80 नहीं 30 हजार रुपए किलो मिलती है मोदी वाली मशरूम, ये हैं खूबिया

गुजरात के युवा ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने पीएम नरेंद्र मोदी पर विदेश से मंगा कर मशरूम खाने का आरोप लगाया है। हाल ही में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए अल्पेश ने कहा है कि पीएम मोदी ताइवान से मशरूम मंगवा कर खाते हैं।

पीएम जो मशरूम खाते हैं उस एक मशरूम की कीमत 80 हजार रुपए है। इसपर कई दिनों से बहस चल रही है, ऐसे में चलिए जानेत हैं आखिर क्या है मशरूम की सच्चाई।

मोदी ने बताया था वो खाते हैं ‘गुच्‍छी

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्‍यमंत्री थे, तब उन्‍होंने एक बार कुछ पत्रकारों को ऑन रिकॉर्ड यह बताया था कि उनकी सेहत का राज हिमाचल प्रदेश का मशरूम है। पीएम मोदी मशरूम की जिस प्रजाति को सबसे ज्‍यादा पसंद करते हैं, उसे ‘गुच्‍छी’ कहते हैं और यह हिमालय के पहाड़ों पर पाया जाता है।

उत्‍तराखंड, हिमाचल प्रदेश के जंगलो में पाया जाता है

इसका उत्‍पादन नहीं किया जा सकता और इसे प्राकृतिक रूप से ही हासिल किया जाता है। यह उत्‍तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्‍मू-कश्‍मीर के ऊंचे पहाड़ों पर जंगलों में पाया जाता है और बर्फ के बढ़ने और पिघलने के बीच के दौर में ही उगता है।

जानें क्यों होता है इतना महंगा

अब चूंकि यह बहुत कम पाया जाता है, इसलिए इसकी कीमत कभी-कभी 30,000 रुपये किलो तक पहुंच जाती है। हालांकि एक किलो में काफी मशरूम आ जाता है, क्‍योंकि यह सूखने पर बिकता है। औसतन देखें तो गुच्‍छी मशरूम 10,000 रुपये किलो मिल जाता है

इस मशरूम में बी कॉम्प्लैक्ट विटामिन, विटामिन डी और कुछ जरूरी एमीने एसिड पाए जाते हैं. इसे लगातार खाने से दिल का दौरा पड़ने की संभावनाएं बहुत ही कम हो जाती हैं. इसकी मांग सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, अमेरिका, फ्रांस, इटली और स्विटरलैंड जैसे देशों में भी है।

कहां-कहां हुआ आपके आधार का यूज, ऐसे करें पता

मौजूदा समय में आधार कार्ड सबसे अहम दस्तावेज बनकर उभरा है. मोबाइल नंबर लेने से लेकर अन्य कामों के लिए पहचान पत्र के तौर पर आधार कार्ड की ही ज्यादातर मांग की जा रही है.

आधार कार्ड की बढ़ती मांग को देखते हुए इसका गलत इस्तेमाल होने की आशंका भी पैदा हो गई है. ऐसे में आधार अथॉरिटी यूआईडीएआई ने एक नई सुविधा शुरू की है, जिसके जरिये आप घर बैठे पता कर सकते हैं कि आपका आधार कार्ड कहां-कहां यूज हुआ है.

इस सुविधा का इस्तेमाल कर आप न सिर्फ जान सकेंगे कि आपका आधार कार्ड कहां-कहां यूज हुआ है, बल्क‍ि इसकी बदौलत आपको कुछ गड़बड़ी नजर आती है, तो आप आसानी से इसकी श‍िकायत भी कर सकते हैं. आगे जानिए कैसे यूज करें इस सुविधा को.

इसके लिए आपको uidai की वेबसाइट पर जाना होगा. यहां आपको ‘Aadhaar Authentication History’ का विकल्प दिखेगा.

जैसे ही आप इस पर क्ल‍िक करेंगे, वैसे ही आपके सामने नई विंडो खुलेगी. यहां आपको आधार नंबर एंटर करना है. इसके साथ ही नीचे दिया गया कैप्चा भी दर्ज करना होगा.

इसके बाद आपको ये बताना होगा कि आपको कब से कब तक की जानकारी चाहिए. ओटीपी जनरेट करने के ऑप्शन पर क्ल‍िक करना है. आधार के साथ रजिस्टर आपके मोबाइल नंबर पर यह ओटीपी आएगा.

ओटीपी एंटर करते ही आपको उस समय सीमा अवध‍ि के दौरान की सारी जानकारी मिल जाएगी, जो आप ने ओटीपी जनरेट करने से पहले दर्ज की थी. अगर आपको हिस्ट्री देखकर कुछ भी गड़बड़ी नजर आई, तो इसकी श‍िकायत यूआईडीएआई से 1947 पर कॉल कर के कर सकते हैं.

दरअसल जब भी आपके आधार को यूज किया जाता है, तो इसे यूज करने के लिए हर संबंध‍ित व्यक्‍त‍ि को यूआईडीएआई को रिक्वेस्ट भेजनी होती है. इसके आधार पर ही यूआईडीएआई आपका डाटा यहां पेश करता है.

अब नहीं डिश एंटीना की जरूरत

फतेहगढ़ साहिब, [प्रदीप शाही]। विज्ञान में नित होते आविष्कार इंसान के जीवन को सुखद बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। एक जमाना था जब छतों पर लगे टीवी एंटीना के घूम जाने मात्र से ही सिग्नल समाप्त हो जाता था। इसके बाद छतों पर से पाइप वाले एंटीना गायब हो गए।

इनके स्थान पर तश्तरीनुमा डीटीएच छतरी आ गई। अब जल्द ही ये तश्तरीनुमा डीटीएच छतरी भी छतों पर से उड़नछू हो जाएंगी। जो नया एंटीना आने वाला है, उसे छत की दरकार नहीं। न छत चाहिए, न लंबा तार।

सीधे सेट टॉप बॉक्स में कनेक्ट कर दीजिए और टेलीविजन का मजा लीजिए। दुनिया माइक्रो स्ट्रिप एंटीना की ओर बढ़ रही है। भारत में भी स्वदेशी माइक्रो स्ट्रिप एंटीना तैयार कर लिया गया है।

भारतीय वैज्ञानिक ने बनाया सस्ता-टिकाऊ स्वदेशी माइक्रो एंटीना

यह माइक्रो स्ट्रिप एंटीना पंजाब फतेहगढ़ साहिब स्थित बाबा बंदा सिंह बहादुर इंजीनियरिंग कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर जसपाल सिंह ने तैयार किया है।

सेट अप बॉक्स से होगा कनेक्ट

दो से तीन सेंटीमीटर आकार के चिपनुमा माइक्रो स्ट्रिप एंटीना को कमरे के अंदर रखे सर्विस बॉक्स में लगाया जा सकेगा। यह बॉक्स फिलहाल घर के बाहर या छत पर लगे डिश एंटीना से तार के जरिये कनेक्ट होता है, जबकि दूसरी ओर टीवी सेट से। अब डिश एंटीना केस्थान पर इसमें माइक्रो स्ट्रिप एंटीना को कनेक्ट कर सब्सक्राइब्ड चैनलों को देखा जा सकेगा।

पंजाब फतेहगढ़ साहिब स्थित बाबा बंदा सिंह बहादुर इंजीनियरिंग कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्यूनिकेशन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर जसपाल सिंह ने स्वदेशी माइक्रो स्ट्रिप एंटीना बनाने में सफलता हासिल की है। प्रोफेसर जसपाल सिंह ने बताया कि शोध कार्य को पूरा करने में पांच साल लग गए। इसे पेटेंट के लिए इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी इंडिया ने स्वीकार कर लिया है।

लागत मात्र 50 रुपये

माइक्रो स्ट्रिप एंटीना से उपभोक्ता ही नहीं कंपनियों को भी लाभ होगा। इसके निर्माण में समय व कीमत दोनों में बचत होगी। इस एंटीना को बनाने में अधिकतम 50 रुपये तक का खर्च आएगा।

इसके लिए किसी लेबोरेट्री की आवश्यकता नहीं होगी। चिप को प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) पर ही बनाया जा सकेगा। इसका आकार दो सेंटीमीटर से लेकर तीन सेंटीमीटर तक रहेगा। साथ ही इससे सिग्नल भी बेहतर हो जाएगा।

अब कपडे धोने से मिलेगा छुटकारा ,धुप में अपने आप साफ होंगे कपडे

कामकाजी लोगों और घरेलू महिलाओं के लिए कपड़ा धोना किसी चुनौतीपूर्ण काम से कम नहीं है लेकिन जल्द ही इस झंझट से निजात मिल सकती है क्योंकि एक ऐसी तकनीक का विकास किया गया है जिसके जरिये प्रकाश पड़ते ही मिनटों में आपके कपड़े खुद ही साफ हो जायेंगे.

 

ऑस्ट्रेलिया के आरएमआईटी विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसे ‘नैनो-एनहांस्ड’ कपड़े का विकास किया है जो अपने आप दाग और जमी हुई मैल निकालने में सक्षम हैं. इसके लिए कपड़े को केवल बल्ब की रोशनी में रखना होगा. धूप में पहनकर निकलने पर भी यह साफ हो जायेगा. अनुसंधानकर्ताओं में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है.

खोज करने वाले टीम में एक भारतीय मूल का वैज्ञानिक भी है जिनका नाम राजेश रामनाथ है। उनका कहना है कि इसका फायदा यह है कि यह पहले से ही 3डी के आधार में बनाया जा रहा है। जिस कारण से कपड़ा अच्छी तरह से अवशोषित कर लेता है और कार्बनिक पदार्थ आराम से निकल जाता है।

अभी इसमें और ज्यादा रिसर्च की जाएगी जिससे वो यह पता लगाएंगे की चाय और टमाटर जैसे घातक दाग कैसे निकाल सकते है। अभी तक यह कपड़ा किसी के पास नही आया है।

जाने इस 26 लाख वाली साइकिल में ऐसा क्या है खास

क्या एक साइकिल की कीमत एक गाड़ी के बराबर हो सकती है वो भी फार्चूनर जैसी बड़ी गाड़ी के बराबर सुनने में विश्वास करना मुश्किल लग रहा है लेकिन यह बात बिलकुल सच है आप हैरानी में पड़ कि दो पहियों की साइकिल की कीमत लाखों रुपए कैसे हो सकती है?

आप खुद को भरोसा दिलाने के लिए कल्पना करेंगे कि यह साइकिल ऑटोमैटिक होगी, इंजिन या बैट्री से चलती होगी वह भी बहुत तेज। लेकिन जब आपसे कोई कहे कि साधारण सी दिखने वाली साइकिल की कीमत 26 लाख रुपए है तो आपको यकीन नहीं होगा। खासकर तब जब आपसे कहा जाए कि यह इसे पैरों से ही चलाना होगा।

लक्जरी कार बनाने वाली कंपनी बुगाती ने 40000 डॉलर (25लाख 92 हजार 200 रुपए) कीमत की साइकिल तैयार की है। सबसे तेज दौड़ने वाली कार बनाने वाली कंपनी बुगाती ने एक बाइक कंपनी के साथ मिलकर ये साइकिल तैयार की है। इस साइकिल की कीमत के हिसाब से जो खूबी बताई गई हैं वह भी जानने लायक हैं।

साइकिल की खूबियां

कंपनी ने करीब 26 लाख रुपए कीमत वाली इस साइकिल की सबसे बड़ी खूबी इसका हल्का होना बताया है। कंपनी ने कहा है कि यह साकिल मात्र 11 पाउंड यानी पांच किलो की होगी।

साइकिल का फ्रेम और बॉडी 95 फीसदी रेनफोर्स कार्बन से बना है। रेनफोर्स कार्बन एक ऐसा पदार्थ है जिसका इस्तेमाल हवाई जहाज की बॉडी बनाने के लिए किया जाता है। ताकि विमान कम से कम वजन के हों।

इस साइकिल का हर पुर्जा हवाई जहाज बनाने वाले मैटेरियल से तैयार किया गया है। इस साइकिल में चेन की जगह बेल्ट लगाया गया जिसे पैडल के सहारे खींचा जाएगा। इस साइकिल को आम साइकिलों की तरह ही आम रास्तों पर दौड़ाया जा सकता है।

साइकिल का नाम

कंपनी बुगाती ने इस बाइक का नाम सुपर बाइक दिया है जो एक अल्टीमेट स्पोर्ट साइकिल है। कंपनी इसे कई रंगों और मॉडल में लॉन्च करने का ऐलान किया है।

3.50 लाख में शुरू करें राइस मिल, सरकार करेगी 90% सपोर्ट

आप मात्र 3.50 लाख रुपए में राइस मिल लगा सकते हैं। अगर आपके पास इतना पैसा भी नहीं है तो आप 90 फीसदी तक लोन सरकार से ले सकते हैं। यानी कि आपके पास 35 हजार रुपए हैं तो आप राइस मिल लगाने की योजना पर काम कर सकते हैं।

दरअसल, खादी विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन ऐसे बिजनेस को 90 फीसदी तक फाइनेंशियली सपोर्ट करता है और ऐसे कारोबारियों को बैंकों के माध्‍यम से लोन दिया जाता है। हालांकि बड़े शहरों में राइस मिल की डिमांड कम हो गई हैं और ब्रांडेंड की डिमांड बढ़ रही है, लेकिन मध्‍यम और छोटे दर्जे के शहरों में मिनी राइस मिल शुरू कर सकते हैं।

आइए, जानते हैं कि एक राइस मिल पर कितना इन्‍वेस्‍टमेंट होगा और कैसे आप राइस मिल शुरू कर सकते हैं। साथ ही, यह भी जानेंगे कि आपको कितना लोन मिलेगा और कितनी इनकम होगी।

कितने में शुरू होगी राइस मिल

खादी एवं विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन की ओर से कई प्रोजेक्‍ट्स का प्रोफाइल तैयार किया है। इन प्रोफाइल के आधार पर आप अपने प्रोजेक्‍ट की रिपोर्ट तैयार कर लोन के लिए अप्‍लाई कर सकते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर आप राइस मिल जिसे पैडी प्रोसेसिंग यूनिट भी कहा जाता है, शुरू करना चाहते हैं तो आपको लगभग 1000 वर्ग फुट के शेड किराया पर लेना होगा।

इसके बाद आपको पैडी क्‍लीनर विद डस्‍ट बाउलर, पैडा सेपरेटर, पैडी दियूस्‍कर, राइस पॉलिशर, ब्रान प्रोसेसिंग सिस्‍टम, एसप्रिरटर खरीदना होगा। अनुमान है कि इन सब पर लगभग 3 लाख रुपए खर्च होगा। इसके अलावा वर्किंग कैपिटल के तौर पर लगभग 50 हजार रुपए खर्च होंगे। इस तरह आप 3 लाख 50 हजार रुपए में राइस मिल शुरू कर सकते हैं।

कैसे मिलेगा 90 फीसदी सपोर्ट 

अगर आप सरकार से फाइनेंशियल सपोर्ट लेना चाहते हैं तो आप प्रधानमंत्री इम्‍पलॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम के तहत लोन के लिए अप्‍लाई कर सकते हैं। इस स्‍कीम के तहत द्वारा 90 फीसदी तक लोन दिया जाता है। लोन के लिए ऑनलाइन अप्‍लाई किया जा सकता है। इस लिंक पर क्लिक करें – https://www.kviconline.gov.in/pmegpeportal/jsp/pmegponline.jsp

कितना होगी इनकम

इस मॉडल प्रोजेक्‍ट के तहत आप लगभग 370 क्विंटल राइस की प्रोसेसिंग करता है। इसका कॉस्‍ट ऑफ प्रोडक्शन लगभग 4 लाख 45 हजार रुपए आएगा, जबकि यदि आप सारा माल आगे बेच देते हैं तो आपकी सेल्‍स लगभग 5 लाख 54 हजार रुपए होगी। यानी कि आप लगभग 1 लाख 10 हजार रुपए तक कमा सकते हैं।

साभार- मनी भास्कर न्यूज़

इस सोलर पावरबैंक से 12 सालों तक मिलेगी पुरे घर को बिजली, वो भी मुफत

यह बात सुनने में कितनी अजीब लगती है कि कोई पावरबैंक कैसे इतना पावरफुल हो सकता है कि उससे घर के बिजली पंखे सब कुछ चल सकें। 300 घंटे तक लगातार बिजली सप्‍लाई देने वाला ये अनोखे पावरपैक 12 सालों तक आपको बिजली की सप्‍लाई देता रहेगा। यानि कि 12 सालों तक आपको बिजली के बिल से आजादी मिल जाएगी।

दिल्‍ली के एक इवेंट में हाल ही में एक ऐसा ही पावरबैंक देखने को मिला, जिसका रिजल्‍ट चौंकाने वाला है। भारत में पैदा हुए समाज सेवी और उद्योगति मनोज भार्गव ने दिल्‍ली के इस इवेंट में लोगों को एक डॉक्‍यूमेंटरी फिल्‍म दिखाई। बिलियन्स इन चेंज 2 नाम की इस शॉर्ट फिल्‍म में कुछ ऐसे प्रोडक्‍ट और सॉल्‍यूशन दिखाए गए हैं, जिनके इस्‍तेमाल से आम लोगों की रोजमर्रा की तमाम जरूरतें आसानी से पूरी हो सकती हैं। इसी इवेंट के दौरान पोर्टेबल सोलर डिवाइस हंस 300 पावरपैक और हंस सोलर उपकरण के लॉंच की घोषणा की गई।

 

मनोज भार्गव की कंपनी द्वारा बनाए गए ये प्रोडक्‍ट सच में एक सोलर पावर स्‍टेशन हैं। जो सोलर ऊर्जा से भारी मात्रा में बिजली बनाकर उसे लंबे समय के लिए स्‍टोर कर सकते हैं। जिससे तमाम लोगों को या कहें कि किस के घर में बिजली की सभी जरूरतों को बहुत कम खर्चे में काफी समय तक पूरा किया जा सकता है।

हंस 300 पावरपैक की अद्भुत क्षमता

यह छोटा सा सोलर पावर बैंक इतनी ज्‍यादा बिजली बनाता और स्‍टोर करता है, जिससे घर की लाइटें, पंखे, टीवी वगैरह कई घरेलू उपकरण मजे से चलाए जा सकते हैं। आपको बता दें कि यह शक्‍तिशाली पावरपैक किसी आम सोलर बैटरी सिस्‍टम से बहुत ज्‍यादा पावरफुल है।

 

यह उपकरण 150 घंटे और 300 घंटे के पावर बैकअप वाले दो मॉडल्‍स में पेश किया गया है। जिनकी कीमत क्रमश: 10 हजार और 14 हजार है। यही नहीं इस उपकरण पर पूरे 12 साल की वारंटी है। कहने का मतलब यह है कि एक बार घर पर लगाने के बाद आपको 2 सालों तक बिजली के बिल से आजादी मिल सकती है।

अगले साल मई से खरीद सकेंगे लोग

बिलियन्स इन चेंज 2 कंपनी की अपने दो पावरबैंक ‘हंस पावरपैक और हंस सोलर ब्रिफकेस’ को अगले साल मई में मार्केट लॉन्‍च की योजना है। मनोज भार्गव बताते हैं कि इस हाईटेक 21वीं सदी में भी दुनिया भर के लाखों करोंड़ो लोग गावों में बिना बिजली के ही रहने को मजबूर हैं। उनके ये सोलर उपकरण शहरों से ज्‍यादा गांवों के लिए वरदान हैं

और जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

ऐसे शुरू करें अपना कॉपी बनाने (Notebook making ) का बिज़नेस

कॉपी अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक महत्वपूर्ण वस्तु है. इसके बिना पढाई लिखाई किया जाना संभव नहीं है. विभिन्न विषयों की आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न तरह के कॉपी का निर्माण किया जाता है, जो कि बाज़ार में अलग अलग कीमतों पर बेचे जाते हैं.

ये नोटबुक अलग अलग ब्रांड और क्वालिटी के साथ मौजूद होते हैं, जिन्हें इनकी क्वालिटी के साथ विभिन्न कीमतों पर बेचीं जाती है. आप भी बहुत कम पैसे में नोटबुक का व्यापार शुरू कर सकते हैं और अपने ब्रांडिंग के साथ इन्हें बेच कर ख़ूब लाभ कमा सकते है. यहाँ पर इस व्यापार से जुडी सभी आवश्यक जानकारियाँ दी जायेंगी. इसी तरह आप कम खर्च में पेपर प्लेट बनाने का व्यापार शुरू कर सकते है.

नोटबुक बनाने का व्यापार कैसे शुरू करें

नोटबुक बनाने के लिए आवश्यक रॉ मटेरियल (Notebook making raw materials)
नोटबुक बनाने के लिए आवश्यक रॉ मटेरियल के विषय में नीचे दिया जा रहा है. इसके लिए विभिन्न कोटेड अथवा अनकोटेड पेपर यानि दिस्ता पेपर और गत्ता की आवश्यकता होती है.

रॉ मटेरियल की कीमत (Price of raw materials):

दिस्ता पेपर : दिस्ता पेपर की क़ीमत 62 रू प्रति किलोग्राम है.
गत्ता : कवर के लिए इस्तेमाल होने वाला गत्ता 1 रूपया प्रति पीस होता है.

कहाँ से ख़रीदें रॉ मटेरियल (Place to buy of raw materials): निम्न वेबसाईट के माध्यम से ऑनलाइन ख़रीदा जा सकता है.
https://dir.indiamart.com/search.mp?ss=notebook+paper&source=autosuggest

नोटबुक बनाने के लिए मशीनरी (Notebook making machines)

  • पिन अप मशीन
  • एज स्क्वायर मशीन
  • कटिंग मशीन

ये मशीनें 4 किलोवाट बिजली लेती है और इसे घरेलु बिजली से भी चलाया जा सकता है.
नोटबुक बनाने के लिए मशीनरी की क़ीमत (Price of Notebook making Machine) :
इन मशीनों की कुल क़ीमत 5.5 लाख से 6 लाख के बीच में होती है.

कहाँ से ख़रीदें :

इसे इस वेबसाईट के माध्यम से ऑनलाइन ख़रीदा जा सकता है:

https://dir.indiamart.com/impcat/notebook-making-machines.html?price

नोटबुक बनाने की प्रक्रिया (Notebook making process)

नोट बुक्स बनाने की प्रक्रिया बहुत ही सरल है, यदि एक बार इसकी मशीनरी समझ ली जाए, तो बहुत आसानी से नोटबुक बनाए जा सकते हैं. इसकी संपूर्ण प्रक्रिया नीचे दी जा रही है.

  • सबसे पहले शीट को (जोकि कॉपी के लिए कवर का काम करता है) उसे अच्छे से इस तरह मोड़ें कि वह कॉपी के अनुसार कवर के आकार में आ जाए.
  • इसके बाद इसमें जितने पन्ने की कॉपी बनानी हो, उतने कागज को भी मोड़ कर उसके अन्दर डाल दें. इसके बाद पिनिंग की प्रक्रिया शुरू होती है.
  • इस प्रक्रिया में इन कवर और उसके अन्दर डाले गये दिस्ता काग़ज़ को पिन करना होता है. इसके लिए फोल्ड किये गये दिस्ता को पिंनिंग मशीन की सहायता से पिन करना होता है. पिंनिंग मशीन की सहायता से यह काम आसानी से हो जाता है.
  • तत्पश्चात इसे एज स्क्वायर मशीन पर ले जाकर इसकी फिनिशिंग करनी होती है. फिनिशिंग यानि कवर से बाहर निकले अतिरिक्त पन्ने आदि की छंटाई वगैरह. फिनिशिंग के बाद नोट बुक पूरी तरह स्क्वायर में हो जाती है.
  • एज स्क्वायर मशीन में पहले इसके पिनिंग का स्थान अच्छे आकार में आ जाता है. इसके बाद इसकी कट्टिंग की बारी आती है. पहले बने हुए कॉपी को सामने से काटें और इसके बाद आवश्यकता हो तो बीच से काट के दो भागों में बाँट दें. पिनिंग किये गये क्षेत्र के अलावा सामने के तीनों भागों को काटना होता है. इस तरह कुछ ही समय में नोटबुक बन के बिकने के लिए तैयार हो जाता है.
  • 15 से 20 मिनट के अन्दर कम से कम 6 से 8 कापियां बन के तैयार हो जाती हैं.

नोटबुक की पैकेजिंग (Notebook packaging)

कॉपी बन के तैयार हो जाने पर इसे आवश्यकतानुसार पैक करना पड़ता है, यदि पैकिंग की बात की जाए तो इसे व्होलसेल अथवा रिटेल के रूप में पैक किया जा सकता है. होलसेल में पैक करने के लिए बड़े पैकेट्स बनाए जा सकते हैं, बड़े बड़े बैग्स में डीलर की आवश्यकता के अनुसार कॉपी पैक किया जा सकता है. यदि रिटेल में अपना ब्रांड सीधे सीधे उतारना चाहते हैं तो इसके लिए प्रति पैकेट 6 कॉपी का पैक बनाएं और विभिन्न स्टेशनरी दुकानों पर पहुंचाएं.

नोटबुक बनाने के व्यापार के लिए कुल खर्च (Notebook manufacturing business cost)
इस व्यव्साय की स्थापना के लिए कुल कर्च 10 लाख रूपए का आता है. इस पैसे में आप ये मशीन भी ख़रीद सकते हैं और साथ ही रॉ मटेरियल भी पा सकते है. इसके अलावा इलेक्ट्रिसिटी वायरिंग वगैरह भी इसी पैसे में हो जायेगी.

इस तरह 10 लाख रुपय की लागत के साथ इस व्यापार की शुरुआत बड़ी आसानी से करके अपना नोटबुक ब्रांड बाज़ार में उतार सकते हैं और मुनाफा कमा सकते हैं.

नोटबुक बनाने के व्यापार में लाभ (Notebook manufacturing business profit)

एक किलो पेपर में लगभग 6 से 7 नोटबुक बनाई जा सकती है. यदि इसे रिटेल में बेचें तो 15 रूपए प्रति पीस बिकता है. एक नोट बुक बनाने में कुल लागत 11 रूपए की पड़ती है. व्होलसेल में इस तरह की नोटबुक की क़ीमत 12 से 13 रूपए की होती है. इस तरह से व्होलसेल में प्रत्येक नोटबुक में 2 रू का लाभ कमाया जा सकता है.

आखिर अंडा मांसाहारी है या शाकाहारी? साइंस के मुताबिक ये रहा जवाब

दुनिया में ऐसे कई सवाल हैं, जिन्हें हम बचपन से सुनते तो आ रहे हैं लेकिन उनके जवाब हमें अभी तक नहीं पता। जैसे, दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा? लेकिन आज हम आपको एक ऐसे सवाल का जवाब देने जा रहे हैं, जिसके ऊपर लंबे समय से बहस चल रही है।

अंडा शाकाहारी है या मांसाहारी…

कई शाकाहारी लोग अंडे को मांसाहारी समझकर नहीं खाते। उनका लॉजिक होता है कि चूंकि अंडे मुर्गी देती है, इस कारण वो नॉन-वेज है। लेकिन अगर ऐसी बात है तो दूध भी जानवर से ही निकलता है, तो वो शाकाहारी कैसे है?

अगर आपको ऐसा लगता है कि अंडे से बच्चा निकल सकता था, इस कारण वो मांसाहारी है, तो आपको बता दें कि बाजार में मिलने वाले ज्यादातर अंडे अनफर्टिलाइज्ड होते हैं। इसका मतलब, उनसे कभी चूजे बाहर नहीं आ सकते। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने भी साइंस के जरिए इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है। उनके मुताबिक, अंडा शाकाहारी होता है।

यह तो हर किसी को पता है कि अंडे के तीन हिस्से होते हैं- छिलका, अंडे की जर्दी और सफेदी। रिसर्च के मुताबिक, अंडे की सफेदी में सिर्फ प्रोटीन मैजूद होता है। उसमें जानवर का कोई हिस्सा मौजूद नहीं होता। ता कारण,तकनीकी रूप से एग वाइटशाकाहारी होता है।

अंडे की जर्दी

एग वाइट की ही तरह एग योक में भी सबसे ज्यादा प्रोटीन, कोलेस्ट्रोल और फैट मौजूद होता है। लेकिन जो अंडे मुर्गी और मुर्गे के संपर्क में आने के बाद दिए जाते हैं, उनमें गैमीट सेल्स मौजूद होता है, जो उसे मांसाहारी बना देता है।

आगे पढ़ें, मुर्गी कैसे देती है अंडा?

आपको बता दें, कि 6 महीने की होने के बाद मुर्गी हर 1 या डेढ़ दिन में अंडे देती ही है, भले ही वो किसी मुर्गे के संपर्क में आए चाहे ना आए। इन अंडों को ही अनफर्टिलाइज्ड एग कहा जाता है। इनसे कभी चूजे नहीं निकल सकते। तो अगर आपने अभी तक मांसाहारी समझ अंडे नहीं खाए, तो इसे अभी से खाना शुरू कर दीजिए।