन पेड़ों में फिर से जान फूंक दी है।

जर्मनी तकनीक से है लैस

जर्मनी से आयातित इस मशीन को ट्री ट्रांसप्लांटर मशीन कहते है । भारत में यह मशीन जर्मनी से मंगवाई है। खास किस्म के बुलडोजर जैसी दिखने वाली एक मशीन 1.75 करोड़ रुपए की है। दरअसल पूरा सिस्टम एक भारी वाहन के रूप में असेंबल्ड है। एक्सपर्ट ने बताया कि सिर्फ 10 लीटर डीजल में यह मशीन एक घंटे में एक पेड़ उखाड़कर इसे दूसरी जगह लगा देती है।

 फीट मोटे पेड़ पर सफल

ट्री ट्रांसप्लांटर मशीन से 36 इंच (तीन फीट चौड़ाई ) वाले पेड़ को आसानी से उखाड़ा जा सकता है। मशीन को आपरेट करने वाले इश्तियाक अहमद ने बताया कि इससे 15-20 साल पुराने पेड़ को आसानी से उखाड़कर शिफ्ट किया जा सकता है। ऐसा हर पेड़ इस मशीन की जद में है, जिसकी जड़ें 6-7 फीट गहराई तक हों।

महोगनी के वृक्ष से मालामाल हो रहे किसान, एक हजार रूपए प्रति किलो तक बिकते है इसके बीज

देश के युवा किसान अब परंपरागत तरीके से खेती करना छोड़कर आधुनिक तरीके से खेती की ओर अग्रसर हो रहे है. ऐसे में मध्य प्रदेश के किसान अब अपने बगीचे में महोगनी के पेड़ को लगाकर मुनाफे कमा रहे है. दरअसल मध्यप्रदेश के पाटी तहसील के किसान मुकेश पाटीदार ने अपने पांच बीघा खेत में महोगनी के वृक्ष को लगाने का कार्य किया है.

मुकेश पाटीदार ने 5 बीघा के खेत में महोगनी के 800 पेड़ लगाए है. जो भी पेड़ गुजरात से मगाएं गए है उन पौधों से करीब 40 से 50 हजार रूपए की आय सलाना प्राप्त हो जाती है. किसान मुकेश के मुताबिक एक बीघा के अंदर इसे लगाने में कुल 40 से 50 हजार रूपये की लागत आती है. किसानों को महोगनी से पेड़ की खेती से लकड़ी के सामान को बनाने में काफी ज्यादा मदद मिलती है.

महोगनी के वृक्ष

बता दें कि महोगनी वृक्ष एक तरह का पर्णपाती वृक्ष है. यह बाहर के बोलिज ( दक्षिण अमेरिका) और डोमिनिकन गणराज्य का राष्ट्रीय वृक्ष है. महोगनी वृक्ष की लकड़ी को चौकड़ा, फर्नीचर, और लकड़ी के अन्य नाव निर्माण के लिए काफी बेशकीमती होता है. इसके पत्तों का उपयोग मुख्य रूप से कैंसर, ब्लडप्रेशर, अस्थमा, सर्दी और मधुमेह सहित कई प्रकार के रोगों में होता है.

इसका पौधा पांच वर्षों में एक बार बीज देता है. इसके एक पौधे से पांच किलों तक बीज प्राप्त किए जा सकते है. इसके बीज की कीमत काफी ज्यादा होती है और यह एक हजार रूपए प्रतिकिलो तक बिकते है. अगर थोक की बात करें तो लकड़ी थोक में दो से 2200 रूपए प्रति घन फीट में आसानी से मिल जाती है.

महोगनी का उपयोग

महोगनी की लकड़ी मजबूत और काफी लंबे समय तक उपयोग में लाई जाने वाली लकड़ी होती है. यह लकड़ी लाल और भूरे रंग की होती है. इस पर पानी के नुकसान का कोई असर नहीं होता है. अगर वैज्ञानिकों के तर्कों की बात करें तो यह पेड़ 50 डिग्री सेल्सियस तक ही तापमान को सहने की क्षमता को बदार्शत कर सकता है और जल न भी हो तब भी यह लगातार बढ़ता ही जाता है. इसके पौधे सीधे कतार में और सूर्य की रोशनी के विपरीत लगाने चाहिए. बाद में आसपास सब्जियां और फलों आदि की भी उपज ली जा सकती है.

ये है दुनिया की सबसे महंगी गाय,9700 लीटर देती है दूध

गाय का दूध काफी फायदेमंद माना जाता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को गाय का दूध पीने की सलाह दी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं एक गाय कितना दूध दे सकती है, शायद 2 लीटर, 4 लीटर या आप कहेंगे ज्यादा से ज्यादा 10 लीटर ।

लेकिन आज जिस गाय के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं वह कोई साधारण गाय नही है. वह 10-20 नहीं 100-200 भी नहीं बल्कि 9700 लीटर दूध देती है. जी हां, यह हैरानी की बात तो है लेकिन सच है। ये गाय अपने एक सीजन में इतनी तादाद में दूध देती है।

उत्तरी अमेरिका में पाई जाने वाली इस गाय का नाम ईस्टसाइड लेविसडेल गोल्ड मिस्सी है. गाय की इस प्रजाति की संख्या बहुत कम है. जानकारी के मुताबिक एक सीमित समय में यह गाय 9700 लीटर दूध दे देती है. यह गाय सिर्फ सबसे ज्यादा दूध ही नहीं देती बल्की सबसे महंगी भी है. रिपोर्ट्स की मानें तो इस गाय की कीमत 22 करोड़ रुपए है।

मिस्सी की नीलामी में इसकी कीमत 3.23 मिलियन डॉलर तक लग चुकी है। नीलामी में शामिल हर व्यक्ति की चाहत यही होती है कि वो इस गाय को खरीदे। वहीं आपको बता दें कि पिछले 30-40 सालों में इस नस्ल की गायों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है, जिसके कारण अमरीका और कनाडा में दूध उत्पादन में वृद्धि देखने को मिल रही है।

बेबी कॉर्न एक बार में कमा कर देगा 2 लाख, साल में 3 से 4 फसल

कम इन्‍वेस्‍टमेंट में अच्‍छी इनकम के लिए खेती को जरिया बनाने वालों के लिए बेबी कॉर्न की खेती भी एक अच्‍छा विकल्‍प हो सकती है। खास बात यह है कि बेबी कॉर्न की पैदावार को पूरे साल में 3 से 4 बार लिया जा सकता है। बड़ी-बड़ी रेस्‍टोरेंट चेन और होटलों में अच्‍छी-खासी डिमांड होने के चलते इसकी कीमत भी अच्‍छी मिलती है।

यदि एक हेक्‍टेयर भूमि में बेबी कॉर्न की खेती का मॉडल समझा जाए तो इससे सालभर में 3 से 4 लाख रुपए की इनकम आसानी से की जा सकती है। जबकि, एक बार में लागत 10 से 15 हजार रुपए प्रति हेक्‍टेयर की आती है। इस हिसाब से देखा जाए तो शुद्ध लाभ 2.5 लाख रुपए से 3.5 लाख रुपए अर्जित किया जा सकता है। आइए जानते हैं कि अच्‍छी इनकम के लिए कब, कैसे और किन किस्‍मों की करें बुआई

अभी है बुआई का अच्‍छा समय

बेबी कॉर्न मक्‍का की एक प्रजाति होती है। या यूं कहें कि यह मक्‍का का प्री-मैच्‍योर भुट्टा होता है। भारत के अधिकतर हिस्‍सों में मक्‍का की बुआई तीनों सीजन (सर्दी, गरमी और बरसात) में की जाती है। उत्‍तर भारत में दिसंबर और जनवरी के महीनों में बुआई ठीक नहीं रहती है। वर्तमान में खरीफ सीजन के लिए बेबी कॉर्न की फसल को बोया जा सकता है।

कितनी लगती है लागत

एक हेक्‍टेयर कृषि भूमि में बेबी कॉर्न पैदा करने के लिए लगभग 15 किलोग्राम बीज की आवश्‍यकता हेाती है। सीड कंपनी के प्रमाणित बीज 200 से 300 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलते हैं। इसके अलावा बीमारियों से बचाने के लिए कीटनाशक व अन्‍य लागत पर 6 से 10 हजार रुपए का खर्च आ जाता है।

इसमें जल्‍दी पैदावार देने वाली (50 से 55 दिनों में) हरियाणा मेज(एचएम)-4, एचक्‍यूपीएम आदि उन्‍नत किस्‍मों को चुना जा सकता है। इन किस्‍मों में बेबी कॉर्न के सभी गुण मौजूद होते हैं। 16 से 20 क्विंटल तक होती है पैदावार एक हेक्‍टेयर बेबी कॉर्न की फसल से लगभग 16 से 20 क्विंटल बेबी भुट्टा (बिना छिलके) के प्राप्‍त होता है।

इसके अलावा 200 से 300 क्विंटल हरा चारा भी प्राप्‍त होता है। गर्मियों के दिनों में बेबी कॉर्न और हरा चारा की बेहद अच्‍छी डिमांड रहती है। बेबी कॉर्न को तोड़ने के बाद नरमंजरी, रेशा, छिलका आदि पोष्टिक चीजें भी मिलती हैं। ये भी बाजार में आसानी से बिक जाती हैं।

एक बार में 1.5 से 2 लाख रुपए की इनकम

बेबी कॉर्न की बिक्री अधिकतर बड़े शहरों में की जाती है। इसकी फुटकर कीमत 70 से 120 रुपए प्रतिकिलो के आसपास होती है। थोक में इसका रेट 4000 से 6000 रुपए प्रति क्विंटल (क्‍वालिटी के अनुसार) होता है। यदि कम से कम दाम 4000 रुपए प्रति क्विंटल को भी आधार बनाया जाए तो सिर्फ बेबी कॉर्न से ही 80000 रुपए इनकम होती है।

इसके अलावा हरा चारा स्‍थानीय बाजारों में लगभग 200 रुपए से 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिकता है। इससे 60 हजार रुपए तक इनकम होती है। इस तरह यदि साल में दो बार भी बेबी कॉर्न की फसल ली जाए तो इससे 2.50 रुपए तक कमाए जा सकते हैं। इसके साथ अन्‍य मौसमी फसलें भी ली जा सकती हैं।

ऐसे करें मार्केटिंग

इसकी बिक्री बड़े शहरों (जैसे- दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि) के मंडियों में की जा रही है | विरेंद्र कुमार यादव ने बताया कि कुछ किसान इसकी बिक्री सीधे ही होटल, रेस्तरां, कम्पनियों (रिलायन्स, सफल आदि) को कर रहे हैं | कुछ यूरोपियन देशों तथा अमेरिका में बेबी कॉर्न के आचार एवं कैन्डी की बहुत ही ज्यादा माँग है | हरियाणा राज्य के पानीपत जिला से पचरंगा कम्पनी द्वारा इन देशों में बेबी कॉर्न के आचार का निर्यात किया जा रहा है |

अच्‍छे दामों के लिए करें प्रोसेसिंग

बाजार में बेबी कॉर्न (छिलका उतरा हुआ) को बेचने के लिये छोटे–छोटे पोलिबैग में पैकिंग किया जा सकता है | इसे अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिये काँच(शीशा) की पैकिंग सबसे अच्छी होती है | काँच के पैकिंग में 52% बेबी कॉर्न और 48% नमक का घोल होता है | बेबी कॉर्न को डिब्बा में बंद करके दूर के बाजार या अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में बेचा जा सकता है।

छोटे किसानो का नया बैल मेगा टी, ट्रेक्टर से पांच गुना कम कीमत पर करें ट्रैक्टर के सारे काम

बहुत से किसान हर साल इस लिए खेती करना छोड़ देते है क्यूंकि उनके पास खेती करने के लिए जरूरी साधन नहीं होते । एक किसान के लिए सबसे जरूरी चीज ट्रेक्टर होता है लेकिन ट्रेक्टर महंगा होने के कारण हर किसान इसे खरीद नहीं पता ।

ऐसे किसानो के लिए किर्लोस्कर कंपनी ने मेगा टी पेश क्या है । जिसकी कीमत तो ट्रेक्टर के मुकाबले कम है लेकिन यह ट्रेक्टर वाले सारे काम कर देता है । इस मशीन से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।इसकी कीमत तकरीबन 1 लाख 40 हजार है।

मशीन की जानकारी

  • मॉडल – मेगा-टी (15 HP) हैंडल स्टार्ट
  • लंबाई – 2950 mm. चौड़ाई – 950 mm. ऊंचाई – 1300 mm.
  • इंजन का वजन – 138 किलोग्राम
  • इंजन की ऑयल कैपेसटी – 3.5 लीटर
  • प्रकार- वाटर कूल्ड डीजल इंजन
  • Rated RPM – 2000
  • ब्लेडों की संख्या – 20
  • गिअर – 6 आगे, 2 रिवर्स

यह मशीन कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

आ गई दाल-बाटी-चूरमा बनाने वाली मशीन, सिर्फ 1 घंटे में 500 लोगों का खाना होता है तैयार

मारवाड़ के पारम्परिक भोजन दाल-बाटी-चूरमा के बारे में कौन नहीं जनता यह राजस्थान के इलवा पुरे भारत में प्रसिद्ध है । लेकिन अब इसे बनाने के लिए अब मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि  दाल-बाटी-चूरमा बनाने के लिए अब मशीन भी आ गई है। यह किसी कंपनी ने नहीं बनाई बल्कि खेती के उपकरण रिपेयर करने वाले बैठवासिया निवासी कन्हैयालाल सुथार ने तैयार किया है। वह भी पुराने कल-पुर्जों से।

इस मशीन से दाल-बाटी बनाने में समय की बचत के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लिए भोजन बनाया जाना संभव हुआ है। आमतौर पर जागरण,धार्मिक अनुष्ठान और गोठ में यहां यही भोजन बनाने की परंपरा है लेकिन बाटी कुछ ही लोग बना पाते हैं। धीरे-धीरे लोगों का रुझान दाल बाटी चूरमा से हटने लगा है। भोजन-महाप्रसादी में दूसरे व्यंजन बनाने लग गए हैं। ऐसे में यह मशीन इस परंपरा को आगे बढ़ाने में कारगर साबित होगी।

ट्रैक्टर से जोड़ने की भी सुविधा

कन्हैयालाल तिंवरी कस्बे में थ्रेशर मशीनों को ठीक करने का काम करते हैं। कई मशीनें खराब हो जाती है। उसके पार्ट्स को ढेर लग गया था। उनके दिमाग में आया कि क्यों न इन पार्ट्स से कुछ नया किया जाए। फिर क्या वे दाल बाटी चूरमा बनाने की मशीन के नवाचार में जुट गए। मशीन देखने में भारी-भरकम लगती है, लेकिन इसे पहियों पर भी इधर-उधर लाया-ले जाया सकता है। इसे ट्रैक्टर के पीछे जोड़कर लाने ले जाने में भी आसानी रहती है।

कन्हैयालाल बताते हैं कि क्षेत्र के कृषि फार्मों पर होने वाले जागरणों में वे जाते रहते हैं। वहां लोगों को दाल बाटी चूरमा बनाते देखा। एक बार बाटी सेखते हुए एक किसान के हाथ जल गए थे। तब लोगों ने कहा कि सब मशीनें आ गई, बाटी के लिए कोई मशीन नहीं आया। उस वक्त यह मशीन बनाने का आइडिया आया।

बाटी, दाल, चूरमा के लिए चार हिस्से

इस मशीन में चार भाग हैं, जिनमें से एक में सूखा आटा, पानी डाला जाता है। आटा मशीन गूंथ देती है। दूसरे भाग में बॉक्सनुमा ओवन है। इसमें 4 से 6 दराज है। इसमें बाटी भर दी जाती है। सबसे नीचे वाले भाग में कोयले जलाए जाते हैं। 20 मिनट की आंच से बाटी पक-कर तैयार हो जाती है। तीसरे भाग में चूरमा की मशीन है। अगले भाग में गैस भट्टी लगी है।

इस पर दाल बनाई जाती है। दो व्यक्ति 500 लोगों के लिए एक घंटे में दाल बाटी चूरमा तैयार कर सकते हैं। एक बार कोयला डालने के बाद गर्म होने में 10 मिनट लगते हैं। इसके बाद बाटी तैयार होनी शुरू हो जाती है। कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है। बल्कि कोयले से ही बाटी पकती है। ट्रैक्टर द्वारा चूरमा मशीन चलाकर चूरमा बनाया जाता है।

डेढ़ दर्जन मशीनें लागत मूल्य पर दी

इन्होंने लगभग 15 धर्मस्थानों व संतों के यहां पर यह मशीन लागत कीमत पर बनाकर दी है।

News Source : दैनिक भास्कर

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।

बहुत ही कम ख़र्चे में फसल काटती है यह मिनी कंबाइन ,जाने पूरी जानकारी

भारत में अब भी गेहूं जा दूसरी फसलें काटने का काम हाथ से ही होता है क्योंकि भारत में किसानो के पास जमीन बहुत ही कम है और वो बड़ी कंबाइन से फसल कटवाने का खर्च नहीं उठा सकते इस लिए अब एक ऐसी कंबाइन आ गई है जो बहुत कम खर्च में फसल काटती है ।

साथ ही अब बारिश से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है मिनी कंबाइन Multi Crop हार्वेस्टर यह कंबाइन छोटे किसानो के लिए बहुत फयदेमंद है इस मशीन से कटाई करने से बहुत कम खर्च आता है और फसल के नुकसान भी नहीं होता।

बड़ी कंबाइन से फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।

अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं । छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । यह मशीन 1 घंटे मे 2 एकड़ फसल की कटाई करती है ,यह मशीन एक दिन मे 14 एकड़ तक फसल की कटाई करती हैऔर इसमें अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान,मक्का अदि भी काट सकते है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

Address–  Karnal -132001 (Haryana), India
phone -+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089
Email-exports@fieldking.com