ऐसे करें 1000 रुपए प्रति किल्लो वाले पिस्ता की खेती

पिस्ता सबसे ज्यादा पसंद क्या जाना वाला ड्राई फ्रूट है इसकी इतनी ज्यादा मांग है की मांग के मुकाबले इसकी पूर्ति बहुत कम है इस लिए इसके इतने ज्यादा दाम है और ये हमेशा ऐसे ही रहेंगे आज हम इस महंगे ड्राई फ्रूट की खेती के बारे मैं आप को बताएंगे

मिट्टी

पिस्ता की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है। हालांकि इसके लिए अच्छी तरह से सूखी गहरी चिकनी बलुई मिट्टी उपयुक्त मिट्टी है। ऐसे पेड़ सूखे का आसानी से सामना करने में सक्षम हैं लेकिन जहां ज्यादा आर्द्रता होती है वहां अच्छा नहीं कर पाते हैं।जिस मिट्टी में पीएच की मात्रा 7.0 से 7.8 है वहां पिस्ता का पेड़ अच्छी किस्म का और ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। ये पेड़ थोड़े कठोर जरूर होते हैं लेकिन उच्च क्षारीयता को काफी हद तक बर्दाश्त भी करते हैं।

जमीन की तैयारी

पिस्ता की खेती के लिए जमीन की अच्छी तरह से जुताई, कटाई और लाइन खींची होनी चाहिए ताकि अच्छी जुताई की स्थिति हासिल की जा सके। अगर मिट्टी में 6-7 फीट की लंबाई में कोई कठोर चीज है तो उसे तोड़ देना चाहिए। क्योंकि पिस्ता की जड़ें गहरे तक जाती है और पानी के जमाव से प्रभावित होती है।

आवश्यक जलवायु

पिस्ता के बादाम को दिन का तापमान 36 डिग्री सेटीग्रेड से ज्यादा चाहिए। वहीं, ठंड के महीने में 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उनके शिथिल अवधि के लिए पर्याप्त है। इसके पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाली जगहों पर ठंडे तापमान की वजह से अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं।

खेती में प्रसारण 

पिस्ता के पेड़ को लगाने के लिए अनुकूल पिस्ता रुटस्टॉक के जरिए पौधारोपन किया जाता है। इस रुट स्टॉक या पौधे को नर्सरी में भी उगाया जा सकता है। सामान्यतौर पर पौधारोपन नीचे स्तर पर किया जाता है और अंकुरित पेड़ को उसी साल या अगले साल लगा दिया जाता है।

 पौधों के बीच दूरियां

पौधारोपन के लिए बड़ा और पर्याप्त गड्ढा खोदा जाना चाहिए ताकि इसकी जड़ें अच्छी तरह इसमे समा सके। नर्सरी या डिब्बे के मुकाबले पिस्ता के पौधे को एक इंच नीचे लगाना चाहिए। और जब बात पौधों के बीच दूरियों की आती है तो वह सिंचाई पर निर्भर करता है। अगर सिंचिंत बाग है तो ग्रिड पैटर्न के लिए 6 मीटर गुणा 6 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए।

वैसे इलाके जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहां पौधों के बीच दूरी 8मीटर गुणा 10 मीटर होनी चाहिए। पिस्ता के बादाम(नट) के लिए नर और मादा पेड़ को लगाना चाहिए और इसका अनुपात1:8(एक नर और आठ मादा पेड़) से 1:10(एक नर और 10 मादा पेड़) का होना चाहिए।

सिंचाई

वैसे तो पिस्ता का पेड़ सूखे को बर्दाश्त कर लेता है लेकिन उनकी देखभाल पर्याप्त नमी के साथ होनी चाहिए। पानी हासिल करने के लिए गीले घास का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है। पानी का अच्छी तरह से उपयोग हो सके इसके लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पानी के जमाव से भी बचना चाहिए।

पिस्ता के लिए खाद और ऊर्वरक  

पिस्ता को भी नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि बादाम जैसी फसल के लिए नाइट्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्वरक माना जाता है। हालांकि पौधे में पहले साल ऊर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन उसके बाद अगले साल से की जा सकती है।

पिस्ता के पौधे में 450 ग्राम अमोनियम सल्फेट की मात्रा दो भाग में डाली जानी चाहिए। बाद के वर्षों में प्रति एकड़ 45 से 65 किलो वास्तविक नाइट्रोजन (एन) प्रयोग करना चाहिए। आनेवाले मौसम के दौरान नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पिस्ते की खेती में कार्यप्रणाली-

पिस्ता के पेड़ को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जाए और उसका ओपन-वेस शेप में विकास हो। पेड़ के मध्य भाग को इस तरह खुला रखना चाहिए कि वो सूर्य की रोशनी को ग्रहण कर सके ताकि अच्छी तरह से फूल खिल सके और बेहतर फल लग सके। ऐसी जरूररत चौथे या पांचवें शीत ऋतु में पड़ सकती है। पेड़ों को पतला ऱखने के लिए दूसरे दर्जे की या कम महत्वपूर्ण शाखाओं की छंटाई कर देनी चाहिए।

पिस्ता की फसल की कटाई-

पिस्ता का पेड़ बादाम या नट के उत्पादन के लिए काफी लंबा समय लेता है। इसके अंकुरित पेड़ अगले पांच साल तक फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं और पौधारोपन के 12 साल के बाद से पर्याप्त फल देना शुरू कर देते हैं।

जब इसके गोला से छिलका उतरने लगता है तब समझ लेना चाहिए कि फल पूरी तरह तैयार हो गया है। कटाई के दौरान सावधान रहने की जरूरत है और अविकसित केरनेल से बचना चाहिए। पौधारोपन के 10 से 12 साल बाद पिस्ता का पौधा करीब 8 से 10 किलो का उत्पादन करता है।

अब जानवर नहीं पहुंचा सकेंगे नुकसान क्योंकि अब पल्स मशीन करेगी फसल की रखवाली

अब किसानों को फसल की रखवाली के लिए रातभर जागने की मजबूरी नहीं रहेगी। न ही फसल को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा सकेंगे। फसल रक्षक पल्स मशीन फसलों की सुरक्षा करेगी। यह मशीन पंत विवि के किसान मेले में किसानों के लिए उपलब्ध हो सकेगी।

12 वोल्ट की बैटरी से संचालित इस मशीन के झटकों से हाथी, नील गाय, जंगली सुअर, हिरन, गीदड़, सेही, बंदर, सांड आदि जानवर फसल के करीब नहीं फटक सकेंगे।

खास बात यह है कि इस मशीन के करंट से जानवर या अंजाने में इंसान के छू लेने पर मौत होने जैसी कोई नौबत नहीं आएगी। एक बार फिर बता दे इस से किसी को कोई जानलेवा नुकसान नहीं होता ।

क्योंकि बैटरी का करंट होने के चलते इसमें अर्थिग होने की नौबत नहीं आती है। इस मशीन को घरों या फार्म हाउस के आसपास भी लगाया जा सकता है। जिससे कि बंदर नुकसान न पहुंचा सकें।

ऐसे करती है मशीन काम

छोटी सी इस मशीन को 12 वोल्ट की मशीन से करंट दिया जाता है। इसके बाद इस मशीन को खेतों के चारों ओर लगाए गए क्लच वायर से जोड़ दिया जाता है। तार की कीमत 160 रुपये प्रति किलो है, जबकि एक किलो में 75 मीटर लंबी तार आ जाती है। मशीन की कीमत नौ हजार रुपये है।

ये है मशीन की क्षमता

  • बैटरी एक बार चार्ज करने पर 24 घंटे चलती है
  • यह मशीन एक मिनट में 75 बार झटके देकर फसल की रखवाली करती है।
  • इसके करंट से कोई भी जानवर या आदमी नहीं मरेगा।

और जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क करें

Ring Road Chamunda Dham colony,BIJNOR (UTTAR PRADESH)PIN-246701
EMAIL : nidhipulsmachine@gmail.com
Mobile No:9012384699, 8859595976

ये है सबसे पौष्टिक चारा ,एक बार लगाने पर पांच साल के लिए मिलेगा चारा

पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है। घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है।

एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है। नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है।

एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है। प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

भारत का ये शहर, जहां आलू-प्याज से भी सस्ते बिकते हैं काजू !

काजू खाने या खिलाने की बात आते ही आमतौर पर लोग जेब टटोलने लगते हैं. ऐसे में कोई कहे कि काजू की कीमत आलू-प्याज से भी कम है तो आप शायद ही विश्वास करेंगे. यानी अगर आप दिल्ली में 800 रुपए किलो काजू खरीदते हैं तो यहां से 12 सौ किलोमीटर दूर झारखंड में काजू बेहद सस्ते हैं. जामताड़ा जिले में काजू 10 से 20 रुपये प्रति किलो बिकते हैं.

जामताड़ा के नाला में करीब 49 एकड़ इलाके में काजू के बागान हैं. बागान में काम करने वाले बच्चे और महिलाएं काजू को बेहद सस्ते दाम में बेच देते हैं. काजू की फसल में फायदा होने के चलते इलाके के काफी लोगों का रुझान इस ओर हो रहा है. ये बागान जामताड़ा ब्लॉक मुख्यालय से चार किलोमीटर की दूरी हैं.

बागान बनने के पीछे है दिलचस्प कहानी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जामताड़ा में काजू की इतनी बड़ी पैदावार चंद साल की मेहनत के बाद शुरू हुई है. इलाके के लोग बताते हैं जामताड़ा के पूर्व उपायुक्त कृपानंद झा को काजू खाना बेहद पसंद था. इसी वजह वह चाहते थे कि जामताड़ा में काजू के बागान बन जाए तो वे ताजी और सस्ती काजू खा सकेंगे.

इसी वजह से कृपानंद झा ने ओडिशा में काजू की खेती करने वालों से मिले. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से जामताड़ा की भौगोलिक स्थिति का पता किया. इसके बाद यहां काजू की बागवानी शुरू कराई. देखते ही देखते चंद साल में यहां काजू की बड़े पैमाने पर खेती होने लगी

कृपानंद झा के यहां से जाने के बाद निमाई चन्द्र घोष एंड कंपनी को केवल तीन लाख रुपए भुगतान पर तीन साल के लिए बागान की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया. एक अनुमान के मुताबिक बागान में हर साल हजारों क्विंटल काजू फलते हैं. देखरेख के अभाव में स्थानीय लोग और यहां से गुजरने वाले काजू तोड़कर ले जाते हैं.

इस किसान ने बिना खर्च किये खोजा अनोखा फार्मूला

15 साल पहले जिस जमीन को बंजर समझा गया, उस जमीन पर एक किसान ने जैविक खेती करके ढाई किलो वजन वाली मौसम्बी पैदा की। यही नहीं किसान ने मेहनत करके जमीन को इस लायक कर दिया, जहां पर अब 20 किलो को कटहल और सवा किलो वजन वाला आम हो रहा है।

उनका प्रयोग रुका नहीं है, बल्कि वे एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उन्हें एग्रीकल्चर कॉलेज में हॉर्टीकल्चर पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं।

  • ये किसान हैं प्राण सिंह। ग्वालियर से 25 किमी दूर जहानपुर गांव। आसपास खेत हैं, लेकिन ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं। केवल प्राण सिंह अपने खेत और बगीचे में काम करते नजर आते हैं।
  • वे बताते हैं कि 15 साल पहले जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो गई, क्योंकि किसानों ने जमकर यूरिया और केमिकल का इस्तेमाल किया। उसके बाद यहां के ज्यादातर किसान ने फसल लगाना बंद कर दी।
  • प्राण सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने खुद ही खेत में मेहनत करना शुरू की। यूरिया और केमिकल का उपयोग बंद किया। खेत के आसपास 3 तालाब बनाए, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया।

जमीन को बनाया उपजाऊ

  • इससे जमीन का वाटर लेबल सही हुआ। फिर उन्होंने गोबर, घास-फूस की खाद का इस्तेमाल किया। वर्मी कंपोस्ट की ट्रेनिंग ली। इसके बाद खेत की उर्वरा शक्ति वापस लौट आई।
  • उन्होंने खेत में नींबू, संतरा और मौसम्बी के पौधे लगाए। इस साइट्रस वैरायटी के पौधों के साथ कई प्रयोग प्राण सिंह ने किए। इसका नतीजा यह निकला कि उनके पेड़ में मौसम्बी का वजन ढाई किलो तक पहुंच गया।

प्राण सिंह ने विकसित की कई नयी वैरायटी

  • यही नहीं उन्होंने कटहल, अमरूद सहित कई पौधों की ग्राफटिंग की, जिससे नयी वैरायटी विकसित हुई। प्राण सिंह बताते हैं कि यह सब प्राकृतिक तरीके से खेती करने का नतीजा है।
  • केमिकल और दूसरी रसायनिक खादों से जमीन और फसल को नुकसान होता है। प्राण सिंह अब कोशिश कर रहे हैं कि एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी की फल लगें। उनके मुताबिक यह संभव है, क्योंकि ये तीनों एक प्रजाति के फल हैं।
  • प्राण सिंह की मेहनत देखकर आसपास बंजर खेतों वाले किसान भी अपनी जमीन में वापस खेती करने के लिए लौट रहे हैं। अब तो एग्रीकल्चर कॉलेज के साथ कृषि विभाग के अफसर प्राण सिंह को जैविक खेती की टिप्स देने के लिए बुलाते हैं।

अब किसानों को हर साल 12,500 रुपए मिलेंगे, अक्टूबर में लॉन्च होगी ये नई योजना

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने प्रदेश के किसानों को आर्थिक मदद देने के लिए नई योजना लॉन्च करने का ऐलान किया है। इस योजना को रायतू भरोसा स्कीम नाम दिया गया है। जानकारी के अनुसार, सीएम रेड्डी इस योजना को 15 अक्टूबर को लॉन्च करेंगे। इस योजना के तहत प्रदेश के किसानों को 12,500 रुपए सालाना मिलेंगे।

नायडू की योजना को किया बंद

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने वर्तमान में चल रही अन्नदाता सुखीभव स्कीम को बंद करके रायतू भरोसा स्कीम को लॉन्च किया है। आंध्र प्रदेश के पिछले मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने लोकसभा चुनावों से पहले फरवरी 2019 में अन्नदाता सुखीभव स्कीम को लॉन्च किया था। इस स्कीम के तहत प्रदेश के किसानों को 10 हजार रुपए दिए जा रहे हैं।

अन्नदाता सुखीभव स्कीम के तहत जिन किसानों को केंद्र सरकार की पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ मिल रहा है, उन्हें प्रदेश सरकार की ओर से चार हजार रुपए अतिरिक्त दिए जा रहे हैं। वहीं जिन किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ नहीं मिल रहा है, उन्हें 10 हजार रुपए की राशि दी जा रही है। यह राशि सीधे किसानों के खाते में जमा कराई जाती है।

दो चरणों में 99 लाख परिवार पात्र चुने गए

अन्नदाता सुखीभव योजना के तहत दो चरणों में प्रदेश के करीब 99 लाख परिवारों को लाभार्थी के तौर पर चुना गया है। अन्नदाता सुखीभव योजना की वेबसाइट के अनुसार पहले चरण में 50,20,972 किसान परिवारों को इसके लिए चुना गया है,

जिसमें से 46,49,369 किसान परिवारों को अब तक भुगतान किया जा चुका है। दूसरे चरण में 48,93,238 किसान परिवारों को चुना गया है जिसमें से अब तक 45,24,330 किसानों को भुगतान किया जा चुका है।

पुलिसवाले ने बनाया झूला पंप, अब बिना डीज़ल और बिजली के मुफत में होगी सिंचाई

महँगी होती बिजली रोज़ बढ़ते पेट्रॉल डीजल के दाम और खेती में बढ़ते लागत के बीच फसल की सिचाई करना किसानों की एक बड़ी समस्या है। लेकिन इन सब के बीच सिंचाई के लिए मोटर चलवाने की झंझट, बिजली की टेंशन, डीजल की झंझट, गैस के दाम और भी कई सारे लफड़े। अब सिंचाई को लेकर आप को भी मिल सकती है इन सभी झंझटों से फुर्सत। क्योंकि अब आ गया है झूला पंप, जिसे बनाया है बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के कल्‍याणपुर थाने में पदास्‍थापित जमादार मेंहीलाल यादव ने।

पंप से प्रति घंटे 10 हजार लीटर पानी निकाला जा सकता है। लागत बेहद कम है। इससे पहले गैस सिलेंडर से पानी निकालने की राह मेहीलाल ने निकाली थी। लेकिन, अब सामान्य ढंग से कम खर्च में पानी के इंतजाम का यंत्र तैयार किया है। उनके कार्य की सराहना कई स्तरों पर हुई है।

खगडिय़ा जिले के बापूनगर निवासी मेहीलाल यादव भागलपुर जिला बल में बहाल हुए। वर्ष 2007 में कटिहार जिले में तैनात थे। वहां किसानों को डीजल व पेट्रोल के लिए गैलन लेकर भटकते देखा। इस स्थिति से निजात दिलाने की सोची। आखिरकार बगैर ईंधन से संचालित झूला पंप का निर्माण किया। फिलहाल मेहसी लीची अनुसंधान केंद्र में एक झूला पंप उपयोग में है।

आती है 25 हजार की लागत

झूला पंप बनाने के लिए चापाकल के हेड, सेक्शन पाइप, साइकिल पाइप, वाशर, रॉड का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें करीब 25 हजार की लागत आती है। यह बगैर ईंधन संचालित होता है। किसी भी भूगर्भीय जलस्रोत से पंप को पाइप के सहारे बिल्कुल पंप सेट की तरह जोड़ झूले पर झूलना आरंभ कर देने पर पानी मिलता है।

इसके लिए दो लोगों की आवश्यकता होती है। लेकिन, एक आदमी है तो दूसरी तरफ ईंट या किसी अन्य वस्तु का भार देकर झूला जा सकता है। जैसा जल स्रोत होगा और जिस स्तर पर झूला चलेगा, उसी हिसाब से पानी निकलेगा।

सरकार के पत्र से बढ़ा उत्साह

सूबे के योजना व विकास विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. अरङ्क्षवद कुमार ने मेहीलाल को पत्र लिखकर स्टेट इनोवेशन काउंसिल द्वारा मुख्यमंत्री नवप्रवर्तन प्रोत्साहन योजना से वित्तीय सहायता प्रदान करने को कहा था।

इसके पहले केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर चिदंबरम ने 2007, पूर्णिया के तत्कालीन आयुक्त पंकज कुमार 2013 और कटिहार के तत्कालीन जिलाधिकारी व सांसद ने सम्मानित किया था। दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस की झांकी में झूला पंप हुआ था।

 झूला पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

इस डेयरी की गाय सिर्फ दूध ही नहीं बिजली भी देती है

आप ने कभी सुना है के गाय दूध के साथ बिजली भी देती हो ? लेकिन ऐसा हो रहा है राजधानी लखनऊ से करीब 14 किलोमीटर दूर बिजनौर कस्बे से सटा सरवन गाँव के डेयरी में गाय दूध तो देती है साथ में उसके गोबर से बायोगैस प्लांट में डाल कर पहले सीएनजी और फिर उस से बिजली पैदा की जाती है ।

लखनऊ के सरवन गाँव निवासी प्रगतिशील पशुपालक जयसिंह डेयरी रोजगार को अपनाकर खुद के रोजगार के साथ ही दूसरे पशुपालकों के लिए भी आय के स्रोत बना रहे हैं। इनकी इस पहल से एक बार फिर क्षेत्र के पशुपालकों में अच्छी कमायी की आस जगने लगी है।

वहीं युवा पशुपालकों के लिए ये प्रेरणा के स्रोत भी बन रहे हैं। पशुपालक जयसिंह बताते हैं कि दूध डेयरी में नवाचारों के माध्यम से वे अच्छा मुनाफा कमा पाने में कामयाब हुए हैं। वर्तमान में उनकी डेयरी के माध्यम से लगभग 150 से ज्यादा पशुपालक आर्थिक रूप से सबल बन रहे हैं।

राजयसिंह छोटे स्तर के पशुपालकों से अच्छी कीमत पर दूध खरीदते हैं और उसे पैक करके बाजार में बेचने का कार्य करते हैं। इनकी डेयरी गांव में पूरे एक एकड़ में बनी हुई है। जयसिंह बताते हैं कि आस-पास के पशुपालकों से वे उनके दूध का फैट और एसएनएफ देखकर बाजार कीमत से ज्यादा में ही दूध खरीदते हैं ।

एक हजार लीटर दूध की खपत

जयसिंह के फार्म में खुद के 150 पशु हैं, जिनमें से 50 गाय और 100 भैंसे शामिल हैं। इनसे प्रतिदिन 500 लीटर दूध का उत्पादन होता है। जबकि 500 लीटर वे दूसरे पशुपालकों से खरीदते हैं। इस दूध को पाश्चराइज करके फिर पैकिंग करके बेचा जाता है।” जयसिंह अपने डेयरी संचालन के बारे में बताते हैं कि 140 क्यूब घनमीटर का बॉयोगैस प्लांट उन्होंने डेयरी में लगाया है, जिससे सीएनजी (कम्प्रेस नेचुरल गैस) उत्पादित करते हैं।

इस गैस के माध्यम से ही जेनरेटर चलाकर वो 24 घंटे बिजली पैदा करते हैं। इस बिजली के माध्यम से ही डेयरी में लगे उपकरण संचालित किए जाते हैं। साथ ही पास के नर्सिंग कॉलेज में भी बिजली देते हैं, जिससे इस कार्य में लगने वाला उनका खर्चा भी निकल आता है।” यही नहीं इस बिजली के द्वारा ही इन्होंने आटा चक्की भी स्थापीत कर रखी है, जिससे पूरे गांव का आटा पीसा जाता है।

यहां से आधे दाम में खरीदें यूज्‍ड ट्रैक्‍टर

एक अनुमान के मुताबि‍क, पुराने ट्रैक्‍टर की इंडस्‍ट्री करीब 5 लाख यूनि‍ट प्रतिवर्ष है। पुराने ट्रैक्‍टरों में सबसे ज्‍यादा मांग 30 से 50 एचपी की रहती है। वैसे भारत में 10एचपी से लेकर 90 एचपी तक के ट्रैक्‍टर बिकते हैं। हम आपको एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म के बारे में बता रहे हैं जहां पुराने ट्रैक्‍टर करीब आधी कीमत में मि‍ल सकते हैं।

यहां बि‍कने के लि‍ए उपलब्‍ध ट्रैक्‍टरों की पूरी स्‍पेसिफि‍केशन और उनकी कीमत की रेंज दी गई है। खरीद पर फाइनेंस की सुवि‍धा भी उपलब्‍ध है। जो कि‍सान नया ट्रैक्‍टर अफोर्ड नहीं कर सकते वह पुराने पर वि‍चार कर सकते हैं।

Mahindra – MM 265 DI

  • मॉडल – MM 265 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 2,10,000 से 260,000
  • कहां – tractorbazar.com

Swaraj/PTL – PTL 733

  • मॉडल – PTL 733
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2008
  • कीमत – 190,000 – 225,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Massey/Tafe – MF 1035 DI

  • मॉडल – MF 1035 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 200,000 – 260,000
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 380

  • मॉडल – EIC 380
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2011
  • कीमत – 180,000 – 250,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 241

  • मॉडल – EIC 241
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2012
  • कीमत – 165,000 – 200,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com