आखिर मिल ही गया वो शख्स जो नाले की गैस से चाय बनाता है ,पीएम मोदी ने किया था खुलासा

रायपुर के श्याम राव शिर्के ने एक ऐसा देसी उपकरण तैयार किया है, जो नदी, नालियों और नालों से निकलने वाली मीथेन गैस को रसोई गैस की तर्ज पर उपयोग करने में मदद करता है। रायपुर में जिस स्थान पर यह उपकरण लगाया गया था, उस घर में लगातार 3 से 4 माह तक एक दर्जन से ज्यादा व्यक्तियों का सुबह का नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन बनाया जाया करता था।

खास बात यह है कि इस उपकरण को तैयार करने वाले श्याम राव सिर्फ 11वीं पास हैं लेकिन हमेशा कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने अपने इस मॉडल का पेटेंट भी करवा लिया है और इसकी सूचना पीएम मोदी तक भी पहुंचा दी है। बता दें कि पीएम ने रायपुर में उनकी तारीफ भी की थी। हम बता रहे हैं यह उपकरण कैसे काम करता है।

कैसे काम करता है उपकरण

  • इस मशीन में प्लास्टिक के तीन ड्रमों को आपस में जोड़ कर उसमें एक वॉल्व लगा दिया जाता है।
  • ये तीनों कंटेनर एक नदी, नाले या नालियों के ऊपर उस स्थान पर रखे जाते हैं, जहां से गंदा पानी गुजरता है।
  • पानी के साथ आ रही गंदगी कंटेनर में न समाए इसलिए उसमें नीचे की तरफ एक जाली लगाई गई है।

  • इस मशीन को ऐसे फिट किया जाता है कि ड्रम में इकट्ठा होने वाली गैस का इतना दबाव बन सके, जिससे वो पाइप लाइन के जरिए उस स्थान पर पहुंच जाए जहां रसोई गैस का चूल्हा रखा है।
  • कंटेनर में इकट्ठा होने वाली गैस की मात्रा नदी-नाले की गहराई, लंबाई और चौड़ाई पर निर्भर करती है।

नालों में लगाया जाएगा…

  • जल्द ही इस उपकरण को रायपुर के कुछ चुनिंदा नालों और नालियों में लगाया जाएगा।
  • छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तैयारी शुरू कर दी हैं।

12500 रु की नौकरी छोड़ शुरू किया ये बिजनेस, 4 साल में बन गया करोड़पति

सपने देखने वालों को ही सफलता मिलती है। अच्छी खासी नौकरी छोड़ अपना बिजनेस शुरू करना काफी मुश्किल होता है। कई बार बिजनेस फेल होने का डर होता है। लेकिन जो ऐसा रिस्क उठाने में सक्षम होते हैं, उनको बिजनेस में सफलता जरूर मिलती है।

कोलकाता के रहने वाले पंकज मालू की कहानी कुछ ऐसी ही है। सीए की नौकरी छोड़ दोस्त से कंप्यूटर उधार लेकर बिजनेस शुरू किया और महज 4 साल में यह शख्स करोड़पति बन गया। उनकी कंपनी में 100 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं और 500 से ज्यादा क्लाइंट जुड़े हैं।

12500 रु की नौकरी छोड़ की शुरुआत

पंकज मालू ने  बताया कि मिडल क्लास फैमिली में बिजनेस की जगह नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है। परिवार की हालत को देखते हुए उन्होंने स्कूल के दिनों में एक प्राइवेट सीए फर्म में ट्रेनी के रूप में काम करना शुरू किया। यहां उन्हें 300 रुपए महीना स्टाइपिंड मिलता था, जिससे उनका पर्सनल खर्च निकल जाता था।

ग्रैजुएशन करते वक्त उन्होंने सीए कोर्स में दाखिला लिया और 2002 में सीए की पढ़ाई पूरी की। सीए करने के बाद 2003 में एक प्राइवेट फर्म में सीए की नौकरी मिली। जहां उनकी मंथली सैलरी 12,500 रुपए थी। लेकिन अपना खुद का बिजनेस शुरू करने के जुनून में 6 महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी।

आईटी का था जुनून

पंकज ने नौकरी छोड़ने के बाद 2004 में एक सीए फर्म की स्थापना की। एक साल तक काम करने के बाद उनको महसूस हुआ कि यह काम उनकी मंजिल नहीं है। इसलिए वह इससे अलग हो गए। आईटी के प्रति लगाव की वजह से उन्होंने कुछ महीने बाद ग्राफिक डिजाइनिंग फर्म शुरू करने का निर्णय लिया और यहीं से वो सफलता की बुलंदी पर पहुंचे। वह कहते हैं कि उनके पिता उनके मेंटर रहे हैं।

दोस्त से उधार लिया कंप्यूटर

पंकज ने कहा कि कंपनी शुरू करने के लिए उन्होंने दोस्त से कंप्यूटर उधार लिया। उस वक्त कंप्यूटर खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। 2005 में मैंने अपने दोस्त नितिश थापा की मदद से क्रिएटिव फिंगर्स की नींव रखी। लेकिन अभी भी मुसीबत खत्म नहीं हुई थी। कंपनी शुरू करने के लिए एक जगह की जरूरत थी। लेकिन इसका हल उनके एक दोस्त ने निकाला और बिना किराए का एक ऑफिस दिया।

650 रुपए का मिला पहला ऑर्डर

उनका सपना साकार तो हुआ, लेकिन बिजनेस जनरेट करना बड़ी चुनौती थी। कंपनी शुरू होने के एक हफ्ते बाद ही उनको पहला ऑर्डर मिला, लेकिन वह सिर्फ 10 डॉलर (650 रुपए) का था। इसके बाद उन्होंने खूब जोरशोर से कंपनी का ऑनलाइन प्रोमोशन किया। दिन रात एक करने के बाद उनको सफलता मिली और पहले साल कंपनी का टर्नओवर 4 लाख रुपए पर पहुंचा और 100 क्लाइंट उनकी कंपनी से जुड़े।

4 साल में टर्नओवर करोड़ के पार

पंकज ने बताया कि धीरे-धीरे काम बढ़ता गया और कंपनी में लोग जुड़ते गए। 2009 में कंपनी का टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए रहा। फॉरेन क्लाइंट्स की संख्या बढ़ने की वजह से ऐसा हुआ, लेकिन 2009-10 में मंदी का वक्त हमारे के लिए काफी मुश्किल भरा था। 2012 में धीरे-धीरे बिजनेस में सुधार आना शुरू हुआ और 2014-15 में 25 फीसदी की तेजी आई।

2016-17 में कंपनी का टर्नओवर 5 करोड़ रुपए हो गया। आज उनकी कंपनी में 100 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं और 500 से ज्यादा क्लाइंट जुड़े हैं। पंकज का कहना है कि कंपनी का टर्नओवर 20 करोड़ रुपए करना लक्ष्य है। साथ ही वह कंपनी का 10 फीसदी इक्विटी बेचना चाहते हैं और बिजनेस विस्तार के लिए 2 करोड़ रुपए जुटाना चाहते हैं।

12वीं में फेल हो जाने के बाद गूगल से पूछता था ‘क्या करूं’, बना करोड़पति

आज हम एक लड़के के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने 12वीं कक्षा भी पास नहीं की है, लेकिन अपने स्टार्टअप के जरिए 24 साल की उम्र में वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसे हासिल करने में सालों लग जाते हैं. हम बात कर रहे हैं ऋषभ लवानिया की. ऋषभ की उम्र अभी सिर्फ 24 साल है. वह इन दिनों साउथ अफ्रीका के केपटाउन शहर में अपना बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं.

ऋषभ एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखते हैं. वह अपने पिता की तरह सिविल इंजीनियरिंग में करियर बनाना चाहते थे, लेकिन 12वीं में फेल हो जाने के बाद उन खुद का बिजनेस शुरु करने के बारे में सोचा. जब ऋषभ 17 साल के थे उस वक्त में अपना पहला स्टार्टअप “रेड कार्पेट” शुरू कर चुके थे और बाकी जगह भी कुछ बेहतर करने के बारे में सोच रहे थे. ऋषभ ने बताया 12वीं कक्षा में फेल होने के बाद मैंने गूगल से काफी मदद ली. अक्सर गूगल पर ”12वीं में फेल होने के बाद क्या बेहतर ऑप्शन है” सर्च किया करता था.

अपनी कड़ी मेहनत की वजह से आज ऋषभ Weetracker मीडिया कंपनी के फाउंडर और सीईओ हैं. WeeTracker अफ्रीकी टेक इकोसिस्टम को समर्पित एक वैश्विक तकनीक मीडिया है. इसका मकसद महाद्वीप में तीन तरह से समग्र रूप से शुरुआत करना है. सूचित करना, शिक्षित करना और निवेश करना.

ऋषभ ने बताया, अफ्रीका एक तकनीकी क्रांति के दौर से गुजर रहा है. जैसे 1990 के दशक के उत्तरार्ध में और 2000 के दशक के शुरुआती दिनों में भारत हुआ करता था. इसी दौर से निपटने के लिए WeeTracker की शुरुआत की गई है.

बता दें, साल 2015 में ऋषभ जब अमेरिका में थे तब उनकी मुलाकात केशू दुबे से हुई. यहां से ही उनकी एक निवेशक के रूप में अपनी यात्रा शुरू की. जहां से उन्हें भारत, चीन, अमेरिका और जापान में स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्र की समझ हुई.

ऋषभ ने WeeTracker की प्लानिंग के बारे में बताते हुए कहा अभी मेरे पास 25 से 30 प्री-सीरीज ए और सीरीज ए के अफ्रीकी उद्यमियों की एक सूची है जो कि उद्यमिता सीखने के लिए भारत आने में रुचि रखते हैं. हम भारत, चीन, अमेरिका और जापान में मेंटर, उद्यमियों और उत्पाद प्रबंधक के नेटवर्क का निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं. बता दें,

आज ऋषभ बिजनेसमैन में गिने जाते हैं उन्होंने दिखा दिया सफलता हासिल जरूरी नहीं स्कूल में अच्छा रिजल्ट ही हासिल किया हो. आप जमकर मेहनत करें सफलता आपके कदमों में होगी.

कभी 350 रु दिहाड़ी कमाने वाला भारतीय, ऐसे बन गया 18 करोड़ का मालिक

चाय बेचकर प्रधानमंत्री बनने के किस्से आपने अकसर सुने होंगे, लेकिन क्या आपने कभी किसी भारतीय के विदेश में चाय बेचकर करोड़पति बनते देखा या सुना है। शायद नहीं। लेकिन 39 वर्षीय केरल निवासी रूपेश थॉमस लंदन में चाय बेचकर करोड़पति बन गए हैं।

उन्होंने लंदन में ‘टुक टुक चाय’ नाम से बिजनेस शुरू किया, जिसका मार्केट वैल्यू 18 करोड़ रुपए हो गया है। वो रेडी ब्रूड चाय बेचते हैं। उनकी चाय की सप्लाई लंदन की लग्जरी डिपार्टमेंटल स्टोर हार्वे निकोल्स में हो रही है।

सपने को दिया पंख

केरल में जन्मे रूपेश का बचपन गरीबी में गुजरा। उनके परिवार में अकसर पैसे की दिक्कत होती थी। वित्तीय परेशानियों के बावजूद रूपेश ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी से  इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। उनको विदेश में नौकरी करने का सपना था। सपने को पूरा करने के लिए साल 2002 उम्र में 795 डॉलर यानी करीब 55 हजार रुपए लेकर लंदन पहुंच गए।

मैकडॉनल्ड्स में की नौकरी

लंदन पहुंचने के बाद रूपेश को मैकडॉनल्ड्स में नौकरी मिली। लंदन में काम को लेकर उत्साहित रूपेश को यह नौकरी अच्छी लगी। यहां उनको 5.30 डॉलर प्रति घंटे के हिसाब से पेमेंट मिलती थी। एक हफ्ते के अंदर उन्होंने दूसरा पार्ट टाइम जॉब ढूंढ लिया, जो डोर-टू-डोर सेल्समैन का था।

ऐसे आया चाय बेचने का आइडिया

दिसंबर 2014 में अपनी पत्नी अलेक्जेंडर के साथ स्वदेश लौटे रूपेश को अपने गांव से चाय बेचने का आइडिया मिला। रूपेश की पत्नी को दूध वाली चाय अच्छी लगी। यहीं रूपेश को टुक टुक चाय का बिजनेस शुरू करने का आइडिया आया।

करीब 2 लाख डॉलर से शुरू किया बिजनेस

रूपेश ने 2 लाख डॉलर से अपने बिजनेस की शुरुआत की। उन्होंने अपनी बचत पूंजी बिजनेस शुरू करने में लगा दिया।

मेहनत से मिली सफलता

रूपेश का कहना है कि मैंने लंदन में चाय बिजनेस पर एक दांव लगाया था। जिसमें उनको सफलता मिली। रूपेश के मुताबिक, अमीर बनने के पीछे कोई मैजिक फॉर्मूला नहीं है। मैंने यह सफलता मेहनत और लगन से पाई है। मेरे अंदर सफल बनने की भूख है और मैंने इसे हासिल में कोई कसर नहीं छोड़ी।

नौकरी छोड़ शुरु किया केला चिप्स का बिज़नेस, सिर्फ 3 महीने में कमाए 4 लाख रुपये

ये हैं दो दोस्त, दीपक और अभिनव। कुछ करना चाहते थे। इसलिए एक ने देश तो दूसरे ने विदेश में मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़ दी। बुरहानपुर में खुद का केला चिप्स का उद्योग खोला। तीन महीने में ही इनकी केला चिप्स इंडिया मार्ट और अमेजन जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर बिकने लगी।

चटपटे, कुरकुरे और लजीज स्वाद के कारण इसकी देश-विदेश में मांग बढ़ रही है। गुजरात, लखनऊ, रायपुर और इंदौर में अपनी छाप छोड़ने के बाद केला चिप्स की डिमांड अमेरिका से भी आई है। यहां पहली खेप के रूप में 16 टन चिप्स भेजने की तैयारी है। एक सप्ताह बाद ओएलएक्स और फ्लिप कार्ट पर चिप्स के साथ केले का आटा भी बिकने लगेगा। इसके लिए शहर की ओएमजी केला वेफर्स कंपनी ने रजिस्ट्रेशन कराया है।

31 साल के अभिनव खेमरिया नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की आईआईएल में दो साल तक मार्केटिंग मैनेजर रहऔर 33 साल के दीपक शर्मा ने केन्या के नैरोबी में एक पम्प कंपनी में बतौर रीजनल मैनेजर काम किया। कंपनी शुरू करने को तीन महीने हुए हैं। इस अवधि में दोनों चार लाख रुपए का प्रॉफिट निकाल चुके हैं।

18 अलग-अलग स्वाद में है केला चिप्स

अभिनव और दीपक ने केला चिप्स के अलग-अलग फ्लेवर बनाने का तरीका इंटरनेट से सिखा। अब वे टोमेटो, कुरकुरे, पुदीना, क्रिम एन ओनियन, चॉकलेट, जलजीरा, मिर्च मसाला, फलाहारी, काली मिर्च, चीज, मंचूरियन, क्रिमी चीज, नाचोज, लाइम एन चिली, शेजवान, जैन पिक्स, कच्ची कैरी फ्लेवर में केला चिप्स बना रहे हैं।

सीड ट्रे ने बदली 15000 महीना नौकरी करने वाले की लाइफ ,अब हर महीने कमाता है 2 लाख

खेती-बाड़ी से जुड़कर कमाई करने के अनेक विकल्प मौजूद हैं। बस जरूरत है अवसर पहचानने और उस पर अमल करने की। किसानों को बेहतर उपज के लिए अच्छेे बीज की जरूरतों को देखते हुए महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले अजिंक्य अशोकराव पिसल को इस क्षेत्र में एक अवसर दिखा और उन्होंने सीड ट्रे बनाने का बिजनेस शुरू किया।

उनके बिजनेस की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज चार साल में ही उन्होंने 1.25 करोड़ रुपए की कंपनी खड़ी कर दी। कभी 15 हजार की नौकरी करने वाले अजिंक्य आज हर महीने 2 लाख रुपए से ज्यादा की इनकम कर रहे हैं।

15 हजार की नौकरी छोड़ी

अजिंक्य ने बताया कि हॉर्टिकल्चर में MSc करने के बाद उन्होंने बेंगलुरू की एक कंपनी में किया, जो सीड ट्रे मैन्युफैक्चर करती थी। इस दौरान उन्होंने सीड्स ट्रे मैन्युफैक्चरिंग के बारे में सीखने के साथ उसमें कोको-पिट भरने, ट्रांसप्लांटिंग और गार्डनिंग के बारे में जाना। इस ट्रे को दोबारा यूज किया जा सकता है।

यहां से आइडिया मिलने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी। नौकरी के दौरान उनको 15,000 रुपए सैलरी मिलती थी। नौकरी छोड़ने के बाद सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रोग्राम एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स में दो महीने की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जेपी नेचर केअर की नींव रखी।

क्या है सीड ट्रे की खासियत

सीड ट्रे की खासियत यह है कि इसमें पौधे की अच्छी ग्रोथ होती है। सीड ट्रे में बीज को प्लांट करने के बाद पौधे जल्दी विकसित होते हैं और फिर इसे खेतों में ट्रांसप्लांट करना आसान होता है। तेज धूप या बारिश में बीज के नष्ट होने खतरा नहीं होता है। सीड ट्रे में तैयार हुए पौधे की जड़ मजबूत होती है और उपज बेहतर होती है।

30 लाख रुपए में शुरू हुआ कारोबार

अजिंक्य ने बताया कि सीड ट्रे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने में 30 लाख रुपए का निवेश लगा। उन्होंने 15 लाख रुपए बैंक ऑफ महाराष्ट्र से लोन लिया। जिस पर उन्होंने नाबार्ड से 36 फीसदी सब्सिडी मिली। बाकी की रकम उन्होंने खुद से निवेश की, जो करीब 12 से 13 लाख रुपए थी।

4 साल में खड़ा किया 1.25 करोड़ का कारोबार

लोगों में जागरूकता बढ़ने से उनके बिजनेस को सफलता मिली है। उनकी कंपनी दो तरह की सीड ट्रे का निर्माण करती है, जिसे दोबारा उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने 2014 में सीड ट्रे बनाने की यूनिट लगाई थी, जिसका सालाना टर्नओवर आज 1.25 करोड़ रुपए हो गया है।

हर महीने हो रही 2 लाख की इनकम

अजिंक्य के मुताबिक, कंपनी के सालाना टर्नओवर पर उनको 20 फीसदी का प्रॉफिट मिल जाता है। यानी 1.25 करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर पर सालाना 25 लाख रुपए मुनाफा अर्जित कर रहे हैं। इस हिसाब उनकी मंथली कमाई 2 लाख रुपए से ज्यादा है।

विदेश में कर रहे हैं एक्सपोर्ट

जेपी नेचर केअर देश में महाराष्ट्र के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और बेंगलुरू में सीड ट्रे का बिजनेस कर रहे हैं। वहीं केन्या, जमैका और साउथ अफ्रीका में सीड ट्रे का एक्सपोर्ट करते हैं।

इंजीनियरिंग छोड़ शुरू की जूता पॉलिश, कमाता है 2 करोड़

आपने जूते साफ करने वालों को इंजीनियर और डॉक्टर बनने के किस्‍से आए दिन सुने होंगे। ऐसा ही एक शख्स है जिसने इंजीनि‍यरिंग छोड़ जूता पॉलिश करना शुरू किया। संदीप गजकस ने जब मोची बनने का फैसला लिया तो उनके मां-बाप समेत कोई भी इस फैसले से खुश नहीं था। हालांकि आज उन्‍हें अपने बेटे पर गर्व होता है।

संदीप गजकस आज द शू लॉन्‍ड्री नाम से अपनी शू पॉलिशिंग एंड रिपेयरिंग कंपनी चलाते हैं। कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए से भी ज्‍यादा है। देश के 10 स्‍टेट्स से भी ज्‍यादा में बिजनैस कर रही इनकी कंपनी विदेशों में भी पहुंच चुकी है। संदीप की इस कंपनी से आज फेमस शू ब्रांड नाइके, रिबोक, पुमा, फिला समेत कई बड़ी कंपनियां जुड़ी हुई हैं।

ऐसे शुरू किया शू पॉलिश का बिजनैस शुरू

संदीप गजकस नैशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ फायरिंग इंजीनियरिंग से इंजीनियरिंग कर चुके थे। वह जॉब के लिए गल्‍फ जाने की तैयारी कर रहे थे लेकिन तब ही 2001 में अमरीका पर 9/11 का अटैक हुआ और उन्‍होंने विदेश जाने का प्‍लान ड्रॉप कर दिया। विदेश में नौकरी का प्‍लान ड्रॉप करने के बाद संदीप ने शू पॉलिश का बिजनैस शुरू करने की ठानी।

करीब 12,000 रुपए खर्च कर उन्‍होंने बिजनैस शुरू करने की तैयारी शुरू की। मां-बाप और दोस्‍तों को अपना यूनीक आइडिया समझाने के बाद कुछ महीनों तक संदीप ने खुद जूता पॉलिश की। अपने बाथरूम को वर्कशॉप बनाकर उन्‍होंने शू पॉलिशिंग को लेकर रिसर्च करना शुरू किया। इसके लिए उन्‍होंने अपने दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों के जूते पॉलिश करने का काम किया।

सफल होने के लिए पहले फेल होना सीखा

संदीप ने एक इंटरव्‍यू में बताया था कि वह जूता पॉलिश के बिजनैस को सिर्फ पॉलिश से निकालकर रिपेयरिंग तक ले जाना चाहते थे। ऐसे में उन्‍होंने काफी लंबे समय तक रिसर्च किया। इस दौरान उन्‍होंने लाखों रुपए खर्च किए और फेल होते रहे। संदीप ने बताया, ‘मैं पुराने जूतों को एकदम नया बनाने और उन्‍हें रिपेयर करने के इनो‍वेटिव तरीके ढूंढ रहा था।

मैंने रिसर्च पर सबसे ज्‍यादा समय बिताया और उस रिसर्च के बदौलत ही मैंने फाइन‍ली 2003 में अपना और देश की पहली द शू लॉन्‍ड्री कंपनी शुरू की। मैंने सफल होने के लिए पहले फेल होना सीखा और उन तरीकों को ढूंढा, जो मुझे नहीं करने चाहिए। मुंबई के अंधेरी इलाके में शुरू हुई गजकस की ये कंपनी आज देश के कई शहरों में पहुंच चुकी है।

द शू लॉन्‍ड्री से जुड़कर आप भी कर सकते हैं कमाई

अगर आप बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं, तो शू लॉन्‍ड्री कंपनी आपको इसका मौका दे रही है। संदीप गजकस की कंपनी अपनी फ्रेंचाइजी बेच रही है। मुंबई, पुणे, गोरखपुर समेत कई शहरों में यह कंपनी अपनी फ्रेंचाइजी खोल चुकी है और यह तेजी से अपनी फ्रेंचाइजी बढ़ाना चाहती है।

ऐसे में आपके पास भी कंपनी से जुड़कर कमाई करने का मौका है। 6 से 10 लाख रुपए में कंपनी अपनी फ्रेंचाइजी दे रही है। अगर इस बिजनैस से जुड़ने की तैयारी कर रहे हैं, तो सीधे संदीप से बात की जा सकती है और इसका फायदा उठाया जा सकता है।

मशरुम गर्ल ने उत्तराखंड में ऐसे खड़ी की करोड़ों रुपए की कंपनी, हजारों महिलाओं को दिया रोजगार

हिला किसान की बात करने पर लोगों के जेहन में अभी तक सिर्फ महिला मजदूरों की तस्वीर आती थी, लेकिन कुछ महिलाएं सफल किसान बनकर इस भ्रम को तोड़ रही है। उत्तराखंड की दिव्या रावत मशरूम की खेती से सालाना एक करोड़ से ज्यादा की कमाई करती है, उनकी बदौलत पहाड़ों की हजारों महिलाओं को रोजागार भी मिला है।

दिव्या के सराहनीय प्रयासों के लिए पिछले वर्ष राष्ट्रपति ने इन्हें नारी शक्ति अवार्ड से सम्मानित किया था। दिव्या ने अपनी मेहनत और लगन से असम्भव काम को सम्भव कर दिखाया। पांच वर्ष की इनकी मेहनत से पलायन करने वाले लोगों की संख्या यहां कम हो रही है। दिव्या कई राज्यों के रिसर्च सेंटर से सीखकर मशरुम की खेती यहां की हजारों महिलाओं को सिखा रही हैं। कम पैसे से यहां के लोग कैसे मशरूम की शुरूवात कर सकते हैं इस बात का दिव्या ने खास ध्यान दिया है।

पलायन रोकने के लिए दिल्ली से लौटी उत्तराखंड

उत्तराखंड राज्य के चमोली (गढ़वाल) जिले से 25 किलोमीटर दूर कोट कंडारा गाँव की रहने वाली दिव्या रावत दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रही थी, लेकिन पहाड़ों से पलायन उन्हें परेशान कर रहा था, इसलिए 2013 में वापस उत्तराखंड लौटीं और यहां मशरूम उत्पादन शुरु किया। दिव्या फोन पर गांव कनेक्शन को बताती हैं, “मैंने उत्तराखंड के ज्यादातर घरों में ताला लगा देखा।

चार-पांच हजार रुपए के लिए यहां के लोग घरों को खाली कर पलायन कर रहे थे जिसकी मुख्य वजह रोजगार न होना था। मैंने ठान लिया था कुछ ऐसा प्रयास जरुर करूंगी जिससे लोगों को पहाड़ों में रोजगार मिल सके।” सोशल वर्क से मास्टर डिग्री करने के बाद दिव्या रावत ने दिल्ली के एक संस्था में कुछ दिन काम भी किया लेकिन दिल्ली उन्हें रास नहीं आई।

अब सालाना करोड़ों का टर्नओवर करती है दिव्या की कंपनी

दिव्या रावत ने कदम आगे बढ़ाए तो मेहनत का किस्मत ने भी साथ दिया। वो बताती हैं, “वर्ष 2013 में तीन लाख का मुनाफा हुआ, जो लगातार कई गुना बढ़ा है। किसी भी साधारण परिवार का व्यक्ति इस व्यवसाय की शुरुवात कर सकता हैं । अभी तक 50 से ज्यादा यूनिट लग चुकी हैं जिसमे महिलाएं और युवा ज्यादा हैं जो इस व्यवसाय को कर रहे हैं ।” मशरूम की बिक्री और लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए दिव्या ने मशरूम कम्पनी ‘सौम्या फ़ूड प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी’ भी बनाई है। इसका टर्नओवर इस साल के अंत तक करीब एक करोड़ रुपए सालाना का हो जाएगा।

दिव्या खुद तो आगे बढ़ी ही हजारों और लोगों को मशरूम की खेती के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने लोगों को भी मशरूम का बाजार दिलवाया। पहाड़ों पर मशरुम 150 से 200 रुपये में फुटकर में बिकता है। ये लोग अब सर्दियों में बटन, मिड सीजन में ओएस्टर और गर्मियों में मिल्की मशरूम का उत्पादन करते हैं। बटन मशरूम एक महीने में ओएस्टर 15 दिन में और मिल्की मशरूम 45 दिन में तैयार हो जाता है। दिव्या कहती हैं, “मैंने लोगों को बताने के बजाय खुद करके दिखाया जिससे उनका विश्वास बढ़ा।”

पहाड़ों के जिन घरों में लटके थे ताले अब वहां उग रहे हैं मशरूम

दिव्या बताती हैं, पढ़ाई के दौरान जब कभी वो घर लौटती थीं अधिकांश घरों में ताले लटके मिलते थे। 4000 से 5000 की नौकरी के लिए स्थानीय लोग दिल्ली जैसे शहर भाग रहे थे। दिव्या की बातों में दम भी है। रोजगार के लिए पहाड़ों से पलायन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट की माने तो पिछले 17 वर्षों में करीब 20 लाख लोग उत्तराखंड को छोड़कर बड़े शहरों में रोजी-रोटी तलाश रहे हैं।

दिव्या की बदौलत अब इनमें से हजारों घरों में लोग 10-15 हजार रुपये की कमाई करते हैं। मशरूम ऐसी फसल है जिसमें लागत काफी कम आती है। 20 दिन में उत्पादन शुरु हो जाता है और करीब 45 दिन में ही लागत निकल आती है। दिव्या ने मशरूम की खेती को इतना सरल कर दिया है कि हर व्यक्ति इसे कर सकता है। पहाड़ों की हजारों महिलाएं उगाने लगी हैं मशरुम।

उत्तराखंड सरकार ने बनाया मशरुम की ब्रांड अंबेसडर

उत्तराखंड सरकार ने दिव्या के इस सराहनीय प्रयास के लिए उसे ‘मशरूम की ब्रांड एम्बेसडर’ घोषित किया। दिव्या और उनकी कंपनी अब तक उत्तराखंड के 10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट लगा चुके हैं। एक स्टेंडर्ड यूनिट की शुरुवात 30 हजार रुपये में हो जाती है जिसमे 15 हजार इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च होता है जो दसियों साल चलता है, 15 हजार इसकी प्रोडक्शन कास्ट होती है।

दिव्या कहती हैं, हम लोग, लोगों को रोजगार नहीं देते बल्कि उन्हें सक्षम बनाते हैं गांव-गांव जाकर लोगों को ट्रेनिंग दी है। अब उसका असर नजर आ रहा है लोग भी ये काम करना चाहते हैं। इस साल तक इन यूनिट की संख्या करीब 500 पहुंच जाएगी।”

सड़क पर खुद खड़ी होकर बेचती हैं मशरुम

ब्रांड अम्बेसडर होने के बावजूद वो रोड खड़े होकर खुद मशरूम बेचती हैं, जिससे वहां की महिलाओं की झिझक दूर हो और वो खुद मशरूम बेंच सके। दिव्या का कहना है अभी उत्तराखंड में इतना मशरूम पैदा नहीं हो रहा है कि उसका बाहर निर्यात किया जा सके, यहाँ मशरूम की बहुत खपत है। वो बताती हैं, पहाड़ की महिलाएं बहुत धैर्यवान होती हैं, मशरूम उन्हें धनवान भी बनाएगा।

पिता की तकलीफ देख 13 साल के बच्चे ने खड़ी की कंपनी, 2 साल में 100 करोड़ कमाने का प्लान

पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। मुंबई के 13 साल के एक बच्चे पर यह कहावत सही साबित हुई है। उसने छोटी सी उम्र में न सिर्फ एक कंपनी खड़ी कर दी और 2 साल में 100 करोड़ रुपए कमाने का टारगेट भी तय किया। एक बैंकर को बच्चे का आइडिया इतना शानदार लगा कि वह अपनी नौकरी छोड़कर उसकी कंपनी का सीईओ बनने को भी तैयार हो गया। हम 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले तिलक मेहता की बात कर रहे हैं, जिसने एक लॉजिस्टिक कंपनी ‘पेपर्स एन पार्सल्स’ की स्थापना की।

कैसे मिला बिजनेस आइडिया

मुंबई के सबअर्बन एरिया में रहने वाले तिलक मेहता का कहना है कि उसे बिजनेस शुरू करने का आइडिया अपने पिता से मिला। उसके पिता विशाल मेहता एक लॉजिस्टिक कंपनी में चीफ एक्जक्यूटिव थे। काम से लौटने के बाद उनको थके-हारे देखकर मन उदास हो जाता था। अपने पिता तकलीफों को देख उसे लॉजिस्टिक सेक्टर में बिजनेस शुरू करने का आइडिया मिला।

बच्चे के आइडिया पर बैंकर ने छोड़ी नौकरी

‘पेपर्स एन पार्सल्स’ की शुरुआत करने वाले तिलक ने अपने बिजनेस आइडिया के बारे में एक बैंकर को बताया। बैंकर को उसका आइडिया इतना अच्छा लगा कि उसने अपनी जमी जमाई नौकरी छोड़कर कंपनी का चीफ एग्जीक्यूटिव बनने को तैयार हो गया। साथ ही उसने बिजनेस बढ़ाने की प्लानिंग के तहत डब्बावाला के साथ हाथ मिलाया ताकि पार्सल की डिलीवरी दूरदराज तक पहुंच सके।

4 महीने रिसर्च के बाद शुरू किया बिजनेस

8वीं पास तिलक ने अपने बिजनेस की शुरुआत करने से पहले 4 महीने तक इस पर रिसर्च किया। औपचारिक तौर पर कंपनी को बुधवार को लॉन्च किया गया।

उसके पिता ने भी कंपनी शुरू करने में बेटे का साथ दिया। उन्होंने लॉजिस्टिक सर्विस की जानकारियां तिलक को दीं। उसके पिता विशाल मेहता एक लॉजिस्टिक कंपनी के चीफ एग्जक्यूटिव हैं।

300 डब्बावाला को बनाया पार्टनर

पार्सल की डिलिवरी के लिए तिलक ने 300 डब्बावाला को अपना पार्टनर बनाया और 200 लोगों को काम पर रखा। ‘पेपर्स एन पार्सल्स’ रोजाना 1200 पार्सल्स की डिलीवरी करती है। एप के जरिए कोई भी कस्टमर्स अपना ऑर्डर दे सकता है। सेम-डे डिलीवरी दोपहर 2.30 बजे के पहले हो जाती है।

40 से 180 रुपए पार्सल का है चार्ज

तिलक की लॉजिस्टिक कंपनी 3 किलो पार्सल तक डिलीवरी करती है। कंपनी 40 से 180 रुपए वजन के अनुसार चार्ज करती है।

बैंक की नौकरी छोड़ तिलक की कंपनी के सीईओ बने घनश्याम पारेख ने कहा कि कंपनी का लक्ष्य इंट्रा-सिटी लॉजिस्टिक मार्केट के 20 फीसदी हिस्से पर काबिज होना तथा 2020 तक 100 करोड़ रुपये का रेवेन्यू हासिल करना है।

एक छोटी सी चाय की दुकान चलाता है ये शख्स, फिर भी वाइफ को करा डाली 17 देशों की सैर

भारत में चाय खूब पी जाती है, इसलिए ज्यादातर शहरों में हर चौक-चौराहों पर चाय की दुकान मिल जाती हैं। लेकिन क्या चाय से इतनी कमाई हो सकती है कि कोई अपनी बीवी को 17 देश घुमाकर ले आए। ये सुनने में अजीब लगता है, लेकिन है बिल्कुल सच। केरल के कोच्चि में एक ऐसा ही शख्स है जो वो भी बेहद कम कमाई के बावजूद चाय की दुकान चलाकर अपनी वाइफ के साथ विदेश घूमने जाता है।

कर रहे वर्ल्ड टूर का सपना पूरा

  • कोच्चि के रहने वाले विजयन वहां श्री बालाजी कॉफी हाउस के नाम से एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। 68 साल के हो चुके विजयन करीब 43 साल से ये दुकान चला रहे हैं। छोटी सी दुकान चलाने के बाद भी विजयन अपनी वाइफ मोहना के साथ दुनिया घूमने का अपना सपना पूरा कर रहे हैं। वे अबतक ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, इजिप्ट, यूएई समेत 17 देशों का सफर कर चुके हैं।
  • ऐसा नहीं है कि विजयन किसी करोड़पति परिवार से ताल्लुक रखते हैं, या उनके पास कमाई का कोई और जरिया भी है। लेकिन इसके बाद भी इसी दुकान से होने वाली कमाई के जरिए ही वे अपना वर्ल्ड टूर का सपना पूरा कर रहे हैं।

घूमने के लिए यूं जुटाते हैं पैसा

  • एक छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले शख्स के लिए वाइफ के साथ इतने सारे देश घूमना बिल्कुल भी आसान नहीं होता। लेकिन इस परेशानी का हल भी उन्होंने ढूंढ निकाला। इसके लिए उन्होंने बैंक से लोन लेना शुरू कर दिया।
  • विजयन बैंक से लोन लेकर ये सारी यात्राएं करते हैं। लेकिन बैंक भी लोन तभी देता है, जब उनके पास कुछ रकम जमा हो। इसके लिए वे रोजाना 300 रुपए सेविंग करते हैं। फिर बाकी पैसा लोन के रूप में लेकर विदेश जाते हैं, वहां से वापस आकर दो-तीन साल में धीरे-धीरे लोन चुकाते हैं और अगले सफर की तैयारी करते हैं।
  • बुजुर्ग शख्स का कहना है कि हम लोन लेकर घूमने जाते हैं इसलिए बहुत ही सावधानी के साथ पैसा खर्च करते हैं और बर्बादी बिल्कुल भी नहीं करते। किसी भी जगह पर जाने के बाद वहां से 10 डॉलर (करीब 700 रुपए) से ज्यादा का सामान नहीं खरीदते।

ऐसे लगा था घूमने का शौक

  • विजयन का कहना है कि उन्हें घूमने का शौक बचपन में तब लगा था, जब उनकी उम्र केवल 6 साल की थी। तब उनके पिता उन्हें अलग-अलग जगह पर घूमने ले जाया करते थे। हम मदुराई, पालानी समेत केरल और आसपास के कई राज्यों में घूमे। बाद में इन्हीं यादों ने मुझे अपना सपना पूरा करने के लिए उत्साहित किया।
  • विजयन के मुताबिक पिता के देहांत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई और मैं दुकान संभालने लगा, जिसकी वजह से मेरा घूमना-फिरना बंद हो गया और लाइफ ठहर सी गई। ये दौर कई साल तक चला। लेकिन 1988 में वक्त फिर बदला और मैंने दोबारा घूमना शुरू कर दिया। इस बार से मेरे साथ मेरी वाइफ मोहना भी रहने लगीं। हमारी शादी करीब 43 साल पहले हुई थी।
  • विजयन का कहना है कि एक बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के बाद मैंने कभी इस तरह की लाइफ के बारे में नहीं सोचा था। पहली बार जब मैं विदेश गया था तो मैं बहुत ज्यादा उत्साहित था। मैंने अबतक जितने भी देश देखे हैं, उनमें से स्विटजरलैंड मेरा पसंदीदा देश है।