गोबर से साबुन-तेल बनाता है यह शख्स

गाय का घी, दूध सेहत के लिए अच्छा होता है, इससे तो सभी वाकिफ हैं। वहीं गोबर से खाद और बायो गैस बनाने के बारे में भी सुना होगा। पर आपने कभी सोचा होगा कि आप गोबर औऱ गोमूत्र से बने साबुन से स्नान भी कर सकते हैं।

नहीं तो आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बता रहे हैं, जिसने कचरा और गंदगी समझने वाले गोबर का इस्तेमाल कर करोड़ों की कंपनी खड़ी कर दी है। मुंबई की यह कंपनी गाय के गोबर औऱ गोमूत्र से साबुन, टूथपेस्ट, क्रीम, फेस वॉश के अलावा अन्य कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स बनाती है।

गाय के गोबर-गोमूत्र से बनाते हैं प्रोडक्ट

काउपैथी के फाउंडर उमेश सोनी ने बातचीत में बताया कि गाय के गोबर और गोमूत्र में बीमारियों से लड़ने से कई गुण मौजूद है। आयुर्वेद में भी पंचगाव्य यानी गोमूत्र, गाय का गोबर, दूध, दही और घी से बने प्रोडक्ट से बीमारी को ठीक किए जाने का जिक्र है।

इस महत्व को देखते हुए उन्होंने गाय के गोबर और गोमूत्र से साबुन समेत कई कॉस्मेटिक प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता बढ़ने से प्रोडक्ट की मांग बढ़ रही है, जिससे उनका बिजनेस भी ग्रो कर रहा है।

10 लाख रु से की शुरुआत

सोनी ने कहा कि साल 2012 में 10 लाख रुपए के निवेश से काउपैथी की शुरुआत की। यह रकम एक्सपोर्ट के बिजनेस से हुई कमाई की थी। काउपैथी को शुरू करने से पहले उन्होंने एक दोस्त के साथ मिलकर एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया था। इसके तहत वो कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट करते थे।

गोबर से साबुन बनाने का क्या है प्रोसेस

गाय के गोबर से बनने वाले प्रोडक्ट के बनाए जाने को लेकर उन्होंने कहा कि हम पहले तेज तापमान में गोबर को सुखाते हैं। गोबर की गंध को मिटाने के लिए उसमें एसेंस ऑयल डालते हैं ताकि उसमें खुशबू आए। ऐसा ही गोमूत्र को उबाल कर अन्य प्रोडक्ट में इस्तेमाल करते हैं।

13 देशों में होता है एक्सपोर्ट

गाय के गोबर से बने साबुन का सोनी ने पेटेंट करा रखा है। उन्होंने कुल चार पेटेंट कर रखे हैं। काउपैथी के गोबर से बने साबुन की कीमत 35 रुपए है। इस साबुन की भारत समेत 13 देशों में एक्सपोर्ट किया जाता है। इसमें यूक्रेन, रूस, अमेरिका, सिंगापुर शामिल है। उनका कहना है कि उनका प्रोडक्ट सभी मानदंडों पर खड़ा उतरता है। एफडीए अप्रूवल के बाद वो प्रोडक्ट मैन्युफैक्चर करते हैं।

5 करोड़ है कंपनी का टर्नओवर

सोनी कहते हैं कि उनकी कंपनी का कुल टर्नओवर 4 से 5 करोड़ रुपए का है। जिसमें काउपैथी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए शामिल है। उनका प्रोडक्ट्स ऑनलाइन भी बिक्री के लिए उपलब्ध है। उन्होंने इसके लिए बिग बास्केट के साथ टाइअप किया है।

वहीं हाईपर सिटी के साथ करार होना था लेकिन इन्वेस्टमेंट ज्यादा होने की वजह से फिलहाल टाल दिया है। उनका लक्ष्य कुछ सालों में कुछ औऱ नए प्रोडक्ट्स लॉन्च करना है। साथ ही वो अपने बिजनेस में प्रत्येक साल 40 फीसदी ग्रोथ दर्ज करना चाहते हैं।

रिटायरमेंट के बाद 60 दिन की ली ट्रेनिंग,ऐसे खड़ा किया 35 लाख रु का कारोबार

अपने देश में रिटायरमेंट के बाद लोग काम करना पसंद नहीं करते हैं। रिटायरमेंट के बाद लोग घर पर अपने परिवार के साथ वक्त बिताने की सोचते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो रिटायरमेंट के बाद अपना बिजनेस शुरू करने का जज्बा रखते हैं और वो अपना एक अलग मुकाम भी खड़ा कर रहे है। हरियाणा के रहने वाले राजकुमार खरब भी ऐसे ही शख्स हैं जिसने नौकरी से रिटायर होने के बाद न सिर्फ अपना बिजनेस शुरू किया, बल्कि वो इससे अच्छी खासी कमाई भी कर रहे हैं।

बुढ़ापे में 2 महीने का किया कोर्स

राजकुमार खरब हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर थे। नौकरी से रिटायर होने के बाद ऑर्गेनिक फार्मिंग में खुद का एंटरप्राइज खोलना चाहते थे। पर इस बार में उनको ज्यादा जानकारी नहीं थी।

इसलिए 2015 में उन्होंने करनाल स्थित इंडियन सोसायटी ऑफ एग्रीबिजनेस प्रोफेशनल्स (ISAP) के तहत एग्री-क्लिनिक एंड एग्री-बिजनेस सेंटर्स को ज्वाइन किया। यहां पर उन्होंने 2 महीने का कोर्स किया। यहां उनको मार्केट सर्वे, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के साथ अन्य बिजनेस डेवलपमेंट के बारे में जानकारी मिली।

कोर्स पूरा होने के बाद उन्होंने अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और आज उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए हो गया है। उनके सफल बिजनेस के बारे में एग्रीक्लिनिक ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की है।

मार्केट में उतारा ऑर्गेनिक गुड़

एग्रीक्लिनिक से ट्रेनिंग पूरा होने के बाद उनको अपना बिजनेस शुरू करना था। इसके लिए उन्होंने मार्केट में सर्वे कर जानना चाहा कि लोग बाजार में नया क्या खोज रहे हैं और बिजनेस का मौका कहां है। उन्होंने पाया कि बाजार में जो गुड़ मिल रहा है वो अच्छी क्वालिटी का नहीं है और उसमें मिठास भी नहीं है। एग्री फील्ड में काम करने का अनुभव होने की वजह से उन्होंने आर्गेनिक गुड़ बाजार में लॉन्च करने का फैसला किया। फिर एआरबी ऑर्गेनिक जैगरी की शुरुआत हुई।

बिना लोन शुरू किया बिजनेस राजकुमार ने अपने बिजनेस की शुरुआत बिना लोन से की। उन्होंने बिजनेस शुरू करने लिए अपनी जमा-पूंजी लगाई। उन्होंने 20 एकड़ की जमीन को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार किया। जहां आज ऑर्गनिक तरीके से गन्ने की खेती होती है। अपने साथ उन्होंने अन्य किसानों को भी ऑर्गेनिक खेती के फायदे के बारे में बताया। वो एक खास तकनीक से गुड़ बनाते हैं औऱ उनके इस तकनीक को हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से लाइसेंस मिला हुआ है।

सालाना 35 लाख रु है टर्नओवर

ऑर्गेनिक गुड़ की डिमांड बाजार में अच्छी है। बाजार में ऑर्गेनिक गन्ने के रस को भी अच्छी कीमत मिल जाती है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन बेहतर हो जाता है। वो अपनी तकनीक को दूसरे किसानों और स्मॉल स्केल फैक्ट्रियों को बेचकर भी कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा वो कमर्शियल मॉडल पर बायोगैस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भी चला रहे हैं।

उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए है। ग्रो ऑर्गेनिक, बाय ऑर्गेनिक राजकुमार इस प्रकार के मॉडल डेवलप कर ग्रामीण युवाओं और पारंपरिक रूरल एंटरप्राइज को नया जीवन देकर उन्हें वाणिज्यिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रहे है। उभरते एग्रीप्न्योर्स के लिए उनका का संदेश है- ऑर्गेनिक उपजाएं, ऑर्गेनिक खरीदें और अगली पीढ़ी के लिए प्लेनेट को बचाओ।

‘3 इडियट’ वाले सोनम वांगचुक सैनिकों के लिए बना रहे मिट्टी के टेंट, ठंड में खुद से होंगे गर्म

सोनम वांगचुक को तो आप जानते ही होंगे। वही, जिनसे प्रेरणा लेकर 3 इडियट फिल्म बनाई गई थी और आमिर खान का किरदार उनसे काफी हद तक प्रभावित था। इंजीनियर, खोजी और शिक्षा व्यवस्था में कई सारे काम करने वाले सोनम ने भारतीय सेना के जवानों को सर्दी से बचाने के लिए काम कर रहे हैं।

कश्मीर के लेह और लद्दाख इलाके में काफी ठंड रहती है। सैनिकों को सीमा के पास बंकर बनाने और उन्हें सर्दी से बचाने पर काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। फिर भी सैनिकों को पूरी तरह से सर्दी से राहत नहीं मिलती। सोनम वांगचुक ने एक प्रॉजेक्ट पर काम करना शुरू किया था, जिसे अब इंडियन आर्मी की फंडिंग मिल रही है।

इकनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक सोनम ने मिट्टी की सहायता से कुछ ऐसे प्री-फैब्रिकेटिड सोलर हीटेड टेंट बनाने के बारे में सोचा जिसमें सैनिकों को ठंडी न लगे। सोनम ने अपने प्रॉजेक्ट का प्रोटोटाइप भी तैयार कर लिया है। अगर उनका यह मिशन सफल हुआ तो इस क्षेत्र में लगभग 10,000 टेंट बनाने होंगे। इन्हें बनाने के लिए लद्दाख में फैक्ट्री स्थापित की जाएगी और इससे वहां के लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

लेह-लद्दाख क्षेत्र समुद्र तल से 12,000 फीट की ऊंचाई पर पड़ता है। जहां अत्यधिक ठंड पड़ती है। सर्दियों में यहां का तापमान माइनस बीस डिग्री तक पहुंच जाता है। मार्च अप्रैल में भी यहां माइनस पांच तापमान रहता है।

लद्दाख क्षेत्र नेशनल पावर ग्रिड से भी नहीं जुड़ा है इसलिए बिजली की सप्लाई छोटे हाइड्रो पावर प्रॉजेक्ट से होती है। इतनी बिजली यहां के लिए नाकाफी होती है। गर्मी पाने के लिए यहां के लोग मिट्टी का तेल या लकड़ियां जलाते हैं। जो कि खर्चीला होने के साथ ही पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है।

जम्मू कश्मीर सरकार के स्टेट स्किल डिपार्टमेंट मिशन के एक समारोह के दौरान वांगचुक ने बताया कि ये सोलर पैसिव स्ट्रक्चर होंगे। यह कोई नई बात नहीं है। नई बात यह है कि इन्हें एक से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा और ये प्री-फैब्रिकेटिड होंगे। इन्हें जरूरत की जगह पर तेजी से असेंबल किया जा सकेगा। इससे आर्मी की शेल्टर से जुड़ी समस्या का हल निकलेगा।

इनकी हीटिंग में कोई खर्च नहीं होगा। माइनस 20 डिग्री तापमान में भी बिना किसी हीट सोर्स के इनके भीतर तापमान 20 डिग्री पर चला जाएगा। वांगचुक ने कहा कि ठंडी जगहों पर बिल्डिंग कॉस्ट 15 साल की हीटिंग के बराबर होती है।

उन्होंने कहा कि सेना जवानों को गर्म रखने के लिए कितना तेल जलाती है और इससे कितना प्रदूषण होता है। यह स्थिति बदलने जा रही है। उन्होंने बताया, ‘हम कई प्रोटोटाइप्स पर काम कर रहे हैं। मुझे नहीं पता कि सेना की क्या नीति है, लेकिन उन्होंने इसमें रुचि दिखाई है और उन्होंने प्रोटोटाइप के लिए भुगतान भई किया है।’ सेना वांगचुक के हर प्रोटोटाइप का खर्च उठा रही है।

सोनम ने लद्दाख में माउंटेन विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा भी की है। अगर उनका प्रोटोटाइप को हरी झंडी मिलेगी तो वे अपनी यूनिवर्सिटी में ही टेंट बनाने की फैक्ट्री लगाएंगे और बच्चों को लाइव उदाहरण देकर सिखाएंगे। उनका कहना है कि बच्चों को वास्तविक जिंदगी के अनुभवों से सिखाना चाहिए। उनकी यूनिवर्सिटी में बच्चों को ऐसे ही पढ़ाया जाएगा।

वांगचुक ने अपनी यूनिवर्सिटी बनाने के लिए पैसे जुटाने का कैंपेन भी शुरू कर दिया है। उन्हें उनके आईस-स्तूप के लिए रोलैक्स अवॉर्ड मिला। इस अवॉर्ड के तहत उन्हें एक करोड़ रुपये भी मिले। उन्होंने बताया कि कई कॉर्पोरेट फर्म से संपर्क करने पर उन्होंने 1.5 करोड़ रुपये इकट्ठा कर लिए हैं।

नौकरी के दौरान मिला आइडिया, 13 साल में 10 लाख को बना दिया 15 करोड़

चाह हो तो राह मिल ही जाती है। ये साबित कर दिखाया है तेलंगाना के डॉ रवींद्र रेड्डी ने। कुछ करने की चाहत रखने वाले रेड्डी ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर पॉल्ट्री फार्म का बिजनेस शुरू किया। 10 लाख रुपए लोन लेकर उन्होंने पॉल्ट्री फार्म की शुरुआत की जिसका आज सालाना टर्नओवर 15 करोड़ रुपए हो गया है।

12 साल का अनुभव आया काम

तेलंगाना के 46 वर्षीय डॉ रवींद्र रेड्डी पॉल्ट्री साइंस में डॉक्टरेट हैं। उनके पास पॉल्ट्री सेक्टर में काम करने का 12 साल का अनुभव है। पॉल्ट्री फार्म शुरू करने से पहले वो एक जानी-मानी कंपनी में अच्छी सैलरी पर काम करते थे।

लेकिन इस सेक्टर में 12 साल का अनुभव होने की वजह से उन्होंने अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का मन बनाया और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स स्कीम से ट्रेनिंग ली और फिर अपने बिजनेस की शुरुआत की। उनकी सफलता की कहानी एग्री क्लिनिक ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की है।

दो लक्ष्य के साथ पॉल्ट्री सेक्टर में रखा कदम

डॉ रेड्डी दो लक्ष्य के साथ पॉल्ट्री सेक्टर में बिजनेस करने उतरे थे। पहला इस सेक्टर में मुझे खुद को सबसे अच्छा साबित करना था। दूसरा पॉल्ट्री फार्मर्स को क्वालिटी सर्विस प्रदान करना था। इन्हीं दो लक्ष्यों के साथ उन्होंने पॉल्ट्री सेक्टर में कदम रखा।

2 महीने की ली ट्रेनिंग

एग्रीप्न्योर बनने के लक्ष्य को पूरा करने के वास्ते वो 2004 में एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स स्कीम द्वारा चलाए जा रहे दो महीने के ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। इस दौरान उन्होंने और विस्तार से बिजनेस की बारीकियों को समझा और बिजनेस मॉड्यूल के बारे में जाना। फिर शुरू हुआ उनका अपना बिजनेस।

10 लाख लोन लेकर शुरू किया बिजनेस

एसीएंडएबीसी से ट्रेनिंग लेने के बाद डॉ रेड्डी ने एक सरकारी बैंक से 10 लाख रुपए का लोन लेकर अपने बिजनेस की शुरुआत की। इस लोन पर उन्हें नाबार्ड से 36 फीसदी सब्सिडी मिली। आज रेड्डी रिसर्च एंड लैब्स (आरआऱ लैब्स) का पॉल्ट्री बिजनेस वेंचर्स में एक नाम है। उनके पास तेलंगाना में 24 एकड़ जमीन है जिसमें रिसर्च लैबोरेट्री और पॉल्ट्री फीड यूनिट है।

15 करोड़ है सालाना टर्नओवर

10 लाख रुपए से शुरू किया गया आरआर लैब्स का बिजनेस आज सालाना 15 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। वो अपने फर्म में 56 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। वहीं 30 जिलों में किसानों को सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा वो असम, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश के राज्यों में फर्टाइल एग्स की डिमांड को पूरा कर रहे हैं।

150 रुपए में की ढाबे पर नौकरी, अब 1.5 करोड़ की कार के लिए 16 लाख का नम्बर

यह खबर आपको चौंकाने वाली है। सुनकर हैरानी होगी। जिस व्यक्ति ने 15 साल पहले ढाबे पर डेढ़ सौ रुपए की नौकरी की, मंगलवार को उसी व्यक्ति ने अपनी डेढ़ करोड़ की लग्जरी कार के लिए 16 लाख का आरजे 45 सीजी 001 नंबर खरीदा।

स्वेज फॉर्म में रहने वाले राहुल तनेजा ने इससे पहले भी 2011 में अपनी बीएमडब्ल्यू 7 सीरीज के लिए 10 लाख का वीआईपी 0001 खरीदा था। परिवहन अधिकारियों के मुताबिक अभी तक देश का सबसे महंगा नंबर है। इससे पहले 11 लाख रुपए तक के नंबर बिके हुए हैं

राहुल की अभी एक इवेंट मैंनेजमेेंट कंपनी है। मध्यप्रदेश के कटला के रहने वाले राहुल के पिता टायर पंचर लगाने का काम करते थे। जिन्दगी में कुछ कर गुजरने के लिए छोटी उम्र में घर छोड़कर जयपुर आ गए। जहां आदर्शनगर में एक ढाबे पर 150 रुपए में नौकरी की। नौकरी करते हुए राहुल ने राजापार्क स्थित आदर्श विद्या मंदिर में पढ़ाई भी की।

दोस्तों की किताब, कॉपी और पासबुक्स मांगकर पढ़ाई की और ९२ प्रतिशत अंक हासिल किए। राहुल के अनुसार दो साल तक ढाबे पर नौकरी के बाद दीवाली पर पटाखे और होली पर रंग तो मकरसंक्रान्ति पर पतंगें बेचने का काम किया। रोजी-रोटी के लिए घर-घर तक अखबार पहुंचाया और फिर रात को ऑटो चलाया।

दोस्तों के कहने पर मॉडलिंग शुरू की

दोस्तों के कहने पर मॉडलिंग का चस्का लग गया और एक फैशन शो में भाग ले लिया। वर्ष 1998 में जयपुर क्लब के एक फैशन शो में भाग लिया और वे चुन लिए गए। इस दौरान 8 महीने तक फैशन शो किए। इसके बाद उन्होंने बैक स्टेज आने का निर्णय लिया। इसका मतलब उन्होंने इवेंट कराने का काम शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी खोल ली। फिर उन्होंंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता हासिल की।

नम्बर 1 की ऐसी चाहत

तनेज को नम्बर एक की इतनी चाहत है कि वे इस नम्बर से जुड़ा हर काम करना चाहते हैं। इसके लिए पहले भी एक गाड़ी के लिए एक नम्बर हासिल कर चुके हैं। दस अंकोंं के मोबाइल में 1 नम्बर सात बार हैं। चारों कार के नम्बर भी एक ही डिजिट में है।

  • देश में सबसे महंगा नम्बर खरीदा है। इससे पहले चंडीगढ़ में 11.83 लाख में रुपए नम्बर बिकाथा। डेढ़ सौ रुपए में ढाबे में नौकरी, फुटपाथ पर जैकेट बेची, अखबार बांटे, आॅटो चलाकर पेट भरा। इसलिए गरीब क्या होती है पता है। नम्बर एक पर बने रहने की चाहत के चलते ही यह नम्बर खरीदा है। —राहुल तनेजा, वीआईपी नम्बर खरीदने वाले
  • नीलामी प्रक्रिया में सबसे महंगा नम्बर 16 लाख एक हजार में बिका है। इससे पहले ग्यारह लाख रुपए तक में ही नम्बर बिक चुका है। यही कारण है यह नीलामी प्रक्रिया चर्चा का केन्द्र बनी हुई है। —अनिल सेनी, डीटीओ

7000 रु. की सरकारी ट्रेनिंग, 42000 प्रति‍माह कमा रहे हैं रवि‍राज

पुणे के रहने वाले रवि‍राज वि‍लास हारगुडे अब दि‍ल्‍ली में एक अच्‍छी नौकरी कर रहे हैं। वह क्‍लीन मैक्‍स सोलर प्राइवेट लिमि‍टेड में बतौर डिजाइन इंजीनि‍यर नौकरी कर रहे हैं और प्रति‍माह उन्‍हें 42000 रुपए मि‍लते हैं।

यह देश की नामी रूफटॉप सोलर कंपनी में से एक है। वह कहते हैं इस कंपनी में बेहतर मौका दि‍लाने नेशल स्‍मॉल इंडस्‍ट्रीज कॉरपोरेशन (NSIC) की भूमि‍का रही। रवि‍राज की सफलता की कहानी खुद नेशल स्‍मॉल इंडस्‍ट्रीज कॉरपोरेशन (NSIC) ने शेयर की है।

NSIC से वीकेंड कोर्स कि‍या

हारगुडे ने दि‍ल्‍ली के नेशल स्‍मॉल इंडस्‍ट्रीज कॉरपोरेशन (NSIC) से Staad Pro. का वीकेंड कोर्स कि‍या। इसकी क्‍लास केवल शनि‍वार और रविवार को होती थी। रवि‍राज ने अगस्‍त-सितंबर 2017 में यह कोर्स कि‍या। उन्‍होंने बताया कि‍ तब इसकी फीस करीब 7000 रुपए थी।

वह बताते हैं कि‍ मेरे प्रोफाइल के लि‍हाज से मुझे इस तरह के प्रोग्राम से काफी लाभ मि‍ल सकता था यह बात मैं जानता था। मगर नौकरी के साथ इस तरह की ट्रेनिंग करना ना केवल कठि‍न था बल्‍कि‍ खर्चीला भी था। फि‍र मुझे NSIC की जानकारी मि‍ली और मैंने कोर्स ज्‍वाइन कर लि‍या। अपने करि‍यर में मुझे इसका वेटेज मि‍ला।

सरकार ने स्‍वरोजगार और तकनीकी ट्रेनिंग मुहैया कराने के लि‍ए सरकार नेशल स्‍मॉल इंडस्‍ट्रीज कॉरपोरेशन के माध्‍यम से कई तरह के कोर्स का संचालन करती है। कामकाजी लोगों के लि‍ए वीकेंड ट्रेनिंग भी कराई जाती है। यहां की ट्रेनिंग की खास बात ये है कि यहां के सभी कोर्स मान्‍यता प्राप्‍त होते हैं और फीस भी बहुत ज्‍यादा नहीं होती।

कहां-कहां है सुवि‍धा

एनएसआईसी के टेक्‍नि‍कल सर्विस सेंटर दि‍ल्‍ली, पंजाब, उत्‍तर प्रदेश, तेलंगाना, तमि‍लनाडु, पश्‍चि‍म बंगाल, गुजरात और हरि‍याणा में हैं। हर केंद्र कई तरह की ट्रेनिंग देता है।

कि‍स तरह के कोर्स कराए जाते हैं

एनएसआईसी के सेंटरों में नौकरी करने या अपना छोटा व्‍यवसाय शुरू करने के लि‍ए कई तरह की ट्रेनिंग कराई जाती है। इनमें पेपर नेपकि‍न व दोना मेकिंग, पैकिंग, टॉयल पेपर मेकिंग, गेहूं का आटा बनाना व पैकिंग, ऑटोमेटिक वायर नेल, तेल नि‍कालना, सोया मिल्‍क, बेसि‍क कटिंग व टेलरिंग, मसाले पीसना व पैकिंग, पेट बोतल, नोट बुक प्रिटिंग व बाइंडिंग, जुराबें बनाना।

यहां टेक्‍नि‍कल कोर्स भी कराए जाते हैं जैसे – 3डी मॉडलिंग एंड एनालाइसि‍स, रि‍वर्स इंजीनि‍यरिंग, ऑर्गेनि‍क फार्मिंग बि‍जनेस, टेलीवि‍जन प्रोडक्‍शन वगैरह। कैसे मि‍लता है दाखि‍ला कोर्स में दाखि‍ले का समय अलग अलग है। कई बैच चलते रहते हैं।

आप सबसे पहले https://www.nsic.co.in पर जाकर ये देखें कि‍ आपके आसपास पड़ने वाले सेंटर में इस समय कि‍स कोर्स में दाखि‍ला चल रहा है। इसके अलावा आप वेबसाइट पर दि‍ए गए फोन नंबरों पर संपर्क भी कर सकते हैं।

बिना नौकरी के सिर्फ वीडियो गेम खेल कर हर घंटे 8 लाख की कमाई कैसे कर लेती है ये लड़की?

हमारे आस-पास तमाम ऐसे लोग हैं जो जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी बहुत थोड़ी रकम जमा कर पाते हैं। वहीं कुछ लोग नौकरी के जरिए पैसे कमाते हैं पर यहां हम आपको एक ऐसी लड़की के बारे में बता रहे हैं जो बेरोजगार है, फिर भी वो हर घंटे 8 लाख रुपए की कमाई करती है। अब आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर वो लड़की ऐसा क्या करती है जो वह हर घंटे 8 लाख रुपए कमा रही है, आइए जानते हैं।

बिना जॉब के लाखों की कमाई

इस अनोखी लड़की का नाम है चेल्सिया। चेल्सिया ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली है और उसे ऑफिस में कंप्यूटर पर बैठकर काम करने पसंद नहीं था। तो उसने पैसे कमाने के लिए नया जरिया खोजा। इसके लिए उसने अपने ही पैशन को कमाई में बदल दिया।

हर घंटे 8 लाख रुपए की कमाई

चेल्सिया ने ऑनलाइन वीडियो गेम का जरिया खोजा और वह ऑनलाइन वीडियो गेम्स खेलकर काफी पैसा कमा रही है। चेल्सिया 1 घंटे तक वीडियो गेम खेलने के लिए करीब 8 लाख रुपए लेती हैं। अब आखिर आप ये सोच रहे होंगे कि कोई गेम खेलता है तो उसे पैसे क्यों मिलते हैं, तो आपका ये संशय भी हम यहां दूर कर देते हैं।

ऐसे होती है कमाई

जिस वक्त चेल्सिया गेम खेल रही होती हैं, उस वक्त लोग गेम लाइव देखते हैं। लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान सब्स्क्रिप्शन, ऐड और स्पॉन्सर मिलने के चलते उन्हें करीब 8 लाख तक मिल जाते हैं।

पार्टीज करने का शौक

चेल्सिया को पार्टीज करने का काफी शौक है, वो सोशल मीडिया पर अपनी कई फोटोज अपलोड करती रही हैं। चेल्सिया ने फार्मेसी में डिग्री ली है लेकिन वो नौकरी नहीं करना चाह रही थी। उनका कहना है कि जितनी कमाई वो गेमिंग में कर लेती हैं उतनी वो जॉब करके कभी नहीं कर पातीं। यही नहीं इस कमाई से वो अपने पूरे परिवार का भी खर्चा उठा लेती हैं।

चैरिटी

इतना ही नहीं चेल्सिया लोक कल्याण के लिए चैरिटी भी करती हैं। लोगों के कल्याण के लिए वो इन पैसों को चैरिटी में भी लगाती हैं। वो कई सामाजिक कार्य करती रहती हैं। कई फंक्शंस में भी वो हिस्सा लेती हैं और जिनकों पैसों की जरूरत पड़ती है वो चैरिटी कर देती हैं।

पिता की अंतिम इच्छा को पूरी करने निकला था बेटा

आपको जानकर हैरानी होगी कि जो नंबर उसके पिता ने उसे बताया उसी नंबर के लॉटरी टिकट पर उसके पिता खुद 20 साल तक अपनी किस्मत आजमते रहे थे। लॉटरी जीतने वाले शख्स ने बताया कि उसके पिता की यह अंतिम इच्छा थी कि वह उसी लॉटरी का नंबर लेता रहे।

जैसे उस शख्स के पिता ने उसे कहा था, ठीक वैसे ही वह करता रहा। आखिरकार अपने पिता की अंतिम इच्छा का सम्मान करने का ईनाम उस शख्स को मिला भी। उसी टिकट ने उसे 8 मिलियन डॉलर का जैकपॉट जीताया।

जैकपॉट जीतने वाले शख्स ने बताया कि उसके पिता ने अपने जीते जी करीब 20 साल तक एक ही नंबर का लॉटरी टिकट खरीदा। विनिंंग अमाउंट के बारे में शख्स ने बताया कि वह जीते हुए पैसे अपनी फैमिली के लिए खर्च करेगा।

कचरे से पैसे कमा रहा है ये शख्स

क्या आपने कभी सोचा है जिस कूड़े को हम और आप फेंक देते हैं उससे भी पैसा कमाया जा सकता है. आज एक ऐसे शख्स के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने कचरे से पैसे कमाना शुरू किया.

बेंगलुरु के रहने वाले नवीन मरियन अपना खुद का बिजनेस खोलना चाहते थे. जिसके लिए उन्होंने रीसाइकलिंग बिजनेस को चुना काम करना शुरू किया. नवीन का मानना था कि जिस कूड़े-कचरे को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं उससे भी पैसा कमाया जा सकता है.

बता दें, नवीन मरियन ने अपने करियर की शुरूआत होटल इंडस्ट्री में बतौर शेफ से की थी. 2013 में उन्होंने अपनी खुद की केटरिंग सर्विस (प्लेट अप) शुरू की और कॉर्पोरेट इवेंट्स का कॉन्ट्रैक्ट लेने लगे. पर उनका ये बिजनेस ज्यादा समय तक चल नहीं पाया. जिसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी बल्कि नया बिजनेस शुरू किया.

ऐसे शुरू किया बिजनेस

रीसाइकलिंग बिजनेस शुरू करने के लिए उन्होंने ‘खाली बॉटल’ के नाम से एक वेबसाइट बनाई. जहां पर ग्राहक (कोई व्यक्ति या कॉर्पोरेट हाउस) अपने पते से रीसाइकलिंग के लिए कूड़ा-कचरा आदि जमा करवाने के लिए रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं.

रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ‘खाली बॉटल’ के पास उन लोगों के कॉल और मैसेज आते हैं. फिर उनकी टीम ग्राहकों के पते से कूड़ा-कचरा इकट्ठा करके लाती है. बता दें, टीम के पास वेइंग मशीन होती है और वे एक प्रोफेशनल ड्रेस कोड में होते हैं. इसके बाद संबद्ध और प्रमाणित रीसाइकलिंग प्लांट को यह माल भेज दिया जाता है.

वहीं कूड़ा घर से ले जाने के लिअ ग्राहक पेमेंट करते हैं जिसके लिए कई विकल्प दिए गए है. आपको बता दें टीम खाली बोतल सिर्फ सूखा कूड़ा ही जमा करती है. इसी के साथ नवीन कहते है इस बिजनेस से उन्हें फायदा तो हो ही रहा है साथ शहर की गंदगी भी साफ हो रही है. बता दें, खाली बॉटल के पास फिलहाल 15 कर्मचारियों की टीम है, जिसमें इंजीनियर्स से लेकर ड्राइवर तक सभी शामिल हैं.

लोन लेकर शुरू किया कारोबार

खेती-बाड़ी से जुड़कर कमाई करने के अनेक विकल्प मौजूद हैं। बस जरूरत है अवसर को पहचानने औऱ उस पर अमल करने की। उत्तराखंड के रहने वाले इस शख्स ने किसानों की परेशानियों को समझा और उसके हल के लिए मिले आइडिया से खड़ा कर दिया करोड़ों का कारोबार।

उसके बिजनेस की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज तीन साल में ही वह करोड़पति बन गया। आइए जानते हैं हरेंद्र की सफलता के बारे में…

ऐसे मिला आइडिया

खूबसूरत वादियों के शहर उत्तराखंड के अधमसिंह जिले के रहने वाले हरेंद्र सिंह ने बताया कि कैसे उनको खेती से जुड़े बिजनेस का आइडिया मिला। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में अक्सर भूस्खलन की घटानएं होती रहती है।

भूस्खलन की वजह से रास्ते टूट जाते हैं और यातायात बाधित हो जाता है। किसानों को इससे काफी परेशानी होती होगी जब वो खेती के लिए सीड्स खरीदने कई दिनों तक बाजार नहीं पहुंच पाते होंगे। इस बात को ध्यान में रख डिमांड को देखते हुए हरेंद्र ने किसानों तक पहुंच बनाई और तराई फार्म सीड़्स की नींव रखी।

65 लाख लोन लेकर की शुरुआत

हरेंद्र ने कहा कि एग्रीकल्चर में बीएससी करने के बाद एमबीए किया। इसके बाद मुरादाबाद से एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर से कोर्स किया। कोर्स पूरा होने के बाद उत्तराखंड के किसानों को सीड्स की समस्याओं को देखते हुए एक प्रोजेक्ट बनाया। लोन के लिए नैनीताल बैंक प्राइवेट लिमिटेड को एक करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट सौंपा। फिर उन्हें बैंक से 65 लाख रुपए लोन पास हुआ।

वहीं हिल एरिया में आने की वजह से उनको नाबार्ड की तरफ से 44 फीसदी की सब्सिडी भी मिली। क्या है बिजनेस मॉड्यूल उनका कहना है कि वो सीड्स के ब्रिडर खरीदते हैं। फिर उसे किसानों को देकर फसल तैयार करवाते हैं। तराई की निगरानी में सभी कार्य संपन्न होते हैं। हारवेस्टिंग के बाद उसे क्लिन और ग्रेडेड किया जाता है। फिर सर्टिफिकेशन स्टैंडर्ड्स के मुताबिक, सीड्स को पैकेजिंग कर बेचा जाता है।

कंपनी का टर्नओवर हुआ 8 करोड़ रु

हरेंद्र के मुताबिक, तराई फार्म सीड्स एंड कंपनी का सालना टर्नओवर पिछले साल 8 करोड़ रुपए था। उन्होंने इसकी शुरुआत 2014 में की थी। गेहूं, सरसों, चावल और मटर सीड्स का उनका बिजनेस है।

वो किसानों से 18,00 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से सीड्स खरीदते हैं और बाजार में 2200 से 2400 रुपए प्रति क्विंटल बेचते हैं। उनका कहना है कि सालान टर्नओवर पर 25 फीसदी का प्रॉफिट हो जाता है। यह भी पढ़ें, 2 महीने के कोर्स ने बदली जिंदगी, हर महीने कर रहे 1 लाख रु की कमाई