रिटायरमेंट के बाद 60 दिन की ली ट्रेनिंग,ऐसे खड़ा किया 35 लाख रु का कारोबार

अपने देश में रिटायरमेंट के बाद लोग काम करना पसंद नहीं करते हैं। रिटायरमेंट के बाद लोग घर पर अपने परिवार के साथ वक्त बिताने की सोचते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो रिटायरमेंट के बाद अपना बिजनेस शुरू करने का जज्बा रखते हैं और वो अपना एक अलग मुकाम भी खड़ा कर रहे है।

हरियाणा के रहने वाले राजकुमार खरब भी ऐसे ही शख्स हैं जिसने नौकरी से रिटायर होने के बाद न सिर्फ अपना बिजनेस शुरू किया, बल्कि वो इससे अच्छी खासी कमाई भी कर रहे हैं।

 2 महीने का किया कोर्स

राजकुमार खरब हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर थे। नौकरी से रिटायर होने के बाद ऑर्गेनिक फार्मिंग में खुद का एंटरप्राइज खोलना चाहते थे।

इसलिए 2015 में उन्होंने करनाल स्थित इंडियन सोसायटी ऑफ एग्रीबिजनेस प्रोफेशनल्स के तहत एग्री-क्लिनिक एंड एग्री-बिजनेस सेंटर्स को ज्वाइन किया। यहां पर उन्होंने 2 महीने का कोर्स किया। यहां उनको मार्केट सर्वे, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के साथ अन्य बिजनेस डेवलपमेंट के बारे में जानकारी मिली।

कोर्स पूरा होने के बाद उन्होंने अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और आज उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए हो गया है। उनके सफल बिजनेस के बारे में एग्रीक्लिनिक ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की है।

मार्केट में उतारा ऑर्गेनिक गुड़

एग्रीक्लिनिक से ट्रेनिंग पूरा होने के बाद उनको अपना बिजनेस शुरू करना था। इसके लिए उन्होंने मार्केट में सर्वे कर जानना चाहा कि लोग बाजार में नया क्या खोज रहे हैं और बिजनेस का मौका कहां है। उन्होंने पाया कि बाजार में जो गुड़ मिल रहा है वो अच्छी क्वालिटी का नहीं है और उसमें मिठास भी नहीं है। एग्री फील्ड में काम करने का अनुभव होने की वजह से उन्होंने आर्गेनिक गुड़ बाजार में लॉन्च करने का फैसला किया। फिर एआरबी ऑर्गेनिक जैगरी की शुरुआत हुई।

बिना लोन शुरू किया बिजनेस राजकुमार ने अपने बिजनेस की शुरुआत बिना लोन से की। उन्होंने बिजनेस शुरू करने लिए अपनी जमा-पूंजी लगाई। उन्होंने 20 एकड़ की जमीन को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार किया। जहां आज ऑर्गनिक तरीके से गन्ने की खेती होती है। अपने साथ उन्होंने अन्य किसानों को भी ऑर्गेनिक खेती के फायदे के बारे में बताया। वो एक खास तकनीक से गुड़ बनाते हैं औऱ उनके इस तकनीक को हरियाणा के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट से लाइसेंस मिला हुआ है।

सालाना 35 लाख रु है टर्नओवर

ऑर्गेनिक गुड़ की डिमांड बाजार में अच्छी है। बाजार में ऑर्गेनिक गन्ने के रस को भी अच्छी कीमत मिल जाती है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन बेहतर हो जाता है। वो अपनी तकनीक को दूसरे किसानों और स्मॉल स्केल फैक्ट्रियों को बेचकर भी कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा वो कमर्शियल मॉडल पर बायोगैस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भी चला रहे हैं।

उनके बिजनेस का सालाना टर्नओवर 35 लाख रुपए है। ग्रो ऑर्गेनिक, बाय ऑर्गेनिक राजकुमार इस प्रकार के मॉडल डेवलप कर ग्रामीण युवाओं और पारंपरिक रूरल एंटरप्राइज को नया जीवन देकर उन्हें वाणिज्यिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रहे है। उभरते एग्रीप्न्योर्स के लिए उनका का संदेश है- ऑर्गेनिक उपजाएं, ऑर्गेनिक खरीदें और अगली पीढ़ी के लिए प्लेनेट को बचाओ।

जाने कैसे करोड़पतियों का गांव बना महराष्ट्र का हिवरे बाजार

इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। ये है हिवरे बाजार गांव। यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सूखे की चपेट में है, पर इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की।

बदली गांव की किस्मत…

  • इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। क्योंकि 1990 में यहां 90 फीसदी     परिवार गरीब थे।
  •  इस बारे में गांव के सरंपच पोपट राव कहते हैं कि हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर   सूखे से जूझा। पीने तक के लिए पानी नहीं बचा।
  •  कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए। गांव में महज 93 कुएं ही थे।
  •  वाटर लेवल भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था। लेकिन फिर लोगों ने खुद को बचाने की   कवायद शुरू की।

ऐसे बदली गांव की तस्वीर

  • सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी, ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई।   इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया।
  • इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद     मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी।
  • फिर कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी।
  • पोपट राव ने बताया कि अब गांव में 340 कुएं है। ट्यूबवेल खत्म हो गए हैं और जमीन का   वाटर लेवल भी 30-35 फीट पर आ गया है।

गांव में 80 करोड़पति परिवार

  • सरपंच पोपट राव के मुताबिक, गांव के 305 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 80 करोड़पति परिवार हैं।
  •  वे बताते हैं कि यहां सभी लोगों की मुख्य आय खेती से ही होती है। यह लोग सब्जी उगाकर   ज्यादातर कमाई करते हैं।
  •  हर साल इनकी आय बढ़ रही है। खेती के जरिए जहां 80 परिवार करोड़पति के दायरे में आ   गए हैं। वहीं, 50 से अधिक परिवारों की सालाना इनकम 10 लाख रुपए से ज्यादा है।
  •  गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए    प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

पीएम मोदी ने मन की बात में की थी तारीफ…

पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को ‘मन की बात’ में हिवरे बाज़ार की तारीफ करते हुए कहा था कि पानी का मूल्य क्या है, वो तो वही जानते हैं, जिन्होनें पानी की तकलीफ झेली है। और इसलिए ऐसी जगह पर, पानी के संबंध में एक संवेदनशीलता भी होती है और कुछ-न-कुछ करने की सक्रियता भी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत पानी की समस्या से निपटने के लिए क्रॉपिंग पैर्टन को बदला और पानी ज्यादा उपयोग करने वाली फसलों को छोड़ने का फैसला लिया। सुनने में बात बहुत सरल लगती है, लेकिन इतनी सरल नहीं है।

पांच साल का प्लान बनाया

  • पोपट राव ने बताया कि गांव को बचाने के लिए यशवंत एग्री वाटर शेड डेवलपर्स एनजीओ के   साथ मिलकर पांच साल का प्लान बनाया गया था।
  •  इसके तहत गांव में कुएं खोदे जाने थे। पेड़ लगाने थे। गांव को 100 फीसदी शौचालय वाले   गांव में शुमार करना था।
  •  उन्होंने बताया कि एक बार लोग जुड़े तो जुनून कुछ ऐसा हो गया कि पांच साल का प्लान 2     साल में ही खत्म हो गया।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत, अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

दूध के नहीं मिल रहे थे अच्छे दाम, इस किसान ने निकाली ऐसी तरकीब, आज सालाना कमा रहे लाखों

देश के डेयरी किसानों की सबसे बड़ी समस्या दूध के दाम न मिलना है, जिसकी वजह से कई किसानों ने इस व्यवसाय से मुंह मोड लिया है लेकिन करतालपुर गाँव के ज्ञानेंद्र सिंह ने इससे मुनाफा कमाने की नई तरकीब निकाली है। वह दूध तो बेच ही रहे साथ ही दूध से बने उत्पादों को बनाकर बाज़ार में अच्छे दामों में बिक्री कर रहे है।

”जब मैंने डेयरी को शुरू किया था तब मेरे पास सिर्फ पांच पशु ही थे, जिसके कोऑपरेटिव या प्राइवेट सेंटर पर बेचते थे। लेकिन दूध के दाम ठीक नहीं मिल पाते थे। धीरे-धीरे मैंने पशुओं की संख्या बढ़ाई और दूध तो बेचा साथ ही उसके साथ पनीर, खोया और मिठाई बनानी शुरू की।

दूध से ज्यादा इन उत्पादों को बेचकर जितनी लागत लगती है उससे कही ज्यादा निकल आती है।” ऐसा बताते हैं ज्ञानेंद्र सिंह। आज़मगढ़ जिले से करीब 20 कि.मी दूर पलहानी करतालपुर गाँव में एकड़ में डेयरी बनी हुई है। डेयरी 100 से ज्यादा गाय है, जिनसे रोजाना चार कुंतल दूध का उत्पादन होता है।

डेयरी में गायों को सुविधाओं

”पशुओं के खुर न खराब हो और बैठने में कोई तकलीफ न हो इसके लिए मोटी चटाई बिछा रखी है दूध निकालने के लिए मशीन की भी सुविधा है। इसके साथ सर्दी और गर्मी में बाड़े में अलग-अलग व्यवस्था कर रखी है।”

ज्ञानेंद्र ने कहा ”बाला जी डेयरी प्रोडक्ट्स के नाम से हमारी दुकान है जिसमें शुद्व मिठाई के साथ पनीर, छेना और खोया बेचते है। लोगों के बीच बहुत हमारे प्रोडक्ट्स की डिमांड भी है क्योंकि शुद्व रहता है। मुझे देखकर कई किसानों ने छोटे स्तर पर अभी पनीर और दही बनाना शुरू किया है।डेयरी में ज्ञानेंद्र ने ढाई हजार लीटर दूध की क्षमता वाला फ्रीजर भी लगवा रखा है, जिसकी मदद से दूध को दो तीन तक संरक्षित किया जा सकता है, जिससे मिठाई समेत कई उत्पाद को बनाया जाता है।

पशुपालक दूध के उत्पादों को बनाकर अपनी आय में इजाफा कर सकते हैं। अकेले ज्ञानेंद्र ही नहीं उत्तर प्रदेश के कई किसान अब गाय के दूध, गोबर और गोमूत्र से उत्पादो को बनाकर अच्छे दामों बाज़ारों में बेच रहे हैं।  देसी गाय के गोबर से बने उपले, राख, खाद और गोमूत्र से बने अर्क, पेस्टीसाइड और गो- फिनाइल बनाते है जो कीमत बाजार में बहुत अच्छी मिल रही है।

एक मशीन से बनते हैं सभी डेयरी उत्पाद

दूध से उत्पाद बनाने के लिए एक खोया, पनीर और देसी घी बनाने वाली मशीन खरीदनी होगी। एलपीजी गैस और बिजली से चलने वाली इस मशीन के जरिए मिनटों में दूध को गर्म किया जा सकता है और जरूरत के हिसाब से खोया, पनीर, दही और देसी घी बनाया जा सकता है। बाजार में 100 लीटर दूध की क्षमता वाली मशीन की कीमत करीब 80 हजार के आस-पास है। इससे खोया, देसी घी और पनीर जैसी चीजें बना दी जाएं तो एक से दो दिनों तक रखा जा सकता है और अच्छी कीमत पर बाजार में बेचा जा सकता है।

इस शख्स से सीख़ लीजिए नौकरी करने का तरीका, ऐसे रिटायरमेंट पर कमा लिए 21 करोड़ रुपए

वैसे तो अधिकतर लोगों के साथ ऑफिस में छुट्टियों का पंगा हमेशा ही बना रहता है। लेकिन अगर आपको पता चले कि एक शख्स ने अपनी पूरी नौकरी के दौरान एक भी छुट्टी नहीं ली है और उसे अब रिटायरमेंट के समय 21 करोड़ रुपए भी मिले हैं तो यकीनन आप चौंक जाएंगे।

यह सुनकर भले ही आपको एक बार यकीन न हो लेकिन ये खबर पूरी तरह सच है। दुनियाभर में भारतीयों की काम के प्रति लगन और कार्यशैली की तारीफ हमेशा से की जाती है। अधिकतर भारतीय कर्मचारी अपनी सिक लीव (बीमारी में जी जाने वाली छुट्टियां) का इस्तेमाल नहीं करते और साल के अंत में इन्हें भुना (पैसे लेना) लेते हैं।

आपको बता दें कि एक ऐसे ही भारतीय कर्मचारी ने अपनी सिक लीव के बदले 21 करोड़ रुपये कमा लिए हैं, जिनका नाम अनिल मणिभाई नायक है। अनिल मणिभाई नायक ने हाल ही में लार्सन एंड टब्रो (L&T) के नॉन एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के पद से रिटायरमेंट ले लिया है। यहां पर जो छुट्टियां उन्होंने नहीं ली, उनके बदले उन्हें पूरे 21 करोड़ रुपये मिलेंगे।

लार्सन एंड टर्बो ग्रुप को नई ऊंचाई पर ले जाने वाले अनिल मणिभाई नायक को भारत के दूसरे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण के लिए चुना गया है।

अनिल मणिभाई नायक ने लार्सन एंड टब्रो को 1965 में बतौर जूनियर इंजीनियर ज्वाइन किया था। उन्हें इससे पहले 2009 में पद्म भूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। एल एंड टी की सालाना रिपोर्ट 2017-18 के अनुसार नायक को अपनी छुट्टियां इस्तेमाल नहीं करने के एवज में 21.33 करोड़ रुपए मिलेंगे।

एक Idea ने बदली तकदीर, कबाड़ से कमाते हैं 5 करोड़ रुपए

बिहार के रहने वाले तीन इंजीनियर भाइयों ने एक आइडि‍या से अपनी तकरीर बदल दी। कूड़े-कबाड़ से शुरू किए गए बिजनेस का टर्नअोवर महज तीन साल में 5 करोड़ से ज्यादा पहुंच गया। आपको कूड़े से करोड़ों का कारोबार करने वाले इन तीन भाइयों की सक्सेज स्टोरी बता रहा है।

बनारस की सड़कों पर गंदगी देख आया आइडि‍या…

बिहार के रहने वाले विश्वेश कुमार ने बैंगलुरु से 2014 में कम्प्यूटर साइंस किया, दीपक सिंह ने पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज से 2014 में ही इंजीनियरिंग और एमबीए किया और प्रिंस सिंह ने इसी साल एमबीए मार्केटिंग से किया। तीनों भाई हैं। दीपक ने बताया, ”जून 2014 में सिस्टर की शादी बनारस में थी, फंक्शन में पूरी फैमिली पहुंची थी। हम तीनों भाई भी पहुंचे थे।”

विश्वेश ने बताया, ”बनारस में कुछ दिन बिताए तो दिखा कि सड़कों पर बहुत गंदगी फैली थी। आइडिया आया कि जो वेस्ट रिसाइकिल कर सकते हैं, उसे भी फेंक दिया जाता है। अखबार, किताब, पन्ने, स्क्रैप से र‍िलेटेड चीजों के लिए कई महीने कबाड़ी वालों से बातचीत चली।”

”इस दौरान परिवारवालों ने भी सपोर्ट नहीं किया, घरवालों ने कहा- पढ़-लिखकर कबाड़ बेचोगे। लेकिन, हमने अपने फैसले को बदला नहीं और अागे बढ़ते गए।” प्रिंस ने बताया, ”मैं 30 हजार की नौकरी करता था, सुबह जगता था तो यही सोचता था कि कुछ ऐसा जनरेट हो की खुद का काम हो। विश्वेश ने आइडिया शेयर किया, जो अच्छा लगा।

”कबाड़ को लेकर डोर-टू-डोर सर्वे किया। अन ऑर्गनाइज सेक्टर था, कालबाजारी बहुत थी। हमने प्रॉपर तरीके से काम करना शुरू किया।” ‘सेल कबाड़ी डॉट काम’ के जरिए कूड़ा डोर-टू-डोर खरीदा। इसके बाद परिवार से 10 लाख रुपए लेकर बिजनेस स्टार्ट किया। आज 5 करोड़ से ज्यादा का टर्नअोवर है। दो करोड़ कीमत का डंपिंग ग्राउंड है।””हमारे अंडर में कुल 25 लोगों का स्टॉफ काम करता है। जल्द ही ई-वेस्ट डम्पिंग सेंटर बनाएंगे।”प्रि‍ंस ने बताया कि जो लोग कभी ताने देते थे कि वो अब पार्टनर बनना चाहते हैं।

ऐसे चलता है कबाड़ का बिजनेस

डोर-टू-डोर कबाड़ उठाने की कोई ल‍िमि‍ट नहीं है, लेकिन ऑनलाइन या मोबाइल से बुकिंग पर मिन‍िमम 50 किलो वेस्ट (पेपर, लोहा, कॉपी-किताब, कार्टून, दफ्ती) उठाया जाता है।
कबाड़ को अलग-अलग छांट लिया जाता है।

इसके बाद बल्क में इसे ट्रक या कंटेनर में भरकर रिसाइक्लिंग करने वाली फैक्ट्रि‍यों को भेज दिया जाता है। इन फैक्ट्रि‍यों से ही हमें पेमेंट लेते हैं।पेपर, किताब, कॉपी और दफ्ती मुरादाबाद, काशीपुर, मेरठ और लोहा चुनार को जाता है। हमारे साथ 70 से ज्यादा छोड़े-बड़े कबाड़ी वाले जुड़े है। इनका पूरा माल हम लोग सीधे उनके यहां अपनी गाड़ी भेजकर उठाते है।

दूध बेचने वाला कैसे बना अरबपति ? जानिए बंधन बैंक के सीईओ चंद्रशेचखर घोष की कहानी

मार्च 2018 को बंधन बैंक का स्टॉक शेयर बाजार में लिस्ट हुआ। बाजार में लिस्ट होने के बाद बैंक का मार्केट कैप 58,837 करोड़ रुपए हो गया, जो देश की 22 में से 21 सरकारी बैंकों के मार्केट कैप से कहीं ज्यादा है। इसके साथ ही बैंक ने अपने निवेशकों को मालामाल कर दिया है।

बैंक के शेयर ने एक्सचेंज पर लिस्ट होते ही निवेशकों को 33 फीसदी तक का बड़ा मुनाफा दिया।बंधन बैंक के प्रबंधक चंद्रशेचखर घोष जो गरीबी से लड़ कर आज इस मुकाम तक है पहुंचे है कि बैंक के सीईओ है। तो आइए मिलते है चंद्रशेखर घोष से- उनका जन्‍म पूर्वोत्‍तर राज्‍य के एक छोटे से गांव में वर्ष 1960 में हुआ था। वह छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके संयुक्‍त परिवार में कुल 15 सदस्‍य थे।

घोष के पिता मिठाई की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। इसी से परिवार का खर्चा चलता था। इकोनोमिक टाइम्‍स के अनुसार, घोष अपना खर्च निकालने के लिए दूध बेचने के साथ बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ाया करते थे।यहाँ तक की उन्होंने हलवाई का काम भी किया है।

ढाका विश्वविद्यालय बांग्लादेश से 1978 में सांख्यिकी में एमए करने के बाद घोष ढाका स्थित BRAC में शामिल हुए, जो कि बांग्लादेश के छोटे-छोटे गांवों में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम करता है। वहां उन्होंने जो देखा उसने जीवन बदल दिया। इसी वक़्त ने बंधन बैंक का बीज बोया। रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर 2017 तक बैंक के पास 887 शाखाएं और 430 एटीएम थे, साथ ही पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 23 लाख सामान्य बैंकिंग ग्राहक थे।

घोष का कहना है कि वह गरीबी ही थी जिसने चंद्रशेखर घोष को अमीर बनाया। बंधन बैंक के सीईओ और प्रबंध निदेशक घोष ने अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीख ग़रीबी से ली। घोष ने अपने जीवन का एक हिस्सा बांग्लादेश और पूर्वी भारत के ग्रामीण इलाकों में बेहद गरीब लोगों के साथ बातचीत में बिताया।

फ्री में पानी और बिजली का उपयोग कर रहा है बैंगलोर का वैज्ञानिक

गर्मी की शुरुआत होते ही देश के कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत शुरू हो जाती है । पीने के साफ पानी के साथ ही दैनिक दिनचर्या के लिए पानी की कमी महसूस की जाती है । देश में पिछले कई वर्षों से औसत से अधिक वर्षा होती है लेकिन गर्मी के सीजन में लगभग 30 % जनसँख्या को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है ।

जल सरंक्षण एवं सवर्धन अभी भी आम भारतीयों से दूर है और इसके चलते कई लोगों को पीने का पानी लाने के लिए भी कई किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है । इन सब के बीच कर्नाटक के बेंगलुरु शहर में रहने वाले एक वैज्ञानिक ने जल सरंक्षण के लिए राह दिखाई है । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पिछले लगभग 23 वर्षों में उन्होंने पानी का बिल नहीं भरा है । उनके घर में लगे बारिश के पानी के सरंक्षण के सिस्टम के चलते उन्हें बाहर से पानी मंगवाने की जरूरत नहीं पड़ी ।

पिछले कुछ वर्षों में बेंगलुरु शहर में बहुत ज्यादा विकास हुआ है जिसके चलते इस शहर में सामान्य से अधिक बारिश होने के बावजूद गर्मी के मौसम में पानी की कमी का सामना करना पड़ता है । अपनी धरातलीय एवं भौगोलिक स्थिति के कारण बेंगलुरु में जमीन से पानी निकालना भी महंगा साबित होता है ।

इसके साथ ही कावेरी नदी भी शहर से 100 से ज्यादा किलोमीटर दूर है तथा जमीन से लगभग 1000 फ़ीट ऊँचा होने के कारण पम्पिंग एवं पाइप लाइन में काफी पैसे खर्च करने पड़ते है । इस शहर में झीलों का नेटवर्क बना हुआ था लेकिन बेतहाशा विकास एवं घटते जंगल एवं झीलों का क्षेत्रफल पानी की समस्या का मुख्य कारण बन चूका है ।

शिवकुमार (AR Shivakumar) जो कि कर्नाटक स्टेट कौंसिल ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलजी (KSCST) में सीनियर साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत है । उनके घर पर अभी कावेरी वाटर पाइपलाइन का कनेक्शन नहीं है और अपने घर की जरूरत के लिए पानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग से पूरी करते है । IISc में नौकरी लगने के बाद उन्होंने 1995 में अपना घर बनवाया ।

घर बनवाने के दौरान शिवकुमार ने अपने परिवार के लिए पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए बहुत रिसर्च किया । वो चाहते थे कि पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए अपनी जरूरत पूरी की जाये । इसके लिए सबसे पहले उन्होंने अपने आसपास के घरों एवं अपार्टमेंट्स के वाटर बिल का अध्ययन किया और उससे उन्हें एक परिवार के लिए महीने भर में जरूरत का पानी और बिल का पता चला ।

शिवकुमार का बेंगलुरु स्थित घर 

अपने रिसर्च से उन्होंने पाया कि एक परिवार को प्रतिदिन अपनी जरूरत के लिए 500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है । उसके बाद उन्होंने पिछले 100 वर्षों के मानसून एवं बारिश के डाटा का गहन अध्ययन किया और पाया कि अकाल एवं कम बारिश के दौरान भी इतना पानी तो बरसता ही है जिससे इस शहर के सभी रहवासियों के लिए पुरे वर्ष पानी की उपलब्धता हो सके ।

शिवकुमार (AR Shivakumar) के सामने केवल एक ही समस्या थी कि बारिश सामान्यतया 60-70 दिन होती है लेकिन पानी की जरूरत पुरे 365 दिन पड़ती है । इसके लिए उन्होंने 45000 कैपेसिटी के कुछ वाटर टैंक बनवाये । मोटर एवं बिजली पर निर्भरता घटाने के लिए उन्होंने घर की छत पर ही यह टैंक बनवाने का काम किया । सभी टैंक्स में शिवकुमार के द्वारा अविष्कृत फ़िल्टर टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया जिससे पानी को शुद्ध किया जा सकता है ।

टैंक में पानी भरने के बाद उन्होंने पानी को वेस्ट होने से बचाने के लिए घर में ही गार्डन बनवाया और अतिरिक्त पानी को जमीन में रिचार्ज कर दिया । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ ही वर्षों में शिवकुमार के घर के आसपास ग्राउंड वाटर लेवल 200 फ़ीट से घटकर 40 फ़ीट रह गया ।

शिवकुमार के द्वारा विकसित फ़िल्टरिंग सिस्टम 

शिवकुमार पानी का इस्तेमाल पेट्रोल एवं डीजल से भी ज्यादा सतर्कता से करते है । पानी के सरंक्षण के साथ ही शिवकुमार ने घर पर इस्तेमाल हो रहे पानी को भी रीसायकल करने के लिए सिस्टम लगा रखा है । उसके लिए उन्होंने सेपरेट टैंक्स बना रखे है जैसे कि वाशिंग मशीन से निकला सारा अपनी एक टैंक में जमा होता है जो टॉयलेट के फ्लश में इस्तेमाल होता है । इसके साथ ही किचन से निकला पानी गार्डन में इस्तेमाल होता है ।

इसके साथ ही शिवकुमार ने अपने घर में बहुत सारे परिवर्तन किये है और अपने घर को इको-फ्रेंडली बना रखा है । सोलर वाटर हीटर से निकले गर्म पानी को पुरे दिन गर्म रखने के लिए चावल के भूसे का इस्तेमाल किया है । इसके साथ ही घर पर उपयोग में आने वाली LED लाइट्स भी सोलर पावर से ही जलती है । घर की छत पर बने वाटर टैंक्स और गार्डन के चलते उनका घर प्राकृतिक रूप से ठंडा भी रहता है ।

पिछले कुछ वर्षों में शिवकुमार ने अपनी तकनीक से कई रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से युक्त घर एवं बिल्डिंग्स बनवाये है जिनमे सरकारी और गैर सरकारी अपार्टमेंट्स भी शामिल है । इनमे कर्नाटक विधान सभा , हाई कोर्ट और कुछ कॉर्पोरेट ऑफीस जैसे इंटेल एवं अरविन्द मिल्स भी शिवकुमार की तकनीक का इस्तेमाल कर रहे है ।

शिवकुमार पिछले कई वर्षों से आर्किटेक्ट , बिल्डर्स एवं सरकारी अधिकारीयों को रेन वाटर हार्वेस्टिंग की निशुल्क ट्रेनिंग दे रहे है । इनकी तकनीक का इस्तेमाल भारत के साथ ही कुछ अफ्रीकन एवं यूरोपियन देशों में हो रहा है । प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग एवं समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिए कई संस्थाओं के द्वारा शिवकुमार का सम्मान किया गया है ।

मर्चेंट नेवी की जॉब छोड़ गांव में खोला ऑनलाइन ढाबा, अब 300 लोगों को दे रहा है रोजगार

एक ओर जहां युवा परीक्षा में अच्छे मार्क्स नहीं आने के डर से आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। वहीं 23 साल का एक लड़का हिरणमोय अपनी पढ़ाई पूरी नहीं करने के बावजूद गांव के लोगों की आजीविका को सुधारने और रूरल इकोनॉमी के बढ़ाने के उद्देश्य से मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़ दी।अब वह गांव में ऑनलाइन ढाबा खोलकर कमाने के साथ 300 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा है।

हिरणमोय गोगोई ने बताया कि जब वह 15 साल का था तो एक दुर्घटना में उसके भाई की मौत हो गई थी। इसके तीन साल बाद ही उसकी मां की भी मौत हो गई। मां के चले जाने पर वो टूट सा गया था। फिर मैंने सोचा कि मेरी मां जैसी देश में करोड़ों मां हैं जो पैसे के अभाव में जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं।

यहां से मुझे इनके लिए कुछ करने की चाहत हुई। गोगोई कहते हैं कि बीमार मां के इलाज में घर की माली हालत खराब हो गई। आगे की पढ़ाई के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे। पापा के सारे बैंक अकाउंट खाली हो गए थे। इसलिए मैंने हायर एजुकेशन नहीं करने का फैसला किया।मेरा मानना था कि हायर एजुकेशन के बदले अगर कोई टेक्निकल कोर्स किया जाए तो उसका ज्यादा फायदा मिलेगा।

हिरणमोय गोगोई ने एसटीसीडब्ल्यू 95 बेसिक सेफ्टी ट्रेनिंग कोर्स में एडमिशन लिया। इसे पूरा करने के बाद मर्चेंट नेवी की ट्रेनिंग ली।इस कोर्स को करने का पूरा खर्च 70,000 रुपए आया। कोर्स पूरा होने के बाद वह नौकरी के लिए मलेशिया गया।

मलेशिया में 2 महीने नौकरी के बाद वे देश लौट आए। कोलकाता में एक बीपीओ में करीब डेढ़ साल नौकरी से जमा किए गए पैसे को लेकर अपने गांव लौट गए। साल 2016 में गोगोई ने अपना बिजनेस शुरू किया था। उसके पास शुरू में एक गैस सिलेंडर और एक स्टोव था।

घर में रखे चावल, दाल और सब्जियों से घर का खाना की शुरूआत हुई। गोगोई बताते है कि उन्हें सिर्फ नमक खरीदने के लिए 10रुपए खर्च करने पड़े थे। बाकी सामान घर से लगा था। गोगोई कहते हैं कि पहले तो फेसबुक से इसका प्रचार किया। इसके माध्यम से पहला ऑर्डर हमें 120 रुपए का मिला था।धीरे-धीरे बिजनेस में जब फायदा होने लगा तो अपना बिजनेस करने का आइडिया आया और फिर घर का खाना का वेबसाइट बना दी।

अबतक गगोई के 6 आउटलेट असम में मौजूद है।जून 2016 में ‘घर का खाना’ लॉन्च हुआ। फिलहाल इसके 6 आउटलेट असम में मौजूद हैं। पहले साल में बिजनेस का टर्नओवर 4.70 लाख रुपए रहा.गोगोई का लक्ष्य मौजूदा फाइनेशियल ईयर में 10 लाख रुपए से ज्यादा का टर्नओवर हासिल करना है।

तीन गुना भाव में गन्ना और गुड़ बेचता है ये किसान, गो-मूत्र ने ऐसे बदली इस किसान की तकदीर

गाय के मूत्र में मानव शरीर में होने वाली बीमारियों से लेकर फसलों की बीमारी को नष्‍ट करने वाले तत्‍व मौजूद होते हैं। इसी बात को झज्‍जर के किसान ने भलि भांति समझा और आज गो मूत्र के प्रयोग के कारण तकदीर सिंह की तकदीर बदल गई है। जब उन्‍हें गो मूत्र से जैविक खेती करने की जानकारी कहीं से मिली तो उन्‍होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। गो-मूत्र को पानी के साथ छिड़काव को किसी भी यूरिया से बेहतर समझने वाले इस किसान को पहली मरतबा तो जैविक खेती करने से डर लगा था।

जब फसल एक एकड़ में करीब 200 किलो तक ही हुई। लेकिन जब बाजार में जैविक गन्ना के नाम से बिक्री के लिए पहुंचा तो दाम दोगुने से भी अधिक मिला। जब गन्ना का दाम दोगुने से भी अधिक मिला तो फिर मन में गन्ना से गुड़ बनाने की सोच ने जन्म लिया। पिछले वर्ष जींद कोल्हू में अपने गन्ना से गुड़ बनवाने के लिए पहुंचा तो मात्र तीन घंटे में ही माल उस दाम में बिक गया, जो कि सोचा नहीं था।

गोशाला से शुरू किया था गोमूत्र लेना

करीब 5 वर्ष पूर्व रसायनों से मोहभंग होने के कारण झज्जर स्थित गोशाला से तकदीर सिंह ने गोमूत्र लेने के लिए संपर्क किया। पांच रूपये लीटर के हिसाब से गोमूत्र लेने की शुरूआत करते हुए सीधे 9 एकड़ में जैविक खेती की शुरूआत की। पहले-पहल उत्पादन को रसायनों से कम हुआ। लेकिन जब बाजार में दाम मिला तो समझ में आ गया कि जैविक उत्पादों को बेचने के लिए मंडी तक जाने की जरूरत नहीं है।

ग्राहक और व्यापारी सीधा खेत में ही जाएंगे। करीब 3500 रुपये क्विंटल तक के दाम में गेहूं बेच चुके तकदीर सिंह का चना भी खास है। साथ ही अब दो वर्ष से वह गन्ना की फसल के बाद गुड़ तैयार करने के कारोबार से जुड़े हैं। तकदीर के मुताबिक गन्ने को मौसम का भी नुकसान प्राय: नहीं होता।

ऊपर से जैविक खेती का फायदा यह रहता है कि गर्मी सर्दी के कारण होने वाली बीमारियों से भी फसल बची रहती है। आज गोमूत्र की पूर्ति के लिए उन्होंने अपने घर में दो देसी गाय पाली हुई है। जिनसे गोमूत्र के साथ दूध की पूर्ति भी हो जाती है। साथ ही गांव में अन्य पशुपालकों से भी गोमूत्र खरीद रहे हैं।

जैविक गन्ने में लागत कम आती है, जैविक गुड़ का भाव अच्छा मिलता है। गन्ने की फसल के साथ सह-फसल में गेहूं, चना, मटर, लहसुन, राजमा की फसलें इतना उत्पादन दे देती हैं जिससे उस साल की पूरी लागत निकल आती है। सभी किसानों को जैविक खेती से जुडऩा चाहिए। साथ ही अब व्यापारी भी निरंतर संपर्क में रहते हैं। वह स्वयं पूछते है कि कब क्या माल तैयार हो रहा है।