मशरुम गर्ल ने उत्तराखंड में ऐसे खड़ी की करोड़ों रुपए की कंपनी, हजारों महिलाओं को दिया रोजगार

हिला किसान की बात करने पर लोगों के जेहन में अभी तक सिर्फ महिला मजदूरों की तस्वीर आती थी, लेकिन कुछ महिलाएं सफल किसान बनकर इस भ्रम को तोड़ रही है। उत्तराखंड की दिव्या रावत मशरूम की खेती से सालाना एक करोड़ से ज्यादा की कमाई करती है, उनकी बदौलत पहाड़ों की हजारों महिलाओं को रोजागार भी मिला है।

पलायन रोकने के लिए दिल्ली से लौटी उत्तराखंड

उत्तराखंड राज्य के चमोली (गढ़वाल) जिले से 25 किलोमीटर दूर कोट कंडारा गाँव की रहने वाली दिव्या रावत दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रही थी, लेकिन पहाड़ों से पलायन उन्हें परेशान कर रहा था, इसलिए 2013 में वापस उत्तराखंड लौटीं और यहां मशरूम उत्पादन शुरु किया।

दिव्या फोन पर गांव कनेक्शन को बताती हैं, “मैंने उत्तराखंड के ज्यादातर घरों में ताला लगा देखा।चार-पांच हजार रुपए के लिए यहां के लोग घरों को खाली कर पलायन कर रहे थे जिसकी मुख्य वजह रोजगार न होना था। मैंने ठान लिया था कुछ ऐसा प्रयास जरुर करूंगी जिससे लोगों को पहाड़ों में रोजगार मिल सके।

करोड़ों का टर्नओवर करती है दिव्या की कंपनी

दिव्या रावत बताती हैं, “वर्ष 2013 में तीन लाख का मुनाफा हुआ, जो लगातार कई गुना बढ़ा है। किसी भी साधारण परिवार का व्यक्ति इस व्यवसाय की शुरुवात कर सकता हैं । अभी तक 50 से ज्यादा यूनिट लग चुकी हैं जिसमे महिलाएं और युवा ज्यादा हैं जो इस व्यवसाय को कर रहे हैं ।”

मशरूम की बिक्री और लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए दिव्या ने मशरूम कम्पनी ‘सौम्या फ़ूड प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी’ भी बनाई है। इसका टर्नओवर इस साल के अंत तक करीब एक करोड़ रुपए सालाना का हो जाएगा।दिव्या खुद तो आगे बढ़ी ही हजारों और लोगों को मशरूम की खेती के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने लोगों को भी मशरूम का बाजार दिलवाया।

पहाड़ों पर मशरुम 150 से 200 रुपये में फुटकर में बिकता है। ये लोग अब सर्दियों में बटन, मिड सीजन में ओएस्टर और गर्मियों में मिल्की मशरूम का उत्पादन करते हैं। बटन मशरूम एक महीने में ओएस्टर 15 दिन में और मिल्की मशरूम 45 दिन में तैयार हो जाता है।

पहाड़ों के जिन घरों में लटके थे ताले अब वहां उग रहे हैं मशरूम

स्थानीय लोग 4000 से 5000 की नौकरी के लिए  दिल्ली जैसे शहर भाग रहे थे। दिव्या की बातों में दम भी है। रोजगार के लिए पहाड़ों से पलायन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट की माने तो पिछले 17 वर्षों में करीब 20 लाख लोग उत्तराखंड को छोड़कर बड़े शहरों में रोजी-रोटी तलाश रहे हैं।

दिव्या की बदौलत अब इनमें से हजारों घरों में लोग 10-15 हजार रुपये की कमाई करते हैं। मशरूम ऐसी फसल है जिसमें लागत काफी कम आती है। 20 दिन में उत्पादन शुरु हो जाता है और करीब 45 दिन में ही लागत निकल आती है। दिव्या ने मशरूम की खेती को इतना सरल कर दिया है कि हर व्यक्ति इसे कर सकता है। पहाड़ों की हजारों महिलाएं उगाने लगी हैं मशरुम।

उत्तराखंड सरकार ने बनाया मशरुम की ब्रांड अंबेसडर

उत्तराखंड सरकार ने दिव्या के इस सराहनीय प्रयास के लिए उसे ‘मशरूम की ब्रांड एम्बेसडर’ घोषित किया। दिव्या और उनकी कंपनी अब तक उत्तराखंड के 10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट लगा चुके हैं।

एक स्टेंडर्ड यूनिट की शुरुवात 30 हजार रुपये में हो जाती है जिसमे 15 हजार इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च होता है जो दसियों साल चलता है, 15 हजार इसकी प्रोडक्शन कास्ट होती है।दिव्या कहती हैं, हम लोग, लोगों को रोजगार नहीं देते बल्कि उन्हें सक्षम बनाते हैं गांव-गांव जाकर लोगों को ट्रेनिंग दी है। अब इन यूनिट की संख्या करीब 500 पहुंच जाएगी।”

सड़क पर खुद खड़ी होकर बेचती हैं मशरुम

ब्रांड अम्बेसडर होने के बावजूद वो रोड खड़े होकर खुद मशरूम बेचती हैं, जिससे वहां की महिलाओं की झिझक दूर हो और वो खुद मशरूम बेंच सके।

ये महिलाएं अंडे के छिलके से कर रही है लाखों की कमाई ,अपनाया ये तरीका

अंडा खाने के बाद अक्सर हम छिलके फेंक देते हैं क्योंकि इसे किसी काम का नहीं माना जाता है. वहीं छत्तीसगढ़ की महिलाएं बेकार समझकर फेंक दिए जाने वाले अंडे के छिलके से हर साल लाखों कमा रहीं हैं… आइए जानते हैं कैसे..

ये बात जानकर आप जरूर हैरान रहे गए होंगे कि आखिर कैसे ये महिलाएं अंडे के छिलके से अपनी मोटी कमाई कर रही है. बता दें, छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की ये महिलाएं इन अंडे के छिलकों को खाद के रूप में बदलकर मोटा पैसा कमा रही हैं. आय के लिए उनका निकाला हुआ ये तरीका बेमिसाल है.

ऐसे करती हैं अंडे का छिलके का प्रयोग

जब महिलाओं ने देखा कि अंडे के छिलकों को लोग फेंक देते हैं तो उन्होंने इनका रिसाइकल करने के बारे में सोचा. आज ये महिलाएं अंडे के छिलकों से ‘कैल्शियम पाउडर’ और ‘खाद’ बना रही है. इसकी ट्रेनिंग उन्हें पर्यावरणविद सी. श्रीनिवासन दे रहे हैं. आपको बता दें, श्रीनिवासन एक ऐसे पर्यावरणविद हैं जो पिछले कई सालों से अपशिष्ट पदार्थों को रिसाइकल कर उन्हें काम का बनाने का काम कर रहे हैं.

कैसा होता है अंडे के छिलके से बना पाउडर

जो पाउडर अंडे के छिलकों से तैयार किया जाता है वह मुर्गियों के खाने में मिला दिया है. जिससे उनके भोजन में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाती है साथ मुर्गियां तंदरुस्त रहती हैं. वहीं पोल्ट्री सेंटर के मैनेजर का कहना है कि महिलाओं के इस काम से पशुपालन में काफी मदद मिल रही है. जहां महिलाएं ऐसा करके पैसे कमा रही है वहीं बेकार पड़ी चीजों का सही निपटान हो रहा है.

वहीं एक ओर अंडे के छिलके से खाद बनाई जा रही है. श्रीनिवासन ने बताया- बेकार पड़ी सब्जियों और हरे कचरे से खाद बनाना आसान होता है, लेकिन अंडे के छिलकों से खाद बनने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है. वहीं उन्होंने बताया कि अंडे के छिलके 95 प्रतिशत कैल्शियम कार्बोनेट के बने होते हैं. इनसे बनी खाद पेड़- पौधों को काफी लाभ पहुंचाते हैं. बता दें,

अगर ये महिलाएं 50-60 किलो अंडे के छिलके को रिसाइकल करती हैं. और वहीं मुर्गियों के खाने की कीमत 500 से 600 रुपये प्रति किलो के आस-पास होती है तो ‘स्वयं सहायता समूह’ में काम कर रही ये महिलाएं ये हर महीने 15,000 से 30,000 रुपये तक कमाई करती होंगी.

फ्री में पानी और बिजली का उपयोग कर रहा है बैंगलोर का वैज्ञानिक

गर्मी की शुरुआत होते ही देश के कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत शुरू हो जाती है । पीने के साफ पानी के साथ ही दैनिक दिनचर्या के लिए पानी की कमी महसूस की जाती है । देश में पिछले कई वर्षों से औसत से अधिक वर्षा होती है लेकिन गर्मी के सीजन में लगभग 30 % जनसँख्या को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है ।

जल सरंक्षण एवं सवर्धन अभी भी आम भारतीयों से दूर है और इसके चलते कई लोगों को पीने का पानी लाने के लिए भी कई किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है । इन सब के बीच कर्नाटक के बेंगलुरु शहर में रहने वाले एक वैज्ञानिक ने जल सरंक्षण के लिए राह दिखाई है । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पिछले लगभग 23 वर्षों में उन्होंने पानी का बिल नहीं भरा है । उनके घर में लगे बारिश के पानी के सरंक्षण के सिस्टम के चलते उन्हें बाहर से पानी मंगवाने की जरूरत नहीं पड़ी ।

पिछले कुछ वर्षों में बेंगलुरु शहर में बहुत ज्यादा विकास हुआ है जिसके चलते इस शहर में सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद गर्मी के मौसम में पानी की कमी का सामना करना पड़ता है । अपनी धरातलीय एवं भौगोलिक स्थिति के कारण बेंगलुरु में जमीन से पानी निकालना भी महंगा साबित होता है ।

इसके साथ ही कावेरी नदी भी शहर से 100 से ज्यादा किलोमीटर दूर है तथा जमीन से लगभग 1000 फ़ीट ऊँचा होने के कारण पम्पिंग एवं पाइप लाइन में काफी पैसे खर्च करने पड़ते है । इस शहर में झीलों का नेटवर्क बना हुआ था लेकिन बेतहाशा विकास एवं घटते जंगल एवं झीलों का क्षेत्रफल पानी की समस्या का मुख्य कारण बन चूका है ।

शिवकुमार (AR Shivakumar) जो कि कर्नाटक स्टेट कौंसिल ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलजी (KSCST) में सीनियर साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत है । उनके घर पर अभी कावेरी वाटर पाइपलाइन का कनेक्शन नहीं है और अपने घर की जरूरत के लिए पानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग से पूरी करते है । IISc में नौकरी लगने के बाद उन्होंने 1995 में अपना घर बनवाया ।

घर बनवाने के दौरान शिवकुमार ने अपने परिवार के लिए पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए बहुत रिसर्च किया । वो चाहते थे कि पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए अपनी जरूरत पूरी की जाये । इसके लिए सबसे पहले उन्होंने अपने आसपास के घरों एवं अपार्टमेंट्स के वाटर बिल का अध्ययन किया और उससे उन्हें एक परिवार के लिए महीने भर में जरूरत का पानी और बिल का पता चला ।

शिवकुमार का बेंगलुरु स्थित घर 

अपने रिसर्च से उन्होंने पाया कि एक परिवार को प्रतिदिन अपनी जरूरत के लिए 500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है । उसके बाद उन्होंने पिछले 100 वर्षों के मानसून एवं बारिश के डाटा का गहन अध्ययन किया और पाया कि अकाल एवं कम बारिश के दौरान भी इतना पानी तो बरसता ही है जिससे इस शहर के सभी रहवासियों के लिए पुरे वर्ष पानी की उपलब्धता हो सके ।

शिवकुमार (AR Shivakumar) के सामने केवल एक ही समस्या थी कि बारिश सामान्यतया 60-70 दिन होती है लेकिन पानी की जरूरत पुरे 365 दिन पड़ती है । इसके लिए उन्होंने 45000 कैपेसिटी के कुछ वाटर टैंक बनवाये । मोटर एवं बिजली पर निर्भरता घटाने के लिए उन्होंने घर की छत पर ही यह टैंक बनवाने का काम किया । सभी टैंक्स में शिवकुमार के द्वारा अविष्कृत फ़िल्टर टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया जिससे पानी को शुद्ध किया जा सकता है ।

टैंक में पानी भरने के बाद उन्होंने पानी को वेस्ट होने से बचाने के लिए घर में ही गार्डन बनवाया और अतिरिक्त पानी को जमीन में रिचार्ज कर दिया । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ ही वर्षों में शिवकुमार के घर के आसपास ग्राउंड वाटर लेवल 200 फ़ीट से घटकर 40 फ़ीट रह गया ।

शिवकुमार के द्वारा विकसित फ़िल्टरिंग सिस्टम 

शिवकुमार पानी का इस्तेमाल पेट्रोल एवं डीजल से भी ज्यादा सतर्कता से करते है । पानी के सरंक्षण के साथ ही शिवकुमार ने घर पर इस्तेमाल हो रहे पानी को भी रीसायकल करने के लिए सिस्टम लगा रखा है । उसके लिए उन्होंने सेपरेट टैंक्स बना रखे है जैसे कि वाशिंग मशीन से निकला सारा अपनी एक टैंक में जमा होता है जो टॉयलेट के फ्लश में इस्तेमाल होता है । इसके साथ ही किचन से निकला पानी गार्डन में इस्तेमाल होता है ।

इसके साथ ही शिवकुमार ने अपने घर में बहुत सारे परिवर्तन किये है और अपने घर को इको-फ्रेंडली बना रखा है । सोलर वाटर हीटर से निकले गर्म पानी को पुरे दिन गर्म रखने के लिए चावल के भूसे का इस्तेमाल किया है । इसके साथ ही घर पर उपयोग में आने वाली LED लाइट्स भी सोलर पावर से ही जलती है । घर की छत पर बने वाटर टैंक्स और गार्डन के चलते उनका घर प्राकृतिक रूप से ठंडा भी रहता है ।

पिछले कुछ वर्षों में शिवकुमार ने अपनी तकनीक से कई रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से युक्त घर एवं बिल्डिंग्स बनवाये है जिनमे सरकारी और गैर सरकारी अपार्टमेंट्स भी शामिल है । इनमे कर्नाटक विधान सभा , हाई कोर्ट और कुछ कॉर्पोरेट ऑफीस जैसे इंटेल एवं अरविन्द मिल्स भी शिवकुमार की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे है ।

शिवकुमार पिछले कई वर्षों से आर्किटेक्ट , बिल्डर्स एवं सरकारी अधिकारीयों को रेन वाटर हार्वेस्टिंग की निशुल्क ट्रेनिंग दे रहे है । इनकी तकनीक का इस्तेमाल भारत के साथ ही कुछ अफ्रीकन एवं यूरोपियन देशों में हो रहा है । प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग एवं समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिए कई संस्थाओं के द्वारा शिवकुमार का सम्मान किया गया है ।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत, अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

आधा किलो मीट, 2 लीटर दूध और 100 ग्राम बादाम रोज खाते थे दारा सिंह,जानें उनके बारे में दिलचस्प बातें

19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे ‘रुस्तम-ए-हिंद’ दारा सिंह ने भारत का नाम दुनिया भर में रोशन किया है। उन्होंने अपने दौर में बड़े-बड़े पहलवानों को खौफजदा रखा।

दारा सिंह के बारे में यूं तो ज्यादातर बातें लोग जानते ही हैं लेकिन जिस बात में लोगों की दिलचस्पी सबसे ज्यादा होती है वह है उनकी डाइट। तो चलिए हम आपको बताते हैं कि इतनी लंबी चौड़ी कद काठी का आदमी आखिर डाइट में क्या लिया करता था।

तमाम अलग-अलग चीजों के अलावा रोजाना 100ग्राम बादाम, मुरब्बा और घी दारा सिंह की नियमित डाइट में शामिल थे।बता दें कि दारा सिंह ने 1962 में एक्टिंग शुरू की थी और उनका सबसे चर्चित किरदार रामानंद सागर की रामायण में हनुमान का है।

इसके अलावा वह खुद को फिट बनाए रखने के लिए रोज 10 सिल्वर के वर्क और 8 चपाती एक वक्त की खुराक में लेते थे। दारा सिंह रोज 2 लीटर दूध और आधा किलो मीट खा जाया करते थे।

हालांकि ज्यादातर लोगों का ऐसा मानना है कि नाश्ता दिन की सबसे जरूरी खुराक होता है लेकिन 83 साल की उम्र में भी बेहद फिट नजर आने वाले दारा सिंह सिर्फ लंच और डिनर करते थे। कसरत करने के बाद दारा सिंह रोजाना ठंडाई पीने के शौकीन थे जिसके बाद वह चिकन या लैंब सूप भी पिया करते थे।

इन सब चीजों के अलावा जो चीज लोगों को थोड़ी चौंकाती है वह यह थी कि दारा सिंह हफ्ते में एक दिन व्रत रखा करते थे ताकि उनके शरीर के टॉक्सिन्स निकल जाएं और उनका मेटाबोलिज्म दुरुस्त हो।

तो जहां आज कल बॉडी बनाने के लिए लोग न्यूट्रीशन और व्हे प्रोटीन की मदद ले रहे हैं। दारा सिंह की नियमित सादा खुराक यह साबित करती है कि आप बिना स्टेरॉइड इस्तेमाल किए भी बॉडी बना सकते हैं।

हिंदी फिल्म जब वी मेट और पंजाबी फिल्म दिल अपना पंजाबी में भी दारा सिंह नजर आ चुके हैं।किंग कॉन्ग के साथ उनकी कुश्ती अब तक की सबसे चर्चित कुश्तियों में से एक है जिसमें उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के कॉन्ग को दोनों हाथों से उठा कर रिंग के बाहर फेंक दिया था।

जाने कैसे करोड़पतियों का गांव बना महराष्ट्र का हिवरे बाजार

इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। ये है हिवरे बाजार गांव। यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सूखे की चपेट में है, पर इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की।

बदली गांव की किस्मत…

  • इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। क्योंकि 1990 में यहां 90 फीसदी     परिवार गरीब थे।
  •  इस बारे में गांव के सरंपच पोपट राव कहते हैं कि हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर   सूखे से जूझा। पीने तक के लिए पानी नहीं बचा।
  •  कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए। गांव में महज 93 कुएं ही थे।
  •  वाटर लेवल भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था। लेकिन फिर लोगों ने खुद को बचाने की   कवायद शुरू की।

ऐसे बदली गांव की तस्वीर

  • सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी, ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई।   इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया।
  • इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद     मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी।
  • फिर कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी।
  • पोपट राव ने बताया कि अब गांव में 340 कुएं है। ट्यूबवेल खत्म हो गए हैं और जमीन का   वाटर लेवल भी 30-35 फीट पर आ गया है।

गांव में 80 करोड़पति परिवार

  • सरपंच पोपट राव के मुताबिक, गांव के 305 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 80 करोड़पति परिवार हैं।
  •  वे बताते हैं कि यहां सभी लोगों की मुख्य आय खेती से ही होती है। यह लोग सब्जी उगाकर   ज्यादातर कमाई करते हैं।
  •  हर साल इनकी आय बढ़ रही है। खेती के जरिए जहां 80 परिवार करोड़पति के दायरे में आ   गए हैं। वहीं, 50 से अधिक परिवारों की सालाना इनकम 10 लाख रुपए से ज्यादा है।
  •  गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए    प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

पीएम मोदी ने मन की बात में की थी तारीफ…

पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को ‘मन की बात’ में हिवरे बाज़ार की तारीफ करते हुए कहा था कि पानी का मूल्य क्या है, वो तो वही जानते हैं, जिन्होनें पानी की तकलीफ झेली है। और इसलिए ऐसी जगह पर, पानी के संबंध में एक संवेदनशीलता भी होती है और कुछ-न-कुछ करने की सक्रियता भी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत पानी की समस्या से निपटने के लिए क्रॉपिंग पैर्टन को बदला और पानी ज्यादा उपयोग करने वाली फसलों को छोड़ने का फैसला लिया। सुनने में बात बहुत सरल लगती है, लेकिन इतनी सरल नहीं है।

पांच साल का प्लान बनाया

  • पोपट राव ने बताया कि गांव को बचाने के लिए यशवंत एग्री वाटर शेड डेवलपर्स एनजीओ के   साथ मिलकर पांच साल का प्लान बनाया गया था।
  •  इसके तहत गांव में कुएं खोदे जाने थे। पेड़ लगाने थे। गांव को 100 फीसदी शौचालय वाले   गांव में शुमार करना था।
  •  उन्होंने बताया कि एक बार लोग जुड़े तो जुनून कुछ ऐसा हो गया कि पांच साल का प्लान 2     साल में ही खत्म हो गया।

मर्चेंट नेवी की जॉब छोड़ गांव में खोला ऑनलाइन ढाबा, अब 300 लोगों को दे रहा है रोजगार

एक ओर जहां युवा परीक्षा में अच्छे मार्क्स नहीं आने के डर से आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। वहीं 23 साल का एक लड़का हिरणमोय अपनी पढ़ाई पूरी नहीं करने के बावजूद गांव के लोगों की आजीविका को सुधारने और रूरल इकोनॉमी के बढ़ाने के उद्देश्य से मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़ दी।अब वह गांव में ऑनलाइन ढाबा खोलकर कमाने के साथ 300 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा है।

हिरणमोय गोगोई ने बताया कि जब वह 15 साल का था तो एक दुर्घटना में उसके भाई की मौत हो गई थी। इसके तीन साल बाद ही उसकी मां की भी मौत हो गई। मां के चले जाने पर वो टूट सा गया था। फिर मैंने सोचा कि मेरी मां जैसी देश में करोड़ों मां हैं जो पैसे के अभाव में जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं।

यहां से मुझे इनके लिए कुछ करने की चाहत हुई। गोगोई कहते हैं कि बीमार मां के इलाज में घर की माली हालत खराब हो गई। आगे की पढ़ाई के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे। पापा के सारे बैंक अकाउंट खाली हो गए थे। इसलिए मैंने हायर एजुकेशन नहीं करने का फैसला किया।मेरा मानना था कि हायर एजुकेशन के बदले अगर कोई टेक्निकल कोर्स किया जाए तो उसका ज्यादा फायदा मिलेगा।

हिरणमोय गोगोई ने एसटीसीडब्ल्यू 95 बेसिक सेफ्टी ट्रेनिंग कोर्स में एडमिशन लिया। इसे पूरा करने के बाद मर्चेंट नेवी की ट्रेनिंग ली।इस कोर्स को करने का पूरा खर्च 70,000 रुपए आया। कोर्स पूरा होने के बाद वह नौकरी के लिए मलेशिया गया।

मलेशिया में 2 महीने नौकरी के बाद वे देश लौट आए। कोलकाता में एक बीपीओ में करीब डेढ़ साल नौकरी से जमा किए गए पैसे को लेकर अपने गांव लौट गए। साल 2016 में गोगोई ने अपना बिजनेस शुरू किया था। उसके पास शुरू में एक गैस सिलेंडर और एक स्टोव था।

घर में रखे चावल, दाल और सब्जियों से घर का खाना की शुरूआत हुई। गोगोई बताते है कि उन्हें सिर्फ नमक खरीदने के लिए 10रुपए खर्च करने पड़े थे। बाकी सामान घर से लगा था। गोगोई कहते हैं कि पहले तो फेसबुक से इसका प्रचार किया। इसके माध्यम से पहला ऑर्डर हमें 120 रुपए का मिला था।धीरे-धीरे बिजनेस में जब फायदा होने लगा तो अपना बिजनेस करने का आइडिया आया और फिर घर का खाना का वेबसाइट बना दी।

अबतक गगोई के 6 आउटलेट असम में मौजूद है।जून 2016 में ‘घर का खाना’ लॉन्च हुआ। फिलहाल इसके 6 आउटलेट असम में मौजूद हैं। पहले साल में बिजनेस का टर्नओवर 4.70 लाख रुपए रहा.गोगोई का लक्ष्य मौजूदा फाइनेशियल ईयर में 10 लाख रुपए से ज्यादा का टर्नओवर हासिल करना है।

नौकरी छोड़ 4 दोस्त बेचने लगे दूध, खोल दी कंपनी, आज 100 करोड़ है टर्नओवर

झारखंड की ऑसम डेयरी का नाम न केवल देश में फैला हुआ है बल्कि अब वह विदेश में भी अपनी पहचान बनाने के लिए पूरी तरह से प्रयास कर रहा है। देश की बढ़ती हुई कारोबारी कंपनियों में इसका नाम शुमार है।

कम समय में इसने मेहनत कर जो मुकाम हासिल किया है वह काबिले तारीफ है लेकिन इसके पीछे की कहानी और भी ज्यादा दिलचस्प है। इससे निर्माण की कहानी सभी को कुछ नया करने की प्रेरणा देती है। सबका हौसला बढ़ाती है।

अभिषेक राज, अभिनव शाह, हर्ष ठक्कर और राकेश शर्मा नामक 4 दोस्तों ने मिलकर साल 2012 में इसकी शुरुआत की थी। चारों दोस्तों ने अपनी शानदार कॉरपोरेट जॉब्स छोड़कर इसे बनाने का फैसला किया था। सभी ने मिलकर अपनी आय एक जगह लगा दी और गायें खरीदी। शुरुआत में 40 गायें खरीदी गईं लेकिन परेशानी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

उनकी 26 गायें संक्रमण के कारण मर गईं और यह कारोबार के लिए एक बड़ा नुकसान था। हालांकि इसके बाद भी चारों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने एक बार फिर से कारोबार में निवेश किया और धीरे-धीरे गाड़ी पटरी पर लौटने लगी।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ऑसम डेयरी का टर्नओवर 5 साल के अंदर 100 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

झारखंड में ऑसम डेयरी आज 19 जिलों में चलती है और 140 डिस्ट्रिब्यूटर्स के साथ काम कर रही है। इसके अलावा 3000 से ज्यादा रीटेलर्स भी कंपनी के साथ जुड़े हैं। चार दोस्तों द्वारा शुरू की गई इस कंपनी में आज लगभग 270 लोग काम करते हैं और कंपनी की सक्सेस देखने लायक है।

रिपोर्ट के मुताबिक अभिषेक ने सबसे पहले डेयरी के बिजनेस के बारे में अपने दोस्तों से बात की थी। डेयरी शुरू करने से पहले वह लोग एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करते थे। उनका सालाना पैकेज लगभग 40 लाख रुपये के आसपास था लेकिन बढ़िया पैसे मिलने के बावजूद वह लोग अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार में लग गए।कारोबार शुरू करने के लिए चारों दोस्तों ने अलग अलग 1 करोड़ रुपये लगाए।

शुरुआत में 1 एकड़ जमीन खरीदी गई। वहीं करीब 30 लाख रुपये डेयरी फार्म बनाने में खर्च हुए। कारोबार के लिए न सिर्फ पैसा खर्च किया गया बल्कि सही ट्रेनिंग भी हासिल की। अभिनव शाह एक महीने का डेयरी फार्मिंग कोर्स करने के लिए कानपुर गए। इससे उन्हें जानवरों की स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में अच्छी जानकारी हासिल हुई। साल 2022 तक कंपनी ने 500 करोड़ का कारोबार करने टारगेट रखा है।

आठवीं पास रेशम सिंह ने कबाड़ से बना दी ईंटें बनाने की मशीन, एक घंटे में बनाती है 5000 ईंटें

मन में कुछ अलग करने का जज्बा हो तो पेशेवर डिग्री कोई मायने नहीं रखती। गांव सतीपुरा के आठवीं पास रेशम सिंह विरदी ने इस बात को फिर से साबित कर दिया है। इस देशी वैज्ञानिक ने अपने हुनर के दम पर कबाड़ से ईंट बनाने की मशीन बनाई है। इस मशीन को बनाने में उसे साढ़े छह साल लगे।

मशीन की खासियत यह है कि मिट्टी और पानी अपने आप ही मिलाती है और एक घंटे में पांच हजार ईंटें तैयार कर सकती है।मशीन को चलाने के लिए छह लोगों की जरूरत पड़ती है, जबकि पारंपरिक तरीके से इतनी ईंटें बनाने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है। रेशमसिंह बताते हैं कि ईंट बनाने की मशीन को देखने के लिए काफी लोग आ रहे हैं।

सबसे ज्यादा रुचि ईंट भट्ठा मालिकों की है क्योंकि ये लोग मजदूरों की कमी के चलते परेशान हैं। रेशमसिंह का कहना है कि इस मशीन को बनाने में उनके भतीजे सुखदीपसिंह का भी काफी सहयोग रहा है। अब उसने दूसरी मशीन बनानी शुरू कर दी है।

दोस्त की परेशानी से मिली प्रेरणा

कृषि यंत्र बनाने वाले विरदी हमेशा कुछ न कुछ नया करते रहते हैं पर ईंट बनाने की मशीन तैयार करने की प्रेरणा उन्हें अपने दोस्त प्रेम सिंह की परेशानी सुनकर मिली। प्रेमसिंह के दामाद भी ईंट भट्ठा चलाते हैं लेकिन कई वर्षों से मजदूरों की कमी को लेकर परेशान थे।

प्रेम सिंह की परेशानी सुनकर रेशमसिंह के दिमाग में ईंट तैयार करने वाली मशीन बनाने का आईडिया आया।वे कबाड़ से मशीन के पार्ट तैयार करते रहे। आखिरकार प्रयास रंग लाए पर इसमें साढ़े छह साल का समय लगा। अब मशीन तैयार है और रेशम सिंह इसका परीक्षण भी कर चुके हैं। उनका कहना है कि पहली मशीन बनाने में साढ़े छह साल लगे हैं पर अब ऐसी ही मशीन सिर्फ बीस दिन में तैयार कर सकते हैं।

वर्ष 2009 में बनाई थी जिप्सम लोडर मशीन

इससे पहले भी रेशम सिंह विरदी ने सैंड एंड जिप्सम लोडर मशीन वर्ष 2009 में बनाई थी। 90 हजार रुपए की लागत से तैयार हुई इस मशीन ने रेशम सिंह को राष्ट्रपति से पुरस्कार दिलवाया था। इस मशीन का उपयोग ट्राली में मिट्टी भरने के लिए किया जाता है।

लोडर मशीन ट्राली में मिट्टी लोड करने के अलावा जमीन को समतल भी करती है जबकि साधारण जेसीबी से सिर्फ मिट्टी लोड ही की जा सकती है। इस नई सोच के चलते लोडर मशीन के लिए राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी ने सात मार्च 2013 को दिल्ली में उन्हें सम्मानित किया था। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें सर्टिफिकेट, ट्रॉफी व एक लाख रुपए का चेक पुरस्कार स्वरूप दिया था।

गली-गली घूम साड़ी बेचने वाला बन गया 50 करोड़ की कंपनी का मालिक, कभी 2.50 रु दिहाड़ी पर करता था काम

कहते हैं अगर इरादे मजबूत हों तो गरीबी या किसी तरह की मजबूरी भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। यह कहावत कोलकाता के रहने वाले बिरेन कुमार बसाक पर बिल्‍कुल सटीक बैठती है।

चार दशक पहले बिसाक अपने कंधे पर साड़ियों का बंडल लादकर गली-गली घूम हरेक घर का दरवाजा खटखटाकर साड़ी बेचा करते थे, तो कभी एक बुनकर के यहां 2.50 रुपए दिहाड़ी पर साड़ी बुनने का काम किया करते थे। लेकिन आज वो अपनी मेहनत के दम पर बिरेन बसाक एंड कंपनी के मालिक बन गए हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 50 करोड़ रुपए है।

गरीबी में गुजरा बचपन

बिरेन कुमार बसाक ने मनीभास्कर को अपनी संघर्ष की कहानी बताई। उन्होंने बताया कि उनका बचपन काफी गरीबी में गुजारा। बुनकर के परिवार में जन्मे बसाक के पिता के पास उतने पैसे नहीं थे कि परिवार का भरण-पोषण हो सके। उनके परिवार के पास एक एकड़ जमीन थी जिस पर अनाज उपजाकर कुछ खाने को मिल जाता था। पैसे की वजह से वो ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए।

2.50 रुपए दिहाड़ी पर साड़ी बुनने का किया काम

उन्होंने बताया, कोलकाता के नादिया जिले के फुलिया में उन्हें एक बुनकर के यहां 2.50 रुपए दिहाड़ी पर साड़ी बुनने का काम मिला। इस कंपनी में उन्होंने करीब 8 साल काम किए। इसके बाद उन्होंने खुद का बिजनेस शुरू करने की ठानी और इसके लिए अपना घर गिरवी रखकर 10 हजार रुपए का लोन उठाया।

अपने बड़े भाई के साथ मिलकर वो बुनकर के यहां से साड़ी खरीद बेचने के लिए कोलकाता जाते थे। कुछ सालों तक यही सिलसिला चलता रहा। इस बिजनेस में कमाई होने लगी और दोनों भाई मिलकर करीब 50 हजार रुपए हरेक महीने कमाने लगे थे।

उन्होंने 1987 में साड़ी की अपनी पहली दुकान खोली। उस वक्त उनके पास सिर्फ 8 लोग काम करते थे। धीरे-धीरे बिजनेस बढ़ता गया। आज वो हर महीने हाथ से बनी 16 हजार से ज्यादा साड़ियां देश भर में बेच रहे हैं। यहीं नहीं, अब उनके यहां कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 24 हो गई और वो करीब 5 हजार बुनकरों के साथ काम कर रहे हैं।

भाई से अलग होकर शुरू किया बिजनेस

कमाई बढ़ने के साथ बसाक और उनके भाई ने कोलकाता में एक दुकान खरीदी और साड़ियां बेचने का काम शुरू किया। अगले एक साल में उनकी दुकान का टर्नओवर 1 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। लेकिन जल्दी ही वो अपने भाई से अलग होकर गांव लौट गए और यहीं पर साड़ी बेचने का बिजनेस शुरू किया।

फिर उन्होंने बिरेन बसाक एंड कंपनी की नींव रखी। बुनकरों से साड़ियां खरीद होलसेल रेट में साड़ी डीलर को बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे बिजनेस बढ़ता गया और अब उनकी कंपनी का टर्नओवर 50 करोड़ रुपए हो गया है।