अपनी गाड़ी के टायर में डाल दें ये लिक्विड, फिर 10 हजार KM तक गाड़ी नहीं होगी पंचर; कीमत भी है इतनी कम

टू व्हीलर हो या फोर व्हीलर, कभी न कभी ये पंचर जरूर होती है। ऐसे में यदि आप कहीं घूमने जा रहे हैं तब गाड़ी के पंचर होने से मजा खराब हो जाता है। खासकर, गर्मी के मौसम में पंचर होने के केस ज्यादा होते हैं। इस स्थिति में यदि पंचर सुधारने वाला आसपास नहीं हुआ, तब मुसीबत दोगुनी हो जाती है। हालांकि, मार्केट में एक लिक्विड ऐसा भी आता है जिसका यूज करने के बाद आपकी गाड़ी कभी पंचर ही नहीं होगी।

एंटी पंचर लिक्विड

मार्केट में अब कई कंपनियों के ऐसे लिक्विड मौजूद हैं, जिन्हें एंटी पंचर लिक्विड के नाम से जाना जाता है। इन लिक्विड को ऑनलाइन और ऑफलाइन खरीदा जा सकता है। इस तरह के लिक्विड की कीमत 500 रुपए से शुरू होकर 800 और 1000 रुपए तक है। कीमत के साथ इनकी क्वांटिटी भी बढ़ जाती है।

ऐसे करता है काम

इस लिक्विड को कार, बाइक या स्कूटर के टायर में फिल किया जाता है। फिल करने की 2 प्रॉसेस हैं। पहली इस लिक्विड को किसी इंजेक्शन की मदद से टायर में इंटर किया जाता है, और दूसरा टायर की नॉब से इसे अंदर इंटर किया जाता है। इसके लिए सबसे पहले टायर की हवा निकाली जाती है फिर नॉब से लिक्विड को अंदर डाला जाता है। बात में टायर में हवा भर दी जाती है।

टायर में पहुंचने के बाद ये अंदर का पूरा एरिया कवर कर लेता है। इस प्रोसेस में 2 मिटन का वक्त लगता है। अब यदि टायर पंचर होता है तब पंचर वाली जगह से ये लिक्विड बाहर आता है और सूख जाता है। यानी हवा बाहर नहीं निकल पाती। इस लिक्विड को सेल करने वाली कई कंपनियां 10 हजार किलोमीटर तक इसके काम करने की गारंटी भी देती हैं।

टायर को रखता है कूल

ये लिक्विड टायर को पंचर से बचाने के साथ उसे कूल रखने का काम भी करता है। गर्मी के मौसम में ये काफी असरदार भी होता है। खासकर बाइक और स्कूटर में इसका यूज फायदेमंद साबित होता है।

ये है सबसे पौष्टिक चारा ,एक बार लगाने पर पांच साल के लिए मिलेगा चारा

पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है। घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है।

एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है। नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है।

एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है। प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

भारत का ये शहर, जहां आलू-प्याज से भी सस्ते बिकते हैं काजू !

काजू खाने या खिलाने की बात आते ही आमतौर पर लोग जेब टटोलने लगते हैं. ऐसे में कोई कहे कि काजू की कीमत आलू-प्याज से भी कम है तो आप शायद ही विश्वास करेंगे. यानी अगर आप दिल्ली में 800 रुपए किलो काजू खरीदते हैं तो यहां से 12 सौ किलोमीटर दूर झारखंड में काजू बेहद सस्ते हैं. जामताड़ा जिले में काजू 10 से 20 रुपये प्रति किलो बिकते हैं.

जामताड़ा के नाला में करीब 49 एकड़ इलाके में काजू के बागान हैं. बागान में काम करने वाले बच्चे और महिलाएं काजू को बेहद सस्ते दाम में बेच देते हैं. काजू की फसल में फायदा होने के चलते इलाके के काफी लोगों का रुझान इस ओर हो रहा है. ये बागान जामताड़ा ब्लॉक मुख्यालय से चार किलोमीटर की दूरी हैं.

बागान बनने के पीछे है दिलचस्प कहानी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जामताड़ा में काजू की इतनी बड़ी पैदावार चंद साल की मेहनत के बाद शुरू हुई है. इलाके के लोग बताते हैं जामताड़ा के पूर्व उपायुक्त कृपानंद झा को काजू खाना बेहद पसंद था. इसी वजह वह चाहते थे कि जामताड़ा में काजू के बागान बन जाए तो वे ताजी और सस्ती काजू खा सकेंगे.

इसी वजह से कृपानंद झा ने ओडिशा में काजू की खेती करने वालों से मिले. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से जामताड़ा की भौगोलिक स्थिति का पता किया. इसके बाद यहां काजू की बागवानी शुरू कराई. देखते ही देखते चंद साल में यहां काजू की बड़े पैमाने पर खेती होने लगी

कृपानंद झा के यहां से जाने के बाद निमाई चन्द्र घोष एंड कंपनी को केवल तीन लाख रुपए भुगतान पर तीन साल के लिए बागान की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया. एक अनुमान के मुताबिक बागान में हर साल हजारों क्विंटल काजू फलते हैं. देखरेख के अभाव में स्थानीय लोग और यहां से गुजरने वाले काजू तोड़कर ले जाते हैं.

इस किसान ने बिना खर्च किये खोजा अनोखा फार्मूला

15 साल पहले जिस जमीन को बंजर समझा गया, उस जमीन पर एक किसान ने जैविक खेती करके ढाई किलो वजन वाली मौसम्बी पैदा की। यही नहीं किसान ने मेहनत करके जमीन को इस लायक कर दिया, जहां पर अब 20 किलो को कटहल और सवा किलो वजन वाला आम हो रहा है।

उनका प्रयोग रुका नहीं है, बल्कि वे एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उन्हें एग्रीकल्चर कॉलेज में हॉर्टीकल्चर पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं।

  • ये किसान हैं प्राण सिंह। ग्वालियर से 25 किमी दूर जहानपुर गांव। आसपास खेत हैं, लेकिन ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं। केवल प्राण सिंह अपने खेत और बगीचे में काम करते नजर आते हैं।
  • वे बताते हैं कि 15 साल पहले जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो गई, क्योंकि किसानों ने जमकर यूरिया और केमिकल का इस्तेमाल किया। उसके बाद यहां के ज्यादातर किसान ने फसल लगाना बंद कर दी।
  • प्राण सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने खुद ही खेत में मेहनत करना शुरू की। यूरिया और केमिकल का उपयोग बंद किया। खेत के आसपास 3 तालाब बनाए, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया।

जमीन को बनाया उपजाऊ

  • इससे जमीन का वाटर लेबल सही हुआ। फिर उन्होंने गोबर, घास-फूस की खाद का इस्तेमाल किया। वर्मी कंपोस्ट की ट्रेनिंग ली। इसके बाद खेत की उर्वरा शक्ति वापस लौट आई।
  • उन्होंने खेत में नींबू, संतरा और मौसम्बी के पौधे लगाए। इस साइट्रस वैरायटी के पौधों के साथ कई प्रयोग प्राण सिंह ने किए। इसका नतीजा यह निकला कि उनके पेड़ में मौसम्बी का वजन ढाई किलो तक पहुंच गया।

प्राण सिंह ने विकसित की कई नयी वैरायटी

  • यही नहीं उन्होंने कटहल, अमरूद सहित कई पौधों की ग्राफटिंग की, जिससे नयी वैरायटी विकसित हुई। प्राण सिंह बताते हैं कि यह सब प्राकृतिक तरीके से खेती करने का नतीजा है।
  • केमिकल और दूसरी रसायनिक खादों से जमीन और फसल को नुकसान होता है। प्राण सिंह अब कोशिश कर रहे हैं कि एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी की फल लगें। उनके मुताबिक यह संभव है, क्योंकि ये तीनों एक प्रजाति के फल हैं।
  • प्राण सिंह की मेहनत देखकर आसपास बंजर खेतों वाले किसान भी अपनी जमीन में वापस खेती करने के लिए लौट रहे हैं। अब तो एग्रीकल्चर कॉलेज के साथ कृषि विभाग के अफसर प्राण सिंह को जैविक खेती की टिप्स देने के लिए बुलाते हैं।

अब किसानों को हर साल 12,500 रुपए मिलेंगे, अक्टूबर में लॉन्च होगी ये नई योजना

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने प्रदेश के किसानों को आर्थिक मदद देने के लिए नई योजना लॉन्च करने का ऐलान किया है। इस योजना को रायतू भरोसा स्कीम नाम दिया गया है। जानकारी के अनुसार, सीएम रेड्डी इस योजना को 15 अक्टूबर को लॉन्च करेंगे। इस योजना के तहत प्रदेश के किसानों को 12,500 रुपए सालाना मिलेंगे।

नायडू की योजना को किया बंद

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने वर्तमान में चल रही अन्नदाता सुखीभव स्कीम को बंद करके रायतू भरोसा स्कीम को लॉन्च किया है। आंध्र प्रदेश के पिछले मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने लोकसभा चुनावों से पहले फरवरी 2019 में अन्नदाता सुखीभव स्कीम को लॉन्च किया था। इस स्कीम के तहत प्रदेश के किसानों को 10 हजार रुपए दिए जा रहे हैं।

अन्नदाता सुखीभव स्कीम के तहत जिन किसानों को केंद्र सरकार की पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ मिल रहा है, उन्हें प्रदेश सरकार की ओर से चार हजार रुपए अतिरिक्त दिए जा रहे हैं। वहीं जिन किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ नहीं मिल रहा है, उन्हें 10 हजार रुपए की राशि दी जा रही है। यह राशि सीधे किसानों के खाते में जमा कराई जाती है।

दो चरणों में 99 लाख परिवार पात्र चुने गए

अन्नदाता सुखीभव योजना के तहत दो चरणों में प्रदेश के करीब 99 लाख परिवारों को लाभार्थी के तौर पर चुना गया है। अन्नदाता सुखीभव योजना की वेबसाइट के अनुसार पहले चरण में 50,20,972 किसान परिवारों को इसके लिए चुना गया है,

जिसमें से 46,49,369 किसान परिवारों को अब तक भुगतान किया जा चुका है। दूसरे चरण में 48,93,238 किसान परिवारों को चुना गया है जिसमें से अब तक 45,24,330 किसानों को भुगतान किया जा चुका है।

जहां एक किलो मीट की कीमत है 3 लाख रुपए, हालात इतने बुरे की वहां की सेना ने भी कर दी बगावत

बेतहाशा महंगाई का सामना कर रहे वेनेजुएला में सेना ने बगावत कर दिया है. वेनेजुएला की सेना में डॉक्टर कर्नल रुबेन पाज जिमेनेज ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो से अपनी वफादारी खत्म करने की घोषणा की. कर्नल ने शनिवार को जारी एक वीडियो में कहा, ‘सशस्त्र बलों में हमारे में से 90 फीसदी लोग वास्तव में नाखुश हैं. हमें उन्हें सत्ता में बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.’

उन्होंने अपने साथी सैनिकों से वेनेजुएला को मानवीय सहायता देने में मदद करने का अनुरोध किया.  एक सप्ताह पहले ही वायु सेना जनरल फ्रांसिस्को यानेज ने भी मादुरो से अपनी वफादारी खत्म कर दी थी. वेनेजुएला में सत्ता में रहने के लिए सेना का समर्थन महत्वपूर्ण होता है.

यहां के नोटों की नहीं रह गई है कोई कीमत

वेनेजुएला के आर्थिक हालात बेहद खराब हो गए हैं. यहां महंगाई आसमान छू रही है. यहां आलम यह है कि यहां एक ब्रेड की कीमत हजारों रुपए हो गए हैं. एक किलो मीट के लिए 3 लाख रुपए और एक लीटर दूध के लिए 80 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं.

यहां की सरकार ने दुनिया भर के देशों से गुहार लगाई है कि वे यहां के हालात सुधारने में उनकी मदद करें. वहीं कोलंबिया का कहना है कि चंद दिनों में वेनेजुएला के करीब 10 लाख लोग उसके यहां आकर शरण ले चुके हैं, जिसके चलते उनपर दबाव बन रहा है. यहां महंगाई दर 10 लाख प्रतिशत तक पहुंच चुका है. वेनेजुएला में एक कप कॉफी की कीमत 2000 बोलिवर है.

वेनेजुएला सरकार दिन रात नोट छाप रही है ताकि बजट पूरा किया हो सके. लेकिन इन सबके कारण हालात बिगड़ गए हैं. वेनेजुएला की राजधानी काराकास में एक नर्स मेगुआलिदा ओरोनोज का कहना है कि हम सब यहां अरबपति हैं. लेकिन फिर भी हम गरीब हैं. मेरा वेतन 50 लाख महीना है, लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए ढंग का एक वक्त का खाना नहीं खरीद सकती.

वेनेजुएला में एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर को अपना जूता मरम्मत करवाने के लिए चार महीने की सैलरी के बराबर 20 अरब बोलिवर (करीब 4 लाख रुपये) देने पड़े.

पानी से भी सस्ता है पेट्रोल

वेनेजुएला में एक लीटर पेट्रोल की कीमत केवल 62 पैसे है. अगर, भारत से मुकाबला करें तो यहां एक लीटर पेट्रोल के लिए आपको जितनी कीमत चुकानी पड़ती है, उसमें आप वहां 100 लीटर से भी ज्यादा पेट्रोल खरीद सकते हैं.

12वीं के बाद करें यह कोर्स, मिल सकती है 50 हजार रुपए महीने तक की नौकरी

आज देश में बड़ी संख्या में युवा शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इनमें से बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने का बाद भी नौकरियों से वंचिंत हैं। कई जानकारों का मानना है कि मार्गदर्शन के अभाव में युवा कम नौकरियों की संभावना वाले कोर्स कर लेते हैं।

इससे उन्हें नौकरी पाने में परेशानी होती है। आज हम आपको एक ऐसे ही कोर्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे करने का बाद आपकी नौकरी की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी। तो आइए जानते हैं इस कोर्स के बारे में…

आज के खानपान, प्राकृतिक असंतुलन और पर्यावरण प्रदूषण के कारण मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में विशेषज्ञों की मांग बढ़ रही है। मरीजों के उपचार में डॉक्टरों के साथ-साथ फार्मासिस्टों का भी अहम योगदान है। यह फार्मासिस्ट गुणवत्तापूर्ण दवाइयों का निर्माण, उनका रिएक्शन और दवाइयों के मरीजों पर प्रभाव की जानकारी देते हैं। इस कारण प्राइवेट सेक्टर से साथ-साथ सरकारी क्षेत्र में भी फार्मासिस्टों की मांग बनी रहती है।

 योग्यता

एक फार्मासिस्ट बनने के लिए 12वीं में जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिकी विज्ञान में 50 प्रतिशन अंक होने चाहिए। इसके बाद फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त संस्थान में बैचलर इन फार्मेसी कोर्स में दाखिला ले सकते हैं। प्रत्येक संस्थान में प्रवेश के लिए अलग-अलग प्रक्रिया है। यह कोर्स चार साल का होता है।

बैचलर इन फार्मेसी करने के बाद आप दो साल का मास्टर इन फार्मेसी कोर्स भी कर सकते हैं। कोर्स के दौरान आपको दवा निर्माण के संयंत्र, दवाइयों के मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर और कॉम्बिनेशन, दवा निर्माण की तकनीक और तरीका, दवा परीक्षण, दवा परीक्षण संबंधी कानूनों के बारे में जानकारी दी जाती है।

यहां हैं नौकरी के अवसर

सरकारी और निजी अस्पतालों में हमेशा फार्मासिस्टों की मांग बनी रहती है। सरकार दवाइयों की जांच और क्वालिटी कंट्रोल के लिए औषधि निरीक्षकों की भर्ती करती है। दवा निर्माता कंपनियां केमिस्ट, क्वालिटी कंट्रोल, फार्मासिस्ट आदि पदों पर योग्य युवाओं की नियुक्ति करती हैं। फार्मेसी का कोर्स करने के बाद निजी सेक्टर में आसानी से 15 से 20 हजार रुपए महीने की नौकरी मिल जाती है।

यदि आप सरकारी नौकरी पा लेते हैं तो आपको हर महीने 40 से 50 हजार रुपए की सैलरी मिलेगी। इसके अलावा फार्मासिस्ट अपना मेडिकल स्टोर खोलकर भी हर महीने हजारों रुपए कमा सकता है। आपको बता दें कि मेडिकल स्टोर का लाइसेंस केवल फार्मासिस्टों को ही मिलता है।

यहां से कर सकते हैं कोर्स

  •  गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी दिल्ली
  • जामिया मिलिया हमदर्द दिल्ली
  • इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंस चंडीगढ़
  • इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई
  • गोवा कॉलेज ऑफ फार्मेसी पणजी
  • आईआईटी बीएचयू वाराणसी
  • मणिपाल कॉलेज ऑफ फार्मास्यूटिकल मेडिकल साइंस मणिपाल
  • पुना कॉलेज ऑफ फार्मेसी पुणे

फिर से लॉन्च होगी Ambassador, इस लुक में आएगी नज़र

भारत की आइकॉनिक कार Ambassador की भारत में दोबारा वापसी होगी। वो भी बिल्कुल नए अंदाज और नए लुक में। फ्रेंच के PSA समूह ने 2017 में Ambassador की नेमप्लेट वापस हासिल कर ली और जल्द ही इसे रीलॉन्च करने की योजना है। कंपनी भारत में इसके इलेक्ट्रिक फ्यूल ऑप्शन में उतारेगी।

2022 तक Ambassador कार की होगी लॉन्चिंग

यह कंपनी की इलेक्ट्रिक Ambassador सेडान कार होगी। यह कंपनी Peugeot की कारों की तरह होगी। PSA Peugeot Citroen ग्रुप ने आधिकारिक तौर पर भारत में Citroen ब्रांड की घोषणा कर दी है। इसी दौरान कंपनी Ambassador को भारत में योजना करने की योजना का जिक्र किया। Ambassador रेंज का कारें भारत में 2022 तक उतारी जा सकती हैं।

Ambassador हैचबैक भी उतार सकती है कंपनी

Ambassador ब्रांडेड कारों की एक विशेष ऑनलाइन बिक्री रणनीति का उपयोग करके बेचे जाने की संभावना है। कंपनी सबसे पहले एक कॉम्पैक्ट एसयूवी या क्रोसओवर स्टाइल कार को लॉन्च कर सकती है और फिर बाद में कंपनी हैचबैक उतार सकती है। CarandBike में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार Ambassador ब्रांड का उपयोग केवल भारत में बेचे जाने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए किया जाएगा।

पुलिसवाले ने बनाया झूला पंप, अब बिना डीज़ल और बिजली के मुफत में होगी सिंचाई

महँगी होती बिजली रोज़ बढ़ते पेट्रॉल डीजल के दाम और खेती में बढ़ते लागत के बीच फसल की सिचाई करना किसानों की एक बड़ी समस्या है। लेकिन इन सब के बीच सिंचाई के लिए मोटर चलवाने की झंझट, बिजली की टेंशन, डीजल की झंझट, गैस के दाम और भी कई सारे लफड़े। अब सिंचाई को लेकर आप को भी मिल सकती है इन सभी झंझटों से फुर्सत। क्योंकि अब आ गया है झूला पंप, जिसे बनाया है बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के कल्‍याणपुर थाने में पदास्‍थापित जमादार मेंहीलाल यादव ने।

पंप से प्रति घंटे 10 हजार लीटर पानी निकाला जा सकता है। लागत बेहद कम है। इससे पहले गैस सिलेंडर से पानी निकालने की राह मेहीलाल ने निकाली थी। लेकिन, अब सामान्य ढंग से कम खर्च में पानी के इंतजाम का यंत्र तैयार किया है। उनके कार्य की सराहना कई स्तरों पर हुई है।

खगडिय़ा जिले के बापूनगर निवासी मेहीलाल यादव भागलपुर जिला बल में बहाल हुए। वर्ष 2007 में कटिहार जिले में तैनात थे। वहां किसानों को डीजल व पेट्रोल के लिए गैलन लेकर भटकते देखा। इस स्थिति से निजात दिलाने की सोची। आखिरकार बगैर ईंधन से संचालित झूला पंप का निर्माण किया। फिलहाल मेहसी लीची अनुसंधान केंद्र में एक झूला पंप उपयोग में है।

आती है 25 हजार की लागत

झूला पंप बनाने के लिए चापाकल के हेड, सेक्शन पाइप, साइकिल पाइप, वाशर, रॉड का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें करीब 25 हजार की लागत आती है। यह बगैर ईंधन संचालित होता है। किसी भी भूगर्भीय जलस्रोत से पंप को पाइप के सहारे बिल्कुल पंप सेट की तरह जोड़ झूले पर झूलना आरंभ कर देने पर पानी मिलता है।

इसके लिए दो लोगों की आवश्यकता होती है। लेकिन, एक आदमी है तो दूसरी तरफ ईंट या किसी अन्य वस्तु का भार देकर झूला जा सकता है। जैसा जल स्रोत होगा और जिस स्तर पर झूला चलेगा, उसी हिसाब से पानी निकलेगा।

सरकार के पत्र से बढ़ा उत्साह

सूबे के योजना व विकास विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. अरङ्क्षवद कुमार ने मेहीलाल को पत्र लिखकर स्टेट इनोवेशन काउंसिल द्वारा मुख्यमंत्री नवप्रवर्तन प्रोत्साहन योजना से वित्तीय सहायता प्रदान करने को कहा था।

इसके पहले केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर चिदंबरम ने 2007, पूर्णिया के तत्कालीन आयुक्त पंकज कुमार 2013 और कटिहार के तत्कालीन जिलाधिकारी व सांसद ने सम्मानित किया था। दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस की झांकी में झूला पंप हुआ था।

 झूला पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

कभी भी न खाएं बिना घी की रोटी, शरीर को होते हैं ये बड़े नुक्सान

दोस्तों, घी को मना करना सीधा सेहत को मना करना है. पहले के जमाने में लोग रोजमर्रा के खानों में घी का इस्तेमाल करते थे. घी का मतलब देसी गाय का शुद्द देशी घी. घी को अच्छा माना जाता था. और कोलेस्ट्रोल और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ कभी सुनने में भी नही आती थी.

लेकिन फिर शुरू हुई घी की गलत पब्लिसिटी, बड़ी बड़ी विदेशी कंपनियों ने डॉक्टरों के साथ मिलकर अपने बेकार और यूजलेस प्रोडक्ट को सेल करने के लिए लोगों में घी के प्रति नेगेटिव पब्लिसिटी शुरू की. जबकि रिफाइंड और दुसरे वनस्पति तेल और घी इन सब रोगों का कारण है.

घी न खाने में प्राउड फील करने लगे कि वो हेल्थ कांसियंस है. क्योकि जब आप एक ही चीज झूठ को बार बार टीवी पर दिखाओगे तो वो लोगो को सच लगने लगता है. जबकि घी खाना नुकसानदायक नही बहुत ही फायदेमंद है. घी हजारों गुणों से भरपूर है, खासकर गाय का घी तो खुद में ही अमृत है.

घी हमारे शरीर में कोलेस्ट्रोल को बढाता नही बल्कि कम करता है. घी मोटापे को बढाता नही बल्कि शरीर के ख़राब फैट को कम करता है. घी एंटीवायरल है और शरीर में होने वाले किसी भी इन्फेक्शन को आने से रोकता है. घी का नियमित सेवन ब्रेन टोनिक का काम करता है. खासकर बढ़ते बच्चों की फिजिकल और मेंटली ग्रोथ के लिए ये बहुत ही जरुरी है.

घी हमारे इम्यून सिस्टम को बढाता है. और बिमारियों से लड़ने में आपकी मदद करता है. घी हमारे डाइजेस्टीव सिस्टम को भी ठीक रखता है जो आजकल सबसे बड़ी प्रॉब्लम है. आज हर दूसरा व्यक्ति कब्ज का मरीज है. दिन में कई कई बार शोचालय जाता है

अब हम बात करते है कि घी को कितना और कैसे खाए

एक नार्मल इन्सान के लिए 4 चम्मच घी काफी है. घी को पका कर या बिना पकाए दोनों तरीके से खा सकते है. चाहे तो इसमें खाना पका लें या फिर बाद में खाने के ऊपर डालकर खा लें. दोनों ही तरीके से घी बहुत ही फायदेमंद है. और सबसे जरुरी बात अगर आप सबसे ग्लोइंग, शाइनिंग और यंग दिखना चाहते हैं तो घी जरुर खाएं क्योंकि घी एंटीओक्सिडेंट जोकि आपकी स्किन को हमेशा चमकदार और सॉफ्ट रखता है