पशुओं  के लिए घर पर त्यार करें यह दलिया, 100% दूध बढ़ने की है गरंटी

आज हम आपको एक ऐसा दलिया बनाना सिखएंगे जिस से आपके पशु की दूध देने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी और यह सस्ता है कोई महंगा नहीं है ।इसमें दो चीजें का ध्यान जरूर रखें एक इसके बनाने की विधि और दूसरा इसको देने का समय दोनों को ध्यान से समझें ।

दलिया बनाने के लिए सबसे पहले आपको चाहिए गेहूं का दलिया। गेहूं का दलिया आप मक्की का और चीज का भी ले सकते हैं लेकिन गर्मी में गेहूं का दलिया सबसे अच्छा रहता है और इसके साथ आपको चाहिए तारा मीरा अगर आपको मिलता है तो बहुत अच्छी बात है अगर नहीं मिलता है तो कोई बात नहीं है ।

इसके बाद आती है हमारी शक्कर की जगह गुड का इस्तेमाल कर सकते है लेकिन गर्मी में शक्कर सबसे अच्छी रहती है । इसके साथ आप सरसों का तेल और मीठा सोढा का इस्तेमाल करें मीठा सोढा पांचन शक्ति के लिए बहुत अच्छा होता है । इसके अलावा किसान इसमें हमारे कॉटन सीड और कैल्शियम आदि डाल सकते है ।

इसको बनाना कैसे है सबसे पहले आपको लेना है दलिया और इसमें आपको पानी डाल कर आग पर पका लेना है उसके बाद हम इसमें हम सबसे पहले शक्कर डालेंगे और इसके बाद किसान भाइयो सरसों का तेल डालना है जोकि आपको सौ ग्राम के लगभग लेना है अपने पशुओं के हिसाब से अगर आपका पशु ज्यादा बड़ा है भी या तो आप इसको ज्यादा भी ले सकते है ।

तारामीरा भी आप 50 ग्राम तक इस्तेमाल कर सकते हैं कोई दिक्कत नहीं है ज्यादा भी कर लिया तो कोई प्रॉब्लम नहीं है यह पशु के लिए बहुत अच्छा है और इसके बाद सबसे जरूरी चीज आती है कि मीठा सोडा इसको इस्तेमाल करना अगर आपको इस्तेमाल करना है तो आप एक चम्मच दे सकते है लेकिन पशु को आपके पशु को दस्त वगैरह नहीं लगी होनी चाहिए ।

इस दलिया की पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए हुए वीडियो को देखें ।

ज्यादा मुनाफे के लिए करें ब्रोकली की खेती

ब्रोकोली की खेती ठीक फूलगोभी की तरह की जाती है। इसके बीज व पौधे देखने में लगभग फूल गोभी की तरह ही होते हैं। लेकिन इसका रंग हरा होता है इसलिए इसे हरी गोभी भी कहते है उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में जाड़े के दिनों में इन सब्जियों की खेती बड़ी सुगमता पूर्वक की जा सकती है जबकि हिमाचल प्रदेश , उत्तरांचल और जम्मू कश्मीर में में इनके बीज भी बनाए जा सकते है।

सब्जियों की पैदावार में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। लेकिन आज भी हमारी ज्यादातर सब्जियों की कम उत्पादकता व कमजोर गुणवत्ता की । आगे आने वाले समय में सब्जियों का उत्पादन व विदेशों में उन की सप्लाई दोनों ही बढ़ सकते हैं।

इस तरह की सब्जियों में ब्रोकली का नाम बहुत मशहूर है. इस की खेती पिछले कुछ सालों से धीरेधीरे बड़े शहरों के आसपास कुछ किसान करने लगे हैं। बड़े महानगरों में इस सब्जी की मांग भी अब बढ़ने लगी है ।पांच सितारा होटलों व पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है और जो किसान इस की खेती कर के इस को सही बाजार में बेचते हैं, उन को इस की खेती से बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।

ब्रोकोली की बाज़ार मांग

पांच सितारा होटल तथा पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है तथाजो किसान इसकी खेती करके इसको सही बाजार में बेचते हैं उनको इसकी खेती से बहुत अधिक लाभ मिलता है क्योंकि इसके भाव कई बार 30 से 50 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक या इससे भी उपर मिल जाते हैं। यहां ये बताना उचित रहेगा कि ब्रोकोली की खेती करने से पहले इसको बेचने का किसान जरूर प्रबंध कर लें क्योकि यह अभी महानगरों, बड़े होटल तथा पर्यटक स्थानों तक ही सीमित है। साधारण, मध्यम या छोटे बाजारों में अभी तक ब्रोकोली की मांग नहीं है।

कृषकों के लिए ब्रोक्कोली की खेती के फायदे

बाजार में ब्रोक्कोली की कीमत सामान्य गोभी से कहीं ज्यादा है. बड़े शहरों में बाजारों इसकी कीमत 100 रुपये से लेकर 250 रुपये प्रति किलो होती है. बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और झारखण्ड जैसे कई प्रदेशों में इसकी आयात दिल्ली और पुने जैसे बड़े शहरों से होने के कारण इसकी कीमत और बढ़ जाती है. तो छोटे शहरों के किसानों के पास अच्छा अवसर है की वो अपने लोकल मार्केट में ही अच्छे दामों पर ये फसल बेच सकते हैं. मांग बढ़ने पर निर्यात कर के आमदनी और बढ़ाई जा सकती है.

ब्रोक्कोली की खेती से कितनी आमदनी बन सकती है

यदि आपके पास 1 एकर प्लाट (43500 स्क्वायर फ़ीट) का क्षेत्र उपलब्ध है तो आप तक़रीबन 125000 से 150000 रुपये तक की आमदनी 3-4 महीने में हो सकती है.

ब्रोकोली के पौधे = 6000 कम से कम
पौधों का नुकसान = 1000 पौधे
स्वस्थ पौधे = 5000

मार्केट रेट के हिसाब से आप हर पौधे (या फूल) को 75 से 150 रुपये तक में बेच सकते हैं, क्यों कि हर पौधे का वजन 500 ग्राम से 1 किलो तक का होगा. मैं इस गणना के लिए 75 रुपये प्रति पीस भी मानू तो,

आमदनी = 5000 x 75 = 375000 रुपए
आपके खर्चे = 1 लाख से लेकर डेढ़ लाख तक (सिंचाई, बीज, कीटनाशक दवाइयाँ, ट्रांसपोर्टेशन, इत्यादि)
आपका कुल मुनाफा = 125000 से 175000 रुपये तक (केवल 3-4 महीने में)

लगाने का समय

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ब्रोकोली उगाने का उपयुक्त समय ठण्ड का मौसम होता है इसके बीज के अंकुरण तथा पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए तापमान 20 -25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए इसकी नर्सरी तैयार करने का समय अक्टूम्बर का दूसरा पखवाडा होता है पर्वतीय क्षेत्रों में क़म उचाई वाले क्षेत्रों में सितम्बर- अक्टूम्बर , मध्यम उचाई वाले क्षेत्रों में अगस्त सितम्बर , और अधिक़ उचाई वाले क्षेत्रों में मार्च- अप्रैल में तैयार की जाती है ।

बीज दर

गोभी की भांति ब्रोकली के बीज बहुत छोटे होते है। एक हेक्टेअर की पौध तैयार करने के लिये लगभग 375 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है ।

नर्सरी तैयार करना

ब्रोकोली की पत्ता गोभी की तरह पहले नर्सरी तैयार करते है और बाद में रोपण किया जाता है कम संख्या में पौधे उगाने के लिए 3 फिट लम्बी और 1 फिट चौड़ी तथा जमीन की सतह से 1.5 से. मी. ऊँची क्यारी में बीज की बुवाई की जाती है क्यारी की अच्छी प्रकार से तैयारी करके एवं सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर बीज को पंक्तियों में 4-5 से.मी. की दूरी पर 2.5 से.मी. की गहराई पर बुवाई करते है बुवाई के बाद क्यारी को घास – फूस की महीन पर्त से ढक देते है तथा समय-समय पर सिचाई करते रहते है जैसे ही पौधा निकलना शुरू होता है ऊपर से घास – फूस को हटा दिया जाता है नर्सरी में पौधों को कीटों से बचाव के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र का प्रयोग करें ।

रोपाई

नर्सरी में जब पौधे 8-10 या 4 सप्ताह के हो जायें तो उनको तैयार खेत में कतार से कतार , पक्ति से पंक्ति में 15 से 60 से. मी. का अन्तर रखकर तथा पौधे से पौधे के बीच 45 सें०मी० का फ़सला देकर रोपाई कर दें । रोपाई करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए तथा रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें ।

खाद और उर्वरक

रोपाई की अंतिम बार तैयारी करते समय प्रति 10 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में 50 किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद कम्पोस्ट खाद इसके अतिरिक्त 1 किलोग्राम नीम खली 1 किलोग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर क्यारी में रोपाई से पूर्व समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद क्यारी की जुताई करके बीज की रोपाई करें ।

प्रजातियाँ

ब्रोकली की किस्मे मुख्यतया तीन प्रकार की होती है श्वेत , हरी व बैंगनी |

बैंगनी –इनमे हरे रंग की गंठी हुई शीर्ष वाली किस्मे अधिक पसंद की जाती है इनमे नाइन स्टार , पेरिनियल,इटैलियन ग्रीन स्प्राउटिंग,या केलेब्रस,बाथम 29 और ग्रीन हेड प्रमुख किस्मे है |

संकर किस्मों में- पाईरेट पेकमे ,प्रिमिय क्राप ,क्लीपर , क्रुसेर , स्टिक व ग्रीन सर्फ़ मुख्य है |

अभी हाल भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र कटराई द्वारा ब्रोकली की के.टी.एस.9 किस्म विकसित की गई है इसके पौधे मध्यम उचाई के ,पत्तियां गहरी हरी ,शीर्ष सख्त और छोटे तने वाला होता है | भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने हाल ही में पूसा ब्रोकोली 1 क़िस्म की खेती के लिये सिफ़ारिश की है तथा इसके बीज थोड़ी मात्रा में पूसा संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, कटराइन कुल्लू घाटी , हिमाचल प्रदेश से प्राप्त किये जा सकते हैं|

मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।

जाने कैसे इस किसान ने उगाई किसान ने उगाई आलू-गेहूं की अंतर फसल

कम बीज डालकर अधिक गेहूं उत्पादन लेने की तकनीक सुनी थी, लेकिन जब खेत में आजमाई तो कामयाब हो गए। यह उत्पादन लिया है करनाल जिला के गांव ब्रास निवासी किसान सुरजीत सिंह ने। उन्होंने गेहूं और आलू की फसल ली है। सबसे खास बात यह है कि किसी तरह की बीमारी भी नहीं लगी। यही नहीं वे पहले बासमती की एक किस्म भी खुद ईजाद कर चुके हैं और भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसान को सम्मानित किया जा चुका है।

ये हुआ उत्पादन: किसान के अनुसार आलू और गेहूं की फसल उगाने में कुल खर्च प्रति एकड़ 8 हजार रुपए आया। आलू की किस्म हिमसोना उगाई। गेहूंऔर आलू दोनों मिलाकर 51400 रुपए का फसलों का उत्पादन हुआ।

सुरजीत सिंह के अनुसार जो किसान गेहूं की अगेती किस्म उगाते हैं वे आलू गेहूं साथ-साथ बिजाई कर सकते हैं। पहले गेहूं की कटाई होगी, फिर किसान आलू की फसल ले सकता है। कपास के नीचे आलू गेहूं की बिजाई भी ली जा सकती है। क्योंकि प्रदेश में करीब 6 लाख हेक्टेयर में कपास होती है। वर्ष 2008 में कपास की बासमती किस्म “सुरजीत बासमती” भी ईजाद कर चुके हैं।

यह कमजोर बंजर खारे पानी में आसानी से हो सकती है। किसान को इसके लिए सम्मान भी मिला। वे आज भी गेहूं-धान दलहनी फसलों का बीज खेत में तैयार करते हैं। दूर दराज से किसान उनके यहां आधुनिक खेती के तरीके सीखने के लिए आते हैं। सुरजीत बीए पास हैं। उनके पास एक बैंक से कॉल भी आया कि आप नौकरी ज्वाइन कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने खेती को प्राथमिकता दी।

बकौल सुरजीत सिंह उन्होंने आलू बिजाई की मशीन से खेत में गेहूं की बिजाई की। प्रति एकड़ 100 किलोग्राम यूरिया 100 किलोग्राम डीएपी लिया। डीएपी के साथ 15 किलोग्राम गेहूं का बीज भी मिला दिया। एक खाने से आलू का बीज मशीन से खेत तक पहुंचता रहा, जबकि दूसरे से गेहंू का बीज और डीएपी खेत तक पहुंचा। मेढ के ऊपर आलू और दोनों ओर गेहूं की फसल उगी।

सिर्फ 1000 रुपये खर्च कर उगाएं 400 Kg टमाटर, जानें किसने किया कमाल

गाजीपुर जिले के मिर्जापुर गांव निवासी पार्थ खेती में क्रांति लाने के लिए प्रयासरत हैं। पार्थ ने हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित कर टमाटर की खेती कर मिसाल कायम की है। मौजूदा समय में गाजीपुर जिले में लगभग सभी घरों में उनके मॉडल से टमाटर की खेती हो रही है।

पार्थ को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि में पढ़ाई के दौरान इस तकनीक के बारे में पता चला था। उन्होंने बताया कि विवि के हार्टीकल्चर विभाग के प्रोफेसर डॉ. डीआर सिंह व डॉ. पीयूष कांत सिंह ने उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि जोधपुर में सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट (साजरी) में यह तकनीक आई थी। साजरी में यह योजना सफल नहीं हो पाई, लेकिन पार्थ ने इस तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

राष्ट्रपति पुरस्कार से तीन बार हो चुके हैं सम्मानित

पार्थ को अब तक तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पहली बार 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें बेस्ट एनसीसी कैडेट ऑफ इंडिया के अवार्ड से सम्मानित किया था।

वहीं, दूसरी बार प्रतिभा पाटिल ने स्काउटिंग के लिए 2009 में सम्मानित किया। हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित करने के लिए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पार्थ को प्रेसिडेंट रोवर अवार्ड से सम्मानित कर चुके हैं।

गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है नाम

गाजीपुर से दिल्ली (राजघाट) तक बिना रुके हुए 167 घंटे तक लगातार चलकर पार्थ अपना नाम गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज करा चुके हैं। पार्थ की इस उपलब्धि पर तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल दलवीर सिंह सुहाग ने उन्हें सम्मानित किया था। पार्थ की टीम में कुल दस युवा शामिल थे, जिन्होंने लगातार छह दिन तक यात्रा की थी।

इस तरह से की जाती है खेती

20-20 मीटर के छह पाइप को एक पिलर पर रख दिया जाता है। पिलर के एक तरफ दस फीट का गड्ढा खोदकर उसमें 100 लीटर का टैंक डाला जाता है। टैंक में न्यूट्रियेंट के 16 तत्वों से युक्त पानी मिलाया जाता है। पौधे को पाइप में लगा दिया जाता है, जहां तक पंप की सहायता से पानी पहुंचाया जाता है। पाइप में एक कीप लगा दी जाती है, जिसके जरिये बचे हुए पानी के वापस टैंक तक ले जाया जाता है। पूरी प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती है।

खास बात यह है कि इस तकनीक के जरिये टमाटर का पौधा लौकी के पौधे से भी बड़ा होकर लगभग 60 मीटर तक का हो जाता है। एक हजार रुपये खर्च करके कम से कम चार सौ किलो टमाटर प्राप्त किया जा सकता है।

हाइड्रोपोनिक तकनीक पर लिख चुके हैं 18 किताब

पार्थ अब तक हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक पर अठारह किताबों की श्रंखला लिख चुके हैं। खास बात यह है कि सभी किताबों का शीर्षक वेपन अगेंस्ट हंगर (भूख के खिलाफ हथियार) है। शीर्षक का उल्लेख करते हुए पार्थ ने बताया कि आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों का गरीब भूखा सोता है।

तकनीक को लेकर आत्मविश्वास भरे लहजे में पार्थ ने बताया कि इसका सही तरीके से क्रियान्वयन होने पर देश में खेती के जरिये ही किसानों की आर्थिक समस्या दूर हो जाएगी और अन्नदाता को भूखे नहीं सोना पड़ेगा।

अब हवा में भी उगेगा आलू

शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने हवा में आलू उगाने का कारनामा कर दिखाया है। संस्थान द्वारा बीते तीन सालों से किया जा रहा प्रयोग सफल साबित हुआ है।जिसके बाद संस्थान को यह आविष्कार करने में सफलता हाथ लगी है। संस्थान एरोपोनिक नामक नई तकनीक से बिना मिट्टी के हवा में आलू उगाने की यह विधि ईजाद की है।

आमतौर पर आलू जमीन के नीचे उगाया जाता है। एरोपोनिक नाम की नई तकनीक में आलू बिना मिट्टी के हवा में उगाया जाएगा, यानी कि एक थर्मोकोल लगे बॉक्स में छेद करके आलू के पौधे को डाला गया है। पौधे को इस तरह से बॉक्स में डाला गया है कि उसकी जड़े नीचे हवा में हो।

जडों पर न्यूट्रिन अमीडिया नामक छिड़काव किया गया है। विभिन्न तापमान के अनुरूप इन पौधों की जांच की गई। इस आलू को उगाने के लिए मिट्टी का प्रयोग नहीं किया गया। इसमें कीटनाशकों का प्रयोग न के बराबर हुआ है।

ऐरोपोनिक पद्धति से मिट्टी के बिना बीज आलू पैदा करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू की रोग रहित नई किस्में तैयार करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू को किसानों तक कम समय में पहुंचाने में मदद मिलेगी।

आमतौर पर जिस आलू के एक पौधे से सिर्फ पांच और 10 आलू पैदा होते थे, इस तकनीक की मदद से आलू के एक पौधे से 70 आलू का उत्पादन हो सकेगा। ऐसे में सात गुना ज्यादा आलू का उत्पादन संभव होगा । इस प्रकार इस तरिके से आलू का उत्पादन 7 गुना बढ़ जाता है । बहुत जल्द ये तकनीक किसानो के पास पहुंच जाएगी

इस किसान ने खोजी गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक जो बदल सकती है किसानों की किस्मत

उत्तर प्रदेश के एक किसान ने गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक खोज निकाली है गन्ना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। इस विधि से गन्ने की बुवाई करने से न सिर्फ बीज कम लगता है बल्कि खाद, पानी और पेस्टीसाइड की मात्रा में भी तीन से चार गुना तक की कमी आती है। इस तकनीक का नाम है ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’।

यूपी के लखीमपुर खीरी के किसान जिले के शीतलापुर गाँव में रहने वाले युवा हाईटेक किसान दिल्जिन्दर सहोता इस तकनीक से खेती कर रहे हैं। ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ यानी गन्ने की खड़ी गुल्ली (गन्ने का टुकड़ा) की बुआई।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ गन्ना बोआई की यूपी में अपनाई जा रही पारम्परिक तकनीक से बिल्कुल अलग है। ये दो उल्टी दिशाओं वाले कांसेप्ट हैं। किसानों को अपना माइंड सेट बदलना पड़ेगा।

गुल्ली विधि प्लान्टेशन में खेत मे पहले बेड बनाए जाते हैं, फिर बेड के एक सिरे पर विशेष प्रकार से एक-एक आंख की खड़ी गुल्ली काटकर लगाई जाती है।जेट एयरवेज में नौकरी छोड़ अपनी मिट्टी से जुड़े युवा और हाईटेक किसान दिल्जिन्दर कहते हैं, ”खेती में लागत बढ़ती जा रही है ऐसे में किसान इनपुट कास्ट कम करके ही अपनी बचत को बढ़ा सकते हैं।”

गुल्ली विधि में खाद कम से कम, पानी 75 प्रतिशत कम और बीज में सबसे बड़ी बचत होती है। आम किसान बैलों से एक एकड़ में आम तौर पर 25 से 35 कुन्तल तक बीज प्रयोग करते। ट्रेंच विधि से और भी ज्यादा बीज लगता है। पर इस विधि से मात्र चार से पांच कुन्तल बीज में एक एकड़ खेत की बोआई हो जाती है। सर्दियों की बोआई तो दो से तीन कुन्तल गन्ने के बीज से ही हो सकती।

दिल्जिन्दर मुस्कुराते हुए कहते हैं ये बात आम किसान के सामने कहेंगे तो वो हंसेगा। पर ये 100 फीसदी सच है। चार पांच कुन्तल में एक एकड़ गन्ने की बिजाई। ‘खड़ी गुल्ली विधि’ में धूप और पानी का मैनेजमेंट बड़ा जरूरी है। गन्ने की फसल सी-4 टाइप की फसल है सो धूप इसके लिए पूरी मिलनी जरूरी है।

दिल्जिन्दर कहते हैं हम इसे फगवाड़ा मेथड या अवतार सिंह मेथड भी कहते हैं। हमने भी ये विधि पंजाब के किसान अवतार सिंह से ही सीखी। इसके बाद आजमाई और आज पूरी तरह से मुतमुईन हूँ।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ की इस विधि के बारे में पंजाब के किसान अवतार सिंह कहते हैं, ”ये कुदरती खेती है। गन्ना जब ऊपर की ओर बढ़ता है तो हम उसे लिटा के क्यों बोते हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में पंच तत्वों से शरीर बनने की बात कही गई। ये विधि भी उसी पर आधारित है। पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु। जिसमें से हम सिर्फ जल का प्रबंधन कर सकते ये ही हमारे हाथ में है। गुल्ली विधि भी इन्हीं पंचतत्वों के आधार पर ही बोई जाती है। इसे हम नेचुरल खेती भी कह सकते।

दिल्जिन्दर सहोता गुल्ली विधि के बारे में बड़ी ही विश्वास के साथ बताते हैं, ”एक एकड़ में लाइन टू लाइन दूरी के आधार पर बीज कम या ज्यादा हो जाता। अगर साढ़े चार बाई दो फीट पर बोते हैं, तो एक एकड़ में करीब चार हजार गुल्ली लगेगी। अगर एक आंख से दस गन्ने स्वस्थ निकल आए तो एकड़ में 40 हजार गन्ने हो जाते है।

चालीस हजार गन्ने चार सौ कुन्तल हो गए, हिसाब साफ है।” दिल्जिन्दर कहते हैं कि अगर गन्ने का वजन बढ़ता है, अगर डेढ़ किलो का हो गया तो छः सौ कुन्तल, दो किलो का गन्ना हो गया तो आठ सौ कुन्तल पैदावार हो सकती है। सबसे अच्छी बात इस विधि में ये है कि आप एक गुल्ली यानी आंख से कितने गन्ने लेना चाहते हो ये आप पर निर्भर करता है। जितने चाहिए उसके बाद मिट्टी चढ़ा दीजिए। टिलरिंग बन्द हो जाएगी।

यूपी में अभी आम गन्ना किसान बीज, खाद पेस्टिसाइड अंधाधुंध डालते गन्ने को बड़ा करने के लिए। लेकिन वर्टिकल बेड प्लान्टेशन में गन्ने को बढ़ाया नहीं जाता। बल्कि उसकी मोटाई बढाई जाती। गन्ना गठीला होगा तो स्वस्थ होगा। मिट्टी चढ़ी होगी तो गिरेगा भी कम।

दिल्जिन्दर कहते हैं, ”अगर हम चार कुन्तल में चार सौ और ज्यादा उत्पादन ले सकते तो फिर खेत मे 30-40 कुन्तल बीज क्यों झोंकना। खर्चो में कटौती करके ही किसान इनपुट लागत बचा सकता है।

वर्टिकल बड का कॉन्सेप्ट दिल्जिन्दर को पंजाब से मिला है। पर दिल्जिन्दर कहते है। करने में डर लग रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था कि एक गन्ने के अखुए से 30, 40, 50 तक गन्ने लिए जा सकते हैं, पर किया तो रिजल्ट सामने हैं। मुझे लगता पानी खाद से लेकर बीज की इतनी बड़ी बचत किसी और विधि में होती होगी? 25 से 30 कुन्तल बीज भी बच गया तो किसान के करीब नौ हजार रुपए बच गए। अभी हम चार-पांच फीट पर गन्ना बो रहे पर आगे लाइन टू लाइन दूरी छः आठ फीट भी करेंगे।

अच्छी आमदनी के लिए नवंबर में ऐसे करें अजवाइन की उन्नत खेती

यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं।

अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों की औषधी बनाने के काम में लिया जाता हैं।

जलवायु

उत्तरी अमेरिका, मिस्त्र ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य्प्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ हिसों में अजवाइन की व्यावसायिक खेती की जाती हैं। अजवाइन की बुवाई के समय मौसम शुष्क होना चाहिए। अत्यधिक गर्म एवं ठंडा मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता हैं। अजवाइन पाले को कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं।

अजवाइन की उन्नत खेती

राजस्थान राज्य में इसकी खेती 15483 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती हैं जिससे 5450 टन उत्पादन एवं 352 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं (वर्ष 2009-10 के अनुसार)। इसकी खेती मुख्यतः चित्तौडगढ, उदयपुर, झालावाड़, राजसमंद, भीलवाड़ा एवं कोटा में की जाती हैं।

अजवाइन कम लागत की मसाला फसल हैं तथा इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए यदि उन्नत तकनीकी से खेती की जाये तो इसके उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती हैं। इसके लिए ध्यान देने योग्य बिंदुओं का विवरण इस प्रकार से हैं:-

उन्नत किस्में

  • लाम सलेक्शन-1 – 135 से 145 दिन में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती हैं।
  • लाम सलेक्शन-2 -इसके पौधे झाड़ीदार होते हैं इसकी औसत उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।
  • आर.ए. 1-80 -यह किस्म 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। दाने बारीक़ परन्तु अधिक सुगंधित होते हैं इसमें 10-11 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं। इस किस्म पर सफेद चूर्णिल आसिता रोग का प्रकोप अधिक रहता हैं।

भूमि

अजवाइन एक रबी की मसाला फसल हैं। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं। सामान्यतः बलुई दोमट मिटटी जिसका पि.एच. मान 6.5 से 8.2 तक है, में अजवाइन सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। जहां भूमि में नमी कम हो वहां सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक हैं।

खेती की तैयारी

खेत तैयार करने के लिए मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें तथा इसके बाद 2 जुताई देशी हल से कर खेत को भली-भांति तैयार करें। अजवाइन का बीज बारीक़ होता हैं। अतः खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भरभूरा होने तक जुताई करें।

खाद एवं उर्वरक

अजवाइन की भरपूर पैदावार लेने के लिए 15-20 दिन पूर्व 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिलाए। उर्वरक के रूप में इस फसल को 20 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देवें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में डाल देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद खड़ी फसल में देवें।

बीज दर एवं बुवाई

अजवाइन की बुवाई का उचित समय सितम्बर से नवम्बर होता है। इसे छिड़काव या क़तर विधि से बोया जाता है। एक हेक्टेयर के लिए 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिए बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनि हुई मिट्टी के साथ मिलाकर बुवाई करे इससे बीज दर सही रखने में मदद मिलती है। कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त है। इस विधि में कतार से कतार की दुरी 30-40 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15-25 से.मी. रखें। इसमें बीजों का अंकुरण 10-15 दिनों में पूर्ण होता है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई

अजवाइन की फसल काफी हद तक सूखा सहन कर सकती है। इसका सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में उत्पादन किया जा सकता है। सामान्यतया अजवाइन के लिए 2-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जब पौधे 15-20 से.मी. तक बड़े हो जाये तब पौधों की छंटाई करके पौधे से पौधे की दुरी में पर्याप्त अंतर रखें। फसल में जल निकासी की भी उचित व्यवस्था करे ताकि पौधों को उचित बढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान एवं वातावरण मिल सके।

फसल कटाई एवं उपज

कटाई की उपयुक्त अवस्था में फसल पीली पड़ जाती है तथा दाने सुखकर भूरे रंग के हो जाते है। अजवाइन की फसल लगभग 140-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। कटाई पश्चात फसल को खलिहान में सुखावें तथा बाद में गहाई और औसाई की जाय। साफ बीजों को 5-6 दिन सूखा कर बोरों में भर कर भंडारण करे।

उपज

सामन्यतः एक हेक्टेयर में अजवाइन की उपज 10-12 क्विंटल तक की पैदावार प्राप्त होती है। अजवाइन बहुउपयोगी होने के साथ विदेशों में विक्रय कर विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत है।अजवाइन का एक क्विंटल का भाव 10000 से 12000 होता है जिस से आप को एक हेक्टेयर से एक लाख से ज्यादा की आमदन हो जाती है ।

अगर किसान भाई अजवाइन की खेती संबंधित मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखकर खेती करें तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। साथ ही वह कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते है।

बंपर फसल के लिए ऐसे करें बेड विधि से चने की खेती

इस सीजन में चने की बुवाई की जाती है। और आज हम आपको चने की खेती करने की एक ऐसी विधि के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे न सिर्फ किसानों की लागत कम होगी बल्कि उसके साथ ही उत्पादन भी बढ़ेगा। मैं बात कर रहा हूं बेड विधि से चने की खेती के बारे में। मध्य प्रदेश के बुत से किसान इस विधि से खेती कर रहे हैं।

चना रबी ऋतु ने उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है। विश्व के कुल चना उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत में होता है। देश में कुल उगायी जाने वाली दलहन फसलों का उत्पादन लगभग 17.00 मिलियन टन प्रति वर्ष होता है। चने का उत्पादन कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है।

मध्य प्रदेश के हरदा जिले के खिरकिया गाँव के किसान आशीष वर्मा ने बताया, ”बेड़ विधि से चने की खेती करने से कई तरह के फायदे होते हैं। बेड पर बोया गया चना नर्म जमीन पर रहता है जिससे पौधे का विकास अच्छे से होता है।

” उन्होंने बताया, ”इस विधि से खेती करने से अगर बारिश हो भी जाती है तो कोई नुकसान नहीं होता है। इसके साथ ही सिंचाई करने के लिए कम पानी की ज़रूरत पड़ती है। खरपतवार भी कम होता है।” चने की बुवाई अक्टूबर से नवंबर महीने में की जाती है, लेकिन चने की बिटकी किस्म की बुवाई अभी भी की जा सकती है।

देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। जो कुल चना उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा करता है।

”साधारण तरीके से चने की खेती करने से एक एकड़ में जहां 10 से 12 कुंतल उत्पादन होता है तो वहीं बेड़ विधि से खेती करने से प्रति एकड़ उत्पादन 14 से 16 कुंतल होता है,” आशीष ने बताया, ”बेड विधि से खेती करने के लिए सबसे पहले कल्टीवेटर की सहायता से खेत की जुताई करें फिर उसके बाद पाटा लगाकर खेत को बराबर कर दे।

इसके बाद पलेवा कर दें और फिर जब खेत बुवाई करने के लायक हो जाए तो चने की बुवाई कर दें।” आशीष 30 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, जिसमें से 7 एकड़ पर चने की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि बेड विधि से बुवाई करने से खरपतवार कम होता हैं और निराई गुड़ाई की जरूरत कम होती है।

अर्थशास्त्र के गुरु ने जल प्रबंधन से बंजर भूमि में उगाया सोना

जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से नौ किमी दूर स्थित कंकराड़ी गांव के दलवीर सिंह चौहान ने जल प्रबंधन के बूते अपनी ढलानदार असिंचित भूमि को सोना उगलने वाली बना दिया। टपक खेती व माइक्रो स्प्रिंकलर और मेहनत की तकनीक से वह इस 0.75 हेक्टेयर भूमि पर पिछले 17 साल से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। इससे दलवीर हर वर्ष 3.5 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं।

दलवीर सिंह ने वर्ष 1994 में गढ़वाल विवि श्रीनगर से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद वर्ष 1996 में बीएड किया। सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रहने वाले दलवीर पर भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी भी थी। इसलिए उन्होंने गांव के निकट मुस्टिकसौड़ में एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन, स्कूल से मिलने वाला मानदेय परिवार चलाने के लिए ना काफी था।

वर्ष 2001 में उत्तरकाशी के उद्यान अधिकारी कंकराड़ी गांव पहुंचे तो उन्होंने दलवीर को आंगन के आसपास नकदी फसलों के उत्पादन को प्रेरित किया। दलवीर ने डरते हुए पहले वर्ष एक छोटे-से खेत में छप्पन कद्दू लगाए। घर के नल से पानी भर कर एक-एक पौध की सिंचाई की। संयोग देखिए कि तीन माह के अंतराल में उनके 45 हजार रुपये के छप्पन कद्दू बिक गए।

नौकरी छोड़ प्रगतिशील किसान बने

खेती से लाभ होते देख दलवीर ने प्राइवेट स्कूल की नौकरी छोड़कर सब्जी उत्पादन शुरू कर दिया। पानी के इंतजाम के लिए वर्ष 2008 में एक लाख रुपये की विधायक निधि से दो किमी लंबी लाइन मुस्टिकसौड़ के एक स्रोत से जोड़ी। वहां भी पानी कम होने के कारण घर के पास ही एक टैंक बनाया। इसी बीच कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ में दलवीर ने खेती के साथ जल प्रबंधन की तकनीक सीखी।

फिर वर्ष 2008 में ही सिंचाई के लिए टपक खेती अपनाई। इसके लिए सिस्टम लगाने में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दलवीर की मदद की। सूखी भूमि पर जब लाखों रुपये की आमदनी होने लगी तो दलवीर ने वर्ष 2011 में माइक्रो स्प्रिंकलर की तरकीब सीखी।

इसका उपयोग दलवीर ने गोभी, पालक, राई व बेमौसमी सब्जी उत्पादन के लिए बनाए गए पॉली हाउस में किया। आज इन्हीं तकनीकों और अपनी मेहनत के बूते दलवीर जिले के प्रगतिशील किसानों की सूची में हैं।

घर ही बना बाजार

दलवीर की खेती में खास बात यह है कि सब्जी विक्रेता सब्जी लेने के लिए सीधे उनके गांव कंकराड़ी पहुंचते हैं। इसलिए दलवीर के सामने बाजार का संकट भी नहीं है।

कम पानी में बेहतर उद्यानी का गुर सिखा रहे दलवीर

दलवीर की मेहनत को देखने और कम पानी में अच्छी उद्यानी के गुर सीखने के लिए जिले के 45 गांवों के ग्रामीणों को कृषि विभाग व विभिन्न संस्थाएं कंकराड़ी का भ्रमण करा चुकी हैं। दलवीर जिले के 30 से अधिक गांवों में कम पानी से अच्छी उद्यानी का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। इसी काबिलियत के बूते दलवीर को ‘कृषि पंडित’, ‘प्रगतिशील किसान’ सहित कई राज्यस्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ऐसी होती है टपक खेती

कम पानी से अच्छी किसानी करने का वैज्ञानिक तरीका टपक खेती है। इसमें पानी का 90 फीसद उपयोग पौधों की सिंचाई में होता है। इसके तहत पानी के टैंक से एक पाइप को खेतों में जोड़ा जाता है। उस पाइप पर हर 60 सेमी की दूरी पर बारीक-बारीकछेद होते हैं। जिनसे पौधों की जड़ के पास ही पानी की बूंदें टपकती हैं। इस तकनीक को ड्रॉप सिस्टम भी कहते हैं।

70 फीसद पानी का उपयोग

माइक्रो स्प्रिंकलर एक फव्वारे का तरह काम करता है। इसके लिए टपक की तुलना में टैंकों में कुछ अधिक पानी की जरूरत होती हैं। इस तकनीक से खेती करने में 70 फीसद पानी का उपयोग होता है। जबकि, नहरों व गूल के जरिये सिंचाई करने में 75 फीसद पानी बरबाद हो जाता है।

दलवीर की बागवानी

ब्रोकली, टमाटर, आलू, छप्पन कद्दू, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी, बैंगन, फ्रासबीन, फूल गोभी, राई, पालक, खीरा, ककड़ी के अलावा आडू़, अखरोट, खुबानी, कागजी नींबू आदि।