इस तरह अपनी आय दुगने से ज्यादा कर सकते हैं किसान, कृषि वैज्ञानिक ने किया दावा

केंद्र सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कर रही है। विपक्ष के द्वारा इस दावे पर खड़े किये जा रहे सवालों से इतर वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों की आय दोगुनी या उससे भी अधिक करना संभव है, लेकिन इसके लिए किसानों को पारंपरिक खेती की बजाय आधुनिक तकनीकों से व्यावसायिक खेती को अपनाना होगा।

गेहूं या चावल जैसी ज्यादा लागत और कम बचत वाली फसलों की बजाय फलों, फूलों, सब्जियों या किसी अन्य व्यावसायिक उपज को खेती का केंद्र बनाना होगा। केंद्र की तरफ से इसके लिए किसानों को तकनीकी और वित्तीय मदद उपलब्ध करवानी होगी।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के वैज्ञानिक डॉ. एके दुबे ने अमर उजाला को बताया कि किसान को ‘अन्न उत्पन्न करने वाली सोच’ की बजाय ‘व्यावसायिक सोच’ को अपनाना चाहिए। जैसे कोई किसान एक एकड़ भूमि पर गेंहू या चावल जैसी फसल का उत्पादन करके अधिकतम पचास से साठ हजार रूपये का लाभ कमा पाता है,

लेकिन इसी भूमि पर अगर वह नींबू की व्यावसायिक खेती वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से करता है तो सभी खर्चे काटने के बाद वह प्रति एकड़ न्यूनतम दो लाख रूपये से लेकर चार लाख रूपये वार्षिक आय का शुद्ध लाभ कमा सकता है।

नींबू की फसल के लिए कुछ जानकारी

इस वर्ग में नींबू, मौसमी फल, मीठी नारंगी, संतरा, ग्रेप फ्रूट, चकोतरा या टैंजरिन जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं। अपने गुणों के कारण भारत में कागजी नींबू की खेती काफी लाभप्रद है। इसके लिए पूसा इंस्टिट्यूट द्वारा उत्पन्न की गई पूसा अभिनव और पूसा उदित सबसे बेहतर किस्में हैं। ये एक वर्ष में दो बार, अगस्त-सितंबर और मार्च-अप्रैल के बीच तैयार होती हैं।

नींबू के एक पौधे को 15X15 फीट की जगह चाहिए। इस तरह एक एकड़ में लगभग 180 पौधे तैयार किये जा सकते हैं। प्रति पौधा प्रति वर्ष दो हजार तक फल दे सकता है। एक एकड़ में नींबू के पौधे लगाने में 15 से 20 हजार रूपये तक की लागत आ सकती है। शुरू के तीन से चार वर्ष किसान पौधों के बीच इंटरक्रॉपिंग कर अन्य फसलें उगाते रह सकते हैं, लेकिन इसके बाद पौधे बड़े हो जाते हैं और फल देना शुरू कर देते हैं। किसान इस दौरान आय करने लगता है। लेकिन पांचवें से छठें वर्ष में पौधे पूर्ण व्यावसायिक बन जाते हैं और किसान इनसे प्रति एकड़ लाखों रूपये की आय कमा सकते हैं।

प्रति वर्ष प्रत्येक पौधे को 50 किलो देसी खाद, 600 ग्राम नाइट्रोजन, 400 ग्राम फास्फोरस, 600 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। कीटनाशक, फफूंदनाशक, जुताई-सिंचाई और फसल को बाज़ार तक पहुंचने को मिलाकर प्रति वर्ष डेढ़ लाख रूपये तक की लागत आ सकती है। उत्पादित फसल आज के बाज़ार की दर से लगभग सात लाख रूपये में बिक सकती है और इस तरह किसान किसी आकस्मिक नुकसान को झेलने के बाद भी चार लाख रूपये से अधिक की आय कर सकता है।

नींबू में अगस्त-सितंबर वाली फसल में किंकर नाम की बीमारी लग सकती है। इससे 30 फीसद तक फसल खराब हो सकती है। लेकिन उचित कीटनाशकों के उपयोग से यह नुकसान दस फीसद से भी कम किया जा सकता है। मार्च-अप्रैल में गर्म मौसम होने के कारण यह बीमारी नहीं लगती। वैज्ञानिक डॉ. एके दुबे ने बताया कि वे किंकर बीमारी प्रतिरोधी नींबू की फसल तैयार करने में जुटे हैं। प्रयास चल रहा है कि वर्ष 2025 तक वे पूसा अभिनव की ऐसी प्रजाति विकसित कर दें जिसमें यह बीमारी नहीं लगेगी।