एक बिहारी पड़ा थाइलैंड और जापान पर भारी

एक बिहारी सब पर भारी वाली कहावत तो आप ने सुनी होगी वहीं एक बिहारी किसान ने गन्ने के उत्पादन का रिकॉर्ड तोड़ा जिसका लोहा आज थाइलैंड और जापान भी मान रहे हैं। वैसे ये यकीन करना थोड़ा मुश्किल है क्यूंकि जहां गन्ने का प्रति एकड़ औसत उत्पादन 250 से 500 क्विंटल तक हो, वहां कोई 1018 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर सकता है। पर ऐसा एक बिहारी किसान ने कर दिखाया

दो दशक पूर्व मैट्रिक पास करने के बाद जिसे रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा था आज उसके खेतों की फल-सब्जियां बिक्री के लिए सीधे मॉल जा रही हैं। अपनी दो दशकों की मेहनत से उन्होंने न केवल अपनी बल्कि गांव के लोगों की जीवन दशा में बदलाव की पटकथा भी लिखी है।

इस बिहारी किसान की थाईलैंड-जापान यात्रा वाया हरियाणा शुरू हुई। मुजफ्फरपुर के छोटे से कस्बे सकरा के रहने वाले दिनेश प्रसाद ने मैट्रिक तक चंदनपट्टी हाईस्कूल में पढ़ाई की। बात 1996 की है। बिहारी मजदूरों का पलायन हो रहा था।

दिनेश भी गांव के लोगों के साथ रोजगार की तलाश में हरियाणा पहुंच गए। वहां के खेतों में बिहारी मजदूरों की तरह काम करने की बजाय उन्होंने बटाई पर खेती शुरू की। जैविक उर्वरक, जीरो टिलेज और सीड ट्रांसप्लांट तकनीक के इस्तेमाल से आधुनिक खेती की।

आरंभ में पांच एकड़ खेती के मुनाफे ने मनोबल बढ़ाया। आज हरियाणा में करीब 125 एकड़ और अपने गांव में 138 एकड़ भूमि पर खेती कर रहे हैं। गांव में तो उनकी मात्र आठ एकड़ भूमि है लेकिन 130 एकड़ जमीन लीज पर लेकर फलों और सब्जियों की आधुनिक और जैविक खेती से पैदावार का रिकॉर्ड बनाया। छह वर्षों के दौरान दिनेश प्रसाद ने हरियाणा में उन्नत खेती का ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया कि वे राज्य सरकार की नजर में आ गए।

दरअसल 2001 में हरियाणा सरकार ने चीनी मिलों से किसानों की सूची मंगाई थी। उस सूची में दिनेश प्रसाद एकलौते किसान थे जिन्होंने एक एकड़ में 1018 क्विंटल गन्ना उपजाकर चीनी मिल को बेचा था।

हरियाणा सरकार के नुमाइंदे दिनेश के खेत पहुंचे। उन्हें मंच पर आमंत्रित कर वहां के मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया। इसके बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने गांव सकरा में हरियाणा पैटर्न पर पहले अपनी जमीन पर ही खेती शुरू की।

पड़ोसी किसानों से बातचीत कर उन्हें भी आधुनिक कृषि के लिए प्रेरित किया। अब गांव में अपनी आठ एकड़ भूमि के अलावा करीब 130 एकड़ लीज जमीन पर फल- सब्जी उपजा रहे हैं। आधुनिक और जैविक खेती की शोहरत फैली तो रिलायंस फ्रेश सहित अन्य कृषि उत्पाद का कारोबार करने वाली कंपनियों ने दिनेश प्रसाद से उनकी उपज खरीदने का करार कर लिया। अब इनके खेत की सब्जी और फल सीधे एग्री-मार्केट और मॉल में पहुंच रहे हैं।

तीन महीने जापान में रहे : हरियाणा सरकार से सम्मान मिलने के बाद दिनेश प्रसाद पर केंद्र सरकार की नजर भी गई। 2003 में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उन्हें कृषि के क्षेत्र में अपने अनुभव व शोध साझा करने के लिए जापान भेजा।

करीब तीन माह तक दोभाषिये (ट्रांसलेटर) के साथ जापान में कृषि विकास का अध्ययन किया। 2006 में थाइलैंड जाकर उन्होंने वहां खेती के आधुनिक तौर तरीकों का अध्ययन किया। अमरूद, केला, पपीता, कंद, पुदीना, धनिया, गेहूं, गन्ना, बाजरा से लेकर वे ऐसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं।

कमाल की है यह दूध दुहने वाली मशीन, एक मिंट में निकलती है 2 लीटर दूध

देश के तमाम ग्रामीण इलाकों में गाय या भैंस का दुध दुहने में हाथों का इस्तेमाल किया जाता है और सदियों से यही पारंपरिक तरीका अपनाया जा रहा है। लेकिन जब से डेयरी फार्मिंग की नई-नई तकनीकें सामने आई हैं पारंपरिक तरीके पीछे छूटते जा रहे हैं। मिल्किंग मशीन यानी दूध दुहने की मशीन ने डेयरी फार्मिंग और पशुपालन की दुनिया में क्रांति ला दी है।

मशीन से दुध निकालना काफी सरल है और इससे दूध का उत्पादन भी 15 फीसदी तक बढ़ जाता है। मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनिया भर में इस्तेमाल की जा रही है। आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध निकालने के लिए मशीन का सहारा ले रहे हैं।

पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को मिल्किंग मशीन के नाम से जानते हैं। इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है। इससे पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है। इससे दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है।

इस मशीन से गाय को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो। शुरुआत में गाय मशीन को लेकर दिक्कत कर सकती है लेकिन धीरे-धीरे इसे आदत हो जाती है और फिर मशीन से दूध दुहने में कोई दिक्कत नहीं होती।

मशीन से मिलता है स्वच्छ दूध

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथ-साथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी प्रकार की गंदगी नहीं आती। इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है। पशुपालक के दूध निकालते समय उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है। दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

मिल्किंग मशीन के बारे में जानकारी

मिल्किंग मशीन कई तरह की होती है। जो डेयरी किसान अपनी डेयरी में पांच लेकर पचास गाय या भैंस पालते हैं उनके लिए ट्रॉली बकेट मिल्किंग मशीन पर्यापप्त है। ये मशीन दो तरह की होती सिंगल बकेट और डबल बकेट। सिंगल बकेट मिल्किंग मशीन से 10 से 15 पशुओं का दूध आसानी से दुहा जा सकता है वहीं डबल बकेट मिल्किंग मशीन से 15 से चालीस पशुओं के लिए पर्याप्त है।

ट्रॉली लगी होने के कारण इस मशीन को फार्म में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सुविधाजनक होता है। दिल्ली-एनसीआर में डेयरी फार्म के उपकरण बनाने वाली कंपनी के सेल्स हेड और आधुनिक डेयरी फार्मिंग के जानकार रोविन कुमार ने बताया कि मशीन से दूध दुहने से पशु और पशुपालक दोनों को ही आराम होता है।

उन्होंने बताया कि मशीन के अंदर लगे सेंसर गाय के थनों में कोई दिक्कत नहीं होने देते और निर्वाध रूप से दूध निकलने देते हैं। उन्होंने बताया कि मशीन से दूध दुहने में 4 से 5 मिनट का वक्त लगता है, जिसमें कुल दूध का साठ फीसदी दूध शुरुआत के दो मिनट में निकल आता है और बाकी का बाद में।

आपको बता मिल्किंग मशीन  की कीमत 26000 रुपए  है । दिल्ली-एनसीआर में इन मशीनों को बनाने वाली कई कंपनियां हैं और पशुपालकों को ये मशीन आसानी से उपलब्ध है। लेकिन घबराने की जरूरत नहीं बगैर ट्राली के भी ये मशीने उपलब्ध हैं और रेट भी काफी कम हैं।

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन

फिक्स टाइप मिल्किंग मशीन को फार्म के एक हिस्से में स्थापित किया जाता है। इसमें जरूरत के हिसाब से एक से लेकर तीन बकेट तक बढ़ाया जा सकता है। इस मशीन के रखरखाव में खर्चा कम आता है और एक-एक कर पशुओं को मशीन के पास दुहने के लिये लाया जाता है। ये मशीन 15 से 40 पशुओँ वाले डेयरी फार्म के लिए पर्याप्त है।

मशीन से भैंस का दूध दुहना भी आसान

रोविन कुमार ने बताया की गाय और भैंस दोनों के थनों में थोड़ा अंतर होता है, मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर इससे भैंस का दूध भी आसानी से दुहा जा सकता है। भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन के क्लस्टर बदलने होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, बिहार में मिल्किंग मशीन का प्रचल तेजी से बढ़ता जा रहा है। और लोग पारंकपरिक तरीके के बजाए मशीन के जरिए दूध दुहने को तवज्जो दे रहे हैं।

उत्पादन ज्यादा और लागत कम

एक और अहम बात है मशीन द्वारा दूध दुहने से दूध की मात्रा में 10 से 15 फीसदी बढ़ोतरी हो जाती है। मशीन मिल्किंग द्वारा दूध की उत्पादन लागत में काफी कमी तो आती ही है, साथ-साथ समय की भी बचत होती है। यानी परेशानी भी कम और दूध भी ज्यादा। इसकी सहायता से पूर्ण दुग्ध-दोहन संभव है जबकि परम्परागत दोहन पद्धति में दूध की कुछ मात्रा अधिशेष रह जाती है।

मशीन द्वारा लगभग 1.5 से 2.0 लीटर तक दूध प्रति मिनट दुहा जा सकता है. इसमें न केवल ऊर्जा की बचत होती है बल्कि स्वच्छ दुग्ध दोहन द्वारा उच्च गुणवत्ता का दूध मिलता है। इन मशीनों का रखरखाव भी बेहद सरल है, सालभर के मेंटिनेंस का खर्चा मात्र 300 रुपये आता है।

मिल्किंग मशीनों पर मिलती है सब्सिडी

कई राज्य सरकार मिल्किंग मशीनों की खरीद पर सब्सिडी भी दे रही है और बैंकों से इन्हें खरीदने के लिए लोन भी मिल रहा है। पशुपालकों को इसके लिए अपने जिले के पशुपालन अधिकारी और बैंकों के कृषि और पशुपालन विभाग के अफसरों से संपर्क करना चाहिए।

मशीन से दूध दुहने के दौरान बरतें सावधानी

अगर पशु के पहले ब्यांत से ही मशीन से दूध निकालेंगे तो पशु को मशीन से दूध निकलवाने की आदत हो जाएगी। शुरुआत में मशीन द्वारा दूध दुहते समय पशु को पुचकारते हुए उस के शरीर पर हाथ घुमाते रहना चाहिए, ताकि वह अपनापन महसूस करे। दूध दुहने वाली मशीन को पशुओं के आसपास ही रखना चाहिए ताकि वे उसे देख कर उस के आदी हो जाएं, वरना वे अचानक मशीन देख कर घबरा सकते हैं या उसकी आवाज से बिदक सकते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए आप निचे दिए पते पर संपर्क करें

Address: No.57, 3rd A Cross,
1st Main, Havanoor Extension,
Nagasandra Post, Hesaraghatta Main Road,
Bengaluru, Karnataka 560073

Phone: 094818 65059

अंडा,पत्ता गोभी समेत ये चीजें भी चाइना में बनती है नकली पूरी लिस्ट पढ़ कर हो जाओगे हैरान

मसूद अज़हर पर वीटो लाने के बाद चीन भारतीयों की नज़र में खलनायक बन बैठा है। देश में चाइनीज सामान के बायकॉट की लहर है। हालांकि, हम बायकॉट करने पर ज़ोर नहीं दे रहे लेकिन आपको जानना ज़रूरी है कि आपके घर में कौन से सामन ऐसे हैं जो चाइनीज हैं।

शायद आपको पता न हो लेकिन चीन से आए जिन खिलौनों से आपके बच्चे खेलते हैं वह खराब प्लास्टिक से बने होते हैं। चीन हर वह चीज इस्तेमाल करता है जो खराब हो चुकी होती है।

आज हम चीन के उन दस सामानों की बात करेंगे जो भारत में बिकते हैं

  •  चीन ऐसा देश है जहां इंसान के अलावा हर चीज डुप्लीकेट बन जाती है। आईफोन जैसे कई फोन ऐसे हैं जिनका डुप्लीकेट बनाकर चीन दुनियाभर में बेच देता है।
  • चीन में हर साल करीब 10 मिलियन टन चावल बेचा जाता है, जिसमें से 9 मिलियन टन चावल नकली होता है।
  • चीन में नकली सामान का मार्केट बहुत बड़ा है। यहां नकली शहद भी बनाया जाता है।

  • हाल ही में एक बात सामने आई थी कि चीन बच्चों के खिलौनों को बनाने के लिए कंडोम का इस्तेमाल करता है।
  • चीन नकली अण्डों का भी कारोबार करता है। यह नकली अंडे देखने में एकदम असली लगते हैं। इन्हें बनाने में जो केमिकल इस्तेमाल किए जाते हैं उनसे मेमोरी लॉस का खतरा रहता है।
  • चीन में साल 2004 में नकली बेबी फार्मूला जैसे सेरेलैक बनाने के अपराध में 47 लोगों को सजा हुई थी। इस फॉर्मूले के कारण कई बच्चे मर गए थे।
  • इंडस्ट्रियल सॉल्ट जो बेहद सस्ता होता है चीन उसे भी टेबल सॉल्ट बताकर बेच देता है। इंडस्ट्रियल सॉल्ट को खाने से थाइरोइड जैसे बीमारी होती है।

  • हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा था। इस वीडियो में नकली पत्ता गोभी बनाए की विधि बताई जा रही थी।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि चीन काली मिर्च, दाल, नूडल्स, खाने के मसाले भी नकली बना रहा है।
  • आपको बता दें कि चीन में फेस्टिवल्स के नाम पर कुछ ही त्यौहार मनाए जाते हैं। न ही यहां दिवाली मनाई जाती है न ही क्रिसमस की कोई धूम रहती है। फिर भी 85 प्रतिशत क्रिसमस ट्री और 70 प्रतिशत दिवाली लाइट्स यहीं बनाई जाती हैं।

ये 12 तस्वीरें नहीं, बल्कि होटल्स की वो सच्चाई है, जो होटल वाले हमें कभी नहीं बताते

कहीं घूमने जाने से पहले आप उस जगह पर रहने के लिए होटल्स ढूंढते हैं और जिसका रिव्यू सबसे अच्छा होता आप उसे बुक कर लेते हैं. इस दौरान आपको कई अच्छे-अच्छे ऑफ़र्स भी बताए जाते हैं ताकि आप उस होटल को बुक कराने के लिए मजबूर हो जाएं.

मगर उस होटल में पहुचंने के बाद आपको सब कुछ वैसा मिला जैसा उन्होंने बोला था. अगर ऐसा है, तो आप बहुत किस्मत वाले हैं. क्योंकि, आज हम जिन लोगों के अनुभव आपसे शेयर करने वाले हैं उनके साथ बिल्कुल भी वैसा नहीं हुआ जैसा उन्हें बताया गया था.

ये गार्डन नहीं, बल्कि एक मॉटेल का स्वीमिंग पुल है.

इस होटल रूम के बाथरुम की दीवार शीशे और पर्दे से बनी है.

ये कैसा शीशा है?

जब इन्हें अलमारी बनानी थी, तो ये सोफ़ा कम बेड इतना बड़ा क्यों बनाया?

भाई क्या गोलमाल है, बनाना ही होता तो यहां क्यों आते?

इस होटल रूम के कमरे में ही ओपन बाथरूम है.

भाई एडजस्ट करने से ही दुनिया चल रही है!

ये होटल का मूवी रूम है. इससे बड़े टीवी तो घर के हॉल में होते हैं.

कितनी मेहनत कराओगे?

डिस्प्ले में कुछ होता है और जब वहां जाओ, तो कुछ और ही होता है.

शावर है, लेकिन इस्तेमाल कर पाओ, तो कर लो.

इस वैज्ञानिक ने पढ़ी थी अख़बार में अपनी मौत की खबर, उसके बाद इस तरह की नोबल पुरस्कार की शुरुआत

तक़रीबन 100 साल पहले, एक आदमी सुबह का अखबार देख रहा था और अचानक वह अपना नाम मृतकों की नामावली वाले पेज पर देखकर अचंभित और भयभीत हो गया। बाद में अखबार ने विवरण में बताया की गलती से किसी गलत इंसान की मृतक घोषित किया गया।

लेकिन अखबार देखने के बाद उस आदमी की पहली प्रतिक्रिया देखने योग्य थी।वह यही सोच रहा था की वह यहाँ है या वहा है? और जब विवरण को देखते हुए उसने ओने धैर्य को वापिस प्राप्त किया तब उसके दिमाग में दुसरा विचार यह आया की लोग उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे।

जब लोग मृतकों वाली नामावली वाले पेज पर पढेंगे, “डायनामाइट का राजा मारा गया।” और यह भी की, “वह मृत्यु का सौदागर था।” उस आदमी ने डायनामाइट की खोज की थी और जब उसने ‘मौत का व्यापारी’ ये शब्द पढ़े, तो उसने अपनेआप को ही एक प्रश्न पुछा,

“क्या इसी नाम से मुझे याद किया जायेंगा?” उसने उस समय अपनी भावनाओ को महसूस किया और निश्चय किया की वह इस तरह याद रहने वाला नही बनना चाहता।उसी दिन से, उसने शांति के लिए काम करना शुरू किया। उस आदमी का नाम अल्फ्रेड नोबेल था और आज वह महान नोबेल पुरस्कार के लिए याद किये जाते है।

Alfred Nobel – अल्फ्रेड नोबेल

1901 से, भौतिक विज्ञानं, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्र में महान उपलब्धिया प्राप्त करने वाले पुरुष और महिलाओ को नोबेल पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है। उस संस्था 1895 में स्थापित की गयी जब अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में लिखा था की,

वह अपनी सारी जायदाद नोबेल पुरस्कार देने के लिए छोड़कर जा रहे है। जैसे अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी भावनाओ को महसूस किया था और पुनः अपने गुणों को स्थापित करने की ठानी थी उसी तरह हमें भी एक कदम पीछे जाकर आगे बढ़ने की सोचनी चाहिये।

अंग्रेजों को सब्जी की खेती सिखा रहा कुरुक्षेत्र का किसान

शाहबाद के गांव डाडलू निवासी हरबीर सिंह ने रोजगार पाने की खातिर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की। इस नौजवान का कृषि से कोई लम्बा चौड़ा नाता भी नहीं था।

महज 2 कनाल की भूमि वाले इस नौजवान के सिर पर एकाएक सब्जी की खेती करने का एक ऐसा जुनून सवार हुआ कि आज हरबीर सिंह अपने आपको एक प्रगतिशील किसान के रूप में स्थापित कर चुका है। किसान हरबीर सिंह अब अंग्रेजों को सब्जी की खेती करने के गुर सिखा रहा है।

नर्सरी फार्म हाउस पर कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि संस्थानों से विद्यार्थी ट्रेनिंग लेने के लिए पहुंचते हैं। इतना ही नहीं हरबीर सिंह कृषि विश्वविद्यालयों व संस्थानों में बतौर प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांव डाडलू में हरबीर सिंह ने वर्ष 2005 में 2 कनाल क्षेत्र में सब्जियों की नर्सरी लगाने का प्रयास शुरू किया।

उसने धीरे-धीरे 2 कनाल से आज 14 एकड़ भूमि पर सब्जियों की नर्सरी को स्थापित किया। उनकी नर्सरी की पौध इतनी उत्तम है कि लगभग 8 हजार से ज्यादा किसान सब्जी फार्म हाउस से जुड़े हैं और सब्जियों की पौध भी खरीदते हैं। इतना ही नहीं हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार से किसान उनकी पौध खरीदने के लिए पहुंचते हैं। पिछले 2 वर्षों से किसान हरबीर सिंह की पौध की मांग इटली जैसे देशों में भी की जा रही है।

150 तरह के बीजों का प्रतिवर्ष ट्रायल

प्रगतिशील किसान हरबीर सिंह ने बताया कि इस नर्सरी में टपका व फव्वारा सिंचाई तकनीकी को अपनाकर हरी मिर्च, शिमला मिर्च, टमाटर, गोभी, प्याज, बैंगन जैसी सब्जियों के साथ-साथ पपीते के फल की पौध भी तैयार की जा रही है।

इस नर्सरी में करीब 200 लोगों को रोजगार के अवसर भी मुहैया करवाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 2 एकड़ जमीन पर 150 से ज्यादा किस्मों के विभिन्न मल्टीनेशनल कम्पनियों के बीज ट्रायल के तौर पर प्रतिवर्ष लगा रहे हैं।

विदेशी सीख रहे हैं खेती के गुर

हरबीर सिंह के नर्सरी फार्म हाउस पर इंगलैंड, हालैंड, अफगानिस्तान, इस्राइल, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों के डेलिगेट‍्स पहुंचते हैं। इन सभी देशों के प्रतिनिधि सब्जी की खेती करने के गुर सीखते है। हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर किसानों को अप टू डेट करने के लिए प्रतिवर्ष 4 से 5 राज्य व जिलास्तरीय सेमिनारों का आयोजन बागवानी विभाग के सहयोग से किया जा रहा है।

द्विफसलीय चक्र से निकले किसान मछली पालन से कमा रहे है मोटा मुनाफा, एक एकड़ के पौंड से ही सवा लाख की तक कमाई

जिले के जिन किसानों ने धान-गेहूं के द्विफसलीय चक्र से निकलकर मछली पालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाया, वह आज मोटा मुनाफा ले रहे हैं।

पंजाब सरकार के डायवर्सिफिकेशन आैर तंदुरुस्त पंजाब अभियान के तहत डीसी पटियाला ने आसपास के क्षेत्रों में हो रहे मछली पालन की समीक्षा के लिए मछली पालन विभाग के अधिकारियों से मीटिंग की। जिले के गांव सुनियारहेड़ी के संजय इंदर सिंह चहल 22 एकड़ में पौंड बनाकर मछली पाल रहे हैं। 1987 से वह सफलतापूर्वक इस काम में लगे हैं।

ऐसे ही राजपुरा के गांव ढींढसा के परमजीत सिंह ने 1997 में पांच एकड़ जमीन ठेेके पर लेकर मछली पालन शुरू किया। 2008 में 10 एकड़ जमीन और लेकर मछली पालन के वैज्ञानिक तरीके को अपनाया। इसी क्रम में नानोकी गांव के रणजोध सिंह 19 एकड़ में और अवतार सिंह सात एकड़ में मछली उत्पादन कर रहे हैं। कुमार अमित बताते हैं कि ढ़ाई एकड़ के तालाब के लिए सरकार 7 लाख रुपए तक का ऋण दे रही है इस पर 80 हजार रुपए सब्सिडी है।

मछली पालकों को पूंग फार्म बीड़ दोसांझ नाभा में पांच दिन की निशुल्क ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें छह किस्म की मछलियों का पूंग भी मार्च से सितंबर महीने में दिया जाता है। विभाग के सहायक निदेशक अमरजीत सिंह बताते हैं कि प्रति एकड़ एक लाख से सवा लाख रुपए की कमाई तय है। इस व्यवसाय में लागत कम होने से लाभ अधिक रहता है।

झींगा मछली पालन कर रहीं हरपिंदर, 6 साल में पुरुषों को पछाड़ा, 4 राज्यों की सबसे बड़ी उत्पादक
किसान झींगा मछली से मोटी कमाई कर रहे हैं। इस सूची में सबसे ऊपर मुक्तसर के गांव छापियांवाली की महिला किसान हरपिंदर कौर हैं। हरपिंदर कौर ने बताया कि जमीन सेम प्रभावित होने से आमदनी नहीं थी। 2012 से मछली पालन शुरू किया था।

2017 में झींगा मछली का पालन शुरू किया आैर पहली बार 3.5 एकड़ में अच्छी पैदावार की। अब 14 एकड़ में पौंड है। 2017 में 14.80 टन पैदावार कर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली में सबसे ज्यादा पैदावार करने वाली किसान बनीं। मुक्तसर के गांव छापियांवाली में 14 एकड़ में बना रखा है पौंड

5 से 6 लाख रुपए प्रति एकड़ कमा रही हैं मुनाफा

हरपिंदर के अनुसार झींगा मछली से 12 से 14 लाख रुपए प्रति ऐकड़ मुनाफा आता है। सभी खर्च निकाल वह हर साल प्रति एकड़ में 5 से 6 लाख रुपए बचा रही हैं। हरपिंदर कौर के पति फतेह सिंह ने बताया कि पत्नी 2018 में हुए राज्य स्तरीय प्रोग्राम में सम्मानित हो चुकी है। इसके अलावा जिला मुक्तसर के डीसी से भी सम्मानित हो चुकी है। 2014 में 15 टन मछली उत्पादन कर वह पुरुषों को भी पछाड़ चुकी हैं।

पाकिस्‍तान से सटे अमृतसर में आधी रात को सुनाई दी धमाकों की आवाजें आखिर क्‍या थीं, सामने आई ये बड़ी वजह

पाकिस्‍तान से सटे पंजाब के अमृतसर में गुरुवार रात लोगों को धमाकों की आवाजें सुनाई देने की खबरें शुक्रवार सुबह आईं. कुछ लोगों के मुताबिक गुरुवार देर रात 1:30 बजे तेज धमाकों की आवाज सुनाई दीं. पुलिस ने ऐसे किसी भी धमाके से इनकार किया. लेकिन अब इन धमाकों जैसी आवाज का असल कारण सामने आ गया है.

समाचार एजेंसी एएनआई ने सूत्रों के मुताबिक कहा है कि गुरुवार देर रात भारतीय वायुसेना ने पंजाब और जम्‍मू में अपने लड़ाकू विमानों के जरिये किसी भी हालात से निपटने के लिए अभ्‍यास उड़ानें भरी थीं. इस अभ्‍यास के दौरान बड़ी संख्‍या में लड़ाकू विमानों ने अमृतसर समेत अन्‍य स्‍थानों के ऊपर सुपरसोनिक स्‍पीड में उड़ान भरी थी.

माना जा रहा है कि इसी सुपरसोनिक स्‍पीड के कारण ही लोगों को धमाके जैसी आवाजें सुनाई दीं. भारतीय वायुसेना ने ये अभ्‍यास पाकिस्‍तानी वायुसेना द्वारा भविष्‍य में भारतीय हवाई क्षेत्र में घूसपैठ करने की आशंकाओं के मद्देनजर किया है. इसके जरिये भारतीय वायुसेना पाकिस्‍तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है.

वहीं पुलिस ने धमाके जैसी किसी भी घटना से इनकार किया है. न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत करते हुए एडीसीपी जगजीत सिंह वालिया ने कहा कि मैं लोगों से अपील करता हूं कि वह किसी भी तरह के सोशल मीडिया की अफवाहों पर ध्यान न दें. सब कुछ सही है. हमें अभी तक किसी भी तरह की अनहोनी की घटना की कोई जानकारी नहीं मिल रही है.

अमृतसर के कुछ लोगों का कहना है कि यह धमाके विमान के गुजरने के कारण हुए थे. ऐसा भी बताया जा रहा है कि धमाके इतने जोरदार थे कि इनकी आवाज सिर्फ अमृतसर शहर ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी सुनाई दी. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा गया है कि धमाकों के कारण कुछ घरों के शीशे टूट गए और लोगों में डर का माहौल पैदा हो गया.

शहर में कई जगह पुलिस ने लोगों को समझा कर घरों को भेजा. इसी बीच पुलिस कमिश्नर एसएस श्रीवास्तव और डीसी शिव दुलार सिंह ढिल्लों ने बताया कि अभी तक उन्हें धमाके कहां पर हुए हैं इसकी जानकारी नहीं मिली है. जांच की जा रही है. उन्होंने लोगों से अपील की वह किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें.

मिल रहा गैस एजेंसी खोलने का मौका,बिना सिक्योरिटी डिपॉजिट के करें निवेश,यहां करें संपर्क

दिल्ली में एलपीजी गैस एजेंसी खोलने का मौका है। Go Gas कंपनी ने इसके लिए विज्ञापन जारी किया है। कंपनी एंजेसी खोलने के लिए सिक्योरिटी डिपॉडिट नहीं लेगी। मतलब रजिस्ट्रेशन से लेकर डीलरशिप और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए डिपॉजिट नहीं जमा करना होगा।

हालांकि एजेंसी चलाने के लिए बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। मतलब गोदाम और डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर और ऑफिस के लिए जमीन की जरूरत होगी। साथ ही गैस सिलेंडर की डिलीवरी और डीलरशिप स्टोर पर भी इनवेस्टमेंट करना होगा।

यहां करें संपर्क

कंपनी के कॉमर्शियल और नॉन कॉमर्शियल दोनों तरह के गैस सिलेंडर को डिस्ट्रीब्यूशन का मौका होगा। इसके लिए गो गैस ने जिला और तहसील स्तर एजेंसी खोलने के लिए आवेदन मांगे है। जो लोग Go Gas एजेंसी की डीलरशिप लेना चाहते हैं,

उन्हें 7666555560 पर संपर्क करना होगा। साथ ही info@elitegogas.com पर संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा रीजनल ऑफिस 515 A अंसल चेंबर 2 भीकाजी कामा प्लेस नई दिल्ली से भी इस बारे में जानकारी हासिल किया जा सकता है।

गैस एजेंसी लेने की योग्यताएं

आवेदन की उम्र 21 से 60 साल के बीच होनी चाहिए
आवेदक एक भारतीय नागरिक हो
आवेदन ने 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की हो।
आवेदक शारीरिक रुपए से विकलांग नहीं होना चाहिए

बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत

गैस एजेंसी के लिए अप्लाई करने के लिए आवेदक के पास विभिन्न इलाकों (शहरी और ग्रामीण) में गोदाम बनाने के लिए खुद या फिर लीज की जमीन होनी चाहिए, जो ओवरहेड पावर ट्रांसमिशन और टेलीफोन लाइनों से दूरी होनी चाहिए।

जमीन ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां तक ट्रक आसानी तर पहुंच सके। निवेश की क्षमता होनी चाहिए। इसके अलावा खुद की एक गाड़ी होनी चाहिए, जिससे एलपीजी सिलेंडर का ट्रांसपोर्टेशन किया जा सके। गाड़ी किराए की भी हो सकती है। इन्हीं नियमों के आधार पर गैस एजेंसी मिलेगी।

क्या डॉक्यूमेंट चाहिए

  • निवास और जाति प्रमाण पत्र
  • पैन और आधार कार्ड
  • जीएसटी नंबर
  • जमीन के डॉक्यूमेंट या फिर लीज का सर्टिफिकेट

Maruti Suzuki की नई कारें मचाएंगी कार बाजार में धमाल,कंपनी इन कारों को लॉन्च करने की कर रही है तैयारी

देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी आने वाले वक्त में नई कारें लॉन्च करने की तैयारी कर रही है और इसकी झलक अगले साल होने वाले दिल्ली ऑटो एक्सपो में दिखाई देगी। नई लॉन्च वाली कारों में एंट्री लेवल कारों से लेकर डी सेगमेंट की कारें भी शामिल होंगी। साथ ही, मारुति की आने वाली कारों की फ्लीट में इलेक्ट्रिक कारें भी लॉन्च करेगी…

मारुति पिछले कुछ समय से नई ऑल्टो पर काम कर रही है। नई ऑल्टो वर्तमान मॉडल से बिल्कुल अलग होगी। नई ऑल्टो को रेनो क्विड जैसी एसयूवी डिजाइन थीम पर बनाया जाएगा। रेनो क्विड का ग्रांउड क्लियरेंस इस सेगमेंट में सबसे ज्यादा है। साथ ही नई ऑल्टो का डिजाइन फ्यूचर एस कॉन्सैप्ट से लिया जाएगा।

नए मॉडल में टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम, डुअल एयरबैग्स, एबीएस के साथ ईबीडी, स्पीड सेंसर अलर्ट जैसे फीचर भी होंगे। ऑल्टो की बॉडी को सेफ्टी नॉर्म्स के मुताबिक डिजाइन किया जाएगा। नई ऑल्टो में 1.0 लीटर का टर्बोचार्ज्ड पेट्रोल इंजन के साथ मैनुअल और ऑटोमैटिक गियर बॉक्स दिया जा सकता है।

मारुति अर्टिगा का नया वैरियंट अर्टिगा क्रास लॉन्च करेगी, जिसे नेक्सा डीलरशिप के जरिए बेचा जाएगा। नए मॉडल में नई फ्रंट ग्रिल के साथ ब्लैक फिनिश दी जाएगी, साथ ही बंपर्स में भी बदलाव होगा। नई क्रॉस में अलॉय व्हील के साथ 6 सीटटर में लॉन्च किया जाएगा। इसमें मैनुअल के साथ ऑटोमैटिक गियरबॉक्स का भी फीचर मिलेगा। इस मॉडल को इस साल ही लॉन्च किया जा सकता है।

विटारा मारुति के सबसे पॉपुलर मॉडल्स में से है और इस सेगमेंट में सबसे ज्यादा बिकने वाली कार भी है। वतर्मान विटारा की लाइफसाइकिल खत्म हो रही है और नए मॉडल पर काम चल रहा है। नए मॉडल को ह्यूंदै क्रेटा के मुकाबले लॉन्च किया जा सकता है। नई विटारा में नई डिजाइन थीम के साथ नई ग्रिल और नए हैडलैंप्स और टेल लैंप्स मिलेंगे। साथ ही बंपर का लुक भी चेंज होगा। इसके अलावा नई विटारा को डीजल के साथ पेट्रोल में भी लॉन्च का जाएगा। विटारा की लॉन्चिंग 2020 में हो सकती है।

इसके अलावा मारुति विटारा का 7 सीटर वर्जन भी लॉन्च कर सकती है। नई विटारा में 2+3+2 पैटर्न में सीटें होंगी। इसके अलावा खबरें हैं कि नई विटारा पहले से लंबी और चौड़ी होगी। विटारा 7 सीटर में फोर व्हील ड्राइव फीचर दिया जा सकता है। 7 सीटर मॉडल को रेगुलर मॉडल की लॉन्चिंग के बाद उतारा जाएगा।