अब हाइड्रोजेल से सिर्फ एक सिंचाई से होगी फसल

इस हालात में खेती को अगर बचाना है तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा जिसमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो और पूरी कवायद में hydrogel (हाइड्रोजेल) किसी चमत्कार से कम नहीं है।अब बार बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ एक बार सिंचाई करने पर इतना पानी सोख लेता है की बाद में सिंचाई की जरूरत ही नहीं रहती ।

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान जिसे पूसा संस्थान भी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने ही इस अद्र्घ-कृत्रिम हाइड्रोफिलिक पॉलिमर जेल का विकास किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस जेल में कई ऐसी खासियत हैं जो जैव चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे तरल पदार्थों को अवशोषित करने वाले जेल से उसे अलग करती है।

इसे ‘पूसा हाइड्रोजेल’ नाम दिया गया है । इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन में केवल 2.5 से 3.75 किलो जेल डालने की जरूरत होती है। अब तक दुनिया में ऐसे जितने भी जेल तैयार किए गए हैं उनकी तकरीबन 10 किलो मात्रा एक हेक्टेयर जमीन में डालनी पड़ती है।

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है जिसमें पता चला है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) की मदद से बारिश और सिंचाई के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।

हाइड्रोजेल पोलिमर है जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं। हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

शोधपत्र में कहा गया है कि हाइड्रोजेल खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुँचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है। शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम हाइड्रोजेल ही पर्याप्त है। हाइड्रोजेल 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहाँ सूखा पड़ता है।

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है, बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुँचाता है।

हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं। हाइड्रोजेल के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है।

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

Hydrogel (हाइड्रोजेल) कैसे काम करता है ?

हाइड्रोजेल अपने भार के मुकाबले 400 गुना से भी ज्यादा पानी को सोख सकते हैं. धीरे-धीरे जब इसके आसपास गर्मी बढ़ने लगती है, तो हाइड्रोजेल तेजी से पानी छोडना शुरू करता है.

यह सोखे गये जल का 95 फीसदी तक वापस छोड़ता है. पानी को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान यह रीहाइड्रेट होगा और इसे स्टोर करने के लिए इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया जा सकता है. इस प्रकार यह प्रक्रिया दो से पांच सालों तक जारी रह सकती है, जिस दौरान बायोडिग्रेडेबल हाइड्रोजेल डिकंपोज होता रहेगा. यानी फसलों के लिए पानी की जरूरतों को पूरा करता रहेगा.