कोटा के किसान ने विकसित की आम की नई प्रजाति

फलों के राजा कहे जाने वाले आम का नाता हमारी सभ्यता से शुरू से ही रहा है। अमूमन गर्मी के सीजन में ही आम का उत्पादन होता है। लेकिन अब दिन-प्रतिदिन विज्ञान के बढ़ते कदम की वजह से आम का उत्पादन अन्य सीजनों में भी होने लगा है।

भारत में इस समय 1500 से अधिक आम की किस्में पाई जाती हैं। सभी किस्म अपने आप में अच्छा खासा महत्व रखती है। ऐसी ही एक किस्म खोज निकाली है कोटा के एक किसान ने। इन्होंने ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसका साल के तीनों सीजन में उत्पादन होता है। यानी पूरे साल भर ये प्रजाति फल देती है, इसीलिए इसका नाम रखा गया है ‘सदाबहार।’

कोटा में बागवानी करने वाले गिरधरपुरा गांव के किसान किशन सुमन की बाग से उत्पादित होने वाला सदाबहार आम की कुछ खूबी अल्फांसो आम की तरह हैं। अल्फांसो भारत का सब से खास किस्म का आम है। इसे आम का सरताज कहा जाता है। बस इसी सरताज से मिलती जुलती चीजों जैसा सदाबहार आम है। आम की ये प्रजाति अपने आप में अलग तरीके की है।

किशन सुमन ने 1995 में गुलाब, मोगरा और मयूरपंखी (थूजा) की खेती शुरू की और तीन वर्षों तक फूलों की खेती करते रहे। इसी दौरान उन्होंने गुलाब के ऐसी किस्म को विकसित किया जिसमें एक ही पौधे मं सात रंग के फूल लगते हैं। उनके द्वारा उत्पादित इस किस्म का उन्हें अच्छा रिटर्न मिला। इसके बाद उन्होंने अन्य फसलों पर भी काम करना शुरू किया।

सुमन बताते हैं कि “मैंने सोचा है कि अगर मैं गुलाब की किस्म में परिवर्तन कर सकता हूं तो फिर आमों के साथ क्यों नहीं। मैंने विभिन्न किस्मों के आमों को इकठ‍्ठा किया और उन्हें पोषित किया। जब पौधे पर्याप्त बड़े हो गए, तो मैंने उन्हें रूटस्टॉक पर तैयार किया। इसके बाद फिर काफी हद तक परिवर्तन आया।

गुलाब किशन को कामयाबी 2000 में मिलती दिखी। उन्होंने अपने बगीचे में एक आम के पेड़ की पहचान की, जो तीन मौसमों में खिल गया था। जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्टूबर। उन्होंने पांच पेड़ों को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस पेड़ की अच्छी विकास आदत थी और इसमें गहरे हरे पत्ते थे। इन पेड़ों की एक खास बात यह भी थी कि इन पौधों में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं थी। धीरे-धीरे वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध होते गए। हनी बी नेटवर्क के एक स्वयंसेवक सुंदरम वर्मा ने सुमन के नवाचार के बारे में जमीनी तकनीकी नवाचारियों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के लिए संस्थागत अंतरिक्ष, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) को सूचित किया।

इसके बाद एनआईएफ ने सदाबहार पौधे बेचने या उपहार देने के लिए कहा, मैंने उन्हें पौधे दिए। एनआईएफ ने मुझे ये सलाह दी कि अपनी किस्म को सत्यापित कराएं। वे कहते हैं कि उनकी सलाह मानते हुए अपनी किस्म को प्रमाणित करने के लिए मैंने 11 वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी किस्म के पौधे लगाए। वह कहते है कि एनआईएफ को “मैंने 2012 में 20 पौधों का उपहार दिया था। अब पेड़ फल दे रहा है और जब फल पकता है, त्वचा नारंगी रंग प्राप्त करती है, जबकि अंदरूनी फल गेरुआ रंग का होता है।

खास प्रकार की किस्म को विकसित करने वाले किशन सुमन को अब तक कई अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। मार्च 2017 में सुमन को 9वीं द्विवार्षिक ग्रासरूट इनोवेशन और राष्ट्रपति भवन में आयोजित उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के दौरान फार्म इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

इनके फलों की तारीफ करते हुए हरदेव चौधरी कहते हैं कि सदाबाहर पूरे वर्ष खिलते हैं। फल का स्वाद मीठा होता है और एक बौने विविधता के रूप में विकसित होते हैं। वे कहते हैं कि आम की इस नस्ल को किचन ग्रार्डन में बर्तन में रखकर कुछ समय बाद उत्पादित किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि मौजूदा किस्मों की स्थिति को देखते हुए इसकी क्षमता बड़ी है। ऑक्सीजन की अत्याधिक उपलब्धता होने के कारण ये उत्पादकों के लिए भी बेहद फायदेमंद हो सकता है। वे कहते हैं कि ये किस्म देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का एकमात्र हाईब्रिड आम है जो कि साल में तीन बार फल देता है।

राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बने है सदाबहार

किशन सुमन द्वारा उत्पादित की जा रही आम की ये किस्म अब राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बन चुके हैं। सदाबार आम किस्म के यहां पर चार पौधे लगाए गए है। किशन के अनुसार उनके चार बीघा खेत में आम के 22 मदर प्लांट्स और 300 ग्राफ्टेड प्लांट्स लगे हुए हैं।

सदाबहार नाम की आम की यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। बौनी किस्म होने से इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। इसमें वर्ष भर नियमित रूप से फल आते हैं और ये सघन रोपण के लिए भी उपयुक्त है। जब से राष्ट्रपति भवन में सुमन के आमों को लगाया गया था, तब से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

सुमन ने दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नर्सरी और व्यक्तियों को 800 रुपये से अधिक, 800 रुपये के लिए उपलब्ध कराया है। सुमन ने कहा, “मुझे नाइजीरिया, पाकिस्तान, कुवैत, इराक, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी लोग कॉल करके सदाबहार के बारे में पूछ रहे हैं।

सुमन के अनुसार एक पौधा लगभग 5 साल बाद फल देता है। मेरे लिए एक अच्छी बात यह है कि उत्पादक लंबे समय तक का इंतजार करते हैं लेकिन वे शिकायत नहीं करते हैं। ये सदाबार अन्य किस्मों से बहुत अलग है।

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

सर्दियों में हरे चारे के लिए करे इस घास की काश्त, दूध उत्पादन में होगी 30 फीसदी तक बढ़ोतरी

सर्दियों में पशु को अगर संतुलित और सही आहार नहीं मिलता है तो वह बीमार होने लगते हैं जिस वजह से दूध के उत्पादन में भी कमी आनी शुरू हो जाती है क्योंकि पशुपालक भी सर्दियों में पशुओं को हरी बरसीम खिलाते है उससे भी दूध में ज्यादा उत्पादन नहीं हो पाता.

इसलिए पशुपालको को सर्दियों में पशुओं को हरी बरसीम की जगह ‘मक्खन घास’ खिलानी चाहिए. क्योंकि यह पशुओं के लिए काफी पौष्टिक और फायदेमंद है. इसके सेवन से पशुओं के दूध उत्पादन में 25 – 30 फीसदी तक बढ़ोतरी होती है.क्योंकि हरी बरसीम में बहुत जल्दी कीट लगता है, पर मक्खन घास में कीट लगने की समस्या नहीं होती. यह घास सर्दियों में उगाई जाती है.इसकी बुवाई यदि अक्टूबर माह में की जाए तो आप इसकी कटाई 35- 40 दिनों के अंदर कर सकते है.

इसकी दूसरी कटाई भी 20- 25 दिनों के अंदर की जा सकती है. ‘मक्खन घास’ की सालभर में 5-6 बार आसानी से कटाई की जा सकती है. इस घास के बीज एक हेक्टर प्रति किलो की दर से लगते है क्योंकि यह बरसीम की बुवाई के समय बोया जाता है. यह बरसीम की तुलना में काफी अच्छा है. पशुओ के लिए इसका सेवन करना दूध उत्पादन को बढ़ाता है.

इसके अंदर 14-15 फीसदी प्रोटीन होता है. इसके बीज बाजार से खरीदे जा सकते है. इसकी सबसे पहले शुरुआत चार साल पहले पंजाब, हरियाणा में हुई थी. सबसे पहले यह 2 हज़ार किलो से शुरू हुई और आज इसका पूरे पंजाब में 100 मीट्रिक टन से भी ज्यादा बीज लगता है. इसकी बिक्री सबसे ज्यादा पंजाब, हरियाणा में होती है. इसको 150 टन से भी ज्यादा किसानों ने ख़रीदा है. इसका बीज बाजार में 400 रुपये प्रति किलो तक बिकता है.

ऐसे करें बुवाई

इसकी खेती सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, जिसका पीएच 6.5 से 7 तक हो। मक्खन ग्रास शीतकालीन चारा फसल है, जिसे घर-घर काटा जा सकता है। यह मैदानी एवं पहाड़ी इलाकों में बुवाई के लिए उपयुक्त है। सभी तरह की मिट्टी में इसकी शीतकालीन बुवाई नवंबर से दिसंबर में की जा सकती है।

ग्रीष्मकालीन चारा फसल के लिए इसे मार्च से अप्रैल के बीच बोया जा सकता है। बुवाई के समय खेत में नमी रहनी चाहिए। 10 से 15 दिनों में अंकूरण होना शुरू हो जाता है। मक्खन ग्रास के बीज वजन में हल्के होते है। वहीं बरसीम के साथ मिलाकर भी इसे बोया जा सकता है। बीजों के अंकुरण के बाद दो-तीन सप्ताह में एक सिंचाई की जरूरत होती है। इसके बाद 20 दिनों के बाद जरूरत के अनुसार पानी दिया जाना जरूरी है।

मोदी सरकार देगी किसानों को ये बड़ा तोहफा, हर किसान को प्रति एकड़ मिलेगी 4000 रुपए की मदद और इतने लाख का ब्याज मुक्त कर्ज

2019 साल मोदी सरकार के लिए काफी अहम माना जा रहा है. दरअसल, कुछ ही महीनों में  लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और यह मोदी सरकार के लिए किसी अग्‍निपरीक्षा से कम नहीं है. ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार अन्नदाताओं को बड़ा तोहफा देने की विचार कर रही है। सरकार किसानों को बड़ी राहत की योजना रही है। मोदी सरकार किसानों को 4, 000 प्रति एकड़ रुपए आर्थिक सहायदा देने जा रही है।

मोदी सरकार खेती के लिए हर सीजन में 4000 रुपए प्रति एकड़ की दर से आर्थिक मदद करेगी। यह पैसा सीधे किसानों के बैंक अकाउंट में भेजा जाएगा। जानकारी के मुताबिक सरकार किसानों का एक लाख तक ब्याज मुक्त करने की भी घोषणा करेगी। इसी हफ्ते इसका ऐलान किया जाएगा। योजना पर सालाना खर्च 2.3 लाख करोड़ का होगा।

किसानों के लिए योजनाएं लाने पर विचार

पिछले महीने केंद्र सरकार देश के किसानों को राहत देने पर विचार करने वाली खबरें आई थी । सरकार सही समय पर कर्ज भुगतान करने वाले किसानों की ब्याज माफ कर सकती है। इसके लिए सरकार लगातार उच्चस्तरीय बैठकें कर रही हैं।

अगर ऐसा होता है तो ये किसानों के लिए बड़ी राहत होगी। दरअसल तीन राज्यों में हार के बाद मोदी सरकार किसानों को लेकर ज्यादा चिंतित दिख रही है। लगातार किसानों के लिए की योजनाएं लाने पर विचार कर रही है। साथ ही मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में काम कर रही है। 2018 में सरकार ने किसानों को रबी फसल पर एमएसपी बढ़ा दी थी।

पश्चिम बंगाल सरकार ने भी की घोषणा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी प्रदेश के किसानों के लिए बड़ा पिटारा खोला था। किसानों को ऋण मुक्त और 5 हजार रुपए प्रति एकड़ देने की घोषणा की थी। इससे पहले कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत के बाद किसानों का कर्ज माफ कर दिया है।

कांग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि सरकार अगर आएगी तो पार्टी किसनों का कर्जमाफ कर देगी। इससे पहले यूपी में योगी सरकार ने भी किसानों की कर्जमाफी की थी।

पानी की कमी से परेशान किसान ने किया केसर की खेती का रुख

क्षेत्र में पानी की कमी से भले ही किसान परेशान हो लेकिन राजस्थान के बसवा तहसील क्षेत्र के गांव झूथाहेड़ा में एक किसान ने इस परेशानी को दूर कर कम पानी व कम खर्च में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए केसर की खेती को अपनाया है।

किसान को उम्मीद है कि इस खेती को करने के बाद उसे खर्च से तीन गुना मुनाफा मिलेगा। झूथाहेड़ा गांव निवासी किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि उनके गांव सहित आसपास के क्षेत्र में वर्षों से पानी की कमी से किसान परेशान हैं।

फसलों में पानी की अधिकता को लेकर कई किसानों ने तो खेती बाड़ी भी करना बंद कर दिया हैं। ऐसे में उन्होंने जानकारी लेकर अपने आधा बीघा खेत में इस बार केसर की फसल की पैदावार की हैं।किसान ने बताया कि इस फसल में पानी की आवश्यकता कम है। उनके द्वारा बीज लगाए गए थे जिस पर अब खेत में 720 केसर के पौधे उग आए है ।

उन्होंने बताया कि केसर के पौधों में 15-20 दिन के अंतराल में पानी देना पड़ता हैं। वर्तमान में पौधे बड़े हो गए है तथा उनमें डोडी भी उग आई हैं। 15 दिन बाद इसमें केसर आना शुरु हो जाएगी।

मुनाफा तीन गुना मिलने की उम्मीद

किसान ने बताया कि केसर की खेती में उन्होंने करीब ढाई लाख रुपए का खर्च आया हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि केसर को बेचने के दौरान तीन गुना मुनाफा मिलेगा।

उन्होंने बताया कि केसर बेचने के लिए उन्होंने जम्मू में केसर का कारोबार करने वाले व्यापारियों से संपर्क किया था।जहां व्यापारियों ने एक किलो केसर दो लाख रुपए में खरीदने का भरोसा दिलाया है। उन्होंने बताया कि उनको अपने खेत में करीब चार किलो केसर आने की उम्मीद है।

नेट बना सबसे बड़ा सहयोगी

किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि पानी की कमी के कारण वह खेती करने को लेकर लंबे समय से परेशान था। एक दिन टेलीविजन पर उन्होंने केसर की खेती के बारे में देखा। इसके बाद उनके मन में केसर की खेती करने को लेकर उम्मीद जगी। नेट पर केसर की खेती कैसे करते है इस बारे में जानकारी ली।

इसके बाद जम्मू से बीज लाकर इस खेती को शुरु कर दिया। उन्होंने बताया कि अभी भी वे इस फसल में किसी प्रकार की परेशानी आने पर नेट पर सर्च कर उस परेशानी को दूर कर देते है।

इस एक Idea से चमकी किसान की किस्मत, हर साल कमा रहा है इतने लाख रुपए

लेट्यूस (सलाद पत्ता), गांठ गोभी, पत्ता गोभी, नारंगी हरे रंग की (ब्रोकली) गोभी, पुदीना, पालक, हल्दी, दो-तीन किस्म की मिर्च, टमाटर, बेलदार सब्जियों के अलावा कुष्मांड कुल की सब्जियां।बैंगन, प्याज, मिर्च, गोभी, गेंदा, गुलाब, टमाटर सहित अनेक सब्जियों एवं फुलवारी के पौधों की नर्सरी।

क्या आप सोच सकते हैं यह सारा काम कितने बीघा में होगा? महज दो बीघा में कई तरह की सब्जियों के साथ पौध तैयार कर बेचकर एक परिवार साल में 5 लाख रुपए कमाई करता है।

  • इतने छोटे से खेत में पानी संग्रह के लिए छोटी सी पक्की डिग्गी, स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकल, पाइप्स के जरिए पौधों की बूंद-बूंद सिंचाई करते हैं चक दो ई छोटी के ओमप्रकाश घोड़ेला और उनका परिवार।

  •  डिग्गी पर सोलर पंप, केंचुआ खाद तैयार करने का अलग से प्लांट। भूमि भी सबसे अलग, निराली। खेत का एक इंच भी बेकार नहीं जाने देते ओमप्रकाश। वे उन किसानों के लिए प्रेरणा दायक हैं जिनके पास बहुत छोटी जोत है।

बेलदार सब्जियां भूमि से ऊपर

ओमप्रकाश अपने खेत में बेलदार सब्जियाें का उत्पादन जमीन से ऊपर लेते हैं। खेत की क्यारियों की मेड़ पर बांस-बल्लियां लगाकर बेलें उपर चढ़ा देते हैं। हरा पत्ता, सुगंधित पत्ता, सेलरी पत्ता, ब्रोकली जैसी महंगी सब्जियाें की उपज का हुनर ओमप्रकाश ने पिता से सीखा। उनके खेत में मार्च-अप्रैल में पालक, दिसंबर-जनवरी में टिंडे और बारहमास पुदीना रहता है।

पौध तैयार करने का नायाब तरीका

  •  वे खेत में पौध तैयार कर किसानों को बेचते हैं। उनकी नर्सरी में मिर्च, गोभी, टमाटर आदि की पौध तैयार की जाती है। इसके लिए वे प्लास्टिक की ट्रे में कोकोपिट डालते हैं। प्रत्येक खाने में एक या दो बीज डालते हैं।
  • ओमप्रकाश के मुताबिक, कोकोपिट ऐसा चूर्ण है जिसमें पौध अंकुरण शीघ्र होती है।

सफेद चंदन की खेती में 80 हजार लगाकर कमा सकते हैं 60 लाख रूपये

चंदन की खुशबू और इसके औषधीय गुणों के चलते इसकी देश-दुनिया में बड़ी मांग है। चंदन की लकड़ी देश में 8 से 10 हजार रुपए प्रति किलो, तो विदेश में 20 से 25 हजार रुपए प्रति किलो तक में बिकती है।

इसकी खेती करने वाले गोरखपुर के किसान अविनाश कुमार के मुताबिक आने वाले 25-30 वर्षों में सफेद चंदन की अच्छी मांग रहेगी, ऐसे में आप अगर मोटी कमाई करना चाहें तो सफेद चंदन की खेती कर सकते हैं। इसमें आपको सिर्फ 80 हजार से 1 लाख रुपए लगाने होंगे, जिसके बाद आपको कम से कम 60 लाख रुपए का मुनाफा होगा।

वैध है सफेद चंदन की खेती

अमूमन लोगों को लगता है कि चंदन की खेती अवैध है, जबकि ऐसा नहीं है। अविनाश कुमार के मुताबिक सरकार ने सफेद चंदन की खेती करने को वैधता दी है।

एक पेड़ से निकलती है इतनी लकड़ी

चंदन के एक भरे-पूरे पेड़ से आपको आसानी से 6 से 10 किलो लकड़ी मिल सकती है। अगर आप एक एकड़ में चंदन के पेड़ लगाते हैं तो इसके बाजार भाव के हिसाब से आपको बहुत आसानी से 60 लाख का मुनाफा हो जाएगा।

हालांकि इसमें आपको लगभग 10 से 12 साल का इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि चंदन के पेड़ को बड़ा होने में कम से कम इतना समय लगता है। और यह भी तब जब आप पूरी तरह से ऑर्गेनिक खेती करेंगे। अगर आप सामान्य तरीके से खेती करते हैं तो आपको 20 से 25 साल का भी इंतजार करना पड़ेगा।

ऐसे कर सकते हैं खेती

अविनाश कुमार के मुताबिक अगर आपके पास कोई एक-दो एकड़ की खाली जमीन है, तो इसमें आप आसानी से यह खेती कर सकते हैं। इसमें आपको सिर्फ पौधे खरीदने, सिंचाई व्यवस्था करने, खाद डालने और खेत के चारों ओर बाड़ लगाने के लिए एक लाख रुपए तक खर्च करने होंगे।

वैसे तो चंदन का पौधा बाकी पौधों की तुलना में काफी महंगा आता है, लेकिन अगर आप कई सारे पौधे खरीदेंगे तो यह आपको 200 रुपए तक में मिल जाएगा। शहरी इलाकों में जिन लोगों ने प्लॉट लेकर खाली छोड़ रखे हैं उनके लिए सफेद चंदन की खेती बहुत फायदेमंद हो सकती है। जब तक आपकी जमीन की कीमत बढ़ेगी, तब तक आप चंदन की लकड़ियों से भी कमाई कर लेंगे।

अब नए तरीके की खेती में है फायदा

अविनाश कुमार के मुताबिक अब पारंपरिक खेती में उतना मुनाफा नहीं मिलता है। इसलिए उन्होंने पारंपरिक खेती को छोड़कर दो साल पहले पत्नी किरण यादव के साथ मिलकर औषधीय पौधों की खेती शुरू की।

उनकी संस्था ‘शबला सेवा संस्थान’ के तहत लोगों को पारंपरिक खेती से हटकर नए प्रकार की खेती के बारे में जानकारी दी जाती है। उनकी पत्नी इस संस्थान की अध्यक्ष हैं। उन्होंने यह भी बताया कि खेती में ‘पहले आओ पहले पाओ’ का सिद्धांत काम करता है।

आगे आने वाले वर्षों में बाजार में चंदन की काफी अच्छी मांग होने की उम्मीद है। ऐसे में जितना जल्दी आप इसकी खेती शुरू करेंगे उतना जल्दी आपको मुनाफा होगा।