कभी ईंट ढोकर चलाते थे घर, अब सालाना कमा रहे 5 लाख रु., इनके संघर्ष पर इंग्लैंड में लिखी जा रही किताब

यह कहानी बिहार के एक किसान मो. इरफान की है। इनके पास पांच एकड़ जमीन थी लेकिन वह उपजाऊ नहीं थी। घर चलाने के लिए ईंट-भट्‌ठा पर मजदूरी करते थे। गाय पालकर व दूध बेचकर किसी तरह परिवार चलाते थे। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए।

उनसे मो. इरफान ने वर्मी कंपोस्ट बनाने के बारे में जानकर इसपर काम शुरू कर दिया। पहले ही साल उन्होंने 2 लाख रु. कमाए। इसके बाद उन्होंने 5 एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी। अब इरफान सालाना पांच लाख रु. कमा रहे हैं।

इरफान पर बनी फिल्म देख इंग्लैंड से चले आए वैज्ञानिक

अब दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग ने इरफान पर शार्ट फिल्म बनाई। इस फिल्म को देखकर इंग्लैंड से वैज्ञानिकों की टीम इनकी खेती का तरीका देखने इनके गांव आ पहुंची। वर्मी कंपोस्ट प्लांट का विजिट किया। अब ये टीम इनकी सफलता की कहानी किताबों के पन्नों पर उतार रही है।

सफलता से हौसला बढ़ा, केले व मक्के की भी शुरू की खेती

मो. इरफान ने बताया, आमदनी नहीं होने के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहा था। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए तो उनसे वर्मी कंपोस्ट बनाना सीखा।

पूरी मेहनत के साथ वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया। सफलता मिलने लगी तो हौसला बढ़ा और केले व मक्के की खेती भी शुरू की। आज मेरे बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रहे हैं। पैसे जमा कर पांच एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर दी। अब तो गांव के कई किसान भी यह खेती शुरू कर चुके हैं।

जैविक खाद बनाने के साथ ही केंचुआ की भी कर रहे मार्केटिंग

  • माे. इरफान वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाने के साथ ही केंचुए की भी मार्केटिंग कर रहे हैं। सूबे के करीब 50 किसानों को केंचुआ मुहैया करा रहे हैं। 12 सदस्यों के समूह को ऑर्गेनिक खेती के लिए जागरूक किया है।
  • हर सदस्य 12 किसानों को यह टेक्निक सिखा रहे हैं। केंचुए से होने वाले फायदे बता रहे हैं। एक माह में 400 केजी तक केंचुआ बेचकर करीब 1 लाख तक कमा लेते हैं।

Google की नौकरी छोड़ बेचना शुरू किया समोसा, कर रहा है 50 लाख तक की कमाई

आईटी फील्ड में काम करने वाले किसी भी शख्स से पूछ लीजिए, गूगल जैसी कंपनी में काम करना उसका सपना होगा. गूगल में नौकरी करने का मतलब है पूरी जिंदगी शान और आराम से जीना. गूगल के एम्प्लॉई की सैलरी की शायद आप कल्पना न कर सकें, क्योंकि ये कंपनी फ्रैशर्स को भी करोड़ों का पैकेज ऑफर कर देती है.

लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने गूगल की अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी वह भी समोसे बेचने के लिए. ऐसे इंसान को भले ही लोग बेवकूफ कह दें, लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ एक साल में ही उनका टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा हो गया तो शायद लोगों को अपनी राय बदलनी पड़ जाए. यहां हम बात कर रहे हैं ‘द बोहरी किचन’ के मालिक ‘मुनाफ कपाड़िया’ की.

समोसा बेचने के लिए छोड़ी गूगल की नौकरी

सुनकर थोड़ा अजीब जरूर लगेगा कि समोसा बेचने के लिए कोई शख्स गूगल की नौकरी कैसे छोड़ सकता है, लेकिन ये सच है. मुनाफ कपाड़िया ने समोसे बेचने के लिए गूगल की मोटो पैकेज की नौकरी छोड़ दी. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, समोसा भी बेचा तो इस तरह कि अपनी कंपनी का सालाना टर्नओवर 50 लाख पहुंच दिया.

इस आइडिया के बाद शुरू की कंपनी

मुनाफ भारत में ‘द बोहरी किचन’ नाम का रेस्‍टोरेंट चलाते हैं. मुनाफ बताते हैं कि उनकी मां नफीसा टीवी देखने की काफी शौकीन हैं और टीवी के सामने काफी वक्त बिताया करती थीं. उन्हें फूड शो देखना काफी पसंद था और इसलिए वह खाना भी बहुत अच्छा बनाती थीं. मुनाफ को लगा कि वह अपनी मां से टिप्स लेकर फूड चेन खोलेंगे.

ट्रेडमार्क है समोसा

मुनाफ का द बोहरी किचन न सिर्फ मुंबई बल्कि देशभर में मशहूर है. मुनाफ के रेस्टोरेंट में सिर्फ समोसे ही नहीं मिलते. हां समोसा उनका ट्रेडमार्क जरूर है. दरअसल, मुनाफ जिस दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं उनकी डिशेज काफी शानदार होती हैं.अभी उनके रेस्टोरेंट को खुले सिर्फ एक साल हुआ है और उनका टर्नओवर 50 लाख पहुंच गया है. मुनाफ इसे अगले कुछ सालों में 3 से 5 करोड़ तक पहुंचाना चाहते हैं.

हर महीने करते हैं लाखों रुपए की कमाई

बीते दो साल में ही रेस्तरां का टर्नओवर 50 लाख रुपए तक पहुंच गया है. “द बोहरी किचन” को अपने लजीज खाने के लिए कई सेलेब्स द्वारा भी तारीफ मिल चुकी है. आशुतोष गोवारिकर और फराह खान जैसी मशहूर हस्तियां भी “द बोहरी किचन” के लजीज खाने का लुत्फ उठा चुके हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तारीफ भी कर चुके हैं.

राजस्थान के किसान ने अपने गांव को बना दिया मिनी इजरायल , सालाना 1 करोड़ की कमाई

खेती किसानी के मामले में इजरायल को दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है। वहां रेगिस्तान में ओस से सिंचाई होती है, दीवारों पर गेहूं, धान उगाए जाते हैं, भारत के लाखों लोगों के लिए ये एक सपना ही है। इजरायल की तर्ज पर राजस्थान के एक किसान ने खेती शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर सुन कर आप उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे।

दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर राजस्थान के जयपुर जिले में एक गांव है गुड़ा कुमावतान। ये किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) का गांव है। खेमाराम ने तकनीकी और अपने ज्ञान का ऐसा तालमेल भिड़ाया कि वो लाखों किसानों के लिए उदाहरण बन गए हैं। आज उनका मुनाफा लाखों रुपए में है। खेमाराम चौधरी ने इजरायल के तर्ज पर चार साल पहले संरक्षित खेती (पॉली हाउस) करने की शुरुआत की थी। आज इनके देखादेखी आसपास लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं, लोग अब इस क्षेत्र को मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम अपनी खेती से सलाना एक करोड़ का टर्नओवर ले रहे हैं।

सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मिला मौका

राजस्थान के जयपुर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर गुड़ा कुमावतान गांव है। इस गाँव के किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) को सरकार की तरफ से इजरायल जाने का मौका मिला। इजरायल से वापसी के बाद इनके पास कोई जमा पूंजी नहीं थी लेकिन वहां की कृषि की तकनीक को देखकर इन्होंने ठान लिया कि उन तकनीकाें को अपने खेत में भी लागू करेंगे।

सरकारी सब्सिडी से लगाया पहला पॉली हाउस

चार हजार वर्गमीटर में इन्होने पहला पॉली हाउस सरकार की सब्सिडी से लगाया। खेमाराम चौधरी गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “एक पॉली हाउस लगाने में 33 लाख का खर्चा आया, जिसमे नौ लाख मुझे देना पड़ा जो मैंने बैंक से लोन लिया था, बाकी सब्सिडी मिल गयी थी। पहली बार खीरा बोए करीब डेढ़ लाख रूपए इसमे खर्च हुए।

चार महीने में ही 12 लाख रुपए का खीरा बेचा, ये खेती को लेकर मेरा पहला अनुभव था।” वो आगे बताते हैं, “इतनी जल्दी मै बैंक का कर्ज चुका पाऊंगा ऐसा मैंने सोचा नहीं था पर जैसे ही चार महीने में ही अच्छा मुनाफा मिला, मैंने तुरंत बैंक का कर्जा अदा कर दिया। चार हजार वर्ग मीटर से शुरुआत की थी आज तीस हजार वर्ग मीटर में पॉली हाउस लगाया है।”

मिनी इजरायल के नाम से मशहूर है क्षेत्र

खेमाराम चौधरी राजस्थान के पहले किसान थे जिन्होंने इजरायल के इस माडल की शुरुआत की थी। आज इनके पास खुद के सात पॉली हाउस हैं, दो तालाब हैं, चार हजार वर्ग मीटर में फैन पैड है, 40 किलोवाट का सोलर पैनल है। इनके देखादेखी आज आसपास के पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 200 पॉली हाउस बन गये हैं।

इस जिले के किसान संरक्षित खेती करके अब अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। पॉली हाउस लगे इस पूरे क्षेत्र को लोग अब मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं। खेमाराम का कहना है, “अगर किसान को कृषि के नये तौर तरीके पता हों और किसान मेहनत कर ले जाए तो उसकी आय 2019 में दोगुनी नहीं बल्कि दस गुनी बढ़ जाएगी।”

मुनाफे का सौदा है खेती

अपनी बढ़ी आय का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “आज से पांच साल पहले हमारे पास एक रुपए भी जमा पूंजी नहीं थी, इस खेती से परिवार का साल भर खर्चा निकालना ही मुश्किल पड़ता था। हर समय खेती घाटे का सौदा लगती थी, लेकिन जबसे मैं इजरायल से वापस आया और अपनी खेती में नये तौर-तरीके अपनाए, तबसे मुझे लगता है खेती मुनाफे का सौदा है, आज तीन हेक्टयर जमीन से ही सलाना एक करोड़ का टर्नओवर निकल आता है।”

खेमाराम ने अपनी खेती में 2006-07 से ड्रिप इरीगेशन 18 बीघा खेती में लगा लिया था। इससे फसल को जरूरत के हिसाब से पानी मिलता है और लागत कम आती है। ड्रिप इरीगेशन से खेती करने की वजह से जयपुर जिले से इन्हें ही सरकारी खर्चे पर इजरायल जाने का मौका मिला था जहाँ से ये खेती की नई तकनीक सीख आयें हैं।

इजरायल मॉडल पर खेती करने से दस गुना मुनाफा

जयपुर जिले के बसेड़ी और गुढ़ा कुमावतान गाँव के किसानों ने इजरायल में इस्तेमाल होने वाली पॉली हाउस आधारित खेती को यहां साकार किया है। नौवीं पास खेमाराम की स्तिथि आज से पांच साल पहले बाकी आम किसानों की ही तरह थी। आज से 15 साल पहले उनके पिता कर्ज से डूबे थे। ज्यादा पढ़ाई न कर पाने की वजह से परिवार के गुजर-बसर के लिए इनका खेती करना ही आमदनी का मुख्य जरिया था। ये खेती में ही बदलाव चाहते थे, शुरुआत इन्होने ड्रिप इरीगेशन से की थी। इजरायल जाने के बाद ये वहां का माडल अपनाना चाहते थे।

कृषि विभाग के सहयोग और बैंक के लोंन लेने के बाद इन्होने शुरुआत की। चार महीने में 12 लाख के खीर बेचे, इससे इनका आत्मविश्वास बढ़ा। देखते ही देखते खेमाराम ने सात पॉली हाउस लगाकर सलाना का टर्नओवर एक करोड़ का लेने लगे हैं। खेमाराम ने बताया, “मैंने सात अपने पॉली हाउस लगाये और अपने भाइयों को भी पॉली हाउस लगवाए, पहले हमने सरकार की सब्सिडी से पॉली हाउस लगवाए लेकिन अब सीधे लगवा लेते हैं, वही एवरेज आता है, पहले लोग पॉली हाउस लगाने से कतराते थे अभी दो हजार फाइलें सब्सिडी के लिए पड़ी हैं।”

इनके खेत में राजस्थान का पहला फैन पैड

फैन पैड (वातानुकूलित) का मतलब पूरे साल जब चाहें जो फसल ले सकते हैं। इसकी लागत बहुत ज्यादा है इसलिए इसकी लगाने की हिम्मत एक आम किसान की नहीं हैं। 80 लाख की लागत में 10 हजार वर्गमीटर में फैन पैड लगाने वाले खेमाराम ने बताया, “पूरे साल इसकी आक्सीजन में जिस तापमान पर जो फसल लेना चाहें ले सकते हैं, मै खरबूजा और खीरा ही लेता हूँ, इसमे लागत ज्यादा आती है लेकिन मुनाफा भी चार गुना होता है।

डेढ़ महीने बाद इस खेत से खीरा निकलने लगेगा, जब खरबूजा कहीं नहीं उगता उस समय फैन पैड में इसकी अच्छी उपज और अच्छा भाव ले लेते हैं।” वो आगे बताते हैं, “खीरा और खरबूजा का बहुत अच्छा मुनाफा मिलता है, इसमें एक तरफ 23 पंखे लगें हैं दूसरी तरफ फब्बारे से पानी चलता रहता है ,गर्मी में जब तापमान ज्यादा रहता है तो सोलर से ये पंखा चलते हैं,फसल की जरूरत के हिसाब से वातावरण मिलता है, जिससे पैदावार अच्छी होती है।”

ड्रिप इरीगेशन और मल्च पद्धति है उपयोगी

ड्रिप से सिंचाई में बहुत पैसा बच जाता है और मल्च पद्धति से फसल मौसम की मार, खरपतवार से बच जाती है जिससे अच्छी पैदावार होती है। तरबूज, ककड़ी, टिंडे और फूलों की खेती में अच्छा मुनाफा है। सरकार इसमे अच्छी सब्सिडी देती है, एक बार लागत लगाने के बाद इससे अच्छी उपज ली जा सकती है।

तालाब के पानी से करते हैं छह महीने सिंचाई

खेमाराम ने अपनी आधी हेक्टेयर जमीन में दो तालाब बनाए हैं, जिसमें बरसात का पानी एकत्रित हो जाता है। इस पानी से छह महीने तक सिंचाई की जा सकती है। ड्रिप इरीगेशन और तालाब के पानी से ही पूरी सिंचाई होती है। ये सिर्फ खेमाराम ही नहीं बल्कि यहाँ के ज्यादातर किसान पानी ऐसे ही संरक्षित करते हैं। पॉली हाउस की छत पर लगे माइक्रो स्प्रिंकलर भीतर तापमान कम रखते हैं। दस फीट पर लगे फव्वारे फसल में नमी बनाए रखते हैं।

सौर्य ऊर्जा से बिजली कटौती को दे रहे मात

हर समय बिजली नहीं रहती है, इसलिए खेमाराम ने अपने खेत में सरकारी सब्सिडी की मदद से 15 वाट का सोलर पैनल लगवाया और खुद से 25 वाट का लगवाया। इनके पास 40 वाट का सोलर पैनल लगा है। ये अपना अनुभव बताते हैं, “अगर एक किसान को अपनी आमदनी बढ़ानी है तो थोड़ा जागरूक होना पड़ेगा।

खेती से जुड़ी सरकारी योजनाओं की जानकारी रखनी पड़ेगी, थोड़ा रिस्क लेना पड़ेगा, तभी किसान अपनी कई गुना आमदनी बढ़ा सकता है।” वो आगे बताते हैं, “सोलर पैनल लगाने से फसल को समय से पानी मिल पाता है, फैन पैड भी इसी की मदद से चलता है, इसे लगाने में पैसा तो एक बार खर्च हुआ ही है लेकिन पैदावार भी कई गुना बढ़ी है जिससे अच्छा मुनाफा मिल रहा है, सोलर पैनल से हम बिजली कटौती को मात दे रहे हैं।”

रोजाना इनके मिनी इजरायल को देखने आते हैं किसान

राजस्थान के इस मिनी इजरायल की चर्चा पूरे राज्य के साथ कई अन्य प्रदेशों और विदेश के भी कई हिस्सों में है। खेती के इस बेहतरीन माडल को देखने यहाँ किसान हर दिन आते रहते हैं। खेमाराम ने कहा, “आज इस बात की मुझे बेहद खुशी है कि हमारे देखादेखी ही सही पर किसानों ने खेती के ढंग में बदलाव लाना शुरू किया है। इजरायल माडल की शुरुआत राजस्थान में हमने की थी आज ये संख्या सैकड़ों में पहुंच गयी है, किसान लगातार इसी ढंग से खेती करने की कोशिश में लगे हैं।”

(साभार-गांव कनेक्शन)

एक माँ ने शुरू क्या अनोखा बिज़नेस, ब्रेस्ट मिल्क को बदल दिया खूबसूरत ज्वेलरी में

बच्चे की आंखें भी नहीं खुलती हैं, वो अपनी मां की छाती से चिकप जाता है और मां उसको स्तनपान कराती है.इस पल और बॉन्ड को और मजबूत करने की कोशिश करते हुए, चेन्नई की प्रीथी विजय , जो एक मां भी हैं, ब्रेस्ट मिल्क को ख़ूबसूरत ज्वेलरी में बदलने का काम कर रहीं हैं, ताकि वो पल और रिश्ता हमेशा के लिए खूबसूरत यादों के रूप में कैद हो जाए.

प्रीथी ने बताया कि कैसे उनके दिमाग में ये विचार आया:

मैं एक कार्यक्रम में गई थी, जहां मां के लिए आयोजित किया गया था. वहां किसी ने पूछा कि क्या यहां कोई ऐसा है, जो इंडिया में ऐसा करता है. मैं पिछले 5 सालों से हस्तशिल्प (handicrafts) बनाने के साथ उसका काम भी करती हूं, और जब मुझे इसके बारे में पता चला तो सबसे पहले मेरे दिमाग में यही ख़्याल आया कि मैं भी ये कर सकती हूं.ब्रेस्ट मिल्क या स्तन का दूध एक खराब होने वाला पदार्थ है, इसलिए ये काम करना बिलकुल भी आसान नहीं था.

‘जब मैंने ये करना शुरू किया, तो मैंने हर प्रकार के प्रिज़र्वेटिव्स का इस्तेमाल किया. लेकिन कुछ महीनों में ही ब्रेस्ट मिल्क का रंग बदल जा रहा था. फिर मैंने कुछ दोस्तों से इसमें मदद मांगी और आखिरकार इसे बरकरार रखने का एक तरीका मिल ही गया.’

जब उनको दूध को संरक्षित रखने का तरीका मिल गया, तब उन्होंने ब्रेस्ट मिल्क, गर्भनाल, बच्चे के बाल और बच्चे के पहले दांत को भी ज्वेलरी बनाने के लिए यूज़ करना शुरू कर दिया.इसी साल मई महीने के बाद से, देश के अलग-अलग राज्यों से हर हफ़्ते इनको कम से कम 12 ऑर्डर मिल चुके हैं. झुमके से लेकर पेंडेंट्स तक, आप जो चाहें और जैसी डिज़ाइन चाहें प्रीथी आपको वो सब बना कर दे सकती हैं.

हर आइटम की कीमत उसको बनाने में इस्तेमाल किये गए मेटेरियल के आधार पर बदलती रहती है. लेकिन इनकी कीमत 1000 से 4000 रुपये के बीच रहती है. उनके पास आने वाले ज़्यादातर ऑर्डर्स उनके Facebook page के माध्यम से आते हैं और लोगों द्वारा भी आते हैं.

प्रीथी, जो खुद एक मां हैं, का मानना है कि इस प्रकार का उपहार दुनिया की हर जगह मां के लिए अनमोल है.वो कहती हैं कि ‘बहुत लोगों के लिए ये ज्वेलरी सोना-चांदी-हीरे से भी ज़्यादा कीमती होती है. बहुत सी मांओं ने ये ज्वेलरी इस लिए बनवाई है कि वो इसे अपने बेटे या बेटी को दे देंगीं, तो कुछ का मानना है कि वो ये अपने बच्चे के लाइफ पार्टनर को देंगी. ये माता-बच्चे के रिश्ते का एक प्रतीक है और ये अनमोल है.’

हमें पूरा यकीन है कि नई मां के लिए इससे अच्छा और बेहतर कोई दूसरा तोहफ़ा हो ही नहीं सकता. और हो भी क्यों न, क्योंकि ये बच्चे को जन्म देने के दौरन होने वाली असहनीय पर सुखद पीड़ा और उसका यादगार अनुभव है, जिसे ही मातृत्व कहा जाता है.

आखिर मिल ही गया वो शख्स जो नाले की गैस से चाय बनाता है ,पीएम मोदी ने किया था खुलासा

रायपुर के श्याम राव शिर्के ने एक ऐसा देसी उपकरण तैयार किया है, जो नदी, नालियों और नालों से निकलने वाली मीथेन गैस को रसोई गैस की तर्ज पर उपयोग करने में मदद करता है। रायपुर में जिस स्थान पर यह उपकरण लगाया गया था, उस घर में लगातार 3 से 4 माह तक एक दर्जन से ज्यादा व्यक्तियों का सुबह का नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन बनाया जाया करता था।

खास बात यह है कि इस उपकरण को तैयार करने वाले श्याम राव सिर्फ 11वीं पास हैं लेकिन हमेशा कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने अपने इस मॉडल का पेटेंट भी करवा लिया है और इसकी सूचना पीएम मोदी तक भी पहुंचा दी है। बता दें कि पीएम ने रायपुर में उनकी तारीफ भी की थी। हम बता रहे हैं यह उपकरण कैसे काम करता है।

कैसे काम करता है उपकरण

  • इस मशीन में प्लास्टिक के तीन ड्रमों को आपस में जोड़ कर उसमें एक वॉल्व लगा दिया जाता है।
  • ये तीनों कंटेनर एक नदी, नाले या नालियों के ऊपर उस स्थान पर रखे जाते हैं, जहां से गंदा पानी गुजरता है।
  • पानी के साथ आ रही गंदगी कंटेनर में न समाए इसलिए उसमें नीचे की तरफ एक जाली लगाई गई है।

  • इस मशीन को ऐसे फिट किया जाता है कि ड्रम में इकट्ठा होने वाली गैस का इतना दबाव बन सके, जिससे वो पाइप लाइन के जरिए उस स्थान पर पहुंच जाए जहां रसोई गैस का चूल्हा रखा है।
  • कंटेनर में इकट्ठा होने वाली गैस की मात्रा नदी-नाले की गहराई, लंबाई और चौड़ाई पर निर्भर करती है।

नालों में लगाया जाएगा…

  • जल्द ही इस उपकरण को रायपुर के कुछ चुनिंदा नालों और नालियों में लगाया जाएगा।
  • छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तैयारी शुरू कर दी हैं।

सरसों के साग को विदेशों में बेच कर लाखों रुपया कमा रहा है पंजाब का यह किसान

अमृतसर के पास वेरका गांव को फतेहपुर शुकराचक से जोड़ने वाली लिंक रोड पर चलते हुए तकरीबन आधे एकड़ में फैले फ़ूड प्रोसेसिंग की एक इकाई गोल्डन ग्रेन इंक को शायद ही कोई नोटिस कर पाता है लेकिन इसने सरसों की पत्तियों से बनने वाली पंजाब की सुप्रसिद्ध व्यंजन – सरसों दा साग की धमक से पंजाब के बाहर ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी हलचल मचा दी है।

इस गोल्डन ग्रेन इंक यूनिट के लिए कच्ची सामग्री की कोई कमी नहीं है। इसकी खरीद आमतौर पर यहां के इच्छुक किसानों से बाजार की खुदरा कीमतों से भी ज्यादा दर पर की जाती है। हालांकि इसे तैयार करने का कार्य इतना आसान नहीं है जितना कि दिखता है, यही वजह है कि इस यूनिट के मालिक 59 साल के जगमोहन सिंह हर वक्त व्यस्त नजर आते हैं। वह ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग और अनाज पिसाई में डिग्री हासिल करने के बाद 1986 में जगमोहन अपने गृह नगर अमृतसर लौटे।

वो मोबाइल फोन पर लगातार किसानों से बात करते रहते हैं जो ज्यादातर गुरदासपुर जिले के आसपास के रहनेवाले हैं। ये किसान उन्हें सरसों के तोड़े जाने की जानकारी देते हैं। इसके बाद उनकी यूनिट में सरसों की पत्तियों की साग तैयार कर, कैन में बंद कर दुबई, इंग्लैंड और यहां तक कि कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भेजा जाता है।

वो अपना कारोबार संपर्क के जरिए करते हैं। वो बताते हैं, ”सरसों पैदा करनेवाले बटाला इलाके के गावों के करीब 30 किसानों से मेरा मौखिक समझौता है। सभी छोटे और सीमांत किसान हैं और उनके पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है।”

हिसार किस्म की औसत ऊपज 80 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि स्थानीय पंजाबी किस्म महज 50 क्विंटल प्रति एकड़ की ऊपज दे पाती है और वो भी दो बार तुड़ाई के बाद। अमृतसर के बाजार में साग की पत्तियों की कीमत घटती-बढ़ती रहती है।

इसलिए अगर अमृतसर के खुदरा बाजार में इसकी औसत दर 7 रुपये प्रति किलो है तो एक एकड़ से किसान को 56,000 रुपये की तक कमाई हो जाती है। लेकिन अगर गोल्डन ग्रेन के लिए दो रुपये ज्यादा मिल रहा है तो कमाई बढ़कर 72,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाती है।

प्राथमिक तौर पर साग के प्रसंस्करण का दो हिस्सा होता है, पहला- अलग करना और दूसरा- उबालना जो कि स्टीम बॉयलर में किया जाता है। एक दिन में दो टन साग तैयार किया जाता है। टिन के जार में पैक रेडी टू ईट यानी तैयार साग में किसी प्रिजर्वेटिव या परिरक्षक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दूसरे उत्पाद के साथ इन जार को नरैन फूड के ब्रांड नाम(जगमोहन के पिता का नाम नरैन सिंह है) के साथ निर्यात कर दिया जाता है।

मार्ग की कठिनाइयां

उन्हें इस बात का अफसोस है कि अमृतसर से कोई कार्गो या मालवाहक विमान नहीं है और जो यात्री विमान यहां से उड़ान भरते हैं उसमें माल ढुलाई के लिए जगह बहुत सीमित होता है। जगमोहन बताते हैं कि उन्होंने मध्य पूर्व के बाजार का अध्ययन किया है और ये पाया कि “अमृतसर से ताजी तोड़ी गई हरी सब्जियों और फल के निर्यात की बड़ी संभावना है।” ”फ्लाइट से अमृतसर से दुबई का रास्ता महज दो घंटे का है, अगर यहां से प्रतिदिन कार्गो या मालवाहक उड़ान की सेवा मिल जाए तो किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ सकता है।”

12500 रु की नौकरी छोड़ शुरू किया ये बिजनेस, 4 साल में बन गया करोड़पति

सपने देखने वालों को ही सफलता मिलती है। अच्छी खासी नौकरी छोड़ अपना बिजनेस शुरू करना काफी मुश्किल होता है। कई बार बिजनेस फेल होने का डर होता है। लेकिन जो ऐसा रिस्क उठाने में सक्षम होते हैं, उनको बिजनेस में सफलता जरूर मिलती है।

कोलकाता के रहने वाले पंकज मालू की कहानी कुछ ऐसी ही है। सीए की नौकरी छोड़ दोस्त से कंप्यूटर उधार लेकर बिजनेस शुरू किया और महज 4 साल में यह शख्स करोड़पति बन गया। उनकी कंपनी में 100 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं और 500 से ज्यादा क्लाइंट जुड़े हैं।

12500 रु की नौकरी छोड़ की शुरुआत

पंकज मालू ने  बताया कि मिडल क्लास फैमिली में बिजनेस की जगह नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है। परिवार की हालत को देखते हुए उन्होंने स्कूल के दिनों में एक प्राइवेट सीए फर्म में ट्रेनी के रूप में काम करना शुरू किया। यहां उन्हें 300 रुपए महीना स्टाइपिंड मिलता था, जिससे उनका पर्सनल खर्च निकल जाता था।

ग्रैजुएशन करते वक्त उन्होंने सीए कोर्स में दाखिला लिया और 2002 में सीए की पढ़ाई पूरी की। सीए करने के बाद 2003 में एक प्राइवेट फर्म में सीए की नौकरी मिली। जहां उनकी मंथली सैलरी 12,500 रुपए थी। लेकिन अपना खुद का बिजनेस शुरू करने के जुनून में 6 महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी।

आईटी का था जुनून

पंकज ने नौकरी छोड़ने के बाद 2004 में एक सीए फर्म की स्थापना की। एक साल तक काम करने के बाद उनको महसूस हुआ कि यह काम उनकी मंजिल नहीं है। इसलिए वह इससे अलग हो गए। आईटी के प्रति लगाव की वजह से उन्होंने कुछ महीने बाद ग्राफिक डिजाइनिंग फर्म शुरू करने का निर्णय लिया और यहीं से वो सफलता की बुलंदी पर पहुंचे। वह कहते हैं कि उनके पिता उनके मेंटर रहे हैं।

दोस्त से उधार लिया कंप्यूटर

पंकज ने कहा कि कंपनी शुरू करने के लिए उन्होंने दोस्त से कंप्यूटर उधार लिया। उस वक्त कंप्यूटर खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। 2005 में मैंने अपने दोस्त नितिश थापा की मदद से क्रिएटिव फिंगर्स की नींव रखी। लेकिन अभी भी मुसीबत खत्म नहीं हुई थी। कंपनी शुरू करने के लिए एक जगह की जरूरत थी। लेकिन इसका हल उनके एक दोस्त ने निकाला और बिना किराए का एक ऑफिस दिया।

650 रुपए का मिला पहला ऑर्डर

उनका सपना साकार तो हुआ, लेकिन बिजनेस जनरेट करना बड़ी चुनौती थी। कंपनी शुरू होने के एक हफ्ते बाद ही उनको पहला ऑर्डर मिला, लेकिन वह सिर्फ 10 डॉलर (650 रुपए) का था। इसके बाद उन्होंने खूब जोरशोर से कंपनी का ऑनलाइन प्रोमोशन किया। दिन रात एक करने के बाद उनको सफलता मिली और पहले साल कंपनी का टर्नओवर 4 लाख रुपए पर पहुंचा और 100 क्लाइंट उनकी कंपनी से जुड़े।

4 साल में टर्नओवर करोड़ के पार

पंकज ने बताया कि धीरे-धीरे काम बढ़ता गया और कंपनी में लोग जुड़ते गए। 2009 में कंपनी का टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपए रहा। फॉरेन क्लाइंट्स की संख्या बढ़ने की वजह से ऐसा हुआ, लेकिन 2009-10 में मंदी का वक्त हमारे के लिए काफी मुश्किल भरा था। 2012 में धीरे-धीरे बिजनेस में सुधार आना शुरू हुआ और 2014-15 में 25 फीसदी की तेजी आई।

2016-17 में कंपनी का टर्नओवर 5 करोड़ रुपए हो गया। आज उनकी कंपनी में 100 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं और 500 से ज्यादा क्लाइंट जुड़े हैं। पंकज का कहना है कि कंपनी का टर्नओवर 20 करोड़ रुपए करना लक्ष्य है। साथ ही वह कंपनी का 10 फीसदी इक्विटी बेचना चाहते हैं और बिजनेस विस्तार के लिए 2 करोड़ रुपए जुटाना चाहते हैं।

12वीं में फेल हो जाने के बाद गूगल से पूछता था ‘क्या करूं’, बना करोड़पति

आज हम एक लड़के के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने 12वीं कक्षा भी पास नहीं की है, लेकिन अपने स्टार्टअप के जरिए 24 साल की उम्र में वो मुकाम हासिल कर लिया, जिसे हासिल करने में सालों लग जाते हैं. हम बात कर रहे हैं ऋषभ लवानिया की. ऋषभ की उम्र अभी सिर्फ 24 साल है. वह इन दिनों साउथ अफ्रीका के केपटाउन शहर में अपना बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं.

ऋषभ एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखते हैं. वह अपने पिता की तरह सिविल इंजीनियरिंग में करियर बनाना चाहते थे, लेकिन 12वीं में फेल हो जाने के बाद उन खुद का बिजनेस शुरु करने के बारे में सोचा. जब ऋषभ 17 साल के थे उस वक्त में अपना पहला स्टार्टअप “रेड कार्पेट” शुरू कर चुके थे और बाकी जगह भी कुछ बेहतर करने के बारे में सोच रहे थे. ऋषभ ने बताया 12वीं कक्षा में फेल होने के बाद मैंने गूगल से काफी मदद ली. अक्सर गूगल पर ”12वीं में फेल होने के बाद क्या बेहतर ऑप्शन है” सर्च किया करता था.

अपनी कड़ी मेहनत की वजह से आज ऋषभ Weetracker मीडिया कंपनी के फाउंडर और सीईओ हैं. WeeTracker अफ्रीकी टेक इकोसिस्टम को समर्पित एक वैश्विक तकनीक मीडिया है. इसका मकसद महाद्वीप में तीन तरह से समग्र रूप से शुरुआत करना है. सूचित करना, शिक्षित करना और निवेश करना.

ऋषभ ने बताया, अफ्रीका एक तकनीकी क्रांति के दौर से गुजर रहा है. जैसे 1990 के दशक के उत्तरार्ध में और 2000 के दशक के शुरुआती दिनों में भारत हुआ करता था. इसी दौर से निपटने के लिए WeeTracker की शुरुआत की गई है.

बता दें, साल 2015 में ऋषभ जब अमेरिका में थे तब उनकी मुलाकात केशू दुबे से हुई. यहां से ही उनकी एक निवेशक के रूप में अपनी यात्रा शुरू की. जहां से उन्हें भारत, चीन, अमेरिका और जापान में स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्र की समझ हुई.

ऋषभ ने WeeTracker की प्लानिंग के बारे में बताते हुए कहा अभी मेरे पास 25 से 30 प्री-सीरीज ए और सीरीज ए के अफ्रीकी उद्यमियों की एक सूची है जो कि उद्यमिता सीखने के लिए भारत आने में रुचि रखते हैं. हम भारत, चीन, अमेरिका और जापान में मेंटर, उद्यमियों और उत्पाद प्रबंधक के नेटवर्क का निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं. बता दें,

आज ऋषभ बिजनेसमैन में गिने जाते हैं उन्होंने दिखा दिया सफलता हासिल जरूरी नहीं स्कूल में अच्छा रिजल्ट ही हासिल किया हो. आप जमकर मेहनत करें सफलता आपके कदमों में होगी.

कभी 350 रु दिहाड़ी कमाने वाला भारतीय, ऐसे बन गया 18 करोड़ का मालिक

चाय बेचकर प्रधानमंत्री बनने के किस्से आपने अकसर सुने होंगे, लेकिन क्या आपने कभी किसी भारतीय के विदेश में चाय बेचकर करोड़पति बनते देखा या सुना है। शायद नहीं। लेकिन 39 वर्षीय केरल निवासी रूपेश थॉमस लंदन में चाय बेचकर करोड़पति बन गए हैं।

उन्होंने लंदन में ‘टुक टुक चाय’ नाम से बिजनेस शुरू किया, जिसका मार्केट वैल्यू 18 करोड़ रुपए हो गया है। वो रेडी ब्रूड चाय बेचते हैं। उनकी चाय की सप्लाई लंदन की लग्जरी डिपार्टमेंटल स्टोर हार्वे निकोल्स में हो रही है।

सपने को दिया पंख

केरल में जन्मे रूपेश का बचपन गरीबी में गुजरा। उनके परिवार में अकसर पैसे की दिक्कत होती थी। वित्तीय परेशानियों के बावजूद रूपेश ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी से  इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। उनको विदेश में नौकरी करने का सपना था। सपने को पूरा करने के लिए साल 2002 उम्र में 795 डॉलर यानी करीब 55 हजार रुपए लेकर लंदन पहुंच गए।

मैकडॉनल्ड्स में की नौकरी

लंदन पहुंचने के बाद रूपेश को मैकडॉनल्ड्स में नौकरी मिली। लंदन में काम को लेकर उत्साहित रूपेश को यह नौकरी अच्छी लगी। यहां उनको 5.30 डॉलर प्रति घंटे के हिसाब से पेमेंट मिलती थी। एक हफ्ते के अंदर उन्होंने दूसरा पार्ट टाइम जॉब ढूंढ लिया, जो डोर-टू-डोर सेल्समैन का था।

ऐसे आया चाय बेचने का आइडिया

दिसंबर 2014 में अपनी पत्नी अलेक्जेंडर के साथ स्वदेश लौटे रूपेश को अपने गांव से चाय बेचने का आइडिया मिला। रूपेश की पत्नी को दूध वाली चाय अच्छी लगी। यहीं रूपेश को टुक टुक चाय का बिजनेस शुरू करने का आइडिया आया।

करीब 2 लाख डॉलर से शुरू किया बिजनेस

रूपेश ने 2 लाख डॉलर से अपने बिजनेस की शुरुआत की। उन्होंने अपनी बचत पूंजी बिजनेस शुरू करने में लगा दिया।

मेहनत से मिली सफलता

रूपेश का कहना है कि मैंने लंदन में चाय बिजनेस पर एक दांव लगाया था। जिसमें उनको सफलता मिली। रूपेश के मुताबिक, अमीर बनने के पीछे कोई मैजिक फॉर्मूला नहीं है। मैंने यह सफलता मेहनत और लगन से पाई है। मेरे अंदर सफल बनने की भूख है और मैंने इसे हासिल में कोई कसर नहीं छोड़ी।

नौकरी छोड़ शुरु किया केला चिप्स का बिज़नेस, सिर्फ 3 महीने में कमाए 4 लाख रुपये

ये हैं दो दोस्त, दीपक और अभिनव। कुछ करना चाहते थे। इसलिए एक ने देश तो दूसरे ने विदेश में मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़ दी। बुरहानपुर में खुद का केला चिप्स का उद्योग खोला। तीन महीने में ही इनकी केला चिप्स इंडिया मार्ट और अमेजन जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर बिकने लगी।

चटपटे, कुरकुरे और लजीज स्वाद के कारण इसकी देश-विदेश में मांग बढ़ रही है। गुजरात, लखनऊ, रायपुर और इंदौर में अपनी छाप छोड़ने के बाद केला चिप्स की डिमांड अमेरिका से भी आई है। यहां पहली खेप के रूप में 16 टन चिप्स भेजने की तैयारी है। एक सप्ताह बाद ओएलएक्स और फ्लिप कार्ट पर चिप्स के साथ केले का आटा भी बिकने लगेगा। इसके लिए शहर की ओएमजी केला वेफर्स कंपनी ने रजिस्ट्रेशन कराया है।

31 साल के अभिनव खेमरिया नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की आईआईएल में दो साल तक मार्केटिंग मैनेजर रहऔर 33 साल के दीपक शर्मा ने केन्या के नैरोबी में एक पम्प कंपनी में बतौर रीजनल मैनेजर काम किया। कंपनी शुरू करने को तीन महीने हुए हैं। इस अवधि में दोनों चार लाख रुपए का प्रॉफिट निकाल चुके हैं।

18 अलग-अलग स्वाद में है केला चिप्स

अभिनव और दीपक ने केला चिप्स के अलग-अलग फ्लेवर बनाने का तरीका इंटरनेट से सिखा। अब वे टोमेटो, कुरकुरे, पुदीना, क्रिम एन ओनियन, चॉकलेट, जलजीरा, मिर्च मसाला, फलाहारी, काली मिर्च, चीज, मंचूरियन, क्रिमी चीज, नाचोज, लाइम एन चिली, शेजवान, जैन पिक्स, कच्ची कैरी फ्लेवर में केला चिप्स बना रहे हैं।