सरकार का बड़ा ऐलान, अब इस राज्य के किसानों को मिलेंगे सालाना 15 हजार रुपए

विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले आंध्र प्रदेश सरकार ने किसानों के लिए रियायतों का ऐलान किया. चुनावी मौसम में आंध्र प्रदेश के किसानों को राज्य सरकार की तरफ से बड़ा तोहफा दिया गया है।

अब प्रदेश के किसानों को राज्य सरकार की तरफ से सालाना 9 हजार रुपए बतौर आर्थिक मदद दिए जाएंगे।सीएम चंद्र बाबू नायडू ने बीते शनिवार को 4 हजार रुपए की मदद नाकाफी बताते हुए इसे बढ़ाकर 9 हजार रुपए करने का ऐलान किया।

सालाना मिलेंगे 15 हजार रुप

राज्य सरकार की इस मदद का लाभ5 हेकटेयर भूमि वाले किसानों को मिलेगा। यह योजना केंद्र की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से अलग होगी। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार की दोनों योजनाओं से आंध्र प्रदेश के किसानों को सालना 15 हजार रुपए मिलेंगे। केंद्र की योजना की तरफ से सालाना 6 हजार रुपए दी जाएंगी।

सीएम चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में एक सिचाई योजना के शिलान्यास के मौके पर ऐलान किया कि किसानों को राज्य सरकार की तरफ से लोकसभा चुनाव से पहले 4000 रुपए की पहली किस्त दे दी जाएगी। बाकी आर्थिक मदद का पैसा लोकसभा चुनाव के बाद किसानों के अकाउंट में भेजा जाएगा।

केंद्र की तरफ से मिलेंगे 6 हजार रुपए सालना

केंद्र की पीएम-किसान योजना के तहत 2 हेक्टेयर वाले किसानों को सालाना 6 हजार रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी। इसकी योजना की दो किस्तों को लोकसभा चुनाव से पहले जारी किया जा सकता है। इसके लिए केंद्र की तरफ से राज्यों को किसान का डेटाबेस तैयार करने का ऐलान कर दिया है।

21 करोड़ का सुल्तान, रोज खाता है 15 किलो, सेब-10 किलो गाजर

भारत में गायों की तरह ही सांड की काफी ज्यादा देखरेख की जाती. लेकिन हरियाणा का ये सांड अपने अजीबो गरीब शौक के लिए सोशल मीडीया पर खूब छाया हुआ है। तकरीबन 21 करोड़ का सांड रोजाना शाम को व्हिस्की पीता है लेकिन सांड की इस आदत से उसका मालिक बिल्कुल भी परेशान नहीं।

इस सांड का नाम ‘सुल्तान’ है और इसकी आदत पर उसके मालिक का कहना है कि वो शराब पीना काफी पसंद करता है और उसके ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है।

ये है सुलतान की खुराक

  • नरेश ने बताया कि सुलतान का वजन 16.5 क्विंटल है। उसकी खुराक में 15 किलो सेब, 10 किलो गाजर और 10 किलो दूध शामिल है। इनके अलावा हरा चारा और 10 किलो दाना उसकी खुराक में शामिल है।
  • सुलतान की खुराक पर खास ध्यान रखा जाता है। नरेश का कहना है कि यदि खुराक पर ध्यान नहीं रखा गया तो उसकी सेहत पर इसका सीधा असर होगा।
  • खुराक के अलावा उसकी साफ सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाता है, सुलतान रोज शैम्पू से नहाता है और तेल की मालिश कराता है।

शराब का शौकीन

वह कोई राजा महाराजा नहीं है लेकिन उसके शौक किसी राजा महाराजा से कम नहीं है। इक्कीस करोड़ रुपए कीमत का सुल्तान मात्र सात साल और 10 माह का है, लेकिन रोज शाम को खाने से पहले अलग-अलग ब्रांड की शराब पीता है।

प्रति सप्ताह में छ: दिन शाम के खाने से पहले शराब पीता है लेकिन मंगलवार का दिन सुल्तान का ड्राई डे होता है। हरियाणा के कैथल जिले में मुर्रा नस्ल का भैंसा सुल्तान इन दिनों शराब का शौकीन हो गया है।

सुल्तान की उम्र आठ साल की भी नहीं है और अब से पांच साल पहले नरेश ने उसे रोहतक से 2 लाख 40 हजार रुपए में खरीदा था। एक विदेशी ने पिछले दिनों इसकी कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी। सुबह के नाश्ते में सुल्तान देशी घी का मलीदा और दूध पीता है।

सुल्तान सोमवार को ब्लैक डॉग, बुधवार को 100 पाइपर, गुरुवार को बेलेनटाइन, शनिवार को ब्लैकलेबल या शिवास रीगल, रविवार को टीचर्स पीता है। कैथल के बूढ़ाखेड़ा गांव के रहने वाले सुल्तान के मालिक नरेश ने बताया कि वे सीमन बढ़ाने के लिए सुल्तान को शराब पिलाते हैं।यह दवाई की तरह दी जाती है। सुल्तान सालभर में 30 हजार सीमन (वीर्य) की डोज देता है जो 300 रुपए प्रति डोज बिकती है।

कूलर-पंखों में रहता है सुलतान

  •  सुलतान को गर्मी से बचाने के लिए उसके पास पंखे और कूलर लगाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में सुबह और शाम दो बार उसे नहलाया जाता है।
  •  दो मजदूर दिनभर उसकी देखभाल में लगाए जाते हैं, जो उसके खाने पीने के अलावा साफ सफाई और मालिश आदि करते हैं।
  •  हरियाणा के कैथल जिले के रहने वाले नरेश बैनिवाल ने बताया कि सुलतान नेशनल लेवल पर अवॉर्ड जीत चुका है। उसका यह भैंसा मुर्रा नस्ल का है।

इस हिसाब से वह सालाना 90 लाख रुपए कमा लेता है। सुल्तान वर्ष 2013 में हुई राष्ट्रीय पशु सौंदर्य प्रतियोगिता में झज्जर, करनाल और हिसार में राष्ट्रीय विजेता भी रह चुका है।

राजस्थान के पुष्कर मेले में एक पशु प्रेमी ने सुल्तान की कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी, लेकिन नरेश ने कहा कि सुल्तान उसका बेटा है और कोई अपना बेटा कैसे बेच सकता है।

गुलाब का इत्र बना के यह किसान करता है 6 एकड़ से 8 लाख की कमाई

किसान मेहनत करता है लेकिन उसको सफलता नहीं मिलती लेकिन कुश ऐसे किसान भी है जो अलग ही सोचते है और कुश ऐसा जुगाड़ कर लेते है के थोड़ी ज़मीन से ही वो बहुत सारा पैसा कमा लेते है ।

ऐसे ही हरियणा के बरोला में रहने वाले एक किसान कुशलपाल सिरोही दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। आज वे गुलाब की एक किस्म बुल्गारिया की खेती कर प्रति एकड़ 8 लाख रु  कमा रहे हैं। वे पिछले कुछ सालों से इत्र व गुलाब जल बेच रहे हैं। अरब के देशों में बुल्गारिया गुलाब से बनाए इनके इत्र की खूब डिमांड है।

कैसे बनाते हैं गुलाब का इत्र

कुशलपाल सिरोही के अनुसार, तांबे के बड़े बर्तन में पानी और गुलाब के फूल डाल दिए जाते हैं।इसके बाद ऊपर से मिट्टी का लेप कर बर्तनों के नीचे आग जलाई जाती है।उसके बाद भाप के रूप में गुलाब जल व गुलाब इत्र एक बर्तन में एकत्रित हो जाते हैं, जिस बर्तन में भांप बनकर इत्र जाता है, उसे पानी में डाल दिया जाता है।

गुलाब का इत्र केवल तांबे के बर्तन में निकाला जाता है। कई जगह कंडेंसिंग विधि से भी अर्क निकाला जाता है।लेकिन आसवन विधि ज्यादा कारगर है। एक क्विंटल फूलों में मात्र 20 ग्राम इत्र निकलता है।इंटरनेशनल मार्केट में एक किलोग्राम इत्र का मूल्य करीब आठ लाख रुपए है।

सिर्फ छह एकड़ में करते हैं गुलाब की खेती

कुशलपाल ने बताया कि छह एकड़ में वह गुलाब की खेती कर रहे हैं। नवंबर व दिसंबर में इसकी कलम की कटाई होती है, इसी दौरान कलम लगाई जाती है। मार्च व अप्रैल माह मेें इस पर फूल आने शुरू हो जाते हैं।

गुलाब के फूलों की एक हजार किस्में हैं, लेकिन इत्र बुल्गारिया गुलाब में ही निकलता है।अगर फूलों की फसल ठीक-ठाक रहे तो इस किस्म से छह एकड़ पर तीन से आठ लाख रुपए कमा लेते हैं।

गुलाब की खेती पर कितना आता है खर्च

नवंबर व दिसंबर में गुलाब के पौधों की कटाई व छंटाई होती है। इसी दौरान नई कलमें भी लगाई जा सकती हैं। कुशपाल के मुताबिक, एक एकड़ में बुल्गारिया गुलाब लगाने में चार हजार रुपए के करीब खर्च आता है।

एक एकड़ में करीब दो हजार कलमें लगाई जा सकती हैं। यह तीन माह में तैयार हो जाता है। एक बार लगाया गुलाब 15 साल तक फूल देने के काम आता है।

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Sh. Kushal Pal Sirohi s/o Harender Singh
Village -Barola (Chandana)
Phone -01746-222222

अब 2 किलों दहीं करेगी 25 किलों यूरिया का मुकाबला

रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक से होनेवाले नुकसान के प्रति किसान सजग हो रहे हैं. जैविक तकनीक की बदौलत उत्तर बिहार के करीब 90 हजार किसानों ने यूरिया से तौबा कर ली है | इसके बदले दही का प्रयोग कर किसानों ने अनाज, फल, सब्जी के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी बढ़ोतरी भी की है |

25 किलो यूरिया का मुकाबला दो किलो दही ही कर रहा है | यूरिया की तुलना में दही मिश्रण का छिड़काव ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है | किसानों की माने, तो यूरिया से फसल में करीब 25 दिन तक व दही के प्रयोग से फसलों में 40 दिनों तक हरियाली रहती है|

किसान बताते हैं कि आम, लीची, गेहूं, धान व गन्ना में प्रयोग सफल हुआ है| फसल को पर्याप्त मात्रा में लंबे समय तक नाइट्रोजन व फॉस्फोरस की आपूर्ति होती रहती है| केरमा के किसान संतोष कुमार बताते हैं कि वे करीब दो वर्षों से इसका प्रयोग कर रहे हैं| काफी फायदेमंद साबित हुआ है|

लीची व आम का होता है अधिक उत्पादन

इस मिश्रण का प्रयोग आम व लीची में मंजर आने से करीब 15-20 दिनों पूर्व इसका प्रयोग करें. एक लीटर पानी में 30 मिलीलीटर दही के मिश्रण डाल कर घोल तैयार बना लें | इससे पौधों की पत्तियों को भीगों दें | 15 दिन बाद दोबारा यही प्रयोग करना है |

इससे लीची व आम के पेड़ों को फॉस्फोरस व नाइट्रोजन की सही मात्रा मिलती है | मंजर को तेजी से बाहर निकलने में मदद मिलती है | सभी फल समान आकार के होते हैं | फलों का झड़ना भी इस प्रयोग से कम हो जाता है|

ऐसे तैयार होता दही का मिश्रण

देशी गाय के दो लीटर दूध का मिट्टी के बरतन में दही तैयार करें | तैयार दही में पीतल या तांबे का चम्मच, कलछी या कटोरा डुबो कर रख दें| इसे ढंक कर आठ से 10 दिनों तक छोड़ देना है | इसमें हरे रंग की तूतिया निकलेगी | फिर बरतन को बाहर निकाल अच्छी तरह धो लें | बरतन धोने के दौरान निकले पानी को दही में मिला मिश्रण तैयार कर लें |दो किलो दही में तीन लीटर पानी मिला कर पांच लीटर मिश्रण बनेगा|

इस दौरान इसमें से मक्खन के रूप में कीट नियंत्रक पदार्थ निकलेगा | इसे बाहर निकाल कर इसमें वर्मी कंपोस्ट मिला कर पेड़-पौधों की जड़ों में डाल दें | ध्यान रहे इसके संपर्क में कोई बच्चा न जाये | इसके प्रयोग से पेड़-पौधों से तना बेधक (गराड़)और दीमक समाप्त हो जायेंगे | पौधा निरोग बनेगा |

जरूरत के अनुसार से दही के पांच किलो मिश्रण में पानी मिला कर एक एकड़ फसल में छिड़काव होगा | इसके प्रयोग से फसलों में हरियाली के साथ-साथ लाही नियंत्रण होता है | फसलों को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिलता होता है | इससे पौधे अंतिम समय तक स्वस्थ रहते हैं|

बोले किसान

सकरा के इनोवेटिव किसान सम्मान विजेता दिनेश कुमार ने बताया, मक्का, गन्ना, केला, सब्जी, आम-लीची सहित सभी फसलों में यह प्रयोग सफल हुआ है| आत्मा हितकारिणी समूह के 90 हजार किसान यह प्रयोग कर रहे हैं| इसके बाद मुजफ्फरपुर, वैशाली के साथ-साथ दिल्ली की धरती पर इसे उतारा है|

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मार्च 2017 में इनोवेटिव किसान सम्मान से सम्मानित किया| मुजफ्फरपुर के किसान भूषण सम्मान प्राप्त सतीश कुमार द्विवेदी कहते हैं, जिन खेतों में कार्बनिक तत्व मौजूद होते हैं, उनमें इस प्रयोग से फसलों का उत्पाद 30 फीसदी अधिक होता है. इस मिश्रण में मेथी का पेस्ट या नीम का तेल मिला कर छिड़काव करने से फसलों पर फंगस नहीं लगता है. इसके प्रयोग से नाइट्रोजन की आपूर्ति, शत्रु कीट से फसलों की सुरक्षा व मित्र कीटों की रक्षा एक साथ होती है|

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है।

जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

कहीं भी उगाएं बटन मशरूम, एक सीजन में 3 लाख तक कमाने का मौका

अगर खेतीबाड़ी के जरि‍ए अच्‍छी कमा ई करने के तरीका खोज रहे हैं तो बटन मशरूम की खेती एक अच्‍छा ऑप्‍शन हो सकता है। यह मशरूम की ही एक कि‍स्‍म होता है, मगर इसमें मि‍नरल्स और वि‍टामि‍न खूब होते हैं।

इसकी खासि‍यत ये है कि‍ आप एक झोंपड़ी में भी इसकी फायदेमंद खेती कर सकते हैं। मशरूम अपने हेल्थ बेनेफि‍ट्स की वजह से लगातार पॉपुलर हो रही है।  इसका रेट 300 से 350 रुपए कि‍लो है।

बड़े शहरों में तो यह इसी रेट में मि‍लता है। थोक का रेट इससे करीब 40% तक कम होता है। कई लोगों ने पारंपरि‍क खेती को छोड़कर मशरूम उगाना शुरू कर दि‍या है और अब अच्‍छी खासी कमाई कर रहे हैं। जैसे गोरखपुर के कि‍सान राहुल सिंह।

 उपज और मुनाफे का गणि‍त

राहुल हर साल 4 से 5 क्विंटल कंपोस्‍ट बनाकर उसपर बटन मशरूम की खेती करते हैं। इतनी कंपोस्‍ट पर करीब 2000 कि‍लो मशरूम पैदा हो जाता है। एक क्विंटल कम्पोस्ट में डेढ़ किलो बीज लगते हैं। इसकी बाजार में कीमत 200 से 250 रुपए होती है। मशरूम का थोक रेट 150 से 200 रुपए कि‍लो है।

अब 2000 कि‍लो मशरूम अगर 150 रुपए एक कि‍लो के हि‍साब से भी बि‍कती है तो करीब 3 लाख रुपए मि‍लते हैं। इसमें से 50 हजार रुपए लागत के तौर पर नि‍काल दें तो भी ढाई लाख रुपए बचते हैं, हालांकि‍ इसकी लागत 50 हजार से कम ही आती है। प्रति‍ वर्ग मीटर 10 कि‍लोग्राम मशरूम आराम से पैदा हो जाता है।

इस तरह होती है खेती

  • मशरूम अक्‍टूबर-नवंबर में लगाई जाती है और पूरी सर्दी इसका उत्‍पादन होता रहता है।
  • राहुल करीब 40 बाई 30 फुट की झोंपड़ी में खेती करते हैं। इसमें वह तीन तीन फुट चौड़ी रैक बनाकर मशरूम उगाते हैं।
  • इसके लि‍ए आपको कंपोस्‍ट तैयार करना होता है। आप इस काम के लि‍ए धान की पुआल का यूज कर सकते हैं। सबसे पहले धान की पुआल को भि‍गो दें और एक दि‍न बाद इसमें डीएपी, यूरि‍या, पोटाश व गेहूं का चोकर, जि‍प्‍सम, कैल्‍शि‍यम और कार्बो फ्यूराडन मि‍ला कर सड़ने के लि‍ए छोड़ दें।
  • उसे करीब 30 दि‍न के लि‍ए छोड़ दें। हर 4 से 5 दि‍न पर इसे पलटते रहें और आधा महीना हो जाने पर इसमें नीम की खली और गुड़ का पाक या शीरा मि‍ला दें।
  • एक महीना बीत जाने के बाद एक बार फि‍र से बावि‍स्‍टीन और फार्मोलीन छि‍ड़ने के बाद इसे कि‍सी ति‍रपाल से 6 घंटों के ढक दि‍या जाता है। अब आपका कंपोस्‍ट तैयार हो गया।

इस तरह बि‍छाएं कंपोस्‍ट

  • पहले नीचे गोबर की खाद और मि‍ट्टी को बराबर मात्रा में मि‍लाकर करीब डेढ़ इंच मोटी परत बि‍छाई जाती है। इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो से तीन इंच मोची परत चढ़ाएं।
  • इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो तीन इंच मोटी परत चढ़ाएं और उसके ऊपर मशरूम के बीज समान मात्रा में फैला दें। फि‍र इसके ऊपर एक दो इंच मोटी कंपोस्‍ट की परत और चढ़ा दें।
  • झोंपड़ी में नमी का स्‍तर बना रहना चाहि‍ए और स्‍प्रे से मशरूम पर दि‍न में दो से तीन बार छि‍ड़काव होना चाहि‍ए। झोंपड़ी का तापमान 20 डि‍ग्री बना रहे।
  • सभी एग्रीकल्‍चर यूनि‍वर्सि‍टी और कृषि‍ अनुसंधान केंद्रों में मशरूम के खेती की ट्रेनिंग दी जाती है। अगर आप इसी बड़े पैमाने पर खेती करने की योजना बना रहे हैं तो बेहतर होगा एक बार इसकी सही ढंग से ट्रेनिंग जरूर लें।

News Source: Money Bhaskar News

अब हाइड्रोजेल से सिर्फ एक सिंचाई से होगी फसल

इस हालात में खेती को अगर बचाना है तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा जिसमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो और पूरी कवायद में hydrogel (हाइड्रोजेल) किसी चमत्कार से कम नहीं है।अब बार बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ एक बार सिंचाई करने पर इतना पानी सोख लेता है की बाद में सिंचाई की जरूरत ही नहीं रहती ।

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान जिसे पूसा संस्थान भी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने ही इस अद्र्घ-कृत्रिम हाइड्रोफिलिक पॉलिमर जेल का विकास किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस जेल में कई ऐसी खासियत हैं जो जैव चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे तरल पदार्थों को अवशोषित करने वाले जेल से उसे अलग करती है।

इसे ‘पूसा हाइड्रोजेल’ नाम दिया गया है । इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन में केवल 2.5 से 3.75 किलो जेल डालने की जरूरत होती है। अब तक दुनिया में ऐसे जितने भी जेल तैयार किए गए हैं उनकी तकरीबन 10 किलो मात्रा एक हेक्टेयर जमीन में डालनी पड़ती है।

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है जिसमें पता चला है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) की मदद से बारिश और सिंचाई के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।

हाइड्रोजेल पोलिमर है जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं। हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

शोधपत्र में कहा गया है कि हाइड्रोजेल खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुँचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है। शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम हाइड्रोजेल ही पर्याप्त है। हाइड्रोजेल 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहाँ सूखा पड़ता है।

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है, बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुँचाता है।

हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं। हाइड्रोजेल के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है।

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

Hydrogel (हाइड्रोजेल) कैसे काम करता है ?

हाइड्रोजेल अपने भार के मुकाबले 400 गुना से भी ज्यादा पानी को सोख सकते हैं. धीरे-धीरे जब इसके आसपास गर्मी बढ़ने लगती है, तो हाइड्रोजेल तेजी से पानी छोडना शुरू करता है.

यह सोखे गये जल का 95 फीसदी तक वापस छोड़ता है. पानी को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान यह रीहाइड्रेट होगा और इसे स्टोर करने के लिए इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया जा सकता है. इस प्रकार यह प्रक्रिया दो से पांच सालों तक जारी रह सकती है, जिस दौरान बायोडिग्रेडेबल हाइड्रोजेल डिकंपोज होता रहेगा. यानी फसलों के लिए पानी की जरूरतों को पूरा करता रहेगा.

पशुओं के लिये बहुत उपयोगी ये नुस्खे, नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत

फैट बढ़ाने का फार्मूला

पशु चारे के साथ 100 ग्राम कैल्शियम व 100 ग्राम सरसो का तेल तथा चुटकी भर काला नमक डालकर 7 दिन तक खिलाने से दूध में फेट बढ़ जाएगी ।

पशु को दस्त लगने पर

देसी आंकड़े के 10 फूल तोड़ कर एक रोटी में डालकर खिला देने से चार-पांच घंटे में दस्त ठीक हो जाएगा ।

पशु को हीट पर लाने का तरीका

  • 100ग्राम गुड पुराना वाला कम से कम एक साल पुराना हो..
  • 100 ग्राम सरसो का तेल..
  • 100 ग्राम कैल्शियम..

उपरोक्त तीनों चीजों को मिलाकर 18-20 दिन खिला दे जानवर हीट पर आ जाएगा पशुओं को क्रास या बीज डलवाने के बाद गुड व तेल बंद कर दें और कैल्शियम को ढाई सौ ग्राम जौ के दलिया के साथ पिलाएं

पशु की जड़ टूट जाने पर

1 किलो गुड़ वह साथ में 50 ग्राम अजवाइन 40 /50 आम के पत्तों को पांच लीटर पानी में खूब अच्छी तरह उबालो और उस पानी को ठंडा करके 100 ग्राम कैल्शियम डालकर पशु को पिला देने से आधे घंटे में जड़ बाहर फेंक देगा ।

पशु को चेक करने का फार्मूला

पशु ग्याबन है या नहीं जब पशु 40 – 45 दिन का गर्भ धारण किया हो जाए उस पशु का सुबह के टाइम का पहला पेशाब को कांच के गिलास में भरकर उसमें 2 बूंद सरसों के तेल की डाल दो अगर तेल की बूंद पेशाब पर बिखर जाती है तो पशु ग्याबन नहीं होगा और यदि तेल की बूंद पेशाब पर बनी रह जाती है तो पशु ग्याबन होगा ।

गैस अफारा के लिए

एक लीटर खट्टी छाछ में 50 ग्राम हींग व साथ में 20 ग्राम काला डालकर जानवर को पिलाए तथा सूती कपड़े को घासलेट में भिगोकर पशु को 4/5 मिनट तक सुघा देने से 15 /20 मिनट में ही अफारा उतर जाएगा ।

मोदी सरकार की नई योजना, किसानों को सस्ता लोन देने के लिए घर-घर जाकर दिए जाएंगे ये कार्ड

सरकार देश के हर एक किसान परिवार तक किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) पहुंचाने की योजना पर काम कर रही है। इसे लेकर सरकार जल्द एक स्पेशल कैंपेन लॉन्च करेगी, जिसके तहत किसानों को क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित किया जाएगा साथ ही उन्हें क्रेडिट कार्ड से मिलने वाले फायदे के बारे में समझाया जाएगा।

लोकसभा चुनाव से पहले 14 करोड़ केसीसी बनाने का लक्ष्य

दरअसल सरकार क्रेडिट कार्ड के दायरे को बढ़ाना चाहती है। देश में अभी 6.95 करोड़ किसान परिवार के पास किसान क्रेडिट कार्ड है। सरकार इसे लोकसभा चुनाव से पहले दोगुना करके 14 करोड़ करना चाहती है। किसान क्रेडिट कार्ड के लिए किसानों को बैंक के चक्कर नहीं लगाने होंगे।

द इंडियन बैंक एसोसिएशन ने पिछले हफ्ते एक एडवाइजरी जारी करते हुए सभी बैंकों से कहा है कि केसीसी बनवाने में लगने वाली फीस कर्ज माफी से जुड़े दस्तावजे, जांच समेत अन्य सर्विस पर लगने वाली चार्ज में छूट दी जाएं। दरअसल 3 लाख तक की केसीसी बनवाने के लिए 2 से 5 हजार का खर्च आता है।

 कर्जमाफी से बेहतर कम दर पर लोन

सरकार की योजना है कि किसानों को कर्जमाफी से बेहतर कम दर पर लोन मुहैया कराना है।रिजर्व बैंक की ओर से भी इसकी वकालत की गई है। इस काम में केसीसी सरकार की काफी मदद कर सकता है। बतां दे कि अभी किसानों को फसल चक्र के हिसाब से 4 फीसदी की दर पर कर्ज मुहैया कराया जाता है।

इस राज्य में 230 किसानों ने बिजली बचा सब्सिडी से कमाए 18 लाख, “पानी बचाओ पैसा कमाओ” ये है योजना

पावरकॉम की जून 2018 में राज्य में alt39पानी बचाओ पैसा कमाओalt39 योजना के बाद भू-जल की बचत के प्रति किसान अधिक उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं। 6 फीडरों के करीब 940 किसानों में शुरू हुए इस सर्वेक्षण का मकसद भू-जल बचत है।

फतेहगढ़ साहिब, मुकेरियां तथा जालंधर फीडर के किसानों के लिए शुरू इस योजना में फिलहाल बहुत कम किसान ही अब तक पावरकॉम की सब्सिडी योजना का लाभ लेने में कामयाब हो पाए हैं। 940 में से लगभग 210 किसान ही बिजली यूनिट बचाकर सब्सिडी के रूप में 18 लाख रुपए कमा पाए या बचा पाए हैं।

पंजाब में खेती ले लिए बढ़ते भू-जल दोहन के मद्देनजर पावरकॉम जून 2018 में इस योजना को लाया था। इसमें प्रति बीएचपी 1 हजार यूनिट प्रतिमाह की सीमा निर्धारित की गई थी। इस स्वेच्छा सर्वेक्षण में करीब 20 गांवों के किसान शामिल किए गए थे।

हालांकि योजना की मॉनिटरिंग का समय निर्धारित नहीं किया गया है, लेकिन धान तथा गेहूं के सीजन में प्रतिमाह तयशुदा यूनिट लिमिट के भीतर बिजली उपयोग किए जाने पर बचे यूनिटों पर 4 रुपए के हिसाब से सब्सिडी दी गई है।

महंगी बिजली से सस्ती पड़ रही सब्सिडी

वर्तमान में पावरकॉम अपनी बिजली उत्पादित करने के अलावा प्राइवेट पावर प्लांटों से बिजली खरीद रहा है तथा प्रति यूनिट यह करीब 5.50 रुपए में पड़ रही है। हालांकि इसमें पीक सीजन में खरीदी गई महंगी बिजली शामिल नहीं है,

लेकिन किसानों को यूनिट की बचत के प्रति उत्साहित कर सब्सिडी सीधे उनके बैंक एकाउंट में ट्रांसफर कर पॉवरकाम उन्हें बिजली बचत तथा जमीन के पानी के दोहन दोनों से बचाने को प्रयास कर रही है।

किसानों की जेब में प्रति यूनिट 4 रुपये डालने के बावजूद भी पावरकॉम 50 पैसे से 1 रुपया यूनिट बचत कर रहा है। वहीं ट्यूबवैलों पर बिजली मीटर लगा सर्वेक्षण करने का भारतीय किसान यूनियन विरोध करती रही हैं। उनके मुताबिक पावरकॉम बिजली मीटर लगाने के बाद धीरे-धीरे सभी ट्यूबवेलों पर इसे अनिवार्य कर देगा। इसलिए भी किसान इस सर्वेक्षण में पूरी रुचि नहीं दिखा रहे हैं।