छत पर खेत बनाकर बस 19 हजार में उगाते हैं 700kg सब्ज़ियां

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है, लेकिन दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में आजकल इमारतों की छत पर इस तरह की खेती हो रही है. कुछ इसी तरह के आइडिया को आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख ने अपनाकर अपना बिजनेस शुरू किया है. उनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है. आइए जानें उनके बारे में…

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

इन दोनों ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

जैविक सामग्री से लैस इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैंगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई साग और मिर्च उगता हैं. पानी मीठा होने की वजह से सब्जियां भी स्वादिष्ट होती हैं.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है, जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

जिस तरह से खेती के लिए जमीन कम हो रही हैं, भविष्य में इन क्यारियों की मांग बढ़ेगी, 4 फीट गुणा 4 फीट की चार क्यारियों लगाने पर एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. एक घंटा इन क्यारियों में समय लगाने से मन लायक सब्जी उगाई जा सकती है.

ये भी हैं तरीका

खेतों के घटने और ऑर्गनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं.

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता. मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं.

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है. इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है. इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

 हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं.इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं.मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है. वहीं, बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते.

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं.

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ बताती हैं कि उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है.कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है. कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है. ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे. छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है.

  • कंपनी हमारी कृषि के मुताबिक, ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिये हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं.
  • शर्मा के मुताबिक, एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है. फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है.
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं. अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है. यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं.

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

यह हैं जर्मनी से जुड़े 10 अजीबो गरीब रोचक तथ्य, जो आप नहीं जानते होंगे

जर्मनी विश्व के ताकतवर देशों में से एक है। जिसने विश्वयुद्ध के बाद कंगाल होने पर भी हार नहीं मानी और आज वह सफलता प्राप्त कर ली है जिस पर विश्वास करना भी मुमकिन नहीं है। आइए जानते हैं जर्मनी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य…

जर्मनी की जनसँख्या

जर्मनी की जनसंख्या लगभग भारत के देश आंध्र प्रदेश के बराबर ही है। जर्मनी की जनसंख्या मात्र 8 करोड़ है।

इस देश की ताकत के पीछे ताकत के देश के नागरिकों की देशभक्ति और मेहनत है जो मुश्किलों में भी मुस्कुराना जानते हैं.

कईं राज्यों से मिलकर बना है यह देश

यहां की राजधानी एक राज्य नहीं बल्कि कई राज्य रह चुके हैं जिनमें Aachen , Regensburg , Frankfun-am-main , Bonn and berlin शामिल है।

जेल से फरार होने पर नही मिलती सज़ा

जर्मनी में माना जाता है कि लोगों को अपनी आजादी से जीने का हक है इसलिए जेल से भागने पर भी उन्हें सजा नहीं दी जाती।

अटपटे देश के चटपटे लोग

जर्मनी के लोगों का अंदाज बड़ा अटपटा है वहां के लोग फोन पर बात शुरू करने पर ‘हेलो’ नहीं बल्कि अपना नाम लेकर बातचीत शुरू करते हैं।

नही है स्पीड लिमिट

जर्मनी के 70 परसेंट हाईवे पर वाहन की कोई स्पीड लिमिट नहीं है लेकिन वहां के वाहनों का रोड पर ही इंधन खत्म हो जाना गैरकानूनी माना जाता है।

किताबें छपने में है अव्वल

जर्मनी की पहली पत्रिका सन 1963 में शुरू की गई थी जहां पर अब तक दुनिया की सबसे अधिक किताबें छापी जा चुकी हैं।साल 1989 से साल 2009 के बीच Germany में 2 हज़ार से ज्यादा स्कूल बंद करने पड़े थे क्योंकि उनमें बच्चों की कमी थी।

लगातार कम हो रही है जनसंख्या

जर्मनी और जापान की जन्म दर संख्या सबसे कम है जर्मनी में पिछले 10 साल में दो लाख जनसंख्या कम हो चुकी है।

जर्मनी का बजट

जर्मनी का रक्षा बजट मात्र इतना है कि अमेरिका में एक कुत्ते को खाना खिलाया जा सके। यानी यह देश पालतू जानवरों पर इंसानों से अधिक खर्व्ह करता है.

कर्ज़ से उबरा देश

पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी बिल्कुल कंगाल हो चुका था उन पर लगभग कितना कर्जा था कि उसकी तुलना 96000 टन सोने की कीमत के बराबर की गई थी।

जन्मदिवस को मानते हैं बुरा

जर्मनी में कभी एडवांस हैप्पी बर्थडे नहीं कहा जाता क्योंकि वह उसे अपना बैड लक मानते हैं।

दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले कारे जर्मनी में बनाई जाती है। जिनमें BMW और AUDi शामिल है।

ये हैं दुनिया के 5 सबसे अमीर किसान, जानिए कितनी है संपत्ति

देश में आमतौर पर किसान की इमेज एक मेहनतकश व्‍यक्ति की है। जबकि, दुनिया के कुछ देशों में यह स्थिति बिलकुल अलग है। आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि चीन के लियू योंघाउ की नेटवर्थ  29,480 करोड़ रुपए है। योंघाउ दुनिया के सबसे अमीर किसान हैं।

आइए जानते हैं दुनिया के ऐसे ही 5 अमीर किसानों के बारे में…

  • चीन के लियू योंघाउ दुनिया के सबसे बड़े किसान हैं। फोर्ब्‍स मैग्‍जीन के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 29480 करोड़ रुपए है।
  • 1982 में योंघाउ व उनके दो भाइयों ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती शुरू की थी।
  • तीनों भाइयों ने चीन के चेंगडू में कुल 150 डॉलर लगाकर मूर्गी पालन भी शुरू किया।
  • आज योंघाउ के पास चीन और ऑस्‍ट्रेलिया में हजारों हेक्‍टेयर के एग्रीकल्‍चर फार्म हैं।
  • योंघाउ चीन की सबसे बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनी न्‍यू होप ग्रुप के मालिक हैं।

  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार अमेरिका के लोवा निवासी हैरी स्‍टाईन की कुल संपत्ति 22,780 करोड़ रुपए है।
  • हैरी स्‍टाईन का लोवा के एडेल में 10000 एकड़ का सोयाबीन और मक्‍का का फार्म है।
  • स्‍टाईन मूल रूप से अपनी हाईब्रिड बीजों के लिए जाने जाते हैं।
  • प्रमुख बीज कंपनी मोंनसेंटो और सिंग्‍नेंटा को इनके फार्म से ही बीज आपूर्ति की जाती है।
  • हैरी ने 1960 में खेती करनी शुरू की थी और 5 साल बाद ही वे हार्इब्रिड बीज उगाने लगे।
  • उन्‍होंने हाल ही में अपनी स्‍टाईन सीड नाम से कंपनी शुरू की है जिसके बीज सबसे महंगे हैं।

  • ब्‍लेरो मैगी ब्राजील के एग्रीबिजनेस मोघुल एंड्रे मैगी के बेटे हैं। ये ब्राजील के सबसे बड़े सोयाबीन किसान हैं।
  • मैगी के फार्म्स को छोड़ दिया जाए तो ब्राजील सोयाबीन उत्‍पादन में दूसरे नंबर से सीधे 5 नंबर पर आ जाएगा।
  • वे ब्राजील में करीब 4 लाख हेक्‍टेअर फार्म में सोयाबीन की खेती कराते हैं और दुनिया के सबसे बड़े प्राइवेट सोयाबीन उत्‍पादक हैं।
  • मैगी दो बार ब्राजील के सीनेटर चुने गए हैं और मई में उन्‍हें ब्राजील का एग्रीकल्‍चर मिनिस्‍टर बनाया गया है।
  • उनके फार्म की सोयाबीन का सबसे बड़ा खरीददार चीन है जो 1990 से डायरेक्‍ट इंपोर्ट कर रहा है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 7705 करोड़ रुपए है।

  • टॉनी का नंबर दुनिया के पांच बड़े किसानों में चौथा है, उन्‍होंने 1951 में 25 गायों से डेयरी फार्मिंग शुरू की थी।
  • ऑस्‍ट्रेलिया के एडिल्विश निवासी टॉनी पेरिच ऑस्‍ट्रेलिया के सबसे बड़े डेयरी फार्मर के रूप में जाने जाते हैं।
  • आज उनके पास 2 हजार गाय हैं और 11000 हेक्‍टेअर का एग्रीकल्‍चर फार्म है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 5159 करोड़ रुपए है।
  • टॉनी ने हाल ही में 1200 फ्लैट वाली एक हाउसिंग सोसाइटी को भी डेवलप करना शुरू किया है।

  • दुनिया का सबसे बड़े इन्‍वेस्‍टर वारेन बफे के बड़े बेटे हावर्ड बफे भी एक किसान हैं।
  • हावर्ड को उनके पिता ने 3 बार कॉलेज में एडमिशन दिलाया लेकिन उन्‍होंने तीनों बार पढ़ाई छोड़ दी
  • 80 के दशक में हावर्ड ने सोयाबीन और मक्‍का की खेती शुरू कर दी और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
  • वे आज 3900 एकड़ में अरीजोना में, 9200 एकड़ साउथ अफ्रिका में और 4400 एकड़ में अमेरिका में खेती करते हैं।
  • उनके पास 50 से ज्‍यादा छोटे बड़े ट्रैक्‍टर हैं। उनके पास कुल मिलकार 2,50,000 डॉलर से ज्‍यादा की एग्री मशीनरी है।
  • फोर्ब्‍स पत्रिका के अनुसार उनकी कुल नेट वर्थ यानी संपत्ति 1340 करोड़ रुपए से अधिक है।

ये हैं किसानों के गुरू, केचुओं से कमाई के सिखाते हैं तरीके

अलीगढ़। तालों और अपने प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के साथ अलीगढ़ इन दिनों किसानों के बीच भी चर्चा में आ रहा है। जिले का एक किसान तमाम किसानों को केचुए से कमाई के तरीके बता रहा है, जिसे सीखने के लिए कई जिलों के लोग आते हैं।

अलीगढ़ जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर अतरौली तहसील ब्लाक अतरोली के गांव बैमवीरपुर में रिटायर्ड शिक्षक अपने जैसे तमाम किसानों को जैविक खाद के उत्पादन और बेहतर पैदावार की राह दिखा रहे हैं। 100 से भी अधिक किसान उनके साथ जुड चुके हैं और केंचुआ खाद का प्रयोग कर फसल में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी जैविक खाद की सप्लाई तमाम जिलों में हो रही है।

जिला अलीगढ़ के तहसील अतरौली के गांव बैमवीरपुर के रहने वाले शंभूदयाल शर्मा वर्ष 2006 में प्राथमिक स्कूल के हेडमास्टर के पद से रिटायर्ड हुए थे। साल 2009 में अतरौली ब्लाक मुख्यालय से उन्हें केंचुआ खाद के उत्पादन और उसके प्रयोग से होने वाले लाभ की जानकारी मिली। उन्होंने प्रयोग के तौर पर केंचुआ खाद का उत्पादन शुरू किया।

उन्होंने खुद की ही फसल में इसका प्रयोग किया। कम लागत में मुनाफा देख उन्होंने इसका विस्तार किया। एक साल में ही दर्जनों गाँवों के कई किसान उनसे जुड़ गए। उनकी लगन और उत्पादन के तरीके को देखकर ब्लाक से उन्हें जिला मुख्यालय पर भेजा गया। सरकार से भी वह प्रोत्साहित हुए तो उन्होंने केंचुआ खाद को बिजनेस के रूप में अपना लिया।

शंभूदयाल शर्मा कहते हैं, ”अब इस खाद की सप्लाई हाथरस, कासगंज, औरेया, पीलीभीत, बरेली, मुरादाबाद, झांसी आदि जिलों में है। खाद के निकलने वाले सरकारी टेंडरों के माध्यम से उनकी सप्लाई इतनी अधिक है कि कभी कभी तो वह पूर्ति भी नहीं कर पाते। स्थानीय किसान भी जैविक खाद खरीद ले जाते हैं।”

पिपरमिंट और मक्का की फसल

जैविक खाद के उत्पादन से इस वक्त किसानों की मक्का और पिपरमिंट की फसल लहलहा रही है। मक्का और पिपरमिंट में किसानों को अच्छा मुनाफा मिलने की उम्मीद है। किसान जैविक खाद के प्रयोग से गेहूं और आलू की भी अच्छी पैदावार ले चुके हैं।

किसान जगवीर सिंह (50वर्ष) का कहना है,”रसायन खाद से पैदा होने वाली फसल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं है। जैविक खाद से पैदा होने वाली स्वास्थ्य के लिए नुकसान दायक नहीं है। साथ ही कम लागत से अच्छी पैदावार मिलती है। मक्का और पिपरमिंट की फसल अच्छी हो रही हैं। हाल ही में गेहूं ने अच्छा मुनाफा दिया।”

केंचुआ की खेती से हो रहे फायदे को देखकर आसपास के किसान भी प्रेरणा ले रहे हैं। जागरुक किसान अब रसायन खाद का प्रयोग छोड़कर केंचुआ की खाद से फसल पैदा कर रहे हैं।

सबसे पहले गोबर एकत्रित किया जाता है। गोबर को हिस्सों में बांटकर उसके बेड बनाए जाते हैं। जिन पर जिला मुख्यालय से मिलने वाला विशेष किस्म के केंचुआ छोड़ दिए जाते हैं। ऊपर से टाट का बोरा-पत्ता आदि डाल दिए जाते हैं।

दो महीने तक बस रोज सुबह शाम पानी का छिड़काव करते रहें। धीरे धीरे खाद उतारते जाएं। इस खाद में ही केंचुआ नर और मादा भी होते हैं, जिनसे केंचुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है और खाद का उत्पादन भी। केंचुआ जितने बढ़ जाएं उसी हिसाब से गोबर के बेड बढ़ा लेने चाहिए।

22 एकड़ में आमों का बाग़ लगा कर यह किसान ले रहा प्रति एकड़ 1.75 लाख का मुनाफा

प्रगतिशील किसान बलजिंदर सिंह आम रिवायती खेती से हटकर आम के बाग लगाकर इलाके में काफी पहचान बना चुके हैं और काफी आमदन कमा रहे हैं। रणजीत बाग के रहने वाले किसान बलजिंदर सिंह ने बताया कि बागबानी विभाग के सहयोग से इस क्षेत्र में काफी तरक्की हासिल की है।

उन्होंने बताया कि शुरू में 10-12 एकड़ से शुरू किए इस व्यवसाय को बलजिंदर सिंह ने 22 एकड़ मे तबदील किया और अपनी मेहनत और विभाग के सहयोग से अब वार्षिक एक एकड़ में से 1 लाख 75 हजार रुपए की आमदन प्राप्त कर रहा है। उन्होंने बताया कि बाग लगाकर शुरुआत के दौर में बाग में से आमदन एक पेंशन के रूप में मिलनी शुरू हो जाती है। इसलिए पानी और दवाइयों की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है।

उन्होंने बताया कि समय-समय पर विभाग की ओर से दवाइयां आदि उपलब्ध करवाई जाती हैं। वहीं, एक एकड़ बाग लगाने पर राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत बागबानी विभाग की ओर से 75 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है, जबकि स्प्रे पंप पर 50 प्रतिशत।

वहीं, बागबानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बलविंदर सिंह व बागवानी अधिकारी प्रितपाल सिंह ने बताया कि किसानों को रिवायती फसलों के चक्कर से बाहर निकालने के लिए फसली विभिन्नता से जोड़ा जा रहा है। दिनों-दिन घटते पानी के स्तर के चलते किसानों को सहायक व्यवसाय अपनाने चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि फसली विभिन्नता संबंधी किसी प्रकार की जानकारी के लिए बागबानी दफ्तर गुरदासपुर संपर्क किया जा सकता है।

Flipkart पर 1 रुपये में बहुत कुछ खरीदने का मौका, जानें कैसे उठाएं ऑफर का लाभ

Flipkart पर 1 रुपये में बहुत कुछ खरीदने का मौका..कुछ समय पहले ही WallMart के साथ समझौता के बाद से Flipkart ने कई शानदार और आकर्षक डील्स उपलब्ध कराई हैं। इस बार Flipkart ने घरेलू सामान को 1 रुपये में देने की पहल की है।

जी हां, ग्राहक अपने घर का सामान 1 रुपये में खरीद सकते हैं। यहां जानें कैसेFlipkart पर 1 रुपये में सेल के तहत ग्राहक घर का सामान खरीद सकते हैं। इस दौरान ग्राहक आटा, शैंपू, दाल-तेल आदि चीजें को बेहद कम कीमत में खरीद पाएंगे।

Flipkart पर ग्रॉसरी स्टोर SuperMart के नाम से दर्ज है। Flipkart पर आपको Today’s Steal Deals नजर आएगा। इसके तहत रोजाना ग्राहकों को तीन घर के सामान को एक रुपये में खरीद पाएंगे। हालांकि, इसके लिए एक शर्त है।

क्या है शर्त?

इस ऑफर का लाभ लेने के लिए ग्राहकों को एक शर्त पूरी करनी होगी। इसके तहत ग्राहकों को 1 रुपये में तीन चीजें खरीदने के लिए कम से कम 599 रुपये की खरीदारी करनी होगी। ऐसा करने के बाद ग्राहक 1 रुपये में एक किलो दाल, 1 किलो चीनी और 1 लीटर सरसों तेल खरीद पाएंगे। इस सेल के दौरान अगर ग्राहक एक्सिस बैंक का कार्ड इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें कैशबैक ऑफर भी दिया जाएगा।

जानें क्या है कैशबैक ऑफर?

Flipkart की साईट या ऐप से एक्सिस बैंक के क्रेडिट या डेबिट कार्ड के जरिए खरीदारी करने पर ग्राहकों को 15 फीसद की छूट दी जाएगी। इस कैशबैक ऑफर का लाभ लेने के लिए ग्राहकों को न्यूनतम 1,500 रुपये की खरीदारी करनी होगी।

2019 में बंद हो सकती हैं ये 6 पॉपुलर कारें, जानें कारण

आज हम आपके लिए अपनी खबर में ऐसी गाड़ियां लेकर आए हैं, जो 2019 के दौरान बंद की जा सकती हैं। हमने इन कारों को आगामी बीएस-6 उत्सर्जन मानक, क्रैश टेस्ट मानदंडों और कम बिक्री के चलते चुना है।

Maruti Suzuki Gipsy

  • कीमत – 5.70 लाख रुपये से 6.40 लाख रुपये (एक्स शोरूम दिल्ली)
  • औसत मासिक बिक्री – 500 से कम यूनिट

मारुति सुजुकी जिप्सी ने 1980 के दशक में भारतीय कार बाजार में कदम रखा था और अब माना जा रहा है कि 2019 में कंपनी इसे बंद कर देगी। इसे बंद करने की मुख्य वजह इस साल से लागू होने वाले भारत न्यू व्हीकल सेफ्टी एसेस्मेंट प्रोग्राम (BNVSAP) माना जा रहा है।

Maruti Suzuki Omni

  • कीमत – 2.76 लाख रुपये
  • औसतन मासिक बिक्री – 6000 से 8000 यूनिट्स

मारुति ओम्नी भी जिप्सी की तरह देश में लंबे समय से बिकने वाली मारुति कारों में से एक है। मौजूदा ओमनी ना तो क्रैश टेस्ट को पूरा कर सकेगी और ना ही इसका पुराना 796cc कार्बोरेटेड इंजन कड़े BS-6 उत्सर्जन मानदंड़ों को पूरा करने में सक्षम है, ऐसे में कंपनी ओमनी को बंद कर सकती है।

Mahindra Xylo

  • कीमत – 9.17 लाख रुपये से 12 लाख रुपये (एक्स शोरूम दिल्ली)
  • औसतन मासिक बिक्री – 500 यूनिट्स

साल 2009 में लॉन्च हुई महिंद्रा जायलो को भी कंपनी इस साल बंद कर सकती है। बता दें, 2009 के बाद कंपनी ने इसका अभी तक नया जनरेशन मॉडल लॉन्च नहीं किया है। महिंद्रा जायलो को पहली जनरेशन स्कॉर्पियो के प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है, जो आगामी क्रैश टेस्ट को पास करने में असमर्थ है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि कंपनी जायलो को भारत में बंद कर देगी

Tata Nano

  • कीमत – 2.36 लाख रुपए से 3.34 लाख रुपये
  • औसतन मासिक बिक्री – 50 यूनिट्स

टाटा नैनो 2008 में लॉन्च होने के बाद सबसे सस्ती कार के रूप में सामने आई। हालांकि, कम कीमत होने के बावजूद भी यह कार कंपनी की उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतरी और आगामी मानदंड़ो के चलते इसे बंद किया जा सकता है।

Fiat Punto, Linea

  • पुंटो कीमत – 5.35 लाख रुपये से 7.47 लाख रुपये (एक्स शोरूम दिल्ली)
  • लीनिया कीमत – 7.15 लाख रुपये से 9.97 लाख रुपये (एक्स शोरूम दिल्ली)
  • औसतन मासिक बिक्री – 100 यूनिट्स से भी कम

इन दोनों कारों की बिक्री अन्य कारों की तुलना में काफी लंबे समय से खराब चल रही है। इतना ही नहीं ये दोनों कारें अपने सेगमेंट में सबसे पुरानी कारें भी हैं। लीनिया की सालाना औसतन बिक्री 100 यूनिट्स से भी कम है। वहीं, पुंटो रेंज की मासिक बिक्री लगभग 50 यूनिट्स तक ही है । कंपनी इन दोनों कारों को खराब सेल्स के चलते बंद कर सकती है।

आप भी पतंजलि स्टोर खोलकर कर सकते है कमाई, बाबा रामदेव खोलने जा रहे है पतंजलि परिधान के 500 शोरूम, ऐसे करें अप्लाई

बाबा रामदेव ने आने वाले दिनों में देश के 50 शहरों में पतंजलि परिधान के 500 स्टोर खोलने की घोषणा की है, ऐसे में आपके पास भी बाबा रामदेव का पतंजलि परिधान स्टोर खोलकर कमाई कर सकते हैं।

एफएमसीजी सेक्टर में धाक जमाने के बाद योग गुरु बाबा रामदेव गारमेंट सेक्टर में भी धूम मचाने की तैयारी में जुट गए हैं। इसके लिए बाबा रामदेव ने पतंजलि परिधान लॉन्च किया है। पतंजलि परिधान ने उत्तराखंड में अपना पहला स्टोर हरिद्वार में शुरू कर दिया है। इस स्टोर का शनिवार को बाबा रामदेव ने उद्घाटन किया।यह पतंजलि का देशभर में छठा परिधान स्टोर है।

आइए बताते हैं कि आप कैसे पतंजलि परिधान स्टोर खोल सकते हैं।

परिधान स्टोर खोलने के लिए पतंजलि की ओर से आवेदन मांगे गए हैं। इसके अनुसार इच्छुक लोगों के पास स्टोर खोलने के लिए 2000 वर्गफुट की कॉमर्शियल प्रॉपर्टी होनी चाहिए। यह प्रॉपर्ट चहल-पहल वाली जगह पर होनी चाहिए। जिन लोगों के पास अपनी प्रॉपर्टी है, उनको प्राथमिकता दी जाएगी।

आप लीज की प्रॉपर्टी पर भी स्टोर खोल सकते हैं। आपको बता दें कि बाबा रामदेव ने आस्था, संस्कार और लिवफिट ब्रांड से परिधान तैयार किए हैं। आस्था के तहत महिलाओं के परिधान, संस्कार में पुरुष और लिवफिट में स्पोर्टस और योगा वियर शामिल हैं।

पतंजलि की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, परिधान स्टोर खोलने के इच्छुक लोग उनसे संपर्क कर सकते हैं। स्टोर खोलने के इच्छुक लोग ई-मेल और फोन दोनों के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

स्टोर के बारे में जानकारी ईमेल आईडी enquiry@patanjaliparidhan.org पर मेल भेजकर ली जा सकती है। इसके अलावा आप पतंजलि के फोन नंबर्स पर संपर्क करके भी जानकारी ले सकते हैं।
मकर संक्रांति तक मिलेगी 25 फीसदी की छूट

बाबा रामदेव ने पतंजलि परिधानों पर मकर संक्रांति तक 25 फीसदी छूट देने की घोषणा की है। बाबा रामदेव ने कहा है कि पतंजलि के पास परिधान में 1100 से अधिक विकल्प उपलब्ध हैं। इनमें पुरुष, महिला और बच्चों की पसंद पर विशेष ध्यान दिया गया है।

वहीं पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने कहा है कि पतंजलि परिधानों की गुणवत्ता, रंग और डिजाइन विश्वस्तरीय है और ये परिधान विदेशी ब्रांड से दो से तीन गुना सस्ते हैं।

भारतीय छात्रों ने बनाई दुनिया की पहली ड्राइवरलेस बस, लग्जरी कार से भी कम है कीमत

पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दुनिया की पहली सोलर पावर से चलने वाली ड्राइवरलेस बस तैयार की है। यह बस एक बार चार्ज करने पर 60 से 70 किलोमीटर तक चलेगी और मोबाइल से ऑपरेट होगी। बस की स्पीड 30 किलोमीटर प्रति घंटा होगी।

बस सौर ऊर्जा से चलती है। ये खास बस पूरी तरह से बनकर तैयार हो चुकी है।इंडियन साइंस कांग्रेस के 106वें एडिशन में इस बस को प्रदर्शित किया गया। ऐसा दावा किया जा रहा है कि इस बस को साल 2019 के अंत तक कार्मिशिलय यूज में लाया जा सकेगा। इस बस को 10 मीटर के रेडियस में कंट्रोल किया जा सकता है।

इस बस की कीमत की बात करें, तो इसे बनाने में करीब 6 लाख रुपए की लागत आई है। बस को तैयार करने में एलपीयू के सीएसई व मैकेनिकल इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को एक साल लगे। सेफ्टी फीचर्स के मामले में यह बस अब तक सबसे सुरक्षित मानी जाती है,क्योंकि बस में लगे आधुनिक सेंसर बस को दुर्घटनाग्रस्त नहीं होने देंगे।

वहीं दुर्घटना होने की स्थिति में बस अपना रास्ता खुद बदल लेगी। इसके अलावा यह बस पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त होगी। इसे मोबाइल फोन से भी चलाया जा सकेगा। यह बस आइपी एड्रेस की आधुनिक तकनीक के साथ कनेक्ट रहेगी। जीपीएस व ब्लूटूथ के साथ भी बस को कनेक्ट किया जा सकता है।

एलपीयू के चांसलर अशोक मित्तल का कहना है कि बस का निर्माण करके उनके युवा विद्यार्थियों ने देश को कुछ नया देने की कोशिश की है। बस में आगे और फीचर्स दिए जाएंगे, जिससे यह आम लोगों के लिए पूरी तरह से पर्यावरण फ्रेंडली बनकर प्रदूषण मुक्त भारत के निर्माण में सार्थक पहल साबित हो सके। 1500 किलो भार वाली इस बस की ऊंचाई आठ फीट है, जबकि लंबाई 12 फीट है।

इसमें 12 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलपीयू कैंपस में पांच दिवसीय विशाल इंडियन साइंस कांग्रेस-2019 का शुभारंभ किया। इस अवसर पर भारत और अन्य देशों के टॉप शैक्षणिक संस्थानों, इंडस्ट्री और साइंस समुदाय के क्षेत्रों से 15,000 प्रतिनिधि और अन्य लोगों ने शिरकत की।