इजरायल की पावरफुल मशीनें, इनकी टेक्नोलॉजी का लोहा मानती है दुनिया

इस समय दुनिया के कई देश सूखे का सामना कर रहे हैं। वहीं, इजरायल ने आधुनिक टेक्नोलॉजी से न सिर्फ खेती से जुड़ी कई समस्याएं खत्म कीं, बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं।

इजरायल ने न केवल अपने मरुस्थलों को हराभरा किया, बल्कि अपनी तकनीक को दूसरे देशों तक भी पहुंचाया। खेती-किसानी के लिए इजरायल ने बाग-बगीचों और पेड़ों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने जैसी कई ऐसी मशीनें बनाईं, जिनकी आज दुनिया भर में तूती बोल रही है।

कुछ ही घंटों में ही जोत ली जाती हैं सैकड़ों एकड़ जमीन

इजरायल में बहुत कम बारिश होती है। इसके चलते यहां बारिश का फायदा जल्द से जल्द उठाना होता है। आमतौर पर खेत जोतने में ही काफी समय लग जाता है। इसके लिए इजरायल ने इटली से खेत जोतने वाली ये विशालकाय मशीनें खरीदी थीं।

इसके बाद इजरायली कंपनी ‘एग्रोमॉन्ड लि.’ ने इससे भी आधुनिक मशीनों का प्रोडक्शन शुरू किया। इस तरह अब इजरायल में ये मशीनें अधिकतर किसानों के पास है। इसके अलावा किसान इन्हें किराए पर भी ले सकते हैं। इन मशीनों से कुछ ही घंटों में सैकड़ों एकड़ जमीन जोत ली जाती है।

कारपेट की तरह शिफ्ट कर देती हैं बगीचे

फोटो में दिखाई दे रही यह मशीन इजरायल के इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग द्वारा डवलप की गई है। इसका उपयोग बाग-बगीचों और पौधों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने के लिए किया जाता है। इससे घास-फूंस और पौधों की जड़ों तक को नुकसान नहीं पहुंचता। अब ऐसी मशीनों का उपयोग कई देशों में होने लगा है।

पानी की बचत के लिए अनोखी मशीन

इजरायल में पानी की कमी होने के चलते यहां नहरों की व्यवस्था नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इजरायल के रमत नेगेव डिजर्ट एग्रो रिसर्च सेंटर ने खेतों की सिंचाई के लिए इन स्पेशल मशीनों को डिजाइन किया। इससे न सिर्फ खेतों की सिंचाई होती है, बल्कि पानी की भी काफी बचत हो जाती है। मशीन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है।

मूंगफली जमीन से निकालकर साफ भी कर देती है

इजरायल के इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग द्वारा डवलप की गई यह मशीन मूंगफली और जमीन के अंदर होने वाली सब्जियों व अनाज को निकालने का काम करती है। मशीन की खासियत यह है कि यह सिर्फ मूंगफली को जमीन से निकालने के बाद उसे साफ भी करती जाती है।

इसके बाद मशीन में ही बने ड्रमों में भरती चली जाती है। इससे न सिर्फ किसानों की मेहनत ही बचती है, बल्कि कम समय में ढेर सारा काम हो जाता है। बता दें कि इजरायल में मूंगफली की काफी खेती होती है।

पेड़ों को जड़ सहित उखाड़कर दूसरी जगह कर कर देती है शिफ्ट

सूखा होने के बाद भी इजरायल हरा-भरा देश है। दरअसल, इजरायल ने अन्य देशों की तरह विकास के नाम पर पेड़-पौधों को नाश नहीं होने दिया। इसके लिए यहां पेड़ काटने के बजाय उन्हें शिफ्ट करने की प्रक्रिया अपनाई गई।

इसके लिए इजरायली कंपनी ‘एग्रोमॉन्ड लि.’ ने ऐसी मशीनों का निर्माण किया, जो बड़े से बड़े पेड़ को जड़ सहित उखाड़कर उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर देती है। इससे पेड़ों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता।

जाने दूध में घी(फैट) बढाने का पक्का फार्मूला

गाय या भैंस के दूध की कीमत उसमें पाए जाने वाले घी की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि घी अधिक तो दाम चोखा और घी कम तो दाम भी खोटा। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

यूं तो हर पशु के दूध में घी की मात्रा निश्चित होती है। भैंस में 06 से 10 फीसदी और देशी गाय के दूध में 04 से 05 प्रतिशत फैट (वसा) होता है। होलस्टन फ्रीजियन संकर नस्ल की गाय में 3.5 प्रतिशत और जर्सी गाय में 4.2 प्रतिशत फैट होता है।

जाड़े के दिनों में पशु में दूध तो बढ़ जाता है, लेकिन दूध में घी की मात्रा कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत गर्मियों में दूध कुछ कम हो जाता है, पर उसमें घी बढ़ जाता है। पशु विशेषज्ञों को मानना है कि यदि पशुपालक थोड़ी से जागरूकता दिखाएं और कुछ सावधानियां बरतें तो दूध में घी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।


इसमें प्रमुख है पशु को दिया जाने वाला आहार। पशुपालक सोचते हैं कि हरा चारा खिलाने से दूध और उसमें घी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उसमें चर्बी कम हो जाती है।

इसके विपरीत यदि सूखा चारा/ भूसा खिलाया जाए तो दूध की मात्रा घट जाती है। इसलिए दुधारू जानवर को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा खिलाना चाहिए। इतना ही नहीं, पशु आहार में यकायक बदलाव नहीं करना चाहिए। दूध दोहन के समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरा दूध निकाल लिया जाए।

बछड़ा/ पड़ा को आखिरी का दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी दूध में सर्वाधिक होती है। दूध और घी की अच्छी मात्रा के लिए बुंदेलखंड के वातावरण में भदावरी प्रजाति की भैंस सर्वाधिक अच्छी मानी गई है। इसके अलावा सुरती प्रजाति का भी पालन किया जा सकता है।

750 किलो प्याज के लिए मिले महज 1064 रुपये, नाराज किसान ने पैसो से किया यह काम

महाराष्ट्र के प्याज उपजाने वाले एक किसान को अपनी उपज एक रूपये प्रति किलोग्राम से कुछ अधिक की दर पर बेचनी पड़ी. इसके बाद उसने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अपनी कमाई प्रधानमंत्री को भेज दी.

नासिक जिले के निफाड तहसील के निवासी संजय साठे उन कुछ चुनिंदा प्रगतिशील किसानों में से एक हैं जिन्हें केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से साल 2010 में उनकी भारत यात्रा के दौरान संवाद के लिए चुना था.

साठे ने रविवार को मीडिया से कहा, “मैंने इस मौसम में 750 किलोग्राम प्याज उपजाई लेकिन बीते हफ्ते निफाड थोक बाजार में एक रूपये प्रति किलोग्राम की दर की पेशकश की गई.” उन्होंने आगे कहा, “आखिर मैं 1.40 रूपये प्रति किलोग्राम का सौदा तय कर पाया और मुझे 750 किलोग्राम के लिए 1064 रूपये प्राप्त हुए.”

फिर गुस्से से भरपूर साठे ने कहा, “चार महीने के परिश्रम की मामूली वापसी प्राप्त होना दुखद है. इसलिए मैंने 1064 रूपये पीएमओ के आपदा राहत कोष में दान कर दिये. मुझे वह राशि मनीऑर्डर से भेजने के लिए 54 रूपये अलग से देने पड़े.

” उन्होंने कहा, “मैं किसी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं करता. लेकिन, मैं अपनी दिक्कतों के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण नाराज हूं.”

मनीऑर्डर 29 नवंबर को भारतीय डाक के निफाड कार्यालय से भेजा गया. यह डाक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम भेजा गया है. पूरे भारत में जितनी प्याज होती है उसमें से 50 फीसद उत्तर महाराष्ट्र के नासिक जिले से जाती है.

पालक की खेती से तीन महीने में कमा सकते हैं 2.75 लाख रुपए

खेती-बाड़ी में काम करने के कई ऐसे विकल्प है जिससे आप हर महीने लाखों की कमाई कर सकते हैं। सर्दियों का सीजन शुरू हो गया है और इस सीजन में बाजार में हरी सब्जियां आने लगती हैं। इसमें यदि हम पालक की बात करें तो वह एक ऐसी सब्जी है जिसे आप पूरे साल खाते हैं यह आपके सेहत के लिए तो अच्छी होती ही है,

साथ ही यदि आप इसका बिजनेस करते हैं तो इससे आपको काफी फायदा भी होता है। आप केवल पालक की खेती करने से भी लाखों पैसे कमा सकते हैं। यह एक ऐसी खेती है जिसमें लागत कम लगती है और बहुत कम समय में यह अच्छा मुनाफा देती है।

आपको बता दें कि पालक को एक बार बोया जाता है और इसकी कटाई 5-6 बार की जाती है। इसे एक बार काटने के बाद यह लगभग 15 दिन के बाद फिर से काटने योग्य हो जाती है। इसे सालभर बोया जाता है तो यह एक ऐसी खेती है जिससे आप सालभर कमाई कर सकते है।  पालक की खेती करने के लिए हल्की दोमट मिट्टी सही रहती है। जिसमे जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो और सिंचाई के लिए भी पानी की अच्छी व्यवस्था हो।

पालक की खेती से कमा सकते हैं 2 लाख तक

पालक की खेती की बात की जाए तो इसके लिए 1 हेक्टेयकर जमीन की जरूरत होती है। मात्र एक हेक्टेयर की जमीन में 150-250 क्विंटल पालक उगाया जा सकता है। से 15-20 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से बेचा जा सकता है।

ऐसे में अगर प्रति हेक्टेयर लागत के 25 हजार रुपए निकाल दिए जाएं तो 1500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से 200 क्विंटल से 3 महीने में ही 2 लाख, 75 हजार रुपए की कमाई हो जाती है।

फरवरी से मार्च और नवंबर से दिसंबर के महीने खेती के लिए सही

वैसे तो पालक की खेती पूरे साल की जाती है लेकिन फरवरी से मार्च और नवंबर से दिसंबर के महीने इसकी खेती के लिए अच्छे रहते हैं। पालक की कई प्रजातियां होमती है जिसमें जोबनेर ग्रीन, हिसार सिलेक्सन 26, पूसा पालक, पूसा हरित, आलग्रीन, पूसा ज्योति, बनर्जी जाइंट, लांग स्टैंडिंग, पूसा भारती, पंत कंपोजिटी 1, पालक नंबर 15-16 प्रमुख हैं।

यदि बात की जाए पालक की कटाई की तो इसे उस वक्त काटना सही रहता है जब इसकी पत्तियों की लंबाई 15-30 सेंटीमीटर के करीब हो जाए। इसके बाद हर कटाई 15-20 दिनों के अंतर पर करते रहना चाहिए।

मिर्च की खेती से नेक सिंह करते है 1 एकड़ से 2 लाख की कमाई

पटियाला जिले के नाभा से सटे गांव खोख के रहने वाले लगभग 71 वर्षीय नेक सिंह जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। मार्केट की नब्ज पकड़ उन्होंने इतनी मेहनत की कि आज वह पंजाब के नंबर वन मिर्च उत्पादक हैं। इनकम टैक्स भरने वाले गिने-चुने किसानों की फेहरिस्त में उनका नाम शुमार है। वह मिर्च की खेती से एक एकड़ में दो लाख रुपए कमा लेते हैं और इसी के दम पर उन्होंने अपनी चार एकड़ की पैतृक जमीन को बढ़ाकर 65 एकड़ तक कर लिया है।

इस तरह रहा संघर्ष का सफर

  • अपने अनुभव के बारे में नेक सिंह बताते हैं कि बात साल 1965 की है। कुछ पारिवारिक कारणों के चलते दसवीं की पढाई के बाद आगे नहीं पढ़ पाए। तेरह एकड़ जमीन पर काम शुरू किया, जिसमें से उनके हिस्से लगभग 4 एकड़ जमीन ही आई।
  •  उनके शुरुआती दिन संघर्ष से भरे रहे। यहां तक कि उन्हें घर का खर्च चलाने के लिए पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बस में कंडक्टर की नौकरी भी करनी पड़ी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
  •  नेक सिंह के साथ उनके बड़े भाई भी रहते थे और 1960 में सभी को विरासत में एक समान जमीन मिली थी, लेकिन अपनी उद्यमिता के बल पर उनमे से सबसे आगे निकलने में सिर्फ नेक सिंह ही कामयाब रहे।
  •  जिस वक्त राज्य में हरित क्रांति जोर पकड़ रही थी, उस करीब 20 साल की उम्र में नेक सिंह ने साहसिक कदम उठा खेती के लिए साढ़े 3 हजार रुपए के कर्ज से ट्यूबवेल लगाने का फैसला किया।
  •  सरकार की योजना के मुताबिक उन्होंने गेहूं और चावल की खेती शुरू की। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मदद से उन्हें एक स्थिर आमदनी जरूर मिल रही थी, लेकिन नेक सिंह संतुष्ट नहीं थे और वो और कमाना चाहते थे।
  •  इसी सिलसिले में सन 1980 से उन्होंने वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों से मिलना शुरू कर दिया। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के संपर्क में आने के बाद कपास और टमाटर के पौधों का परीक्षण किया और नई तकनीक सीखी।
  •  इसी का नतीजा रहा कि 1988 से लेकर 2000 तक उन्हें टमाटर की खेती से काफी आमदनी हुई। टमाटर के साथ ही उन्होंने 1991 से मिर्च की खेती भी शुरू कर दी और उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  •  बीते सीजन में उन्होंने साढ़े तीन एकड़ में मिर्च के पौधे लगाए, लेकिन बताते हैं उनका टारगेट 10 एकड़ तक पहुंचने का है। नेक सिंह गेहूं की खेती नहीं करते हैं, बल्कि रबी के मौसम में ज्यादा कमाई वाली फसल आलू, सूरजमुखी और खरीफ मौसम में मिर्च और बासमती चावल की खेती करते हैं।
    इस तरह आया बदलाव
  •  पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के प्रयोगों को दोहराते हुए 1991 में वो मिर्च की सफल खेती से परिचित हुए। इस काम को समझने में उन्हें बेंगलुरु के इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर से भी काफी मदद मिली।
  •  नाभा के ये उद्यमी बताते हैं, “मैं देशभर के वैज्ञानिकों को जानता था जिन्होंने मुझे मिर्च की सीएच-1 प्रजाति के परीक्षण में शामिल होने का मौका दिया। साल दर साल मैंने विशेषज्ञों से मिल रही जानकारी की मदद से इस प्रजाति में सुधार करता रहा, जबकि मिर्च के आधिकांश किसान ये भी नहीं जानते हैं कि नर्सरी कैसे तैयार की जाती है।”
  •  बाद में उन्होंने मिर्च की खेती के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए पॉली हाउस का विकास किया। ये पॉली हाउस राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में काफी मशहूर था।

100 औरतें काम करती हैं नेक सिंह के फार्म पर, कमाती हैं 10 हजार तक

नेक सिंह इलाके की महिलाओं को काम करने का मौका देते हैं और उन्हें प्रति घंटा के लिए 40 रुपए देते हैं। नर्सरी की देखभाल, मिर्च चुनने, दूसरे काम में सहयोग करने जैसे काम के लिए हर साल 100 महिलाओं को काम पर रखते हैं। नेक सिंह बताते हैं कि उनके यहां काम करने का माहौल घर के जैसा है, वहीं उनके काम करने वाली महिलाएं हर महीने करीब 10 हजार रुपए कमा लेती हैं।

मिर्च की खेती संबंधी कुछ खास बातें

  •  एक एकड़ नर्सरी से 285 एकड़ खेती के लिए पौधे तैयार होते हैं।
  • मिर्च के पौधों (सैंपलिंग) से प्रति वर्ष 4500 रुपये से लेकर 6000 रुपए प्रति एकड़ तक आमदनी।
  •  हर साल पौधों (सैंपलिंग) से कुल आमदनी 26 से 50 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ पौधे से करीब साढ़े सात लाख से 14 लाख रुपए की आमदनी।
  •  पौधे के बढ़ने का समय 5 महीना (नवंबर से मार्च तक)
  •  पैदावार लागत (श्रम, लॉजिस्टिक्स, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पौधे के लिए बीज) ढाई लाख प्रति एकड़ श्रम लागत 40 रुपए प्रति घंटा।
  •  एक एकड़ में 180 से 220 क्विंटल हरी मिर्च के साथ 200 क्विंटल लाल मिर्च का उत्पादन होता है हरी मिर्च का बाजार मूल्य 12 से 25 रुपए प्रति किलो।
  • प्रति एकड़ सकल आय 6 लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ कुल आमदनी ( पैदावार लागत को घटाने के बाद) पांच लाख रुपए।
  •  प्रति एकड़ लैंड लीज 20 से 40 हजार रुपए (कुल आमदनी से घटाकर)

इस राज्य ने पाई किसान की मेहनत की कदर, देनी शुरू की किसानों को पेंशन

किसानों को पेंशन देने वाला सिक्किम भारत का पहला राज्य बन गया है। राज्य में 50 वर्ष की उम्र से ऊपर के किसानों को प्रति माह एक हजार रुपये बतौर पेंशन के रुप में मिलेंगे।

इस योजना का आगाज इसी वर्ष अगस्त से हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने नकद राशि शुक्रवार को पूर्वी सिक्किम के सरमसा में आयोजित जैविक खेती उत्पादक एवं राज्य स्तरीय पंचायत सम्मेलन में हस्तांतरित की। इसमें 78 किसान शामिल थे।

सिक्किम में 1000 किसान इस पेंशन के लाभार्थियों में शामिल हैं। इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि चामलिंग ने कहा कि सिक्किम जैविक खेती के लिए तरक्की की राह पर है। इसके लिए राज्य सरकार कृषकों को आवश्यक मदद दे रही है।

उन्होंने 2025 तक कृषि एवं खाद्यान्न उत्पादन में स्वनिर्भर होने के लक्ष्य की घोषणा की। युवाओं को भी स्टार्टअप योजना के जरिए जैविक खेती करने तथा इसका भरपूर लाभ उठाने की अपील करते हुए कहा कि जैविक खेती के उत्पाद की मांग बढ़ी है।

दक्षिण कोरिया ने भी जैविक खेती की इच्छा जाहिर की है। उन्होंने जैविक खेती करने वाले श्रेष्ठ कृषक को एक करोड़ रुपये की नगद पुरस्कार देने करने का घोषणा की। जैविक खेती उत्पादक सम्मेलन में मुख्यमंत्री पवन चामलिंग का कृषकों ने नागरिक अभिनंदन भी किया।

इस अवसर पर ग्रामीण प्रबंधन एवं विकास सचिव सीएस राव, कृषि सचिव खोरलो भूटिया व पंचायतों व कृषकों के प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में कृषि विभाग द्वारा राज्य के विभिन्न गावों से जैविक खेती उत्पाद बाजारों में पहुंचाने के लिए कुल 28 वाहनों की चाबी देकर सेवा आरंभ की।

इस किसान ने बिना खर्च किये खोजा अनोखा फार्मूला

15 साल पहले जिस जमीन को बंजर समझा गया, उस जमीन पर एक किसान ने जैविक खेती करके ढाई किलो वजन वाली मौसम्बी पैदा की। यही नहीं किसान ने मेहनत करके जमीन को इस लायक कर दिया, जहां पर अब 20 किलो को कटहल और सवा किलो वजन वाला आम हो रहा है।

उनका प्रयोग रुका नहीं है, बल्कि वे एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उन्हें एग्रीकल्चर कॉलेज में हॉर्टीकल्चर पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं।

  • ये किसान हैं प्राण सिंह। ग्वालियर से 25 किमी दूर जहानपुर गांव। आसपास खेत हैं, लेकिन ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं। केवल प्राण सिंह अपने खेत और बगीचे में काम करते नजर आते हैं।
  • वे बताते हैं कि 15 साल पहले जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो गई, क्योंकि किसानों ने जमकर यूरिया और केमिकल का इस्तेमाल किया। उसके बाद यहां के ज्यादातर किसान ने फसल लगाना बंद कर दी।
  • प्राण सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने खुद ही खेत में मेहनत करना शुरू की। यूरिया और केमिकल का उपयोग बंद किया। खेत के आसपास 3 तालाब बनाए, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया।

बंजर जमीन को बनाया उपजाऊ

  • इससे जमीन का वाटर लेबल सही हुआ। फिर उन्होंने गोबर, घास-फूस की खाद का इस्तेमाल किया। वर्मी कंपोस्ट की ट्रेनिंग ली। इसके बाद खेत की उर्वरा शक्ति वापस लौट आई।
  • उन्होंने खेत में नींबू, संतरा और मौसम्बी के पौधे लगाए। इस साइट्रस वैरायटी के पौधों के साथ कई प्रयोग प्राण सिंह ने किए। इसका नतीजा यह निकला कि उनके पेड़ में मौसम्बी का वजन ढाई किलो तक पहुंच गया।

कई नयी वैरायटी विकसित की प्राण सिंह ने

  • यही नहीं उन्होंने कटहल, अमरूद सहित कई पौधों की ग्राफटिंग की, जिससे नयी वैरायटी विकसित हुई। प्राण सिंह बताते हैं कि यह सब प्राकृतिक तरीके से खेती करने का नतीजा है।
  • केमिकल और दूसरी रसायनिक खादों से जमीन और फसल को नुकसान होता है। प्राण सिंह अब कोशिश कर रहे हैं कि एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी की फल लगें। उनके मुताबिक यह संभव है, क्योंकि ये तीनों एक प्रजाति के फल हैं।
  • प्राण सिंह की मेहनत देखकर आसपास बंजर खेतों वाले किसान भी अपनी जमीन में वापस खेती करने के लिए लौट रहे हैं। अब तो एग्रीकल्चर कॉलेज के साथ कृषि विभाग के अफसर प्राण सिंह को जैविक खेती की टिप्स देने के लिए बुलाते हैं।

ये है 6 लाख की गाय लक्ष्मी, हर रोज देती है 60 लीटर दूध

भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि लोग डेयरी उद्योग में लगातार प्रयासरत हैं। इसी तरह का एक उदाहरण हरियाणा के करनाल जिले के दादुपुर गांव का है।

यहां एक नेशनल अवार्डी गाय एक दिन में 60 लीटर दूध देती है। औसत निकाला जाए तो हर घंटे में लगभग ढाई लीटर दूध दे रही है।

ब्यूटी में है चैंपियन का जीत चुकी है खिताब

डेयरी चला रहे राजबीर आर्य बताते हैं कि होल्सटीन फ्रिसन नस्ल की इस गाय का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी दूध देने में तो अव्वल है ही लेकिन इसने अपनी ब्यूटी के लिए भी राष्ट्रीय स्तर के पशु मेलों में इनाम जीते हैं। मुक्तसर पंजाब व राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में ब्यूटी चैंपियन रह चुकी है।

ये है खुराक

लक्ष्मी हर रोज 50 किलोग्राम हरा चारा, 2 किलोग्राम सूखा तूड़ा और 14 किलो दाना खाती है। लक्ष्मी व अन्य पशुओं की देखभाल में 6 आदमी दिन-रात लगे रहते हैं। लक्ष्मी का जन्म राजबीर के घर ही हुआ था, जबकि इसकी मां को वे पंजाब से लेकर आए थे।

5 लाख कीमत लगने पर लक्ष्मी को बेचने को तैयार नहीं है राजबीर

राजबीर बताते हैं कि जनवरी के महीने में बैंगलुरू से गाय खरीदने के लिए उसके फार्म पर लोग आए थे। उन्होंने इसकी कीमत 5 लाख रुपए लगाई थी। इस कीमत पर भी राजबीर ने गाय को नहीं बेचा।

डेयरी उद्योग के 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं राजबीर

डेढ़ एकड़ भूमि पर बने राजबीर के फार्म पर फिलहाल 75 गाय हैं। जिनमें से 60 होल्सटीन फ्रिसन, 10 जर्सी और 5 साहिवाल नस्ल की है। इस मौसम में हर रोज 800 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है।

जिसमें से कुछ शहर में बेचने जाते हैं, बाकी को अमूल डेयरी भेजा जाता है। वे पिछले 18 वर्ष से डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं। 1998 में मात्र 5 गाय से शुरूआत की थी। अब वे 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं।

ऐसे करे खेती में नई तकनिक प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग, पूरी जानकारी पढ़े।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में लगे पोधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म के द्वारा सही तरीके से ढकने की प्रणाली को प्लास्टिक मल्चिंग कहते है। यह फिल्म कई प्रकार और कई रंग में आती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

इस तकनीक से खेत में पानी की नमी को बनाए रखने और वाष्पीकरण रोका जाता है। ये तकनीक खेत में मिटटी के कटाव को भी रोकती है। और खेत में खरपतवार को होने से बचाया जाता है। बाग़वानी में होने वाले खरपतवार नियंत्रण एवं पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत सहायक होती है।क्यों की इसमे भूमि के कठोर होने से बचाया जा सकता है और पोधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है।

सब्जियों की फसल में इसका प्रयोग कैसे करे।

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी है उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले फिर उसमे गोबर की खाद् और मिटटी परीक्षण करवा के उचित मात्रा में खाद् दे। फिर खेत में उठी हुई क्यारी बना ले। फिर उनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा ले।फिर 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म जो की सब्जियों के लिए बेहतर रहती है उसे उचित तरीके से बिछा दे फिर फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबा दिया जाता हे। इसे आप ट्रैक्टर चालित यंत्र से भी दबा सकते है। फिर उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से पोधों से पोधों की दूरी तय कर के छिद्र कर ले। किये हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पोधों का रोपण कर ले।

फल वाली फसल में इसका प्रयोग।

फलदार पोधों के लिए इसका उपयोग जहाँ तक उस पौधे की छाँव रहती है। वाह तक करना उचित रहता है।इसके लिये फिल्म मल्च की लम्बाई और चौड़ाई को बराबर कर के कटिंग करे।उसके बाद पोधों के नीचे उग रही घास और खरपतवार को अच्छी तरह से उखाड़ के सफाई कर ले उसके बाद सिंचाई की नली को सही से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की प्लास्टिक की फिल्म मल्च जो की फल वाले पोधों के लिए उपयुक्त रहती है। उसे हाथों से पौधे के तने के आसपास अच्छे से लगनी है। फिर उसके चारों कोनों को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढँकना है।

खेत में प्लास्टिक मल्चिंग करते समय सावधानियां।

  •  प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  •  फिल्म में ज्याद तनाव नही रखना चाहिए।
  •  फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ा वे।
  •  फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करे सिंचाई नली का ध्यान रख के।
  •  छेद एक जैसे करे और फिल्म न फटे एस बात का ध्यान रखे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जेसी रखे
  • फिल्म की घड़ी हमेशा गोलाई में करे
  • फिल्म को फटने से बचाए ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे चाव में सुरक्षित रखे।

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कितनी आती है।

मल्चिंग की लागत कम ज्यादा हो सकती हे क्यों की इसका कारण खेत में क्यारी के बनाने के ऊपर होता हे क्यों की अलग अलग फसल के हिसाब से क्यारिया सकड़ी और चौड़ी होती हे और प्लास्टिक फिल्म का बाज़ार में मूल्य भी कम ज्यादा होता रहता है।
प्रति बीघा लगभग 8000 रूपये की लागत हो सकती है और मिटटी चढ़ाने में यदि यंत्रो का प्रयोग करे तो वो ख़र्चा भी होता है।

प्लास्टिक मल्चिग में शासन का अनुदान कितना है।

कृषि को उन्नत करने और इसे बढावा देने लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उधानिकी विभाग में इसके लिये समस्त किसानो को 50%या अधिकतम 16000 रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का लाभ पहले आओ पहले पाओ की तर्ज पर दिया जाता है।इसके अनुदान पाने के लिए आपको अपने जिले के विकास खंड में विरिष्ट उधान विकास अधिकारी को अपने आवेदन जमा करवा सकते हें। और जानकरी आप अपने ग्राम सेवक से भी ले सकते है।

जानें देश की अलग-अलग मंडियों में बासमती धान के भाव

बासमती 1121 का भाव हरियाणा में 3500 से ऊपर बना हुआ है। बासमती 1121 में ग्राहकी अच्‍छी है।अब आवक टूटने लगी है।

राजस्‍थान की कोटा मंडी में 2 घंटे में ही पूरा 1121 धान बिक गया। धान के रेट अच्‍छे मिलने के चलते इस बार किसानों ने धान का स्‍टॉक नहीं किया है। इसलिए अब आगे यह अनुमान लगाना कि बहुत सा धान और मंडियों में आएगा, गलत होगा।

हरियाणा बासमती धान भाव, 

हरियाणा की मंडियों में भाव इस तरह से रहे। सोमवार 26 नंवबर 2018 को टोहाना में बासमती 1121 हाथ वाला धान 3500, कंबाइन वाला 3380, डीपी 1401 3185, पीबी 1 2975 और पूसा 1509 3151 रुपए क्विंटल बिका। गोहाना में बासमती 1121 का भाव 3600 रुपए रहा। फतेहाबाद में बासमती 1121 3550, पीबी 1 3000, पूसा 1509 3162 और डीपी 1401 3273 रुपए बिका। मतलौडा में बासमती 1121 3596 और बासमती 4372 रुपए बिका।

कैथल में बासमती 1121 का भाव 3540 और बासमती का 4270 रुपए रहा। नरवाला में बासमती 1121 धान हाथ से निकाला 3611 और कंबाइन वाला 3370 रुपए तक बिका। कलायत में बासमती 1121 3561 और बासमती 4281 रुपए बिका। पिल्‍लूखेड़ा में बासमती 1121 3580 रुपए और कुरुक्षेत्र में 3681 रुपए बिका। बासमती का भाव कुरुक्षेत्र में 4351 रुपए रहा।

तरावड़ी में बासमती 1121 3500 और बासमती 4300 रुपए बिका। चीका में बासमती 1121 हाथ वाला धान 3300 से 3585 तक और कंबाइन वाला धान 3000 से 3300 तक बिका। पूसा 1509 का भाव 2950 से 3100 रुपए तक रहा।

PB 1 – 3050 तक और बासमती का भाव 4000 से 4250 रुपए तक रहा। गोहाना में बासमती 1121 धान का भाव 3581 रुपए दर्ज किया गया। खरखौदा में बासमती का भाव 3551 और बेरी में 3541 रुपए रहा। उकलाना में बासमती 1121 3561, कंबाइन वाला 3250, डीपी 1401 3241, पीबी 1 2980 रुपए बिका।

उत्‍तर प्रदेश बासमती धान भाव, 

उत्‍तर प्रदेश की मंडियों में धान का भाव इस तरह से रहा। खेर में पूसा 1121 3370, 1509 3000, सुगंध 2481, डीपी 3300 और शरबती 2100 रुपए तक बिका। दिबई में बासमती 1121 3400, पूसा 1509 2950, सुगंध 2450, शरबती 2050 और डीपी 3200 रुपए तक बिका। सीतापुर में हाईब्रिड 1460 तक, कॉमन 1460 तक, आरएच 10 1700 तक और चंदन 21 1825 रुपए क्विंटल बिका।

पंजाब बासमती धान भाव, 

पंजाब की मंडियों का हाल इस तरह से रहा। अमृतसर में बासमती 1121 धान हाथ वाला 3450, कंबाइन वाला 3265 रुपए तक बिका। तरनतारन में हाथ से निकाला बासमती 1121 धान 3300 से 3586 और कंबाइन वाला धान 3000 से 3450 रुपए तक बिका। फरीदकोट में बासमती 1121 कंबाइन 3500, पूसा 1509 3052 और डीपी 1401 3000 रुपए बिका।

नई दिल्‍ली की नरेला मंडी में सोमवार को बासमती 1121- 3550, कंबाइन वाला धान 3250, पूसा 1509 3025, सुगंध 2500 और शरबती 2150 रुपए बिका। नजफगढ में बासमती 1121 3580 रुपए क्विंटल बिका।

राजस्‍थान की कोटा मंडी में बासमती 1121 का भाव 3380, सुगंध का 2350 से 2511, पूसा 1509 का 3000, डीपी का 2600 से 2841 रुपए तक रहा।

मध्‍यप्रदेश की पिपरिया मंडी में पूसा धान का रेट 2700 से 2900 रुपए रहा। बासमती 1121 का भाव 3000 से 3150 और पूसा 1509 का रेट 2700 से 2870 रुपए रहा।