इस किसान ने पराली बेचकर कमाए 30 लाख रुपए, जानें कैसे होती है पराली से इतनी कमाई

पूरा उत्तर भारत इस समय प्रदूषण की चपेट में है और खेतों में जलाई जा रही पराली पर कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा संज्ञान लिया है। वहीं दूसरी तरफ गहरे काले धुंए की परतों में कुछ ऐसे किसान भी हैं जो बिना किसी श्रेय लेने के चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।
गांव जसवंती के मैकेनिकल में बीटेके कर चुके युवा गुरपाल सिंह उन किसानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो स्वयं पराली में आग लगाकर दूसरों को दोषी ठहराते हैं।

बकौल गुरपाल उन्होंने दो सीजन में तीन हजार एकड़ में किसानों को न सिर्फ अवशेष जलाने से रोका, बल्कि इन फानों को प्रयोग अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए किया। अब तक उन्होंने तीन हजार एकड़ फानों की गांठ बनाकर प्राइवेट मिल मालिकों को बेचकर 30 लाख रुपए कमाई की। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पूर्व अवशेषों का समाधान नहीं होने के कारण जब पिता खेत में आग लगाते थे तो वे उन्हें मना करते थे,

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लेकिन संसाधन नहीं होने के कारण आग लगाना मजबूरी होती थी। अवशेषों के साथ मिट्टी को उपजाऊ बनाने में सहायक कीट भी जल जाते थे जिनको देखकर बहुत दर्द होता था। अब वे अपनी 45 एकड़ जमीन के साथ अपने आसपास के दर्जन भर गांवों के किसानों के खेतों के अवशेषों की गांठ बनाकर उन्हें बेचते हैं। किसान बोले- खेत में आग लगाते थे तो दिल रोता था, समाधान नहीं निकलने पर मजबूर थे

नहीं मिल रहा था स्थाई समाधान

2008 में बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गुरपाल पिता के साथ खेती के कार्य में हाथ बंटाने लगा। दो भाईयों पर 45 एकड़ जमीन होने के कारण घर में किसी चीज की तंगी नहीं थी। पिता और बड़े भाई उनको और पढ़ाना चाहते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती करते हुए प्रयोग करने की थी। 2018 में सरकार ने कैथल में 50 प्रतिशत सब्सिडी पर 140 कस्टम हायरिंग सेंटर खोलने का ऐलान किया।

जहां सभी किसान फसल अवशेष प्रबंधन की बजाय दूसरे कृषि यंत्र खरीदने में रुचि ले रहे थे वहीं गुरपाल ने दो बेलर मशीन जिनकी कीमत 27 लाख रुपए थी 50 प्रतिशत सब्सिडी पर खरीदे और पहले ही सीजन में 960 एकड़ में अवशेषों की गांठें बनाकर इन्हें 140 प्रतिशत क्विंटल के हिसाब से मिल मालिकों को बेचा। हालांकि दो सीजन में यंत्रों की कीमत निकाल दें तो यह बचत ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी वे किसानों के लिए काम करके खुश हैं।

किसान को 1 एकड़ से करीब 1300 रुपए की होती है बचत

एक एकड़ में से करीब 25 क्विंटल अवशेष गांठ के रूप में निकलते हैं। एक क्विंटल अवशेष पर 100 रुपए खर्च आता है। जिनमें 60 रुपए ट्रांसपोर्ट और लेबर, 15 रुपए धागा, 20 रुपए डीजल, तीन रुपए चालक खर्च तथा दो रुपए अतिरिक्त खर्च यानि कुल 100 रुपए खर्च आता है। वहीं मिल मालिक किसान को करीब एक क्विंटल के बदले 137 रुपए देते हैं।

पिछले वर्ष यह 140 रुपए में बिका था। यानि किसान को 37 रुपए प्रति क्विंटल यहां से बचत हो रही है और करीब 400 रुपए एक किसान से अवशेष के बदले लिए जाते हैं। यानि एकड़ से किसान को करीब 1300 रुपए बचत होती है। गुरपाल 2018 में 960 एकड़ और 2019 में अब तक 2150 एकड़ अवशेष की गांठ बनाकर बेच चुके हैं।

3 मशीनों का होता है इस्तेमाल

कंबाईन से काटने के बाद अवशेषों को पहले स्लैशर से काटा जाता है और फिर हैरेक से अवशेषों का लाइन बनाई जाती है। उसके बाद बेलर मशीन इनकी गांठ बना देती है। फिर लेबर इन गांठ को वाहनों में लोड करती है और मिल तक पहुंंचाया जाता है।

ऐसे किसानों को प्रोत्साहित और सम्मानित करने की जरूरत

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के कृषि विकास अधिकारी सज्जन सिंह ने कहा कि दोनों सीजन में 16 बेलर यूनिट बेची गई थी। इनमें से कुछ किसान शानदार कार्य कर रहे हैं। पिछले वर्ष भी इन किसानों को सम्मानित करवाने के लिए प्रशासन से अपील की गई थी। ऐसे किसानों को प्रोत्साहित और सम्मानित किए जाने की जरूरत है, क्योंकि पराली जलाना वातावरण व जमीन के लिए घातक है।