अब गाय के गोबर से बनेगे कपड़े, नीदरलैंड में हुई बड़ी खोज

गाय जिसे हमारे देश में माता का दर्जा दिया जाता है. गाय हमारे बहुत काम आती है चाहे वो खेती करने का काम हो या फिर दूध देने का ही क्यों ना हो. वैसे गाय का गोबर भी बहुत फायदेमंद होता है और इससे उपले और कीटनाशक दवाइयां बनाने में भी उपयोग में लिया जाता है.

लेकिन अगर हम आपसे कहे कि गाय के गोबर से ड्रेस भी बन सकती है तो शायद आप ये सुनकर हैरान हो जाएंगे और इसे मजाक ही समझेंगे. लेकिन हम आपको बता दें ये सच है. नीदरलैंड की एक स्टार्टअप कंपनी ने गाय के गोबर से ड्रेस बनाई है.

जी हां… जलिला एसाइदी की एक महिला नीदरलैंड की रहने वाली हैं जो बायोआर्ट एक्सपर्ट हैं. जलिला स्टार्टअप चलाती हैं. जलिला ने गोबर में से सेल्यूलोज़ अलग करके उससे एक ड्रेस बनाने का तरीका निकाला है.जलिला की इस नायाब तरकीब के लिए उन्हें चिवाज वेंचर एंड एचएंडएम फाउंडेशन ग्लोबल अवॉर्ड भी मिला है.

इस अवार्ड के साथ उन्हें दो लाख डॉलर (1.40 करोड़ रुपये) की इनामी राशि भी प्राप्त हुई है.जलील ने ‘वन डच’ नाम से कुछ साल पहले ही एक स्टार्टअप शुरू किया था. उन्होंने अपने इस एक्सपेरिमेंट में गाय के गोबर को रीसाइकिल करके उससे पेपर, बायो-डीग्रेडेबल प्लास्टिक और ड्रेसेस भी बनाई हैं.

ज़लीला ने गोबर से जो सेल्युलोज़ निकाला है उसे उन्होंने ‘मेस्टिक’ नाम दिया है. ज़लीला ने अपने इस इनोवेशन के जरिए सबसे पहले उससे टॉप और शर्ट बनाए. ज़लीला ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि गोबर को सभी लोग वेस्ट समझते थे और इसे बदबूदार भी मानते थे लेकिन गोबर बहुत ही काम की चीज़ है और आने वाले समय में गोबर से बनीं ड्रेस फैशन शोज़ में भी दिखेंगी.

अगर आपकी कार में भी रहती है बदबू तो अपनाये ये 5 तरीके, खुशबू से महकेगी आपकी कार

आजकल लाइफ इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि लोगों की पर्सनल लाइफ कहीं न किसी डिस्टर्ब हो रही है, लोगों के पास खाना-खाने का भी टाइम नहीं है, लोग अपनी कार में ही खाना-पीना करते हैं,

कई बार कार में खाना कार में ही रख दिया जाता है और सफाई तक करने का समय नहीं होता जिसकी वजह से कार में बदबू आने लगती है ऐसे में कई बार दोस्तों के सामने शर्मिदा भी होना पड़ता है। कार में बदबू आने के कई और भी कारण होते हैं। ऐसे में हम आपको 5 ऐसे तरीके बता रहे हैं जिनकी वजह से आपकी कार में खुशुबू रहेगी।

अपनी कार को रखें साफ: कोशिश कीजिये की आप अपनी कार को रोज साफ करें और कार में किसी भी तरह का कोई कचरा न रहने दें। क्योकिं अक्सर कार की ठीक से सफाई नहीं हो पाती और ड्रिंक केन्स या रेपर्स से कार में गंध पैदा होती है जिसकी वजह से कार में रखा परफ्यूम भी ठीक से काम नहीं कर पाता।

गंदे जूते पहन कर कार में न बैठे: हफ्ते में 1 बार अपनी कार के कार्पेट और सीट्स को वैक्यूम करें। ऐसा करने से जमी हुई मिट्टी निकल जाएगी। इतना ही नहीं गंदे जूते लेकर भी कार में न बैठें इससे इन्फेक्शन के साथ स्मेल भी कार में पैदा होने लती है।

अच्छी क्वालिटी का कार परफ्यूम रखें: इस समय मार्किट में कई अच्छी क्वालिटी के परफ्यूम आसानी से मिल जाते हैं ऐसे में आप अपनी कार में सॉफ्ट स्मेल वाला परफ्यूम खरीद सकते हैं। आप स्प्रे वाला परफ्यूम भी रख सकते हैं। स्प्रे वाले परफ्यूम को आप कार के कोने-कोने में इस्तेमाल कर सकते हैं।

स्मोकिंग न करें: अक्सर कार में लोग स्मोकिंग करते नजर आते हैं ऐसे में कार में बदूब रहती है। ऐसे में कोशिश कीजिये कि कार में बिलकुल भी स्मोकिंग न करें।

ओडोर्स का इस्तेमाल एसी सिस्टम की तरफ: कार में ओडोर्स का इस्तेमाल एसी सिस्टम की तरफ करना चाइये क्योकिं ज्यादातर स्मेल यहीं से आती है। बीच-बीच और लगातर ऐसा करने से बाहर से आने वाली बदबू को मिटाया जा सकता है।

यहां लगती है मर्दों की मंडी, मनचाहे दाम पर खरीदती हैं औरतें…

दिल्ली के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां रात 10 बजे के बाद लड़कियों का नहीं बल्कि लड़कों का जाना मुश्किल हो जाता है। इन इलाकों में जाने से लड़के डरते हैं। दरअसल यहां औरतों की नहीं मर्दों की बोलियां लगती हैं। दिल्ली में ऐसी कई जगह हैं जहां शाम के बाद ही मर्दों का बाजार सजता है। आपको बता दें कि इन इलाकों को जिगोलो मार्केट कहा जाता है। यहां अमीर घरों की औरतें मर्दों को खरीदने आती हैं।

जिगोलो मार्केट’ में मर्दों की मुंहमांगी कीमत दी जाती है। यह सब कारोबार रात के 10 बजे के बाद शुरू होता है और सुबह 4 बजे तक चलता रहता है। आपको बता दें कि वैसे तो ये कारोबार छुपकर किया जाता है लेकिन दिल्ली के कई इलाकों में यह खुलेआम होता है। सरोजनी नगर, लाजपत नगर, पालिका मार्केट और कमला नगर मार्केट समेत कई इलाकों में रात होते ही मर्दों की बिक्री है।

कुछ घंटों के लिए जिगोलो की बुकिंग की कीमत 1800 से 3000 रुपए और पूरी रात के लिए 8000 रुपए तक में डील होती है। इस कारोबार को दिल्ली के कई युवा अपना प्रोफेशन बना चुके हैं तो कई अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं। आपको बता दें कि यहां डीलिंग का काम पूरी तरह से सिस्टमैटिक तरीके से होता है।

कमाई का 20 प्रतिशत हिस्सा बिकने वाले मर्द को अपनी संस्था को देना पड़ता है, जिससे वह जुड़ा हुआ होता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मर्दों की पहचान के लिए उनके गले में जिगोलो रुमाल और पट्टे बांध दिए जाते हैं। इससे ही उनकी पहचान होती है। बता दें कि कौन सा लड़का कितना महंगा है ये जिगोलो रुमाल की लंबाई से पता चलता है।

2.60 लाख में लगाएं डिटर्जेंट पाउडर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, 40 हजार मंथली हो सकती है इनकम

अगर आप नया बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं और निवेश के लिए ज्यादा फंड नहीं है तो इस रिपोर्ट का फायदा उठा सकते हैं। आपको सरकार की योजना से जुड़े एक बिजनेस के बारे में बता रहे हैं, जिसमें कम निवेश में ज्यादा मुनाफे की गुंजाइश है।

आप डिटर्जेंट पाउडर एंड केक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगा सकते हैं। यूनिट शुरू करने के लिए आपको 2.60 लाख रुपए अपने पास से निवेश करना होगा। खास बात है कि आप अपने सभी खर्च काटने के बाद भी हर महीने 40 हजार रुपए से ज्यादा की कमाई कर सकते हैं।

क्यों बेहतर है यह विकल्प

रिपोर्ट के मुताबिक, डिटर्जेंट पाउडर एंड केक का इस्तेमाल हर घर में रोजाना होता है। इसकी डिमांड मार्केट में हर समय होती। क्वालिटी अच्छी रहे तो ब्रांड के नाम का भी फर्क नहीं पड़ता।

कितना करना होगा निवेश

प्रधानमंत्री मुद्रा स्‍कीम के प्रोजेक्‍ट प्रोफाइल के अनुसार, डिटर्जेंट पाउड एंड केक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहते हैं तो आपको अपने पास से 2.60 लाख रुपए का निवेश करना होगा। स्कीम के तहत अप्लाई करने पर आपको 3.16 लाख रुपए टर्म लोन और 4.61 लाख रुपए वर्किंग कैपिटल लोन आसानी से मिल जाएगा।

कितना आएगा खर्च

  • फिक्सड कॉस्ट- 4.21 लाख रुपए (इसमें मशीनरी और इक्विपमेंट का खर्च शामिल है।)
  • वर्किंग कैपिटल- 6.15 लाख रुपए ( इसमें एक महीने का रॉ मैटेरियल, वेतन और यूटिलिटीज का खर्च शामिल है।)
  • कुल खर्च- 10.37 लाख रुपए

ऐसे करें लोन के लिए अप्लाई

इसके लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत आप किसी भी बैंक में अप्लाई कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक फॉर्म भरना होगा, जिसमें ये डिटेल देनी होगी.. नाम, पता, बिजनेस शुरू करने का एड्रेस, एजुकेशन, मौजूदा इनकम और कि‍तना लोन चाहिए। इसमें किसी तरह की प्रोसेसिंग फीस या गारंटी फीस भी नहीं देनी होती।

इस तरह होगा प्रॉफिट

10.37 लाख रुपए के प्रोजेक्ट कॉस्ट पर जो एस्टीमेट तैयार किया गया है, उस लिहाज से सालाना टर्नओवर 81,00,000 रुपए हो सकता है। इसमें डिटर्जेंट केक की बिक्री से 21 लाख रुपए और डिटर्जेंट पाउडर की बिक्री से 60 लाख रुपए शामिल हैं।

  • ग्रॉस प्रॉफिट: 5.73 लाख रुपए सालाना
  • नेट प्रॉफिट: 5.15 लाख रुपए सालाना ( टैक्स के बाद)
  • मंथली प्रॉफिट: 40 हजार रुपए से ज्यादा।

ऐसे त्यार होता है 400 रुपए में 40 लीटर नकली दूध ,सेहत के लिए है जहर

एक मिलावट करने वाले ने अपनी पहचान को छिपाते हुए बताया के पिछले काफी समय से नकली दूध बनाने में काम आने वाला पाउडर व केमिकल खरीद रहा हूं। केमिकल व पाउडर के अलावा सोडा व रिफाइंड ऑयल मिलाकर हम नकली दूध तैयार करते हैं।

जल्दी से इसके नकली होने का भी पता नहीं लगता। पाउडर में कास्टिक सोडा मिला होता था। इससे दूध का फैट प्रतिशत बढ़ जाता है, फिर वह ऊंचे रेट पर बिकता है। हम नकली दूध तैयार कर सीधे प्लांट को बेचते थे।

इस काली कमाई के धंधे में मैं अकेला नहीं, बहुत से दूधिए लगे हैं और यह लंबे समय से हो रहा है। अफसरों को भी इसकी जानकारी है। 100 लीटर दूध तैयार करने में महज 10 मिनट का समय लगता है।

त्योहारी सीजन में दूध की मांग जब एकाएक बढ़ जाती है तो हम भी नकली दूध की मात्रा बढ़ा देते हैं। नकली दूध जल्दी तैयार करने के लिए भी एक मशीन आती है, जो बहुत से डेयरी संचालकों व दूधियों के पास है।

3 किलो पाउडर, 2 लीटर केमिकल व 40 लीटर पानी का अनुपात मिलाकर 45 लीटर नकली दूध तैयार किया जाता है। इस 40 लीटर नकली दूध तैयार करने की लागत करीब 400 रुपए आती है। फिर यह दूध 1600 रुपए में बेचा जाता है।

40 लीटर दूध में सीधे 1200 रुपए की कमाई। यह नकली दूध रोज टैंकरों में भरकर नामी डेयरियों व प्लांट में भी सप्लाई किया जाता है। वहां इस दूध से आईसक्रीम व चाकॅलेट-टॉफी बनाई जाती हैं।

चपाती यूनिट का कमाल, हर साल हो रही है 7 लाख की कमाई

पपना मनी चांदना कभी दिहाड़ी पर काम किया करती थी, लेकिन अपना काम शुरू करने की ललक के चलते उन्‍होंने लोन लिया और देखते ही देखते अपनी यूनिट खड़ी कर दी। अब वह न केवल सालाना लगभग 7 लाख रुपए कमा रही हैं, बल्कि वह आठ महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं।

आंध्रप्रदेश के गुंटुर जिले की चांदना ने प्रधानमंत्री इम्‍प्‍लॉयमेंट जनरेशन प्रोग्राम (PMEGP) के तहत 12 लाख रुपए का लोन लेकर इंसटेंट चपाती व पूड़ी मेकिंग यूनिट शुरू की। तीन साल के इस दौर में वह अब महिलाओं के लिए मिसाल बन गई हैं। बल्कि, केंद्र सरकार भी उनकी मिसाल देकर लोगों को PMEGP से लोन लेकर स्‍वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही है।

मिनिस्‍ट्री ने किया ट्विट

मिनिस्‍ट्री ऑफ माइक्रो, स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज की ओर से एक ट्वीट किया गया, जिसमें चांदना की स्‍टोरी के बारे में बताया गया है। साथ ही, लोगों से अपील की गई है कि वे भी PMEGP से लोन ले सकते हैं।

लोन के साथ ली ट्रेनिंग

चांदना ने बताया कि वह घर का खर्च चलाने के लिए अपने ही कस्‍बे में डेली वर्कर के तौर पर काम करती है। वहीं, उसे पता चला कि सरकार की ओर से बिजनेस के लिए लोन मिल रहा है तो वह अपने पति पपना नरसिम्‍हाराव के साथ जिला उद्योग केंद्र पहुंची और लोन के लिए अप्‍लाई कर दिया।

कुछ लोगों की सलाह पर उसने इंसटेंट फूड मेकिंग यूनिट के बारे में जाना। उद्योग केंद्र ने पूरी प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट बनाने में मदद की और वहीं उसे इंसटेंट फूड मेकिंग यूनिट चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई और आखिरकार उसे 12 लाख रुपए का लोन मिला और उसने अपनी यूनिट लगा ली।

60 हजार रु. बचा लेती हैं चांदना

चांदना ने बताया कि पहले साल तक दिक्‍कतें हुई। चपाती बन तो जाती थी, लेकिन कस्‍टमर नहीं थे। कुछ समय बीतने के बाद कस्‍टमर बन गए और अब तीन साल बाद सबकुछ ठीक हो गया है। चांदना के मुताबिक, अभी उनकी यूनिट में आठ महिलाएं काम कर रही हैं। उनकी तनख्‍वाह और बाकी खर्च निकालने के बाद उन्‍हें 50 से 60 हजार रुपए बच जाते हैं।

आप भी ले सकते हैं 25 लाख तक का लोन

पीएमईजीपी को पहले प्रधानमंत्री रोजगार योजना भी कहा जाता था। इस स्‍कीम की शुरुआत साल 2008-09 में हुई थी। इस स्‍कीम का मकसद सेल्‍फ इम्‍प्‍लॉयमेंट को बढ़ाना है।

इस स्‍कीम के तहत 18 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्‍यक्ति सर्विस सेक्‍टर में 5 लाख रुपए से 10 लाख रुपए तक और मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में 10 लाख रुपए से 25 लाख रुपए तक का प्रोजेक्‍ट लगाने के लिए सरकार से लोन ले सकता है।

इस स्‍कीम के तहत 90 फीसदी तक लोन दिया जाता है, जबकि रूरल एरिया में प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट का 25 फीसदी और अर्बन एरिया में 15 फीसदी सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप PMEGP के तहत लोन लेना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर https://kviconline.gov.in/pmegpeportal/jsp/pmegponline.jsp ऑनलाइन अप्‍लाई भी कर सकते हैं। इसके लिए आपके पास आधार नंबर होना जरूरी है। इस आधार नंबर के आधार पर आप अप्‍लाई कर सकते हैं।

आपको बताना होगा कि आप जिला उद्योग केंद्र या खादी बोर्ड के माध्‍यम से लोन लेना चाहते हैं। आपको यह भी बताना होगा कि आप किस बैंक से लोन लेना चाहते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं कि आपकी अप्‍लीकेशन उसी बैंक के पास जाए। आपको पैन कार्ड की भी डिटेल देनी होगी।

प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट करें तैयार

आप जिस बिजनेस के लिए लोन लेना चाहते हैं। उसकी प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट बना कर अप्‍लीकेशन के साथ सबमिट करनी होगी। यदि आपको प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के बारे में जानकारी नहीं है तो आप https://kviconline.gov.in/pmegpeportal/pmegphome/index.jsp वेबसाइट की मदद ले सकते हैं। यह पेज खुलने के बाद आपके लेफ्ट हैंड पर डाउनलोड मॉडल प्रोजेक्‍ट का ऑप्‍शन आएगा, जहां आप मॉडल रिपोर्ट देख कर अपने बिजनेस के हिसाब से प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं।

इन चार मार्केट पर बाजार से आधे दाम में मिलते हैं बच्चों के खिलौने

आम तौर पर बहुत से लोग बच्चों के खिलौनोंं के लिए रिटेल मार्केट जाते हैं। लेकिन रिटेल मार्केट में खिलौने होलसेल मार्केट से महंगे मिलते हैं। कई बार तो एक ही आइटम की कीमत में दोगुने तक का अंतर हो जाता है।

ज्यादा कीमत देने से बचने के लिए आप ऐसी होलसेल मार्केट का रुख कर सकते हैं जहां आपको अच्छी क्वालिटी के खिलौने सस्ते में मिल जाएं। हम यहां आपको देश के कुछ ऐसे ही पॉपुलर होलसेल खिलौना मार्केट के बारे में बता रहे हैं।

तेलीवाड़ा- खिलौने वाली गली, सदर बाजार, दिल्ली

सदर बाजार के लोग तेलीवाड़ा को खिलौने वाली गली के नाम से भी जानते हैं। सदर बाजार एशिया की सबसे बड़ी होलसेल मार्केट है। यहां हर एक प्रोडक्ट कैटेगरी की होलसेल मार्केट है। यहां आपको छोटे बच्चे के लिए खिलौने बैट बॉल, डॉल, हेलिकॉप्टर, ट्रेन से लेकर बड़े बच्चों के लिए ट्राईसाइकिल, साइकिल, स्केटर, कार, बाइक जैसे सभी खिलौने कम दाम में मिल जाएंगे।

यहां के दाम रिटेल या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की तुलना में 30 से 50 फीसदी तक कम होते हैं, क्योंकि यहां से अन्य मार्केट में सप्लाई भी होता है। जैसे जो टॉय कार रिटेल और ई-कॉमर्स वेबसाइट पर 10,000 रुपए में मिलेगी, वो यहां 6 से 8 हजार रुपए में आसानी से मिल जाएगी। यहां खिलौने खरीदते समय बारगेन करना न भूलें।

मोहता मार्केट, क्रॉफोर्ड मार्केट, मुंबई

मुंबई की क्रॉफोर्ड मार्केट में मोहता मार्केट है जो मनीष मार्केट से कुछ गली पीछे है। यहां अन्य रिटेल मार्केट की तुलना में 40 फीसदी तक कम दाम पर खिलौने मिलेंगे। यहां एक टेडी 150 से 250 रुपए में मिल जाएगा जो रिटेल मार्केट में 350 से 500 रुपए में मिलेगा। इसके अलावा रहमान स्ट्रीट और मिर्ची गली में भी खिलौने और गिफ्ट्स मिल जाएंगे।

कैनिंग स्ट्रीट, कोलकाता

कैनिंग स्ट्रीट में मेहता बिल्डिंग के पास खिलौने का होलसेल बाजार है। इस मार्केट में बच्चों के लिए बैट बॉल, डॉल, हेलिकॉप्टर, ट्रेन से लेकर ट्राईसाइकिल, साइकिल, स्केटर, कार, बाइक जैसे सभी खिलौने कम दाम में मिल जाएंगे। यहां के दाम रिटेल या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की तुलना में 30 से 50 फीसदी तक कम होते हैं क्योंकि यहां से अन्य मार्केट में सप्लाई होता है। एक ड्रम जो रिटेल मार्केट में 250 रुपए का मिलेगा, यहां 150 रुपए में मिल जाएगा।

नवीन मार्केट, कानपुर, उत्तर प्रदेश

कानपुर की नवीन मार्केट से भी सस्ते में खिलौने खरीद सकते हैं। यहां खिलौनों की कई दुकानें हैं जहां से कम कीमत पर ट्राईसाइकिल, साइकिल, स्केटर, कार, बाइक से लेकर छोटे बच्चे के लिए ड्रम, डॉल, लाइटिंग वाले खिलौने खरीद सकते हैं।लेकिन यहां खिलौने खरीदने पर बारगेन करना न भूले।

क्यूं मिलते हैं इन मार्केट में सस्ते टॉयज

ये देश के सबसे पुराने ट्रेडिशनल होलसेल मार्केट हैं। ये होलसेल बाजार दिल्ली-एनसीआर, यूपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश तक खिलौने सप्लाई करते हैं। यहां अन्य राज्यों से बनकर खिलौने आते भी हैं और देश के अन्य मार्केट में सप्लाई भी होता है। यहां से राज्यों की रिटेल मार्केट को भी स्टॉक सप्लाई होता है। यहां एक ही डिजाइन के खिलौनों के 20 से 30 पीस मिल जाएंगे।

इस मशीन के साथ शुरू करें टाफी बनाने का बिज़नेस

अगर बात की जाए तो बच्चों को जो चीज़ सबसे ज्यादा पसंद है वो है टाफी ,चोकोलेट ,केन्डी आदि और यह ऐसी चीजें है जिनकी डिमांड कभी भी ख़तम नहीं हो सकती है ।

आज हम आपको एक ऐसी मशीन के बारे में बातएंगे जो टाफी बनाने का काम करती है सिर्फ इतना ही नहीं यह मशीन टाफी बनाने के साथ साथ इसको पैक (Wrap) करने का काम भी करती है ।

यह मशीन कैसे काम करती है इस वीडियो में देखें

यह मशीन एक मिनट मे 350 टोफी तैयार कर देती है । इस मशीन की चौड़ाई 1600mm है और इस की लंबाई 1800mm । इस मशीन के लिए 2 H.P. D.C./1440 R.P.M. पॉवर की जरूरत पड़ती है ।

अगर आप इस मशीन को खरीदना चाहते है तो निचे दिए हुए पते पर संपर्क करें

SHRI VERAI ENGINEERING

  • Address; Mr. Rajubhai I. Prajapati (Proprietor)
    41-42, Bhagirath Estate,
  • Part-2, B/H. Swastik Textile Industries,
  • Gulabnagar, Amraiwadi,
  • Ahmedabad – 382426, Gujarat, India
  • mobile 919426545369, + 919898036414
    Email info@shriveraiengineering.com

ओलंपिक में हर एथलीट मेडल जीतने के बाद दांतों से मेडल को काटता है,जाने इसके पीछे क्या है वजह

ओलंपिक में मेडल जीतना हर एथलीट का सपना होता है. इस सपने को पूरा करने के लिए एथलीट अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं. आपने अकसर देखा होगा कि मेडल जीतने के बाद पोडियम पर खड़े एथलीट जीते हुए मेडल के एक हिस्से को अपने दांतों से काटते हुए नज़र आते हैं.

लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि मेडल जीतने के बाद एथलीट ऐसा क्यों करते हैं? नहीं पता न.दरअसल, पदक जीतने के बाद उसको अपने दांतों से काटने की ये परंपरा सबसे पहले एथेंस ओलंपिक से शुरू हुयी थी. ये परंपरा आज भी जारी है. लेकिन साल 1912 में स्टॉकहोम ओलंपिक में ये परंपरा बंद हो गयी थी.

स्टॉकहोम ओलंपिक में आख़िरी बार खिलाड़ियों को शुद्ध सोने के मेडल दिए गए थे. कहा जाता है कि खिलाड़ी जीत के बाद मेडल अपने दांतों से इसलिए दबाते हैं, ताकि सोने के असली या नकली होनी का पता चल सके. बाद में ये एक परम्परा के तौर पर शुरू हो गयी और खिलाड़ी आज भी ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद ऐसा करते हैं.

ओलंपिक में खिलाड़ियों को जो गोल्ड मेडल दिया जाता है. वो 494 ग्राम सिल्वर और 6 ग्राम सोने का बना होता है. इसका मतलब ये हुआ कि जिसे हम आजतक गोल्ड मेडल समझते थे, उसमे सिर्फ़ 6 ग्राम सोना होता है. लगता है इसी लिए खिलाड़ी दांतों से काटकर असली या नक़ली की पहचान करते हैं.

कहा जाता है कि सोना एक ऐसा धातु है जिसकी शुद्धता की पहचान दांत से काटने के बाद ही हो जाती है. ये परंपरा ऐतिहासिक रही है जोकि इस धातु की शुद्धता के परीक्षण के लिए होती थी. क्योंकि मुलायम धातु होने के कारण सोने को दांतों से काटने पर इस पर निशान पड़ जाते हैं

ये भारत की ट्रेन जिसमें बैठने के लिए हमें लोन ही लेना पड़ेगा !

कभी आपने फाइव स्टार जैसी ट्रेन में सफर किया है ? वैसे तो आपने ट्रेनों में फर्स्ट क्लास से लेकर थर्ड क्लास एसी तक में सफर किया होगा और वहां की सुविधाएं देखी होंगी, लेकिन अगर आपने भारत की सबसे लग्जरी ट्रेनों में सफर नहीं किया है तो उनके बारे में एक बार जान लीजिए.

ये ट्रेन किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं हैं. रॉयल ट्रेन में पैलेस ऑन व्हील्स, महाराज एक्सप्रेस, डेक्कन ओडिसी, रॉयल राजस्थान, गोल्डन चैरियॅट शामिल हैं. इसमें एक और ट्रेन जुड़ने जा रही है और वो है तेजस एक्सप्रेस… जून में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस ये ट्रेन सेवा शुरू की जाएगी.

आइए अब जानते हैं इंडिया की सबसे लग्जरी ट्रेनों के बारे में….

पैलेस ऑन व्हील्स

भारत में सबसे पहले 26 जनवरी 1982 को पहली लग्जरी ट्रेन दिल्ली से शुरू की गई थी वो थी ‘पैलेस ऑन व्हील्स’. उस समय लग्जरी ट्रेनों में एकमात्र यही ट्रेन थी जो विदेशी सैलानियों को भी बहुत लुभाती थी. 23 कोच की इस शाही रेलगाड़ी में 14 सैलून, एक स्पा कोच, दो महाराजा-महारानी रेस्टोरेंट औप एक रिसेप्शन कम बार कोच हैं. इसमें 104 पर्यटक राजसी अंदाज में यात्रा कर सकते हैं.

यह ट्रेन सात दिनों में सैलानियों को राजस्थान के प्रमुख पर्यटन एवं ऐतिहासिक स्थलों के साथ ही विश्व प्रसिद्ध आगरा के ताजमहल की भी सैर करवाती है. यह गाड़ी अपना सफर दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन से प्रत्येक बुधवार को शुरू कर जयपुर, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, जैसलमेर, जोधपुर, भरतपुर और आगरा होते हुए अगले बुधवार को दिल्ली पहुंचती है.

इस ट्रेन का किराया अक्टूबर से मार्च में सीजन होने के कारण 3 लाख 63 हजार है. वहीं अप्रैल से सितंबर में इस ट्रेन का किराया 2 लाख 73 हजार होता है.

महाराजा एक्सप्रेस

दुनिया में कई लक्जरी ट्रेनें चलती हैं, उनमे से एक महाराजा एक्सप्रेस है. यात्रियों के लिए महाराजा एक्सप्रेस में 14 केबिन हैं. इसमें 5 डीलक्स केबिन, 6 जूनियर सूएट, 2 सुईट और एक मैजेस्टिक प्रेसिडेंशियल सुईट हैं. 23 बोगी वाली इस ट्रेन में 88 यात्री सफर कर सकते हैं. महाराजा एक्सप्रेस मे मयूर महल और रंग महल नाम के दो रेस्टोरेंट और बार की भी सुविधा है.

यह ट्रेन दिल्ली से चलकर आगरा, फतेहपुर सीकरी, ग्वालियर, रणथंभौर, वाराणसी, लखनऊ, जयपुर, बीकानेर, खजुराहो व उदयपुर स्टेशन पर रुकती है. यात्री इन ऐतिहासिक स्थानों को देखकर रात का सफर ट्रेन में करते हैं. इस ट्रेन का किराया 1 लाख 93 हजार से लेकर 15 लाख 75 हजार तक है.

डेक्कन ओडिसी

कई सालों के प्रयास के बाद इस ट्रेन की शुरुआत 16 जनवरी, 2004 को हुई थी. ये ट्रेन महाराष्ट्र के खास स्थानों पर जाती है- मुंबई, सिंधुदुर्ग, गोवा, कोल्हापुर, दौलताबाद, चंद्रपुर, अजंता गुफाएं और नासिक. हर स्टेशन या स्टॉपेज एक खास तरह का पर्यटन स्थल है.

इस ट्रेन में कुल 21 डिब्बे हैं. 21 में से 11 डिब्बे यात्रियों के रहने के लिहाज से बनाए गए हैं और बाकी के डिब्बों में डाइनिंग, लॉन्ज, कॉन्फ्रेंस और स्पा की व्यवस्था की गई है. सभी डिब्बों में महाराष्ट्र की सदियों पुरानी अलग-अलग समय की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.

इस ट्रेन का इंटीरियर काफी महंगा और दुर्लभ है. इस ट्रेन का किराया 3 लाख 71 हजार से लेकर 8 लाख 5 हजार तक है.

रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स

ट्रेन में इंडियन और इंटरनेशनल ब्रांडों के स्प्राइट्स और वाइन की सुविधा है जो इसे लग्जरी बनाते हैं. इसमें यात्रियों को भारतीय फूड्स के साथ यूरोपीय, चाइनीज और कॉण्टिनेण्टल खाना सर्व किया जाता है. रॉयल राजस्थान ऑन व्हील्स को सन् 2009 में लॉन्च किया गया था.

इसे पैलेस ऑन व्हील्स 2 भी कहते हैं. ये पैलेस ऑन व्हील्स का अपग्रेड वर्जन है. इस ट्रेन में पैलेस ऑन व्हील्स के मुकाबले ज्यादा जगह है. इस ट्रेन का किराया 3 लाख 78 से लेकर 7 लाख 56 हजार तक है.

गोल्डन चैरियट

ये साउथ इंडिया की लग्जरी ट्रेन है. जो बेंगलुरू से होते हुए लैसूर के रास्ते गोवा तक का सफर तय करती है. 7 दिन के अंदर ये यात्रा पूरी होती है. इस ट्रेन का हर कोच किसी ना किसी रियासत के नाम पर रखा गया है. इसके साथ ट्रेन में दो रेस्त्रा और एक बार भी है. साथ ही इस ट्रेन में जिम और कॉन्फ्रेंस हॉल की भी फैसिलिटी है.

गोल्डन चैरियॅट का किराया- 1,62,000 भारतीयों के लिए, 2,85,000 विदेशियों के लिए (भारतीयों की तुलना में 40% ज्यादा)