पुरानी कार बेचकर खड़ा किया बड़ा कारोबार, अब मिला 700 करोड़ रुपए का इनवेस्टमेंट

पुरानी कार खरीदने वाली दिग्गज ऑनलाइन कंपनी कार देखो डॉट कॉम ने हाल ही में बाजार से करीब 700 करोड़ रुपए का निवेश जुटाया है। गार्नरसॉफ्ट के स्वामित्व वाली कंपनी कार देखो डॉट कॉम ने इस निवेश के साथ अपना कारोबार बढ़ाने के लिए नई योजना बनाई है।

इस योजना के तहत कंपनी अब पुरानी कारों के फाइनेंस और बीमा पर विशेष फोकस करेगा। इसका कारण यह है कि पुरानी कारों पर फॉइनेंस और बीमा की सुविधा शुरू करने के बाद कंपनी के कारोबार में भारी उछाल आया है।

यहां से जुटाया फंड

इस निवेश से जुड़ी जानकारी रखने वाले कंपनी के सूत्रों के अनुसार, Sequoia कैपिटल ग्लोबल ग्रोथ फंड ने कार देखो डॉट कॉम में यह निवेश किया है। इस निवेश के साथ गुरुग्राम स्थित कंपनी में निवेश की सीमा 400-500 मिलियन डॉलर हो गई है। साथ ही कंपनी की वैल्यू 2016 के बाद पहली बार 400 मिलियन डॉलर के पार गई है। 2016 में कंपनी की वैल्यू 360 मिलियन डॉलर के करीब थी।

फाइनेंस और बीमा क्षेत्र ने बदली कंपनी की तकदीर

पुरानी कारों के बेचने वाली दिग्गज कंपनी कार देखो डॉट कॉम ने हाल ही में कारों का बीमा और फाइनेस के क्षेत्र में कदम रखा है। इससे कंपनी की कमाई में बढ़ोतरी हुई है। इन दोनों क्षेत्रों में कदम रखने के बाद कंपनी की कमाई में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले वित्त वर्ष 2018 में बढ़कर 160 करोड़ रुपए हो गई है।

तेजी से बढ़ रहा है पुरानी कारों का बाजार

बाजार के जानकारों के अनुसार, इस समय पुरानी कारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि अब इस कारोबार में कई नामी गिरामी कंपनियां आ गई हैं। साथ ही कंपनियों की ओर से फाइनेंस और बीमा की सुविधा उपलब्ध कराए जाने से लोग इनका रूख कर रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गूगल कैपिटल की कुल कमाई का 20 फीसदी हिस्सा पुरानी कारों से कारोबार से ही आता है।

कार्स-24 में निवेश कर रही है Sequoia कैपिटल

यहां सबसे रोमांचक बात यह है कि कार देखो डॉट कॉम की प्रमुख प्रतिद्वंदी कंपनी कार्स-24 में भी Sequoia कैपिटल ने निवेश किया है। जहां कार देखो अपने कारोबार के लिए केवल बाजार पर निर्भर है, वहीं कार्स-24 कस्टमर टू बिजनेस मॉडल अपनाती है। इस मॉडल के तहत कार्स-24 व्यक्तिगत ग्राहकों और डीलर्स से कार खरीदकर उन्हें अन्य डीलर्स को बेचती है।

दिमाग में आया यह आइडिया, फिर 2 लाख से बना दिए 2 करोड़

शादी के मौके पर वर और वधू दोनों पक्षों के लोग काफी व्यस्त रहते हैं। इस मौके पर दोनों पक्ष अपनी तरफ से किसी तरह कमी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि शादी धूमधाम से हो और ऐसा आयोजन हो कि दूल्हा-दुल्हन के साथ आए सभी मेहमान उसे याद रखें।

लोगों की इसी सोच से मिन्नत लालपुरिया (Minnat Lalpuriya) को एक डेस्टिनेशन वेडिंग का आइडिया मिला और 2 लाख रुपए से शुरू की गई उनकी कंपनी का टर्नओवर अब 2 करोड़ रुपए हो चुका है।

शुरू की कंपनी ‘7 वचन’

लालपुरिया ने इसी आइडिये के भुनाने के लिए ‘7 वचन’ (7vachan) की शुरुआत की। मारवाड़ी परिवार से ताल्लुक रखने वाली मिन्नत लालपुरिया ने बताया कि 7वचन एक वेडिंग कंसल्टैंसी फर्म है। उन्होंने कहा कि हाल के दौर में अपने देश में डेस्टिनेशन वेडिंग का चलन खासा बढ़ा है।

लोग अब किसी खास सिटी या वेन्यू पर शादी करना पसंद कर रहे हैं। इसको देखते हुए उन्होंने 7वचन की नींव रखी। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो कस्टमर्स को शादी के आखिरी समय होने वाली भागदौड़ के बिना पूरी प्लानिंग करने की आजादी देता है।

6 साल में खड़ी कर दी 2 करोड़ की कंपनी

अपने देश में वेडिंग प्लानिंग एक अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में तब्दील हो चुका है। वर्तमान में यह अरबों का बाजार है। कमाई की संभावनाओं को देखते हुए लालपुरिया ने छह साल पहले महज 2 लाख रुपए के निवेश से 7वचन की शुरुआत की थी।

उन्होंने कहा कि 7वचन एक वेन्यू बुकिंग प्लेटफॉर्म और यह डेस्टिनेशन वेडिंग में देश की लीडिंग कंपनी है। इस प्लेटफॉर्म के जरिए एक महीने में करीब 150 शादियां होती है।

क्या है बिजनेस मॉडल

उन्होंने कहा कि उनका काम एक प्लेटफॉर्म पर शादी से जुड़ी सभी सुविधाएं मुहैया कराना है। इसके तहत वह क्लाइंट के मुताबिक डेस्टिनेशन का चुनाव करती हैं, जहां उनको शादी करनी है। इसके बाद उस शहर के होटल्स में उनके रहने की व्यवस्था करती हैं। उनके कई होटल्स से टाईअप हैं, जिससे उनका बेहतर रेट पर कमरे मिल जाते हैं। बल्क बुकिंग के चलते उनके होटल से अच्छा डिस्काउंट और बेस्ट प्राइस मिलता है।

 

ऐसे होती है कमाई

होटल्स से मिले बेस्ट प्राइस को वह अपने कस्टमर्स को पासऑन करती हैं। इसके बदले में कस्टमर्स से बुकिंग अमाउंट पर 2 फीसदी कमीशन चार्ज करती हैं। वह कहती हैं कि एक शादी में कम से कम 20 लाख रुपए खर्च होते हैं।

वहीं हाई प्रोफाइल शादियों में 14 करोड़ रुपए से ज्यादा भी खर्च होते हैं। इस प्लेटफॉर्म की खासियत है कि यहां वह सिर्फ डेस्टिनेशन फिक्स करती हैं। बाकी अन्य काम के लिए अन्य लोग उनके इस प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं।

इस किसान ने तुलसी और आवला की खेती से सिर्फ 2 साल में कमा लिए 45 लाख रूपये

बिजनेस करने का पहला उसूल है कुछ नया करने की चाह रखना। गोरखपुर के अविनाश कुमार ने दो साल पहले इस बात को समझ लिया था। तभी तो उन्होंने पारंपरिक खेती को छोड़कर जड़ी-बूटी एवं दवाई के रूप में इस्तेमाल होने वाले पौधों की खेती की तरफ रुख किया, जिससे न सिर्फ इनकी किस्मत चमकी बल्कि और भी किसानों को इससे फायदा मिला है।

सरकारी नौकरी छोड़कर शुरू की खेती

40 वर्षीय अविनाश कुमार एक अच्छी सरकारी नौकरी कर रहे थे। 2005 में उन्होंने नौकरी छोड़कर गोखरपुर और मधुबनी में अपने पुश्तैनी खेतों में खेती करना शुरू किया। लेकिन पारंपरिक खेती में अधिक मेहनत और लागत के बाद भी मुनाफा कम मिलता था।

ऐसे में उन्होंने कुछ और करने की सोची। 2016 में उन्होंने मेडिसनल पौधों की खेती करनी शुरू की। इन जड़ी-बूटियों की बाजार में काफी मांग है। कई बड़ी कंपनियां इन्हें हाथों-हाथ खरीदती हैं। लिहाजा अपने 22 एकड़ खेतों में उन्होंने तुलसी, ब्रह्मी, कौंच, आंवला, शंखपुष्पी, मंडूकपर्णी समेत कई जड़ी बूटियां उगानी शुरू की।

दो साल में ही मिलने लगा मुनाफा

अविनाश ने बताया कि इस काम में उनकी पत्नी ने उनका साथ दिया। उन्होंने 32 प्रकार की जड़ी-बूटियों पर शोध किया कि कौन सा पौधा किस जगह के लिए उपयुक्त रहेगा। दोनों ने इस खेती करने के लिए 1.20 लाख रुपए की पूंजी लगाई।

अपनी मेहनत के दम पर दो साल में ही उन्होंने अपनी सालाना कमाई 40 से 45 लाख रुपए तक पहुंचा दी। फिलहाल वे लोग 14 प्रकार की जड़ी-बूटियां उगा रहे हैं। इसमें वे जैविक खाद का प्रयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल उनके खेतों में तुलसी की पैदावार 800 क्विंटल हुई, कौंच की फसल 200 क्विंटल हुई।

2000 किसानों को जोड़ा अपने साथ

इन दो सालों के दौरान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के 2000 किसान उनसे जुड़े, जिन्हें अविनाश कुमार औषधीय खेती की बारीकियां भी सिखाते हैं और पारंपरिक खेती में ज्यादा मुनाफा कैसे पाया जाए इस बारे में भी सलाह देते हैं।

जल्द ही शुरू करेंगे एक्सपोर्ट का काम

अविनाश कुमार ने बताया कि 2019 से वे इन औषधीय पौधों को एक्सपोर्ट करेंगे। अमेरिका और खाड़ी देशों में इन जड़ी-बूटियों की बड़ी मांग है।

अासान नहीं रहा सफर

जब उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़कर औषधीय पौधों की खेती के बारे में सोचा तो लोगों ने हतोत्साहित भी किया, डराया और आज भी डराते हैं कि इस काम में नुकसान होगा। इसके बावजूद अविनाश कुमार डटे रहे।

भारत सरकार के कृषि विश्वविद्वालयों के वैज्ञानिकों ने उनका मार्गदर्शन किया। जिसके बाद अपनी मेहनत से उन्होंने आैषधियों की खेती को फायदे का सौदा बना दिया। अब वे कई कृषि विद्यालयों में लेक्चर देने भी जाते हैं।

क्या आप की किस्मत में लिखा है अमीर बनना,ऐसे करें पता

दुनिया भर में हुई स्टडीज बताती हैं कि अमीर बनना किस्‍मत से ज्‍यादा मेह‍नत और स्ट्रैटजीस का खेल है। डैन शावबेल के मुताबिक, अमीर और सफल लोगों में कुछ खास आदतें होती हैं। यह बात अमेरिका में कराए गए एक सर्वे में भी सही साबित हुई है।

अमेरिका में अमीर बने करीब 77 फीसदी लोग ऐसे थे, जिनका संबंध मिडिल क्‍लास या लोअर मिडिल क्‍लास से था। वहीं 19 फीसदी ऐसे लोग थे, जिन्होंने गरीबी में अपना बचपन गुजारा था। मतलब साफ है कि ज्‍यादातर लोगों को अमीरी विरासत में नहीं मिली, बल्‍कि किसी न किसी खास क्‍वालिटी के जरिए वह सफल और अमीर बने।

अमीरों में होती हैं कुछ खास आदतें

शावबेल के मुताबिक, अमीरों में कुछ खास आदतें होती हैं। उन्‍होंने इस बारे में एक ब्‍लॉग भी लिखा है। उन्‍होंने हर अमीर और सफल व्‍यक्ति में कुछ खास बातें नोटिस की हैं।

आइए जानते हैं इन्‍हीं खास बातों के बारे में। आप भी पढ़कर जान सकते हैं कि अमीर बनने की क्‍वालिटी आप में है या नहीं। अगर आप में ये क्वालिटी हैं तो आपके भी अमीर बनने के पूरे चांस हैं। भले ही आप किसी भी हालात में पल या बढ़ रहे हों, क्‍योंकि अमीरी पैतृक नहीं होती है।

चांद-तारे तोड़ने वाले सपने नहीं देखना

अमीर सपने दखते हैं लेकिन हवा में नहीं। उनके सपने चांद तारे तोड़ने वाले नहीं होते हैं, बल्कि हकीकत के करीब होते हैं। उनका गोल तय होता है। वे रोज सुबह उठते हैं और पूरे दिन के लिए उनके पास पहले से ही प्‍लान होता है। वह प्‍लान उनके पहले से ही तय गोल को पूरा करने का होता है।

असफलता से नहीं घबराना

अमीर बनने का पहला लक्षण। अमीर और सफल लोगों को यह पता होता है कि असफलता दरअसल निराशा में नहीं डुबोती, बल्कि आपको सफलता की राह सिखाती है।  आप जान चुके होते हैं कि जिस रास्‍ते पर दरअसल आप थे वह सही नहीं था। इससे आपको बेहतर फैसले लेने की ताकत मिलती है।

किस्‍मत से ज्‍यादा अपने पर भरोसा

उन्‍हें पता होता है कि वह अपनी किस्‍मत खुद लिखेंगे, किसी के भरोसे जीवन की राह नहीं निकलेगी।  वे अपने आपको कल से आगे रखने के लिए रोज कुछ न कुछ नया ट्राई करते हैं।

खुद के लिए जवाबदेह

अमीर बनने वालों में एक और खास बात यह होती है कि वे खुद के लिए जवाबदेह होते हैं। किसी मुश्किल का खुद हल निकालते हैं। अगर कोई गलती करते हैं तो वो उसकी जिम्‍मेदारी लेते हैं। साथ ही इस बारे में भी सोचना शुरू कर देते हैं कि आगे कैसे बढ़ना है

अपनी बात को रखने का हुनर

अमीर बनने वालों में यह सबसे बड़ी क्‍वालिटी होती है कि उन्‍हें अपनी बात कहना आती है।  उन्‍हें पता होता है कि आप किसी बात पर नाराज होंगे और किस बात पर खुश। वह आपके हिसाब से बात करते हैं। यही कारण है कि वे अपने पेशे में सफलता की सीढ़ी तेजी के साथ चढ़ते हैं।

कभी ईंट ढोकर चलाते थे घर, अब सालाना कमा रहे 5 लाख रु., इनके संघर्ष पर इंग्लैंड में लिखी जा रही किताब

यह कहानी बिहार के एक किसान मो. इरफान की है। इनके पास पांच एकड़ जमीन थी लेकिन वह उपजाऊ नहीं थी। घर चलाने के लिए ईंट-भट्‌ठा पर मजदूरी करते थे। गाय पालकर व दूध बेचकर किसी तरह परिवार चलाते थे। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए।

उनसे मो. इरफान ने वर्मी कंपोस्ट बनाने के बारे में जानकर इसपर काम शुरू कर दिया। पहले ही साल उन्होंने 2 लाख रु. कमाए। इसके बाद उन्होंने 5 एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी। अब इरफान सालाना पांच लाख रु. कमा रहे हैं।

इरफान पर बनी फिल्म देख इंग्लैंड से चले आए वैज्ञानिक

अब दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग ने इरफान पर शार्ट फिल्म बनाई। इस फिल्म को देखकर इंग्लैंड से वैज्ञानिकों की टीम इनकी खेती का तरीका देखने इनके गांव आ पहुंची। वर्मी कंपोस्ट प्लांट का विजिट किया। अब ये टीम इनकी सफलता की कहानी किताबों के पन्नों पर उतार रही है।

सफलता से हौसला बढ़ा, केले व मक्के की भी शुरू की खेती

मो. इरफान ने बताया, आमदनी नहीं होने के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहा था। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए तो उनसे वर्मी कंपोस्ट बनाना सीखा।

पूरी मेहनत के साथ वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया। सफलता मिलने लगी तो हौसला बढ़ा और केले व मक्के की खेती भी शुरू की। आज मेरे बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रहे हैं। पैसे जमा कर पांच एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर दी। अब तो गांव के कई किसान भी यह खेती शुरू कर चुके हैं।

जैविक खाद बनाने के साथ ही केंचुआ की भी कर रहे मार्केटिंग

  • माे. इरफान वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाने के साथ ही केंचुए की भी मार्केटिंग कर रहे हैं। सूबे के करीब 50 किसानों को केंचुआ मुहैया करा रहे हैं। 12 सदस्यों के समूह को ऑर्गेनिक खेती के लिए जागरूक किया है।
  • हर सदस्य 12 किसानों को यह टेक्निक सिखा रहे हैं। केंचुए से होने वाले फायदे बता रहे हैं। एक माह में 400 केजी तक केंचुआ बेचकर करीब 1 लाख तक कमा लेते हैं।

Google की नौकरी छोड़ बेचना शुरू किया समोसा, कर रहा है 50 लाख तक की कमाई

आईटी फील्ड में काम करने वाले किसी भी शख्स से पूछ लीजिए, गूगल जैसी कंपनी में काम करना उसका सपना होगा. गूगल में नौकरी करने का मतलब है पूरी जिंदगी शान और आराम से जीना. गूगल के एम्प्लॉई की सैलरी की शायद आप कल्पना न कर सकें, क्योंकि ये कंपनी फ्रैशर्स को भी करोड़ों का पैकेज ऑफर कर देती है.

लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने गूगल की अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी वह भी समोसे बेचने के लिए. ऐसे इंसान को भले ही लोग बेवकूफ कह दें, लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ एक साल में ही उनका टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा हो गया तो शायद लोगों को अपनी राय बदलनी पड़ जाए. यहां हम बात कर रहे हैं ‘द बोहरी किचन’ के मालिक ‘मुनाफ कपाड़िया’ की.

समोसा बेचने के लिए छोड़ी गूगल की नौकरी

सुनकर थोड़ा अजीब जरूर लगेगा कि समोसा बेचने के लिए कोई शख्स गूगल की नौकरी कैसे छोड़ सकता है, लेकिन ये सच है. मुनाफ कपाड़िया ने समोसे बेचने के लिए गूगल की मोटो पैकेज की नौकरी छोड़ दी. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, समोसा भी बेचा तो इस तरह कि अपनी कंपनी का सालाना टर्नओवर 50 लाख पहुंच दिया.

इस आइडिया के बाद शुरू की कंपनी

मुनाफ भारत में ‘द बोहरी किचन’ नाम का रेस्‍टोरेंट चलाते हैं. मुनाफ बताते हैं कि उनकी मां नफीसा टीवी देखने की काफी शौकीन हैं और टीवी के सामने काफी वक्त बिताया करती थीं. उन्हें फूड शो देखना काफी पसंद था और इसलिए वह खाना भी बहुत अच्छा बनाती थीं. मुनाफ को लगा कि वह अपनी मां से टिप्स लेकर फूड चेन खोलेंगे.

ट्रेडमार्क है समोसा

मुनाफ का द बोहरी किचन न सिर्फ मुंबई बल्कि देशभर में मशहूर है. मुनाफ के रेस्टोरेंट में सिर्फ समोसे ही नहीं मिलते. हां समोसा उनका ट्रेडमार्क जरूर है. दरअसल, मुनाफ जिस दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं उनकी डिशेज काफी शानदार होती हैं.अभी उनके रेस्टोरेंट को खुले सिर्फ एक साल हुआ है और उनका टर्नओवर 50 लाख पहुंच गया है. मुनाफ इसे अगले कुछ सालों में 3 से 5 करोड़ तक पहुंचाना चाहते हैं.

हर महीने करते हैं लाखों रुपए की कमाई

बीते दो साल में ही रेस्तरां का टर्नओवर 50 लाख रुपए तक पहुंच गया है. “द बोहरी किचन” को अपने लजीज खाने के लिए कई सेलेब्स द्वारा भी तारीफ मिल चुकी है. आशुतोष गोवारिकर और फराह खान जैसी मशहूर हस्तियां भी “द बोहरी किचन” के लजीज खाने का लुत्फ उठा चुके हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तारीफ भी कर चुके हैं.

राजस्थान के किसान ने अपने गांव को बना दिया मिनी इजरायल , सालाना 1 करोड़ की कमाई

खेती किसानी के मामले में इजरायल को दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। वहां रेगिस्तान में ओस से सिंचाई होती है, दीवारों पर गेहूं, धान उगाए जाते हैं, भारत के लाखों लोगों के लिए ये एक सपना ही है। इजरायल की तर्ज पर राजस्थान के एक किसान ने खेती शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर सुन कर आप उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे।

दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर राजस्थान के जयपुर जिले में एक गांव है गुड़ा कुमावतान। ये किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) का गांव है। खेमाराम ने तकनीकी और अपने ज्ञान का ऐसा तालमेल भिड़ाया कि वो लाखों किसानों के लिए उदाहरण बन गए हैं। आज उनका मुनाफा लाखों रुपए में है। खेमाराम चौधरी ने इजरायल के तर्ज पर चार साल पहले संरक्षित खेती (पॉली हाउस) करने की शुरुआत की थी। आज इनके देखादेखी आसपास लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं, लोग अब इस क्षेत्र को मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम अपनी खेती से सलाना एक करोड़ का टर्नओवर ले रहे हैं।

सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मिला मौका

राजस्थान के जयपुर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर गुड़ा कुमावतान गांव है। इस गाँव के किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) को सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मौका मिला। इजरायल से वापसी के बाद इनके पास कोई जमा पूंजी नहीं थी लेकिन वहां की कृषि की तकनीक को देखकर इन्होंने ठान लिया कि उन तकनीकाें को अपने खेत में भी लागू करेंगे।

सरकारी सब्सिडी से लगाया पहला पॉली हाउस

चार हजार वर्गमीटर में इन्होने पहला पॉली हाउस सरकार की सब्सिडी से लगाया। खेमाराम चौधरी गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “एक पॉली हाउस लगाने में 33 लाख का खर्चा आया, जिसमे नौ लाख मुझे देना पड़ा जो मैंने बैंक से लोन लिया था, बाकी सब्सिडी मिल गयी थी। पहली बार खीरा बोए करीब डेढ़ लाख रूपए इसमे खर्च हुए।

चार महीने में ही 12 लाख रुपए का खीरा बेचा, ये खेती को लेकर मेरा पहला अनुभव था।” वो आगे बताते हैं, “इतनी जल्दी मै बैंक का कर्ज चुका पाऊंगा ऐसा मैंने सोचा नहीं था पर जैसे ही चार महीने में ही अच्छा मुनाफा मिला, मैंने तुरंत बैंक का कर्जा अदा कर दिया। चार हजार वर्ग मीटर से शुरुआत की थी आज तीस हजार वर्ग मीटर में पॉली हाउस लगाया है।”

मिनी इजरायल के नाम से मशहूर है क्षेत्र

खेमाराम चौधरी राजस्थान के पहले किसान थे जिन्होंने इजरायल के इस माडल की शुरुआत की थी। आज इनके पास खुद के सात पॉली हाउस हैं, दो तालाब हैं, चार हजार वर्ग मीटर में फैन पैड है, 40 किलोवाट का सोलर पैनल है। इनके देखादेखी आज आसपास के पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं।

इस जिले के किसान संरक्षित खेती करके अब अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। पॉली हाउस लगे इस पूरे क्षेत्र को लोग अब मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम का कहना है, “अगर किसान को कृषि के नये तौर तरीके पता हों और किसान मेहनत कर ले जाए तो उसकी आय 2019 में दोगुनी नहीं बल्कि दस गुनी बढ़ जाएगी।”

मुनाफे का सौदा है खेती

अपनी बढ़ी आय का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “आज से पांच साल पहले हमारे पास एक रुपए भी जमा पूंजी नहीं थी, इस खेती से परिवार का साल भर खर्चा निकालना ही मुश्किल पड़ता था। हर समय खेती घाटे का सौदा लगती थी, लेकिन जबसे मैं इजरायल से वापस आया और अपनी खेती में नये तौर-तरीके अपनाए, तबसे मुझे लगता है खेती मुनाफे का सौदा है, आज तीन हेक्टयर जमीन से ही सलाना एक करोड़ का टर्नओवर निकल आता है।”

खेमाराम ने अपनी खेती में 2006-07 से ड्रिप इरीगेशन 18 बीघा खेती में लगा लिया था। इससे फसल को जरूरत के हिसाब से पानी मिलता है और लागत कम आती है। ड्रिप इरीगेशन से खेती करने की वजह से जयपुर जिले से इन्हें ही सरकारी खर्चे पर इजरायल जाने का मौका मिला था जहाँ से ये खेती की नई तकनीक सीख आयें हैं।

इजरायल मॉडल पर खेती करने से दस गुना मुनाफा

जयपुर जिले के बसेड़ी और गुढ़ा कुमावतान गाँव के किसानों ने इजरायल में इस्तेमाल होने वाली पॉली हाउस आधारित खेती को यहां साकार किया है। नौवीं पास खेमाराम की स्तिथि आज से पांच साल पहले बाकी आम किसानों की ही तरह थी। आज से 15 साल पहले उनके पिता कर्ज से डूबे थे। ज्यादा पढ़ाई न कर पाने की वजह से परिवार के गुजर-बसर के लिए इनका खेती करना ही आमदनी का मुख्य जरिया था। ये खेती में ही बदलाव चाहते थे, शुरुआत इन्होने ड्रिप इरीगेशन से की थी। इजरायल जाने के बाद ये वहां का माडल अपनाना चाहते थे।

कृषि विभाग के सहयोग और बैंक के लोंन लेने के बाद इन्होने शुरुआत की। चार महीने में 12 लाख के खीर बेचे, इससे इनका आत्मविश्वास बढ़ा। देखते ही देखते खेमाराम ने सात पॉली हाउस लगाकर सलाना का टर्नओवर एक करोड़ का लेने लगे हैं। खेमाराम ने बताया, “मैंने सात अपने पॉली हाउस लगाये और अपने भाइयों को भी पॉली हाउस लगवाए, पहले हमने सरकार की सब्सिडी से पॉली हाउस लगवाए लेकिन अब सीधे लगवा लेते हैं, वही एवरेज आता है, पहले लोग पॉली हाउस लगाने से कतराते थे अभी दो हजार फाइलें सब्सिडी के लिए पड़ी हैं।”

इनके खेत में राजस्थान का पहला फैन पैड

फैन पैड (वातानुकूलित) का मतलब पूरे साल जब चाहें जो फसल ले सकते हैं। इसकी लागत बहुत ज्यादा है इसलिए इसकी लगाने की हिम्मत एक आम किसान की नहीं हैं। 80 लाख की लागत में 10 हजार वर्गमीटर में फैन पैड लगाने वाले खेमाराम ने बताया, “पूरे साल इसकी आक्सीजन में जिस तापमान पर जो फसल लेना चाहें ले सकते हैं, मै खरबूजा और खीरा ही लेता हूँ, इसमे लागत ज्यादा आती है लेकिन मुनाफा भी चार गुना होता है।

डेढ़ महीने बाद इस खेत से खीरा निकलने लगेगा, जब खरबूजा कहीं नहीं उगता उस समय फैन पैड में इसकी अच्छी उपज और अच्छा भाव ले लेते हैं।” वो आगे बताते हैं, “खीरा और खरबूजा का बहुत अच्छा मुनाफा मिलता है, इसमें एक तरफ 23 पंखे लगें हैं दूसरी तरफ फब्बारे से पानी चलता रहता है ,गर्मी में जब तापमान ज्यादा रहता है तो सोलर से ये पंखा चलते हैं,फसल की जरूरत के हिसाब से वातावरण मिलता है, जिससे पैदावार अच्छी होती है।”

ड्रिप इरीगेशन और मल्च पद्धति है उपयोगी

ड्रिप से सिंचाई में बहुत पैसा बच जाता है और मल्च पद्धति से फसल मौसम की मार, खरपतवार से बच जाती है जिससे अच्छी पैदावार होती है। तरबूज, ककड़ी, टिंडे और फूलों की खेती में अच्छा मुनाफा है। सरकार इसमे अच्छी सब्सिडी देती है, एक बार लागत लगाने के बाद इससे अच्छी उपज ली जा सकती है।

तालाब के पानी से करते हैं छह महीने सिंचाई

खेमाराम ने अपनी आधी हेक्टेयर जमीन में दो तालाब बनाए हैं, जिसमें बरसात का पानी एकत्रित हो जाता है। इस पानी से छह महीने तक सिंचाई की जा सकती है। ड्रिप इरीगेशन और तालाब के पानी से ही पूरी सिंचाई होती है। ये सिर्फ खेमाराम ही नहीं बल्कि यहाँ के ज्यादातर किसान पानी ऐसे ही संरक्षित करते हैं। पॉली हाउस की छत पर लगे माइक्रो स्प्रिंकलर भीतर तापमान कम रखते हैं। दस फीट पर लगे फव्वारे फसल में नमी बनाए रखते हैं।

सौर्य ऊर्जा से बिजली कटौती को दे रहे मात

हर समय बिजली नहीं रहती है, इसलिए खेमाराम ने अपने खेत में सरकारी सब्सिडी की मदद से 15 वाट का सोलर पैनल लगवाया और खुद से 25 वाट का लगवाया। इनके पास 40 वाट का सोलर पैनल लगा है। ये अपना अनुभव बताते हैं, “अगर एक किसान को अपनी आमदनी बढ़ानी है तो थोड़ा जागरूक होना पड़ेगा।

खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं की जानकारी रखनी पड़ेगी, थोड़ा रिस्क लेना पड़ेगा, तभी किसान अपनी कई गुना आमदनी बढ़ा सकता है।” वो आगे बताते हैं, “सोलर पैनल लगाने से फसल को समय से पानी मिल पाता है, फैन पैड भी इसी की मदद से चलता है, इसे लगाने में पैसा तो एक बार खर्च हुआ ही है लेकिन पैदावार भी कई गुना बढ़ी है जिससे अच्छा मुनाफा मिल रहा है, सोलर पैनल से हम बिजली कटौती को मात दे रहे हैं।”

रोजाना इनके मिनी इजरायल को देखने आते हैं किसान

राजस्थान के इस मिनी इजरायल की चर्चा पूरे राज्य के साथ कई अन्य प्रदेशों और विदेश के भी कई हिस्सों में है। खेती के इस बेहतरीन माडल को देखने यहाँ किसान हर दिन आते रहते हैं। खेमाराम ने कहा, “आज इस बात की मुझे बेहद खुशी है कि हमारे देखादेखी ही सही पर किसानों ने खेती के ढंग में बदलाव लाना शुरू किया है। इजरायल माडल की शुरुआत राजस्थान में हमने की थी आज ये संख्या सैकड़ों में पहुंच गयी है, किसान लगातार इसी ढंग से खेती करने की कोशिश में लगे हैं।”

(साभार-गांव कनेक्शन)

एक माँ ने शुरू क्या अनोखा बिज़नेस, ब्रेस्ट मिल्क को बदल दिया खूबसूरत ज्वेलरी में

बच्चे की आंखें भी नहीं खुलती हैं, वो अपनी मां की छाती से चिकप जाता है और मां उसको स्तनपान कराती है.इस पल और बॉन्ड को और मजबूत करने की कोशिश करते हुए, चेन्नई की प्रीथी विजय , जो एक मां भी हैं, ब्रेस्ट मिल्क को ख़ूबसूरत ज्वेलरी में बदलने का काम कर रहीं हैं, ताकि वो पल और रिश्ता हमेशा के लिए खूबसूरत यादों के रूप में कैद हो जाए.

प्रीथी ने बताया कि कैसे उनके दिमाग में ये विचार आया:

मैं एक कार्यक्रम में गई थी, जहां मां के लिए आयोजित किया गया था. वहां किसी ने पूछा कि क्या यहां कोई ऐसा है, जो इंडिया में ऐसा करता है. मैं पिछले 5 सालों से हस्तशिल्प (handicrafts) बनाने के साथ उसका काम भी करती हूं, और जब मुझे इसके बारे में पता चला तो सबसे पहले मेरे दिमाग में यही ख़्याल आया कि मैं भी ये कर सकती हूं.ब्रेस्ट मिल्क या स्तन का दूध एक खराब होने वाला पदार्थ है, इसलिए ये काम करना बिलकुल भी आसान नहीं था.

‘जब मैंने ये करना शुरू किया, तो मैंने हर प्रकार के प्रिज़र्वेटिव्स का इस्तेमाल किया. लेकिन कुछ महीनों में ही ब्रेस्ट मिल्क का रंग बदल जा रहा था. फिर मैंने कुछ दोस्तों से इसमें मदद मांगी और आखिरकार इसे बरकरार रखने का एक तरीका मिल ही गया.’

जब उनको दूध को संरक्षित रखने का तरीका मिल गया, तब उन्होंने ब्रेस्ट मिल्क, गर्भनाल, बच्चे के बाल और बच्चे के पहले दांत को भी ज्वेलरी बनाने के लिए यूज़ करना शुरू कर दिया.इसी साल मई महीने के बाद से, देश के अलग-अलग राज्यों से हर हफ़्ते इनको कम से कम 12 ऑर्डर मिल चुके हैं. झुमके से लेकर पेंडेंट्स तक, आप जो चाहें और जैसी डिज़ाइन चाहें प्रीथी आपको वो सब बना कर दे सकती हैं.

हर आइटम की कीमत उसको बनाने में इस्तेमाल किये गए मेटेरियल के आधार पर बदलती रहती है. लेकिन इनकी कीमत 1000 से 4000 रुपये के बीच रहती है. उनके पास आने वाले ज़्यादातर ऑर्डर्स उनके Facebook page के माध्यम से आते हैं और लोगों द्वारा भी आते हैं.

प्रीथी, जो खुद एक मां हैं, का मानना है कि इस प्रकार का उपहार दुनिया की हर जगह मां के लिए अनमोल है.वो कहती हैं कि ‘बहुत लोगों के लिए ये ज्वेलरी सोना-चांदी-हीरे से भी ज़्यादा कीमती होती है. बहुत सी मांओं ने ये ज्वेलरी इस लिए बनवाई है कि वो इसे अपने बेटे या बेटी को दे देंगीं, तो कुछ का मानना है कि वो ये अपने बच्चे के लाइफ पार्टनर को देंगी. ये माता-बच्चे के रिश्ते का एक प्रतीक है और ये अनमोल है.’

हमें पूरा यकीन है कि नई मां के लिए इससे अच्छा और बेहतर कोई दूसरा तोहफ़ा हो ही नहीं सकता. और हो भी क्यों न, क्योंकि ये बच्चे को जन्म देने के दौरन होने वाली असहनीय पर सुखद पीड़ा और उसका यादगार अनुभव है, जिसे ही मातृत्व कहा जाता है.

आखिर मिल ही गया वो शख्स जो नाले की गैस से चाय बनाता है ,पीएम मोदी ने किया था खुलासा

रायपुर के श्याम राव शिर्के ने एक ऐसा देसी उपकरण तैयार किया है, जो नदी, नालियों और नालों से निकलने वाली मीथेन गैस को रसोई गैस की तर्ज पर उपयोग करने में मदद करता है। रायपुर में जिस स्थान पर यह उपकरण लगाया गया था, उस घर में लगातार 3 से 4 माह तक एक दर्जन से ज्यादा व्यक्तियों का सुबह का नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन बनाया जाया करता था।

खास बात यह है कि इस उपकरण को तैयार करने वाले श्याम राव सिर्फ 11वीं पास हैं लेकिन हमेशा कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने अपने इस मॉडल का पेटेंट भी करवा लिया है और इसकी सूचना पीएम मोदी तक भी पहुंचा दी है। बता दें कि पीएम ने रायपुर में उनकी तारीफ भी की थी। हम बता रहे हैं यह उपकरण कैसे काम करता है।

कैसे काम करता है उपकरण

  • इस मशीन में प्लास्टिक के तीन ड्रमों को आपस में जोड़ कर उसमें एक वॉल्व लगा दिया जाता है।
  • ये तीनों कंटेनर एक नदी, नाले या नालियों के ऊपर उस स्थान पर रखे जाते हैं, जहां से गंदा पानी गुजरता है।
  • पानी के साथ आ रही गंदगी कंटेनर में न समाए इसलिए उसमें नीचे की तरफ एक जाली लगाई गई है।

  • इस मशीन को ऐसे फिट किया जाता है कि ड्रम में इकट्ठा होने वाली गैस का इतना दबाव बन सके, जिससे वो पाइप लाइन के जरिए उस स्थान पर पहुंच जाए जहां रसोई गैस का चूल्हा रखा है।
  • कंटेनर में इकट्ठा होने वाली गैस की मात्रा नदी-नाले की गहराई, लंबाई और चौड़ाई पर निर्भर करती है।

नालों में लगाया जाएगा…

  • जल्द ही इस उपकरण को रायपुर के कुछ चुनिंदा नालों और नालियों में लगाया जाएगा।
  • छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तैयारी शुरू कर दी हैं।

सरसों के साग को विदेशों में बेच कर लाखों रुपया कमा रहा है पंजाब का यह किसान

अमृतसर के पास वेरका गांव को फतेहपुर शुकराचक से जोड़ने वाली लिंक रोड पर चलते हुए तकरीबन आधे एकड़ में फैले फ़ूड प्रोसेसिंग की एक इकाई गोल्डन ग्रेन इंक को शायद ही कोई नोटिस कर पाता है लेकिन इसने सरसों की पत्तियों से बनने वाली पंजाब की सुप्रसिद्ध व्यंजन – सरसों दा साग की धमक से पंजाब के बाहर ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी हलचल मचा दी है।

इस गोल्डन ग्रेन इंक यूनिट के लिए कच्ची सामग्री की कोई कमी नहीं है। इसकी खरीद आमतौर पर यहां के इच्छुक किसानों से बाजार की खुदरा कीमतों से भी ज्यादा दर पर की जाती है। हालांकि इसे तैयार करने का कार्य इतना आसान नहीं है जितना कि दिखता है, यही वजह है कि इस यूनिट के मालिक 59 साल के जगमोहन सिंह हर वक्त व्यस्त नजर आते हैं। वह ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग और अनाज पिसाई में डिग्री हासिल करने के बाद 1986 में जगमोहन अपने गृह नगर अमृतसर लौटे।

वो मोबाइल फोन पर लगातार किसानों से बात करते रहते हैं जो ज्यादातर गुरदासपुर जिले के आसपास के रहनेवाले हैं। ये किसान उन्हें सरसों के तोड़े जाने की जानकारी देते हैं। इसके बाद उनकी यूनिट में सरसों की पत्तियों की साग तैयार कर, कैन में बंद कर दुबई, इंग्लैंड और यहां तक कि कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भेजा जाता है।

वो अपना कारोबार संपर्क के जरिए करते हैं। वो बताते हैं, ”सरसों पैदा करनेवाले बटाला इलाके के गावों के करीब 30 किसानों से मेरा मौखिक समझौता है। सभी छोटे और सीमांत किसान हैं और उनके पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है।”

हिसार किस्म की औसत ऊपज 80 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि स्थानीय पंजाबी किस्म महज 50 क्विंटल प्रति एकड़ की ऊपज दे पाती है और वो भी दो बार तुड़ाई के बाद। अमृतसर के बाजार में साग की पत्तियों की कीमत घटती-बढ़ती रहती है।

इसलिए अगर अमृतसर के खुदरा बाजार में इसकी औसत दर 7 रुपये प्रति किलो है तो एक एकड़ से किसान को 56,000 रुपये की तक कमाई हो जाती है। लेकिन अगर गोल्डन ग्रेन के लिए दो रुपये ज्यादा मिल रहा है तो कमाई बढ़कर 72,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाती है।

प्राथमिक तौर पर साग के प्रसंस्करण का दो हिस्सा होता है, पहला- अलग करना और दूसरा- उबालना जो कि स्टीम बॉयलर में किया जाता है। एक दिन में दो टन साग तैयार किया जाता है। टिन के जार में पैक रेडी टू ईट यानी तैयार साग में किसी प्रिजर्वेटिव या परिरक्षक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दूसरे उत्पाद के साथ इन जार को नरैन फूड के ब्रांड नाम(जगमोहन के पिता का नाम नरैन सिंह है) के साथ निर्यात कर दिया जाता है।

मार्ग की कठिनाइयां

उन्हें इस बात का अफसोस है कि अमृतसर से कोई कार्गो या मालवाहक विमान नहीं है और जो यात्री विमान यहां से उड़ान भरते हैं उसमें माल ढुलाई के लिए जगह बहुत सीमित होता है। जगमोहन बताते हैं कि उन्होंने मध्य पूर्व के बाजार का अध्ययन किया है और ये पाया कि “अमृतसर से ताजी तोड़ी गई हरी सब्जियों और फल के निर्यात की बड़ी संभावना है।” ”फ्लाइट से अमृतसर से दुबई का रास्ता महज दो घंटे का है, अगर यहां से प्रतिदिन कार्गो या मालवाहक उड़ान की सेवा मिल जाए तो किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ सकता है।”