इन देशी नुस्खों द्वारा मिंटो में मरते है कीट, इन देसी नुस्खो द्वारा मिंटो में मरते है कीट

आधुनिक युग में कीटनाशकों का नाम मात्र भी इस्तेमाल न करते हुए खेतीबाड़ी करना थोड़ा कठिन है, लेकिन देशी तरीकों से खेतीबाड़ी में खर्च भी बहुत कम आता है।

यह देशी चीजें आप को आपके इर्द–गिर्द ही मिल जाती हैं, बगैर किसी भाग दौड़ के, चाहे आप की फसल सब्जी की हो या अनाज की फसल हो,बगैर किसी रसायन के तैयार की जा सकती है। जिससे मानव जीवन पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है, तथा उसकी कीमत भी रासायनिक फसलों से ज़्यादा मिलती है।

देशी नुस्खा (क):- सफ़ेद फिटकरी-

जब भी कोई फसल ऊपर से लेकर नीचे तक सूखने लगती है, तो समझना चाहिए कि इसकी जड़ों पर फफूंद का हमला हो चुका है। इससे बचने के लिए खेत में पानी लगाते समय ट्यूबवेल के गड्ढे में 1 किलो ग्राम सफ़ेद फिटकरी का टुकड़ा रख दें और पानी देना शुरू कर दें। वह फिटकरीयुक्त पानीपौधों कि जड़ों में लग जाएगा तथा पौधे पुनः स्वस्थ हो जाएंगे।

देशी नुस्खा (ख):- उपले कि राख तथा बुझा चूना-

उपले या चूल्हे कि राख तथा बुझा चूना, एक किलो ग्राम प्रति 25 लीटर पानी में डाल कर 5-6 घंटे के लिए रख दें, तद्उपरांत इस घोल को जितनी भी बेल (जायद) प्रजाति कि फसलों जैसे:- कद्दू, खीरा, घिया, तोरी आदि पर, इसका छिड़काव करने से लाल सूड़ी, कीड़े-मकौड़ों से छुटकारा मिल जाएगा।

देशी नुस्खा (ग):- गोमूत्र, जंगली तंबाकू,ऑक, नीम के पत्ते तथा धतूरा:-

किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक कि जगह इन पाँच चीजों (प्रति 500 ग्राम) का घोल बनाकर, इन सभी को 15-20 दिन के लिए एक बर्तन में (चाहे प्लास्टिक का टब या मिट्टी का घड़ा) 20-25 लीटर पानी डाल कर रख देतें हैं। बाद में इस घोल को कपड़े से छान कर किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक की जगह छिड़काव कर सकतें हैं।

देशी नुस्खा (घ):- खट्टी लस्सी, गलगल और गोबर के उपले:-

खट्टी लस्सी दो किलो, गलगल (नींबू प्रजाति) एक, गोबर के उपले तीन किलो। उपले जीतने पुरानें होंगे उतना ही अच्छा होगा। इन उपलों को 6 दिन के लिए 10-12 लीटर पानी में डाल कर रख देना चाहिए।

उसके बाद इन उपलों को अलग निकाल दें, और उपले वाले पानी में दो किलो खट्टी लस्सी जो कि 15 दिन पुरानी हो तथा एक गलगल पीस कर या निचोड़ कर सारे घोल को कपड़े से छान कर एक घोलक तैयार करके,पीलिया रोग से ग्रसित फसल के ऊपर छिड़काव कर देंगे। कुछ दिनों के बाद फसल का रंग रूप देखने लायक होगा।

क्यों किया जा रहा है गाय के पेट में सुराख ?

गाय की सर्जरी कर उसके पेट में सुराख किया जाता है। इस सुराख को एक प्लास्टिक की रिंग द्वारा बंद किया जाता है। इसमें एक ढक्कन का प्रयोग भी होता है, जो इस छेद को बंद करने के काम आता है। इस सर्जरी के बाद गाय को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए महीने भर का समय लगता है।

इन गायों को fistulated गाय कहा जाता है। इनके पेट में जो माइक्रोब्स होते हैं, उन्हें किसी अन्य जानवर में ट्रान्सफर किया जा सकता है। लेकिन आखिर ऐसा करने की वजह क्या है, आइए जानते हैं?

सबसे हैरानी वाली बात यह है कि गाय इस पर बिलकुल सामान्य रहती है। विचलित नहीं होती। यदि उसके पेट में कोई बैक्टीरिया है भी तो इस छेद द्वारा उसका आसानी से पता लगाया जा सकता है।

छेद करने का मुख्य कारण यह है कि वैज्ञानिकों को इस छेद द्वारा जांच में सहायता मिलती है। वे गाय के अंदरूनी हिस्से की जांच आसानी से कर सकते हैं। जबकि पहले ये बहुत कठिन हुआ करता था। और भी हैं कई फायदे, आइये जानते हैं।

 

गाय के लिए उचित भोजन की जानकारी के लिए यह छेद सहायक है। इस छेद द्वारा यह देखा जाता है कि गाय को कौन-सा खाना पच रहा है और कौन सा उसके लिए हानिकारक है। इसके बाद गाय पूरी तरह से स्वस्थ हो जाती है।

इस छेद का एक सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि गाय को होने वाली बीमारियों का सटीकता के साथ पता चल जाता है। इस छेद की सहायता से गाय के स्वास्थ्य की जानकारी भी आसानी से हो जाती है।गाय के पेट का निरिक्षण कर सीधे पेट में दवाई भी दी जा सकती है। यहाँ तक कि गाय के पेट में हाथ डालकर उसे वेटरनरी डॉक्टर खुद साफ भी कर लेते हैं।

आप शायद हैरान होंगे लेकिन यह छेद गाय की उम्र बढ़ाने में सहायक नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसे गाय के साथ क्रूरता का नाम दे रहे हैं, जिससे लड़ने का कोई क़ानून नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि गाय के पेट का एक हिस्सा काटकर अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। साथ ही यह खेती के काम आने वाला जीव है, इस वजह से इस पर आविष्कार का कानूनी विरोध नहीं किया जा रहा है, जो कि पूर्ण रूप से गलत है।

इस पद्धति का इस्तेमाल केवल अमेरिका में ही किया जाता है। इसे भारत में अभी नहीं लाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पद्धति से कई सकारात्मक चीजें सामने आई हैं।

 

भारत का ये शहर, जहां आलू-प्याज से भी सस्ते बिकते हैं काजू !

काजू खाने या खिलाने की बात आते ही आमतौर पर लोग जेब टटोलने लगते हैं. ऐसे में कोई कहे कि काजू की कीमत आलू-प्याज से भी कम है तो आप शायद ही विश्वास करेंगे. यानी अगर आप दिल्ली में 800 रुपए किलो काजू खरीदते हैं तो यहां से 12 सौ किलोमीटर दूर झारखंड में काजू बेहद सस्ते हैं. जामताड़ा जिले में काजू 10 से 20 रुपये प्रति किलो बिकते हैं.

जामताड़ा के नाला में करीब 49 एकड़ इलाके में काजू के बागान हैं. बागान में काम करने वाले बच्चे और महिलाएं काजू को बेहद सस्ते दाम में बेच देते हैं. काजू की फसल में फायदा होने के चलते इलाके के काफी लोगों का रुझान इस ओर हो रहा है. ये बागान जामताड़ा ब्लॉक मुख्यालय से चार किलोमीटर की दूरी हैं.

बागान बनने के पीछे है दिलचस्प कहानी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जामताड़ा में काजू की इतनी बड़ी पैदावार चंद साल की मेहनत के बाद शुरू हुई है. इलाके के लोग बताते हैं जामताड़ा के पूर्व उपायुक्त कृपानंद झा को काजू खाना बेहद पसंद था. इसी वजह वह चाहते थे कि जामताड़ा में काजू के बागान बन जाए तो वे ताजी और सस्ती काजू खा सकेंगे.

इसी वजह से कृपानंद झा ने ओडिशा में काजू की खेती करने वालों से मिले. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से जामताड़ा की भौगोलिक स्थिति का पता किया. इसके बाद यहां काजू की बागवानी शुरू कराई. देखते ही देखते चंद साल में यहां काजू की बड़े पैमाने पर खेती होने लगी

कृपानंद झा के यहां से जाने के बाद निमाई चन्द्र घोष एंड कंपनी को केवल तीन लाख रुपए भुगतान पर तीन साल के लिए बागान की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया. एक अनुमान के मुताबिक बागान में हर साल हजारों क्विंटल काजू फलते हैं. देखरेख के अभाव में स्थानीय लोग और यहां से गुजरने वाले काजू तोड़कर ले जाते हैं.

4 लोग मिलकर निकाल पाते हैं इस गाय का दूध, जानिए क्या है वजह

भारत में गाय की पूजा की जाती है। इसके अलावा गाय भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ भी रही है। इसलिए यह बहुत उपयोगी पशु माना जाता है।बता दें गाय से व्यवसाय आज पूरी दुनिया में फैला है।

शहरीकरण की ओर बढ़ रहे भारत में आज भी गांव में लोग गाय पालना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इससे शुद्ध दूध तो मिलता ही है साथ ही ये बड़ा आजीविका का साधन भी बन गया है। इसलिए लोग अब गाय खरीदने से पहले ये देखते हैं कि कौनसी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है।

आज हम बात करेंगे ऐसी नस्ल वाली गाय की जो इतना दूध देती है कि उसे निकालने के लिए 4 लोगों की जरूरत पड़ती है। भारत की इस अनोखी गाय की नस्ल का नाम है ‘गीर’

एक रिपोर्ट के मुताबिक ये गाय प्रतिदिन 50 से 80 लीटर दूध देती है। इस गाय के नाम के साथ ‘गीर’ इसलिए जुड़ा क्योंकि ये गाय गुजरात के गीर में पाई जाती है। इस गोवंश का मूल स्थान काठियावाड़ बताया जाता है। इसकी दूध देने की क्षमता के कारण ये नस्ल विश्व विख्यात हो चुकी है। इसकी नस्ल आपको विश्व के कई देशों में देखने को मिल जाएगी।

पंजाब में एक ऐसी गाय आ चुकी है, जिसका दूध दोहने के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 4 लोग लगते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है क्योंकि यह गाय प्रति दिन 61 किलो दूध देती है। सबसे अधिक ब्रासिल और इजरायल के लोग इस नस्ल की गाय को पालना पसंद करते हैं।

बता दें गीर गाय सालाना 2000 से 6000 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है। वहीं दूसरे नंबर पर आती है साहिवाल गाय जो 2000 से 4000 लीटर दूध देती है। तीसरे स्थान पर लाल सिंधी गाय है। हालांकि ये गाय भी 2000 से 4000 लीटर दूध देती है लेकिन पशु नस्ल जानने वाले इसे तीसरे स्थान पर ही आंकते हैं। चौथे स्थान पर राठी, पांचवे पर थरपार्कर और छठे स्थान पर कांक्रेज है।

इस तरह करें रेशम की खेती, एक एकड़ में होगी 6 लाख की कमाई

रेशम की खेती ऐसा व्यवसाय है जिसमें किसान काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। दुनिया के कुल कच्चे रेशम में से 14 फीसदी भारत में उत्पादित होता है। रेशम की चारों वैराइटी उत्पादित करने के कारण दुनिया में भारत का अलग स्थान है।

खास ही नहीं आम लोगों के बीच भी सिल्क के परिधान काफी डिमांड में रहते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान इस खेती से जुड़ रहे हैं। इस खेती को Sericulture कहा जाता है और इसमें काफी मुनाफा कमाया जा सकता है।

ऐसे कर सकते हैं रेशम की खेती

इस खेती में सिल्कवर्म यानी रेशम के कीड़ों को पाला जाता है और मल्बरी यानी शहतूत के पौधों को उगाया जाता है। रेशम के कीड़े इसी पेड़ के पत्तों को खाकर रेशम बनाते हैं। रेशम के कीड़े पालने के लिए आपको 1200 से 1400 वर्ग मीटर के शेड की जरूरत पड़ेगी।

इसके साथ ही आपको तकरीबन एक एकड़ जमीन में शहतूत के पेड़ लगाने होंगे। एक बार में आप तकरीबन इन कीड़ों के 200 अंडे रख सकते हैं। एक साल में दस बार अंडे रखे जा सकते हैं। यानी एक साल में दस बैच में रेशम निकल सकता है।

इतना आएगा सालाना खर्च

रेशम के कीड़े पालने में शेड बनाने, नेट खरीदने और मेहनताना मिलाकर लगभग 1.50 लाख रुपए का खर्च आए। शहतूत की खेती में आपको खाद, पानी, पौधे सब मिलाकर तकरीबन 20 हजार रुपए खर्च करने होंगे। यह खर्च एक बार का है।

इसके बाद रेशम के कीड़ों के अंड़ों के प्रबंधन में आपको 60 हजार और खर्च करने पड़ेंगे। यानी शुरुआत में आपको लगभग 2.30 लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे। इसके बाद आपको सिर्फ 60 हजार रुपए सालाना खर्च करने होंगे।

होगी इतनी कमाई

10 अंड़ों में से आपको 7 किग्रा रेशम मिलेगा। एक साल में आपको एक शेड में से दस बैच में 2000 अंड़े मिलेंगे। केंद्रीय सिल्क बोर्ड के मुताबिक वर्तमान में बाजार में रेशम के कीड़े के कुकून 300 से 500 रुपए प्रति किलो के बीच बिक्री हो जाता है।

ऐसे में आप 2000 अंड़ों से औसतन 5.50 से 6 लाख रुपए तब कमा सकते हैं। साल के 60 हजार खर्च को हटाने के बाद आपको 5 से 5.40 लाख रुपए की आय हो सकती है। यह सिर्फ शुरुआती अनुमान है। धीरे-धीरे पेड़ों के बड़ो होने के साथ आप रेशम के कीड़ों की संख्या भी बढ़ा सकते हैं।

सिर्फ 1000 रुपये खर्च कर उगाएं 400 Kg टमाटर, जानें किसने किया कमाल

गाजीपुर जिले के मिर्जापुर गांव निवासी पार्थ खेती में क्रांति लाने के लिए प्रयासरत हैं। पार्थ ने हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित कर टमाटर की खेती कर मिसाल कायम की है। मौजूदा समय में गाजीपुर जिले में लगभग सभी घरों में उनके मॉडल से टमाटर की खेती हो रही है।

पार्थ को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि में पढ़ाई के दौरान इस तकनीक के बारे में पता चला था। उन्होंने बताया कि विवि के हार्टीकल्चर विभाग के प्रोफेसर डॉ. डीआर सिंह व डॉ. पीयूष कांत सिंह ने उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि जोधपुर में सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट (साजरी) में यह तकनीक आई थी। साजरी में यह योजना सफल नहीं हो पाई, लेकिन पार्थ ने इस तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

राष्ट्रपति पुरस्कार से तीन बार हो चुके हैं सम्मानित

पार्थ को अब तक तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पहली बार 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें बेस्ट एनसीसी कैडेट ऑफ इंडिया के अवार्ड से सम्मानित किया था।

वहीं, दूसरी बार प्रतिभा पाटिल ने स्काउटिंग के लिए 2009 में सम्मानित किया। हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित करने के लिए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पार्थ को प्रेसिडेंट रोवर अवार्ड से सम्मानित कर चुके हैं।

गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है नाम

गाजीपुर से दिल्ली (राजघाट) तक बिना रुके हुए 167 घंटे तक लगातार चलकर पार्थ अपना नाम गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज करा चुके हैं। पार्थ की इस उपलब्धि पर तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल दलवीर सिंह सुहाग ने उन्हें सम्मानित किया था। पार्थ की टीम में कुल दस युवा शामिल थे, जिन्होंने लगातार छह दिन तक यात्रा की थी।

इस तरह से की जाती है खेती

20-20 मीटर के छह पाइप को एक पिलर पर रख दिया जाता है। पिलर के एक तरफ दस फीट का गड्ढा खोदकर उसमें 100 लीटर का टैंक डाला जाता है। टैंक में न्यूट्रियेंट के 16 तत्वों से युक्त पानी मिलाया जाता है। पौधे को पाइप में लगा दिया जाता है, जहां तक पंप की सहायता से पानी पहुंचाया जाता है। पाइप में एक कीप लगा दी जाती है, जिसके जरिये बचे हुए पानी के वापस टैंक तक ले जाया जाता है। पूरी प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती है।

खास बात यह है कि इस तकनीक के जरिये टमाटर का पौधा लौकी के पौधे से भी बड़ा होकर लगभग 60 मीटर तक का हो जाता है। एक हजार रुपये खर्च करके कम से कम चार सौ किलो टमाटर प्राप्त किया जा सकता है।

हाइड्रोपोनिक तकनीक पर लिख चुके हैं 18 किताब

पार्थ अब तक हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक पर अठारह किताबों की श्रंखला लिख चुके हैं। खास बात यह है कि सभी किताबों का शीर्षक वेपन अगेंस्ट हंगर (भूख के खिलाफ हथियार) है। शीर्षक का उल्लेख करते हुए पार्थ ने बताया कि आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों का गरीब भूखा सोता है।

तकनीक को लेकर आत्मविश्वास भरे लहजे में पार्थ ने बताया कि इसका सही तरीके से क्रियान्वयन होने पर देश में खेती के जरिये ही किसानों की आर्थिक समस्या दूर हो जाएगी और अन्नदाता को भूखे नहीं सोना पड़ेगा।

इस देसी जुगाड़ ने दिलाया फसल को नीलगाय और कीट-पतंगों से छुटकारा

“खेत में हर दिन नीलगाय आने से फसलों का बहुत नुकसान होता था, रोशनी को देखकर नीलगाय खेत में नहीं आती है, इसलिए मैंने ढिबरी (दीपक) का एक देसी तरीका अपने खेत में लगाया। इसकी रोशनी से नीलगाय और कीट-पतंग फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।” ये कहना है लखीमपुर के किसान गुड्डू कुमार (41 वर्ष) का।

गुड्डू द्वारा अपने खेत में रात के समय ढिबरी जलाने वाला तरीका इसलिए कारगार है क्योंकि किसानों का मानना है कि अगर रात के समय खेतों में रोशनी रहती हैं तो नीलगाय खेत में इस डर से नहीं आती है क्योंकि उसे लगता है खेत में कोई बैठा है। गुड्डू उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर मितौली ब्लॉक के मैनहन गाँव के रहने वाले हैं।

गुड्डू अपने देशी तरीके का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “ खेत में कीटपतंगों को रोकने के लिए बाजार से दवा डाल-डालकर परेशान हो गया था। दवा बहुत महंगी मिलती थी, जो खेत के उपजाऊंपन को तो कम कर ही रही थी, साथ ही इसे खाकर हम बीमार भी पड़ रहे थे। नीलगाय तो जिस खेत में घुस जाती वो पूरी फसल को ही बर्बाद करके निकलती।”

वो आगे बताते हैं, “कुछ साल पहले मैंने अपने धान के खेत में एक टीन के डिब्बे में एक गोला करके उसके अन्दर ढिबरी जलाकर, बांस के एक डंडे में लगाकर खेत के एक कोने पर लगा दिया। इसकी रोशनी से धान की पूरी फसल में न तो नीलगाय आयी और न ही कीट-पतंग लगें। इस साल भी मैंने गन्ने के खेत में इस यंत्र को लगाया था,

अब गन्ना लम्बा हो गया है इसलिए हटा दिया है।” गुड्डू की तरह अगर कोई भी किसान इस यंत्र को अपने खेत में लगाते हैं तो वो फसल के नुकसान से तो बचेंगे ही साथ ही कीटनाशक के इस्तेमाल से भी बच जायेंगे। जिससे उन्हें पैसे की बचत, खेत की मिट्टी और किसान की सेहत दोनों बेहतर होगी।

“बहुत से कीट जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं, इस यंत्र को लगाने से वो कीट फसल को नुकसान पहुंचाने की बजाए इस यंत्र की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, या फिर जहाँ यह यंत्र लगा होता है उससे दूर भागते हैं। मिट्टी का तेल फेरोमोन की तरह काम करता है,

इसलिए ढिबरी की रोशनी के अलावा इसके तेल की गंध से भी कीटों को आकर्षित या अनाकर्षित करती है।” वो आगे बताते हैं, “इस वजह से ज्यादातर कीट इस यंत्र के आसपास मंडराते हैं और ढिबरी की लौ में या तो मर जाते हैं या फिर इसी यंत्र के आसपास रहते हैं, जिस वजह से फसल को नुकसान नहीं पहुंचता है।”

गुड्डू बताते हैं, “हर शाम ढिबरी में मिट्टी का तेल भरकर रख देते थे, महीने में तीन से चार लीटर तेल खर्च होता है। धान के अलावा किसी भी सब्जी वाली फसल या फिर किसी भी फसल में इस ढिबरी को लगाया जा सकता है। ढिबरी, टीन के डिब्बे और मिट्टी के तेल के अलावा इसमें कोई भी खर्चा नहीं है।”

बारिश के मौसम में रात के अँधेरे में हमारे घरों में जहाँ रोशनी जल रही होती हैं, वहां कीट-पतंगों की भरमार होती है। पहले के बुजुर्ग थाली में पानी भरकर रख देते थे जिससे कीट प्रकाश की तरफ आकर्षित होते थे और उस पानी में गिर जाते थे।

जिससे उनके पंख भीग जाते थे, और वह उड़ने में अक्षम हो जाते थे। ज्यादातर कीट पतंगे दीपक की लौ में जलकर मर भी जाते थे। इस तरह ग्रामीणों के भोजन में ये कीट पतंग नही गिरते थे। ये उनके द्वारा अपनाया गया देशी तरीका था जो बहुत ही कारगार था।

सूखे इलाकों में पैसे कमाना है तो करें लेमनग्रास की खेती, खेती और बिक्री की पूरी जानकारी

एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन-टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल (तेल) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है।

इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है। लेमनग्रास को नींबू घास, मालाबार या कोचिन घास भी कहते हैं। भारत समेत ये उन देशों में पाया जाता है जहां की जलवायु गर्म है।

भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता है, जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है उसमें एक लेनमग्रास भी है।

लेमनग्रास की खेती सूखा प्रभावित इलाकों जैसे मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड तक में की जा रही है। सीमैप के गुणाभाग और शोध के मुताबिक एक हेक्टेयर लेमनग्रास की खेती में शुरु में 30000 से 40000 हजार की लागत आती है।

एक बार फसल लगाने के बाद साल में 3 से 4 कटाई ली जा सकती हैं, जिससे करीब 100-150 किलो तेल निकलता है। इस तरह से एक लाख से एक लाख 60 हजार तक आमदनी हो सकती है, खर्चा निकालने के बाद एक हेक्टेयर में किसान को प्रतिवर्ष 70 हजार से एक लाख 20 हजार तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है।

मेंथा और खस की तरह ही लेमनग्रास की पेराई होती है, और पेराई संयंत्र भी लगभग एक जैसा ही होता है। पत्तियां काटकर उन्हें टंकी में भरकर आसवन किया जाता है।

नर्सरी, रोपाई और निराई-गुड़ाई

लेमनग्रास की जड़ लगाई जाती है, जिसके लिए पहले नर्सरी तैयार की जाए तो लागत कम हो सकती है। अप्रैल से लेकर मई तक इसकी नर्सरी तैयार की जाती है, एक हेक्टेयर की नर्सरी के लिए लेमनग्रास के करीब 10 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 55-60 दिन में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।

यानि जुलाई अगस्त में तैयार नर्सरी यानि स्लिप (जड़ समेत एक पत्ती) को कतार में 2-2 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। हर तरह की मिट्टी और जलवायु में पैदा होनी वाली इस फसल में गोबर की खाद और लकड़ी की राख सबसे ज्यादा फायदा करती है। लेमनग्रास को ज्यादा निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं होती, साल में दो से तीन निराई गुड़ाई पर्याप्त हैं।

ज्यादा सूखे इलाकों में पूरे साल में 8-10 सिंचाई की जरुरत होगी। उत्तर प्रदेश में ऐसी फसलों पर शोध के लिए कन्नौज में सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) है। यहां के अवर शोधकर्ता कमलेश कुमार ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन को इसके फायदे गिनाते हुए बताया, इसकी पत्ती से लेमन-टी यानि नीबू चाय के साथ साबुन, निरमा, डिटर्जेंट, तेल, हेयर आयल, मच्छर लोशन, सिरदर्द की दवा व कास्मेटिक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है।”

यूपी में सीतापुर जिले के बंभौरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हर्षचंद वर्मा के मुताबिक इसमें कीट-पतंगे रोग नहीं लगते हैं, लेकिन एक कोई रोक का प्रकोप दिखे तो नीम की पत्तियों को गोमूत्र में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक लेमग्रास का तेल जिस परफ्यूम,डियो या क्रीम आदि में पड़ा होता है उसके उपयोग से लोगों में ताजगी आ जाती है। चीन में कहीं-कहीं पर इसे सिरदर्द ,पेटदर्द में उपयोग करते हैं, इसके कुछ गुण मुंहासे ठीक करने में भी काम आते हैं। भारत में सर्दी जुखाम के दौरान काफी लोग इसका गाढ़ा पीते हैं।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कई राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हो रही है।

लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित

  • प्रति हेक्टेयर सलाना लागत- 40,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 30,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • कुल उत्पादन से कमाई- 1,60,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 1,00,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • शुद्ध मुनाफा (सालाना) 1,20,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 70.000 रुपए (बिना सिंचाई)

लेमनग्रास के तेल का उपयोग

लेमनग्रास का सबसे ज्यादा उपयोग परफ्यूम उद्योग में होता है। इसके साथ ही, तेल, डिटर्जेट, वांशिग पाउडर, हेयर आयर मच्छर लोशन, कास्मेटिक, सिरदर्द की दवा समेत कई प्रोडक्ट में इस्तेमाल होता है

यह किसान गेहूं और धान की खेती छोड़ कर इस खेती से कमा रहा है सिर्फ 3 महीने में 4 लाख रूपये

सरकार की तरफ से खेती को बढ़ावा देने और किसानों की आय दोगुनी करके उनको सहभागी बनाने के लिए कैंप लगाकर नवीनतम तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही किसानों को मुनाफा देने वाली फसलें लगाने और उन्हें धान-गेहूं के चक्कर से निकालने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसके सार्थक नतीजे भी सामने आ रहा है।

धीरे-धीरे किसान अन्य फसलों में भी रुची दिखा रहा है। सूबे में इस वक्त बागबानी विभाग लगातार किसानों को फलादार पौधे लगाने को प्रेरित कर रहा है। कृषि क्षेत्र में चल रही योजनाओं का फायदा लेकर नौजवान किसान अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

ऐसा ही एक नौजवान किसान है गांव सुरेवाल ब्लॉक आनंदपुर साहिब, पंजाब का हरप्रीत सिंह। इन्होंने 4 कनाल में पॉलीहाउस लगाकर बीज रहित खीरे की खेती शुरू की है। इस खीरे को खाने से पहले छीलना नहीं पड़ता। यह किस्म सलाद के शौकीनों के लिए है।

सर्दी का खीरा : चार कनाल में लगते हैं 5500 बीज, एक एकड़ का 60 हजार रुपए के करीब आता है खर्च

हरप्रीत सिंह का कहना है कि बीज रहित इस खीरे मे फाइबर की भरपूर मात्रा है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस किस्म को उगाने में पानी बहुत कम लगता है। वह इसे तुपका सिंचाई प्रणाली से उगाा रहे हैं।

हरप्रीत सिंह ने बताया कि इस खीरे का लगभग 5 रुपए का एक बीज मिलता है और 4 कनाल में लगभग 5500 बीज लगाए जा सकते हंै। इस फसल को लगाने का समय अक्टूबर अंत या नवंबर शुरू का है। यह किस्म लगभग 3 महीने तक लगातार देती है। इससे सर्दी में भी खीरा मार्केट में मिल जाता है।

चार कनाल में मिलता है 200 क्विंटल उत्पादन, 20 रुपए किलो बिकता है

हरप्रीत सिंह ने बताया कि चार कनाल के पॉली हाउस से तीन महीने में 200 क्विंटल तक खीरे का उत्पादन हो जाता है। यह कम से कम 20 रुपए किलो बाजार में आसानी से बित जाता है। मंडी में डायरेक्ट बेचकर किसान और भी ज्यादा मुनाफा ले सकता है।

उन्होंने बताया कि विवाह सहित अन्य सामाजिक समारोहों के मौके इस खीरे की भारी मांग रहती है।न्होंने 20 लाख रुपए खर्च कर पॉलीहाउस बनाया था। बाद में इस पर पंजाब सरकार ने 50 फीसदी सब्सिडी दे दी थी।

खेती माहिरों की सलाह के अनुसार ही उगाते हैं फसलें

हरप्रीत सिंह ने बताया कि वह चार कमाल से ही 4 लाख के करीब मुनाफा कमा रहे हैं। इसका कारण यह बी है कि वह खेतीबाड़ी माहिरों की सलाह के अनुसार ही सारा काम करते हंै। हरप्रीत सिंह ने इंजीनियरिंग की डिग्री कर रखी है। इंजीनियरिंग करके वह गुरु गोबिंद सिंह इंजीनियरिंग कॉलेज में बतौर इंस्ट्रक्टर नौकरी कर चुके हैं। अब वह खेती में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं।

किसानों को सबसे बड़ी टेंशन से मिलेगा छुटकारा, अब मोबाइल से घर बैठे ही क़र सकेंगे सिंचाई…

पुराने जमाने में किसी बुजुर्ग ने कहा था कि एक वक़्त ऐसा आएगा इंसान सब काम एक ही स्थान पर बैठे हुए करेगा. बुजुर्गों की पुरानी कहावतें आज सच होती जा रही हैं. तकनीक ने इतनी तेजी से इस संसार को जकड़ा है कि हर एक काम आसान हो गया है.

पहले किसान खेत को सींचने के लिए दो-दो दिन खेत में रहा करता था. ताकि उसका खेत पूरी तरह से सींच जाए. लेकिन अब किसान अपने घर बैठे आसानी से सिर्फ एक यंत्र के जरिए खेत की सिंचाई कर सकता है. जी हाँ यह संभव है.

ओस्सियन एग्रो कंपनी नैनो गणेश के नाम से किसानों के लिए एक उत्पाद उपलब्ध करा रही हैं. इस उपकरण के माध्यम से किसान आसानी से घर बैठे अपने समबर्सिबल पम्प को चला सकता है. यानी की जब किसान को खेत में सिंचाई की जरुरत पड़े तो वो घर पर बैठे हुए सम्बर्सिबल को चालू कर सकता है और बंद कर सकता है.

इस ऑटोमैटिक स्विच को मोबाइल फ़ोन से कनेक्ट कर दिया जाता है तो किसान आसानी से मोटर को फ़ोन के माध्यम से ओंन और ऑफ दोनों कर सकता है. यहाँ तक की यदि किसान को लग रहा है कि मोटर में कोई प्रॉब्लम है तो उसको आसानी से इस यंत्र के माध्यम से अलर्ट मिल जाता है. यह एक बहुत ही अत्याधुनिक यन्त्र हैं. जिससे किसान काफी फायदा ले रहे हैं.

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